गायत्री जी ने भरे गले से कहा, “तान्या, सच कहूँ तो जब मैं यहाँ आ रही थी, तो मेरे मन में बहुत सा मैल था। मुझे लगा था कि तुम आजकल की हवा में उड़ने वाली लड़की हो जो परिवार को अपनी शर्तों पर चलाना चाहती है। लेकिन आज तुमने मेरी आंखें खोल दीं। तुमने मयंक को नहीं, मुझे चुनकर यह साबित कर दिया कि तुम्हारे लिए रिश्तों की क्या अहमियत है। जिस घर में सास और बहू एक-दूसरे की ढाल बन जाएं, उस घर को दुनिया की कोई ताकत नहीं तोड़ सकती। मैं तुम्हें वचन देती हूँ, मेरे घर में तुम कभी घुटन महसूस नहीं करोगी। गलतियां तुम करोगी तो मैं सुधारूँगी, और अगर कभी मुझसे कोई भूल हो जाए, तो तुम भी मुझे हक से टोक देना। मयंक मेरा बेटा जरूर है, पर उस घर की असली चाबी अब तुम्हारी होगी।”
ड्राइंग रूम की सेंटर टेबल पर कई तस्वीरें, कुंडलियाँ और बायोडाटा बिखरे पड़े थे। पिछले तीन हफ्तों से घर का माहौल कुछ तनावपूर्ण चल रहा था। वजह थी उनकी इकलौती और लाडली बेटी तान्या का विवाह। तान्या एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर एचआर एग्जीक्यूटिव थी, पढ़ी-लिखी, सुलझी हुई और हर फैसले को बेहद परिपक्वता से लेने वाली लड़की। कई महीनों की मान-मनौव्वल के बाद आखिरकार उसने शादी के लिए हामी भरी थी। भोपाल के एक बेहद संभ्रांत और प्रतिष्ठित परिवार से उसके लिए एक बहुत ही अच्छा रिश्ता आया था। लड़का, मयंक, पेशे से एक सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट था, अच्छा कमाता था और स्वभाव से भी शांत बताया गया था। दोनों परिवारों ने आपस में तस्वीरें देख ली थीं, कुंडलियाँ मिल चुकी थीं और बातचीत आगे बढ़ रही थी।
तान्या की मां, शकुंतला जी, पिछले दो दिनों से लगातार तान्या के पीछे पड़ी थीं कि वह किसी कैफे में जाकर मयंक से एक बार मुलाकात कर ले। उनका मानना था कि आजकल के जमाने में लड़के-लड़की का एक-दूसरे को समझना सबसे जरूरी होता है। जब शकुंतला जी ने हाथ में चाय का कप थमाते हुए फिर से वही बात दोहराई, तो तान्या ने कप मेज पर रखा और बहुत ही सहजता से अपनी मां की आंखों में देखा।
तान्या बोली, “मां, आप बार-बार मयंक से मिलने का दबाव क्यों बना रही हैं? मैंने आपसे कल भी कहा था और आज भी कह रही हूँ कि अगर मुझे शादी से पहले किसी से मिलना है, तो वह मयंक नहीं बल्कि उसकी मां होंगी। मैं पहले अपनी होने वाली सास से अकेले में मिलना चाहती हूँ।”
यह बात सुनते ही कमरे में सन्नाटा छा गया। शकुंतला जी की आंखें फटी की फटी रह गईं। पास ही अखबार पढ़ रहे राजेंद्र जी ने चश्मे के ऊपर से बेटी को देखा और हैरान रह गए।
शकुंतला जी का पारा चढ़ गया। वे बोलीं, “तान्या, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? कभी सुना है कि शादी से पहले कोई लड़की लड़के को छोड़कर उसकी मां से मिलने की जिद करे? जिंदगी तुम्हें मयंक के साथ बितानी है, उसकी मां के साथ नहीं। चार लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे कि लड़की का दिमाग फिर गया है! आखिर तुम चाहती क्या हो? शादी करनी है या कोई तमाशा खड़ा करना है?”
