ढलती धूप की सुनहरी छांव

 विनीत ने कहा, “बाबूजी, मां और आपने पिछले तीस सालों में कभी अपने लिए कोई छुट्टी नहीं ली। जब भी छुट्टियां लीं, हमारे दाखिलों के लिए, हमारी शादियों के लिए या किसी रिश्तेदारी को निभाने के लिए लीं। अब आपकी असली छुट्टियां शुरू होती हैं। आप दोनों जाइए, झीलों के किनारे बैठिए, सुकून से सूर्यास्त देखिए और अपनी जिंदगी को अपने अंदाज में फिर से जिएं।”

सुलोचना की आंखों में कृतज्ञता के आंसू थे और अवधेश जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था। उन्हें समझ आ गया था कि जिंदगी खत्म नहीं हुई है, बल्कि जिंदगी का सबसे हसीन, तनावमुक्त और सुकून भरा अध्याय तो अब शुरू हुआ है। जिस रिटायरमेंट को वे अपने अस्तित्व का अंत समझ रहे थे, वह दरअसल उनके अपने सपनों को जीने की एक नई शुरुआत थी।

शाम के करीब साढ़े सात बज रहे थे। बाहर सर्दियों की हल्की धुंध और खामोशी धीरे-धीरे शहर की गलियों में पसर रही थी। ड्राइंग रूम की दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी की टिकटिक की आवाज सन्नाटे को और गहरा कर रही थी। सोफे पर बैठे अवधेश जी बार-बार अपनी कलाई घड़ी और दीवार घड़ी का मिलान कर रहे थे। पिछले पैंतीस सालों से उनकी जिंदगी का हर पल समय की इसी पाबंदी से बंधा हुआ था। सुबह ठीक आठ बजे घर से निकलना, सरकारी सिंचाई विभाग के मुख्य दफ्तर में बैठकर फाइलों का अंबार निपटाना, मातहतों को दिशा-निर्देश देना और शाम को नियत समय पर घर लौटना—यही उनका संसार था।

मगर अब उस संसार की मियाद पूरी होने में सिर्फ चार दिन बचे थे। इकतीस दिसंबर की तारीख उनके जीवन के उस सबसे बड़े पड़ाव की तरह सामने खड़ी थी, जिससे हर नौकरीपेशा इंसान कभी न कभी गुजरता है। रिटायरमेंट का दिन। उनकी पत्नी सुलोचना रसोई से चाय की दो प्यालियां लेकर आईं और एक प्याली अवधेश जी के सामने मेज पर रख दी।

सुलोचना ने पति के चेहरे पर जमी मायूसी की परतों को देखा और हौले से कहा, “क्या बात है, पिछले कई दिनों से देख रही हूं, चाय ठंडी हो जाती है और आप बस ख्यालों में खोए रहते हैं। कुछ सोच रहे हैं क्या?”

अवधेश जी ने एक गहरी सांस भरी और फीकी मुस्कान के साथ बोले, “सोचना क्या है सुलोचना, बस यही लग रहा है कि जिस दफ्तर में जवानी के दिन से लेकर बुढ़ापे की दहलीज तक का सफर तय किया, अब चार दिन बाद वहां मेरी कोई जरूरत नहीं रहेगी। वो कुर्सी, वो नेमप्लेट, वो लोगों का ‘नमस्ते साहब’… सब एक झटके में किसी और का हो जाएगा। ऐसा लगता है जैसे इंसान जब तक पद पर है, तभी तक उसकी कीमत है। उसके बाद तो वह घर के कोने में रखी उस पुरानी छतरी की तरह हो जाता है, जिसकी जरूरत सिर्फ बारिश में पड़ती है, बाकी दिन उस पर धूल जमती रहती है।”