तान्या मुस्कुराई और अपनी मां का हाथ पकड़ते हुए बोली, “मां, आप इतनी परेशान क्यों हो रही हैं? मैंने शादी से मना कब किया? मैं तो बस रिश्ते की बुनियाद मजबूत करना चाहती हूँ। आप मुझे एक बात बताइए, जब एक लड़की ब्याह कर किसी नए घर में कदम रखती है, तो उसका सबसे ज्यादा सामना किससे होता है? पति तो सुबह नौ बजे दफ्तर निकल जाएगा और रात को आठ बजे थका-हारा लौटेगा। उस घर में पूरे दिन, चौबीसों घंटे लड़की किसके साथ रहेगी? अपनी सास के साथ। अगर घर की दो स्त्रियों के बीच तालमेल, समझ और सम्मान नहीं होगा, तो क्या वह घर कभी स्वर्ग बन सकता है? पति चाहे जितना प्यार करने वाला हो, अगर सास-बहू के रिश्ते में कड़वाहट आ गई, तो धीरे-धीरे पति-पत्नी का रिश्ता भी घुटने टेक देता है। आए दिन के ताने, मनमुटाव और शिकायतें इंसान का मानसिक सुकून छीन लेती हैं। फिर मैं रोते हुए आपके पास आऊँ, इससे तो बेहतर है कि मैं पहले उस घर की धुरी यानी उस मां को समझूँ, जिनके साए में मुझे अपनी पूरी जिंदगी बितानी है।”
तान्या की बातें सुनकर राजेंद्र जी के चेहरे पर एक गहरी मुस्कान उभर आई। वे अखबार एक तरफ रखकर बोले, “शकुंतला, तुम क्यों खामखां गुस्सा हो रही हो? हमारी बेटी की बात में बहुत गहरा अर्थ छुपा है। आज तक हमारे समाज में यही दकियानूसी रवायत चली आ रही है कि सिर्फ लड़का-लड़की को कॉफी शॉप में बिठा दो, वे दो-चार मीठी बातें कर लें और शादी पक्की समझो। लेकिन हकीकत यह है कि शादी के बाद अस्सी प्रतिशत कलह सास और बहू के वैचारिक मतभेदों के कारण होती है। अगर तान्या पहले ही अपनी होने वाली सास के स्वभाव, उनकी सोच और उनके घर चलाने के तरीके को समझ लेना चाहती है, तो इसमें बुराई क्या है? यह तो समझदारी की निशानी है।”
शकुंतला जी ने अपना माथा पकड़ लिया, “वाह भाई बाप-बेटी! दोनों मिलकर मुझे ही पागल साबित कर दो। कल को लड़के वाले सोचेंगे कि कैसी अजीब लड़की है जो लड़के को मिलने के बजाय सास का इंटरव्यू लेना चाहती है! अगर उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया तो?”
राजेंद्र जी ने आत्मविश्वास से कहा, “अगर वे इतने संकुचित विचार के होंगे कि एक लड़की की इस सकारात्मक सोच को न समझ सकें, तो हमें भी ऐसा रिश्ता नहीं चाहिए। पर मुझे मयंक के पिता हरिशंकर जी बहुत सुलझे हुए इंसान लगे। मैं आज ही उनसे बात करता हूँ।”
दोपहर में राजेंद्र जी ने भोपाल फोन लगाया। हरिशंकर जी ने बड़े आदर से फोन उठाया। इधर-उधर की औपचारिक बातों के बाद राजेंद्र जी ने थोड़ा संकोच करते हुए तान्या के दिल की बात उनके सामने रख दी। उन्होंने कहा, “हरिशंकर जी, हमारी बेटी तान्या मयंक से मिलने से पहले आपकी धर्मपत्नी, यानी अपनी होने वाली सास गायत्री जी से अकेले में मिलना और बातचीत करना चाहती है। वह चाहती है कि दोनों एक-दूसरे को समझें।”
फोन के दूसरी तरफ एक पल के लिए खामोशी छा गई, लेकिन फिर हरिशंकर जी का जोरदार ठहाका गूंजा। वे बोले, “अरे वाह राजेंद्र जी! आपकी बेटी ने तो सचमुच कमाल का विचार रखा है। आज के दौर में जहां लड़कियां केवल लड़के का पैकेज, गाड़ी और लाइफस्टाइल देखती हैं, आपकी बेटी उस घर की नींव और संस्कारों को समझने की कोशिश कर रही है। यह उसकी परिपक्वता को दर्शाता है। शुरुआत में ही हर भ्रम और संशय को दूर कर लेने से रिश्ते में कभी दरार नहीं आती। मैं इस बात का पूरा समर्थन करता हूँ।”
जब हरिशंकर जी ने यह बात अपनी पत्नी गायत्री जी को बताई, तो उनका मुंह बन गया। गायत्री जी थोड़ी पारंपरिक सोच वाली महिला थीं। वे माथे पर त्यौरी चढ़ाते हुए बोलीं, “यह क्या नई हवा चल पड़ी है? लड़की लड़के से मिलने के बजाय मुझसे मिलना चाहती है? कहीं यह कोई चाल तो नहीं? मुझे तो इस लड़की के तौर-तरीके और तेवर ठीक नहीं लग रहे। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह पहले ही आकर मुझ पर धौंस जमाना चाहती हो या देखना चाहती हो कि सास सीधी है या तेज?”