सुलोचना के पास उनकी इस उदासी का कोई सीधा जवाब नहीं था। वे जानती थीं कि अवधेश जी ने अपने पूरे जीवन में केवल दो ही चीजों को पूजा—एक उनका काम और दूसरा उनका परिवार। बेटे अंकुर को उन्होंने अपनी मेहनत के बल पर बड़ा सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनाया, जो अब बेंगलुरु में एक नामी कंपनी में ऊंचे पद पर था। बेटी श्रेया को डॉक्टरी पढ़ाई कराकर जयपुर में बसाया, जहां उसका भरा-पूरा परिवार था। बच्चे अपनी-अपनी व्यस्तताओं में रमे थे। पिछले कई महीनों से सिर्फ फोन पर ही बात हो पाती थी—’हां बाबूजी, सब ठीक है’, ‘ख्याल रखिएगा’।

अचानक बाहर बरामदे के लोहे के भारी गेट की खड़खड़ाहट हुई और फिर मेन दरवाजे की घंटी लगातार बजने लगी। साथ ही किसी ने अधीरता से लकड़ी के दरवाजे को थपथपाया।

अवधेश जी चौंके, “अरे, इस वक्त कौन आ गया? दूध वाला तो सुबह आता है, और कोई रिश्तेदार भी आसपास नहीं रहता। मोहल्ले का कोई काम होगा शायद।”

सुलोचना पल्लू संभालते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ीं, “आती हूं भाई, सब्र रखिए!”

जैसे ही उन्होंने सिटकनी खोली और दरवाजा बाहर की तरफ खुला, सुलोचना के मुंह से एक जोरदार चीख निकल गई और उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं।

दरवाजे पर कोई अजनबी नहीं, बल्कि उनका बेटा अंकुर, बहू मेघा, नन्हा पोता आरव, बेटी श्रेया, दामाद विनीत और उनकी सात साल की नवासी मायरा खड़े मुस्कुरा रहे थे। उनके हाथों में ट्रॉली बैग और चेहरों पर लंबी यात्रा की थकान के बावजूद अपार उत्साह था।

“सरप्राइज दादी!” मायरा और आरव दोनों एक साथ दौड़कर सुलोचना के पैरों से लिपट गए।

सुलोचना की आंखें छलक पड़ीं। वे यकीन ही नहीं कर पा रही थीं। अपनी कांपती हथेलियों से उन्होंने कभी बहू के सिर को छुआ तो कभी दामाद और नाती-पोतों को। उनकी बोलती बंद हो चुकी थी, गले से आवाज ही नहीं निकल रही थी।

“अरे सुलोचना, कौन है भाई? कोई अंदर आ भी रहा है या वहीं चौखट पर…” अवधेश जी चश्मा ठीक करते हुए कमरे से बाहर आए और जो दृश्य देखा, उसे देखकर उनके कदम वहीं जड़वत हो गए।

“बाबूजी!” अंकुर आगे बढ़ा और झुककर पिता के पैर छुए। उसके पीछे विनीत ने भी झुककर चरण स्पर्श किए। मेघा और श्रेया ने आगे बढ़कर उनके कंधे पर सिर रख दिया।

अवधेश जी की आंखें भर आईं, उनका गला रुंध गया। किसी तरह शब्दों को समेटते हुए उन्होंने कहा, “तुम सब? एक साथ? बिना किसी खबर के? अंकुर, तेरी तो बेंगलुरु में कोई बड़ी रिलीज होने वाली थी ना प्रोजेक्ट की? और श्रेया, अस्पताल में तेरी तो बैक-टू-बैक सर्जरी थीं! विनीत बेटा, तुम्हारा तो दिल्ली का टूर था… तुम लोग अचानक इस तरह कैसे आ गए? कोई परेशानी तो नहीं है?”

दामाद विनीत मुस्कुराए और अवधेश जी का हाथ थामते हुए बोले, “बाबूजी, दुनिया के सारे प्रोजेक्ट और सारे दौरे एक तरफ, और हमारे जीवन का सबसे बड़ा संबल एक तरफ। हमारे लिए आपसे बढ़कर कोई जरूरी काम हो ही नहीं सकता। हमें लगा कि अब बहुत दिन हो गए बाबूजी के हाथ का बना कड़क काढ़ा पिए, तो बस सबने एक ही दिन की छुट्टी फाइनल की और चल पड़े।”

श्रेया ने अपने पिता के गालों पर हाथ फेरते हुए कहा, “बाबूजी, आप इंदौर एयरपोर्ट से हमारे घर तक की दूरी को जानते ही हैं। हमने फ्लाइट पकड़ी और वहां से दो गाड़ियां किराए पर लीं और सीधे चले आए। हम भला इस समय आपसे दूर कैसे रह सकते थे?”

घर के भीतर का माहौल पल भर में बदल गया। जिस आंगन में कुछ मिनट पहले खामोशी और रिटायरमेंट का भय मंडरा रहा था, वहां अब बच्चों की किलकारियां, बैग्स की चेन खुलने की आवाजें और हंसी के ठहाके गूंजने लगे थे।

सुलोचना तुरंत रसोई में चली गईं। मेघा और श्रेया भी उनके पीछे भागीं। चाय, पकौड़े और गरमा-गरम खान-पान का दौर शुरू हो गया। पूरा घर एक बार फिर से जीवंत हो उठा था।

अवधेश जी चेहरे से तो बहुत खुश दिख रहे थे, बच्चों को गोद में बिठाकर प्यार कर रहे थे, लेकिन अंकुर अपने पिता के चेहरे की हर बारीक सिलवट को पढ़ रहा था। उसने देखा कि जब भी बात दफ्तर या तारीख की आती, बाबूजी की आंखों में एक शून्य तैर जाता था। वे जबरन मुस्कुराते, मानो अपने भीतर चल रहे बवंडर को छुपाने की कोशिश कर रहे हों।

अंकुर और श्रेया अच्छी तरह जानते थे कि पिता के भीतर क्या चल रहा है। इसीलिए तो उन्होंने महीनों पहले से यह गुप्त योजना बनाई थी। उन्होंने तय किया था कि वे पिता को उस खालीपन में अकेला नहीं गिरने देंगे जो किसी भी कर्मठ इंसान को काम से हटने के बाद निगलने लगता है। वे अपने पिता को यह अहसास कराना चाहते थे कि उनकी पहचान केवल उनकी नौकरी या सरकारी कुर्सी से नहीं है, बल्कि वे इस पूरे परिवार के वटवृक्ष हैं, जिनकी छाया के बिना यह परिवार अधूरा है।

अगले दिन सुबह जब अवधेश जी उठे, तो उन्होंने देखा कि अंकुर, विनीत और बच्चे सब सुबह से ही तैयार थे। अवधेश जी ने पूछा, “अरे, तुम लोग इतनी सुबह कहां जाने की तैयारी में हो?”

अंकुर ने मुस्कुराते हुए कहा, “बाबूजी, आज आपका दफ्तर में आखिरी औपचारिक कामकाजी दिन है ना, इसके बाद तो सिर्फ विदाई समारोह बाकी है। आप दफ्तर जाइए, आज हम आपके लिए कुछ खास करने वाले हैं।”

अवधेश जी भारी मन से तैयार होकर दफ्तर चले गए। दफ्तर में सहकर्मी उन्हें विदाई के उपहार दे रहे थे, गुलदस्ते भेंट कर रहे थे, लेकिन उनका मन बार-बार यही सोचकर कड़वा हो रहा था कि कल से इस मेज पर कोई और बैठेगा। वे शाम को जब घर लौटे, तो घर का मुख्य हॉल पूरी तरह सजा हुआ था। दीवारों पर उनके पैंतीस साल के सफर की तस्वीरें टंगी थीं—जब उन्हें पहली बार सरकारी नियुक्ति पत्र मिला था, जब उन्होंने विभाग में सर्वश्रेष्ठ इंजीनियर का पुरस्कार जीता था, जब उन्होंने अपनी पहली तनख्वाह से मां के लिए साड़ी खरीदी थी।

तभी पीछे के कमरे का दरवाजा खुला और अवधेश जी के बचपन के तीन सबसे जिगरी दोस्त—रामानंद जी, प्रोफ़ेसर माथुर और कर्नल जोशी बाहर निकल आए!