हरिशंकर जी ने हंसते हुए अपनी पत्नी को समझाया, “भाग्यवान, तुम हर बात का उल्टा मतलब क्यों निकालती हो? तुम जो यह पूर्वाग्रह पाल रही हो, तान्या इसीलिए तो तुमसे मिलना चाहती है ताकि वह तुम्हारे मन के इस डर को दूर कर सके और तुम उसके मन को समझ सको। वह होने वाले पति से पहले सास को अहमियत दे रही है, तुम्हें तो गर्व होना चाहिए। बेटा तो दिन भर काम में व्यस्त रहेगा, घर की दहलीज तो तुम दोनों को मिलकर संभालनी है। अगर बहू तुम्हारी पसंद-नापसंद, तुम्हारी दिनचर्या और तुम्हारे नजरिए को पहले ही जान लेगी, तो कल को घर में कभी खटपट ही नहीं होगी। मिलने में क्या हर्ज है? तुम भी तो देख लो कि तुम्हारी होने वाली बहू तुम्हारे दिल में जगह बनाने लायक है या नहीं।”
पति की बातों ने गायत्री जी के मन की बेचैनी को थोड़ा शांत किया, हालांकि उनके मन में अब भी एक अजीब सी हिचक बाकी थी। तय हुआ कि अगले रविवार को गायत्री जी और तान्या उज्जैन के एक शांत और खूबसूरत रेस्टोरेंट में मिलेंगी, जहां दोनों खुलकर अपने दिल की बात कह सकें।
रविवार का दिन आया। गायत्री जी अपने पति के साथ उज्जैन पहुँचीं। हरिशंकर जी बाहर ही गाड़ी में रुक गए और गायत्री जी अंदर रेस्टोरेंट के एक कोने में बुक की गई टेबल पर जाकर बैठ गईं। ठीक ग्यारह बजे तान्या ने रेस्टोरेंट में प्रवेश किया। उसने एक सादा लेकिन बेहद शालीन आसमानी रंग का कुर्ता पहन रखा था, चेहरे पर कोई बनावटी चमक नहीं, बल्कि एक आत्मविश्वास भरी सौम्यता थी। टेबल के पास पहुंचते ही तान्या ने झुककर गायत्री जी के चरण स्पर्श किए।
गायत्री जी ने औपचारिक रूप से उसे आशीर्वाद दिया और बैठने का इशारा किया। कुछ पलों के लिए दोनों के बीच एक असहज शांति छाई रही। वेटर ने आकर पानी का गिलास रखा।
गायत्री जी ने सीधे मुद्दे पर आते हुए थोड़ी कठोरता से पूछा, “तान्या बेटा, तुमने मयंक को मिलने के लिए नहीं बुलाया, बल्कि मुझे बुलाया। सच कहूँ तो मुझे यह बात थोड़ी अजीब लगी। हमारे जमाने में तो सास का नाम सुनकर ही लड़कियां सहम जाती थीं, और तुम सीधे मुझसे ही मिलने आ गईं? क्या जानना चाहती हो तुम? क्या तुम्हें लगता है कि मैं कोई सख्त और जालिम सास बनूँगी?”
तान्या ने बहुत ही धीमे और आत्मीय स्वर में उत्तर दिया, “आंटी जी, अगर मेरी किसी बात से आपको ठेस पहुँची हो तो मुझे क्षमा कीजिएगा। पर सच यह है कि मेरे मन में आपके प्रति कोई डर या शंका नहीं है, बल्कि एक गहरी जिज्ञासा और सम्मान है। जब एक लड़की शादी करके विदा होती है, तो वह अपना बचपन, अपने माता-पिता, अपनी सहेलियां और अपना पूरा अस्तित्व पीछे छोड़ आती है। नए घर में सब कुछ नया होता है। पति चाहे जितना भी अच्छा हो, वह कभी मां की कमी पूरी नहीं कर सकता। एक पुरुष कभी नहीं समझ सकता कि रसोई में मसाले कहाँ रखे हैं, घर की परंपराएं क्या हैं, या किस त्यौहार पर घर को कैसे सजाया जाता है। यह सब केवल एक मां सिखा सकती है। मैं मयंक को तो बाद में भी जान सकती हूँ, लेकिन मैं पहले यह जानना चाहती थी कि जिस घर में मुझे अपनी बाकी की जिंदगी गुजारनी है, उस घर की जो असली स्वामिनी हैं, उनके दिल में मेरे लिए क्या जगह होगी? क्या वे मुझे केवल एक काम करने वाली बहू के रूप में देखती हैं, या एक ऐसी बेटी के रूप में जिसे वे अपनी गलतियों पर डांट भी सकें और गले से लगाकर समझा भी सकें?”