अवधेश जी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पाए। रामानंद जी पिछले दस सालों से पुणे में रह रहे थे, माथुर साहब भोपाल में थे और कर्नल जोशी चंडीगढ़ में। इन तीनों को एक साथ अपने सामने देखकर अवधेश जी अपने आंसू नहीं रोक पाए। वे लड़कों की तरह दौड़कर कर्नल जोशी के गले लग गए।

“अरे अवधेश! तू क्या सोच रहा था कि तू अपनी नौकरी की पारी खत्म करेगा और हम मैदान में सीटी बजाने भी नहीं आएंगे?” कर्नल जोशी ने अपनी कड़क और प्यार भरी आवाज में कहा।

रामानंद जी बोले, “तेरे इस होनहार बेटे अंकुर और दामाद विनीत को सलाम कर भाई! इन दोनों ने महीने भर पहले से हमें फोन कर-करके राजी किया, हमारे आने-जाने के टिकट बुक कराए और शहर के सबसे बेहतरीन होटल में हमारे रुकने की व्यवस्था की। बोले कि बाबूजी के जीवन का इतना बड़ा दिन है, उनके पुराने यारों के बिना यह जश्न अधूरा रहेगा।”

उस शाम घर में जो महफिल सजी, वह अवधेश जी ने अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखी थी। पुराने गीतों की धुन, कॉलेज के दिनों की शरारतें, नौकरी के शुरुआती दिनों के संघर्ष के किस्से—सब कुछ एक बार फिर ताजा हो गया। अवधेश जी कई सालों बाद खुलकर, बेपरवाह होकर हंसे थे।

अगले दिन उनका औपचारिक विदाई समारोह था। आमतौर पर विदाई समारोहों में केवल दफ्तर के लोग होते हैं, लेकिन यहां का नजारा अलग था। ऑडिटोरियम में सबसे आगे की कतार में उनका पूरा परिवार—पत्नी, बेटा, बेटी, बहू, दामाद, नाती-पोते और उनके जिगरी यार बैठे थे।

जब अवधेश जी को मंच पर बोलने के लिए बुलाया गया, तो उनका गला भर आया। उन्होंने अपनी बात शुरू करने से पहले दर्शकों में बैठे अपने परिवार को देखा।

मंच से उतरते ही अंकुर ने माइक संभाला। अंकुर ने सभागार में उपस्थित सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के सामने कहा, “आज लोग कह रहे हैं कि हमारे पिता रिटायर हो रहे हैं। सरकारी नियम कहते हैं कि साठ साल के बाद इंसान सेवा से मुक्त हो जाता है। लेकिन हम अपने पिता को बताना चाहते हैं कि आप अपनी नौकरी से रिटायर हुए हैं, हमारी जिंदगी से नहीं। आपने पैंतीस साल तक धूप, आंधी और दबाव में रहकर केवल इसलिए काम किया ताकि हमारी जिंदगी संवर सके। आपने कभी अपनी इच्छाओं को आगे नहीं रखा। आज हम जिस मुकाम पर हैं, वह आपकी इन्हीं पसीने से भीगी उंगलियों को पकड़कर चलने का नतीजा है। कल तक आप सरकार के लिए काम करते थे, अब से आप केवल अपने लिए और हमारे लिए जिएंगे। आप हमारे परिवार के वह मजबूत स्तंभ हैं, जिसकी जगह कोई नहीं ले सकता।”

पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अवधेश जी ने पीछे मुड़कर देखा, उनके सहकर्मियों की आंखें भी नम थीं और उनके सीने में जो एक अनजान सा डर बैठा था, वह उस एक पल में हमेशा के लिए काफूर हो गया।