तान्या के इन निश्छल शब्दों ने गायत्री जी के दिल के किसी कोने को छू लिया। उनकी आंखों की सख्ती थोड़ी पिघली। उन्होंने गहरी सांस लेते हुए कहा, “बेटा, तुम्हारी बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं, लेकिन असल जिंदगी इतनी आसान नहीं होती। मैंने अपने परिवार को संवारने में अपनी पूरी जवानी लगा दी है। मेरे अपने कुछ नियम हैं, घर को साफ-सुथरा रखने की आदत है, सुबह जल्दी उठने की परंपरा है। तुम आजकल की पढ़ी-लिखी, नौकरीपेशा लड़कियां क्या इन बंधनों में बंध पाओगी? कल को तुम कहोगी कि मुझे काम पर जाना है, मैं सुबह चाय नहीं बना सकती, या मुझे अपने तरीके से जीना है, तब क्या होगा?”
तान्या ने बिना किसी हिचकिचाहट के मुस्कुराते हुए कहा, “आंटी, आपने बिल्कुल सही सवाल पूछा, और मैं यही स्पष्टता चाहती थी। मैं नौकरी करती हूँ, यह सच है, और मैं अपने करियर के प्रति समर्पित हूँ। लेकिन करियर मेरे जीवन का एक हिस्सा है, मेरा पूरा जीवन नहीं। मैं यह नहीं कहती कि मैं एक आदर्श गृहिणी बन जाऊँगी और पहले ही दिन से आपके सारे तौर-तरीके सीख लूँगी। मुझसे गलतियां होंगी, कभी खाना बनाते वक्त नमक कम-ज्यादा हो सकता है, कभी काम की थकान की वजह से मैं सुबह देर से उठ सकती हूँ। पर मैं आपसे एक वादा करती हूँ कि मैं कभी उस घर को पराया नहीं समझूँगी। अगर आप मुझे एक बहू के बजाय अपनी बेटी की तरह अपनाएंगी, तो मैं भी आपको अपनी मां की तरह ही मानूँगी। जहां मुझसे गलती हो, आप मुझे अकेले में डांट लीजिएगा, हक से समझा दीजिएगा, लेकिन हमारे बीच कोई तीसरा व्यक्ति, चाहे वह मयंक ही क्यों न हों, शिकायत लेकर न आए। हम दोनों मिलकर उस घर को संभालेंगे। क्या आप मुझे वह space और वह ममता दे पाएंगी जो मुझे मेरी मां से मिलती है?”