विदाई के बाद के दो दिन अवधेश जी ने अपने पुराने दोस्तों के साथ बिताए। बच्चे उन्हें शहर के ऐतिहासिक स्थलों, पुराने पसंदीदा ढाबों और पार्कों में ले गए। वे दिन भर घूमते, चाय की चुस्कियां लेते और पुरानी यादों को ताजा करते। उन दो दिनों में अवधेश जी को एक पल के लिए भी यह याद नहीं आया कि अब उनके पास दफ्तर की कोई फाइल नहीं है।

जब दोस्त अपने-अपने शहरों के लिए रवाना हो गए, तो तीसरे दिन शाम को अंकुर और विनीत ने एक खूबसूरत लिफाफा लाकर अवधेश जी और सुलोचना के हाथों में थमा दिया।

अवधेश जी ने पूछा, “यह क्या है बेटा?”

मेघा ने मुस्कुराते हुए कहा, “पापा जी, इसे खोलकर तो देखिए।”

अवधेश जी ने लिफाफा खोला। अंदर उदयपुर और माउंट आबू के एक हफ्ते के लग्जरी रिसॉर्ट के एयर टिकट्स, होटल बुकिंग और पूरे टूर का कार्यक्रम रखा हुआ था।

विनीत ने कहा, “बाबूजी, मां और आपने पिछले तीस सालों में कभी अपने लिए कोई छुट्टी नहीं ली। जब भी छुट्टियां लीं, हमारे दाखिलों के लिए, हमारी शादियों के लिए या किसी रिश्तेदारी को निभाने के लिए लीं। अब आपकी असली छुट्टियां शुरू होती हैं। आप दोनों जाइए, झीलों के किनारे बैठिए, सुकून से सूर्यास्त देखिए और अपनी जिंदगी को अपने अंदाज में फिर से जिएं।”

सुलोचना की आंखों में कृतज्ञता के आंसू थे और अवधेश जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था। उन्हें समझ आ गया था कि जिंदगी खत्म नहीं हुई है, बल्कि जिंदगी का सबसे हसीन, तनावमुक्त और सुकून भरा अध्याय तो अब शुरू हुआ है। जिस रिटायरमेंट को वे अपने अस्तित्व का अंत समझ रहे थे, वह दरअसल उनके अपने सपनों को जीने की एक नई शुरुआत थी।

सच्चाई यही है कि हमारे समाज में पिता एक ऐसा मौन साधक होता है जो अपनी पूरी उम्र परिवार की जरूरतों को पूरा करने में होम कर देता है। रिटायरमेंट के मोड़ पर आकर जब काम की आपाधापी अचानक थम जाती है, तो उनके भीतर एक गहरा मनोवैज्ञानिक संकट जन्म लेता है। उन्हें डर सताने लगता है कि अब उनकी कोई उपयोगिता नहीं रही, वे समाज और परिवार की नजरों में गैर-जरूरी हो जाएंगे।

ऐसे नाज़ुक दौर में एक परिवार की जिम्मेदारी सबसे बड़ी होती है। जब बच्चे आगे बढ़कर माता-पिता के इस मानसिक द्वंद्व को समझते हैं, उन्हें भावनात्मक संबल देते हैं और उनके अनुभवों का सम्मान करते हैं, तो ढलती उम्र का अकेलापन भी एक खूबसूरत उत्सव में बदल जाता है। परिवार का यह स्नेह, यह सम्मान ही वह संजीवनी है जो एक बुजुर्ग पिता को फिर से पूरे आत्मसम्मान के साथ सिर उठाकर जीने की ताकत देती है।

क्या आपको भी लगता है कि हमारे समाज में रिटायरमेंट के बाद बुजुर्गों को घर की बेकार वस्तु समझने की भूल की जाती है? आपके विचार में बच्चों को इस पड़ाव पर अपने माता-पिता को भावनात्मक रूप से कैसे संभालना चाहिए? अपनी अनमोल राय कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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  में नहीं, बल्कि परिवार के प्यार और सम्मान में होती है, जो उन्हें इस नए अध्याय में गरिमा से जीने का संबल देता है।

लेखिका : ऋचा पांडे

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