गायत्री जी तान्या के चेहरे को एकटक देखती रहीं। उन्होंने देखा कि इस लड़की की आंखों में कोई अहंकार, कोई दिखावा या कोई चालाकी नहीं थी। उसमें सिर्फ एक सच्चा समर्पण और अपने आने वाले कल को सुरक्षित करने की समझदारी थी। गायत्री जी को अचानक अपना वह दौर याद आ गया जब वे ब्याह कर आई थीं। उनकी सास बहुत सख्त थीं, और उन्होंने अपने जीवन के पहले दस साल केवल डर और घबराहट में बिताए थे। वे कभी अपनी सास के सामने खुलकर हंस भी नहीं पाई थीं। उस डर ने उनके रिश्ते में कभी अपनापन नहीं आने दिया था। आज उनके सामने खड़ी यह आधुनिक लड़की उस पुराने चक्रव्यूह को तोड़ना चाहती थी। वह डर के रिश्ते को प्यार और विश्वास के रिश्ते में बदलना चाहती थी।
गायत्री जी की आंखों के कोरों में नमी तैर आई। उन्होंने आगे बढ़कर तान्या का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उनका स्पर्श अब पूरी तरह बदल चुका था, उसमें एक ममतामयी गर्माहट थी।
गायत्री जी ने भरे गले से कहा, “तान्या, सच कहूँ तो जब मैं यहाँ आ रही थी, तो मेरे मन में बहुत सा मैल था। मुझे लगा था कि तुम आजकल की हवा में उड़ने वाली लड़की हो जो परिवार को अपनी शर्तों पर चलाना चाहती है। लेकिन आज तुमने मेरी आंखें खोल दीं। तुमने मयंक को नहीं, मुझे चुनकर यह साबित कर दिया कि तुम्हारे लिए रिश्तों की क्या अहमियत है। जिस घर में सास और बहू एक-दूसरे की ढाल बन जाएं, उस घर को दुनिया की कोई ताकत नहीं तोड़ सकती। मैं तुम्हें वचन देती हूँ, मेरे घर में तुम कभी घुटन महसूस नहीं करोगी। गलतियां तुम करोगी तो मैं सुधारूँगी, और अगर कभी मुझसे कोई भूल हो जाए, तो तुम भी मुझे हक से टोक देना। मयंक मेरा बेटा जरूर है, पर उस घर की असली चाबी अब तुम्हारी होगी।”
तान्या की आंखें भी छलक आईं। उसने गायत्री जी के सीने से लगकर राहत की सांस ली। जो डर, जो संशय दोनों तरफ था, वह एक खुली और सच्ची बातचीत से हमेशा के लिए धुल चुका था।
जब दोनों रेस्टोरेंट से बाहर निकलीं, तो हरिशंकर जी गाड़ी के पास खड़े उनका इंतजार कर रहे थे। उन्होंने अपनी पत्नी के चेहरे पर खिली निश्चिंत मुस्कान और तान्या के चेहरे का संतोष देखकर तुरंत भांप लिया कि बाजी जीत ली गई है।
घर लौटकर गायत्री जी ने सबसे पहले मयंक को अपने पास बुलाया। मयंक थोड़ा झिझक रहा था कि पता नहीं मां और तान्या की मुलाकात कैसी रही होगी। गायत्री जी ने मयंक के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, तूने भले ही अपने लिए जीवनसंगिनी चुनी हो या न चुनी हो, लेकिन मैंने अपने लिए एक ऐसी बेटी चुन ली है जो इस घर को स्वर्ग बना देगी। अब मुझे तेरी शादी की कोई चिंता नहीं है।”
कुछ ही महीनों बाद दोनों की शादी बेहद धूमधाम और आत्मीय माहौल में संपन्न हुई। शादी के बाद जब तान्या विदा होकर ससुराल पहुँची, तो गृह प्रवेश के समय गायत्री जी ने केवल आरती की थाली नहीं सजाई थी, बल्कि चौखट पर तान्या के कान में धीरे से कहा था, “यह तुम्हारा मायका ही है बेटा, यहाँ कभी खुद को पराया मत समझना।”
समय बीतता गया। तान्या ने अपनी नौकरी भी जारी रखी और घर की जिम्मेदारियां भी बाखूबी संभालीं। कभी-कभी मयंक और तान्या के बीच छोटी-मोटी नोकझोंक होती, तो गायत्री जी हमेशा अपनी बहू के पक्ष में खड़ी होकर मयंक को डांट लगाती थीं। घर में हंसी-ठिठोली, प्यार और शांति का वास था। मोहल्ले की दूसरी औरतें जब यह देखतीं, तो हैरान रह जातीं कि एक सास और बहू के बीच इतनी गहरी दोस्ती कैसे हो सकती है। वे भूल जाती थीं कि इस रिश्ते की शुरुआत किसी दिखावे से नहीं, बल्कि शादी से पहले दिल से दिल के सीधे संवाद और एक-दूसरे को समझने की सच्ची नीयत से हुई थी।
तान्या ने यह साबित कर दिया था कि एक सफल वैवाहिक जीवन की शुरुआत सिर्फ पति को जानने से नहीं, बल्कि उस पूरे आंगन की छांव को महसूस करने से होती है जहां इंसान को उम्र भर रहना है।
प्रिय पाठकों, आज के आधुनिक दौर में अक्सर शादियों के टूटने की वजह सास और बहू के बीच पनपने वाली कड़वाहट और संवादहीनता होती है। क्या आपको लगता है कि तान्या का शादी से पहले अपनी होने वाली सास को समझना और उनसे खुलकर बात करना एक सही और अनुकरणीय कदम था? क्या हमारे समाज को भी रिश्तों की इस नई और सकारात्मक सोच को अपनाना चाहिए? अपने अनमोल विचार और अनुभव हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं।
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