उपयोगी खजाना

 अंकिता मम्मी कहां हैं?  अभय ने ऑफिस जाने से पहले अपनी पत्नी अंकिता से पूछा ।

  “आपको तो पता है कि जब सफाई जैसा कुछ काम होता है तो मम्मी  बीरेन (नौकर) के साथ ही लग जाती हैं। उनको ऐसा लगता है कि हर कीमती सामान कूड़ा समझ कर फेंक दिया जाएगा।” अंकिता ने अपनी सासू माँ के न दिखाई पड़ने का कारण बताते हुए कहा।

अंकिता की बात सुनकर अभय के होठों पर मुस्कान आ गई उसने मुस्कुराते हुए अपना सर हिलाते  हुए बोला-” अच्छा ठीक है मैं जा रहा हूं। मम्मी से बता देना।”  इतना कहकर अभत  बाहर निकल गया ।

अंकिता अपने कमरे में चली गई। 

कुसुम आज सुबह से ही नौकर के साथ घर की सफाई करवाने में लगी थी। अंकिता की यह बात सच है कि एकदम बेकार सामान ही वो बाहर यानि कबाड़ी को बेचने को कहती , या फेंकने को बोलती थी।

 उस कबाड़ से भी वह बहुत सारा सामान ऐसा निकाल लेती थी जो उनको लगता था कि यह कभी काम आ  सकता है। और उनकी इस आदत से घर में बहू बेटे दोनों अच्छी तरह वाकिफ थे और परेशान भी थे। कभी-कभी अंकिता झल्ला कर कहती- मम्मी इसका क्या करेंगी आप?

 कुसुम  तुरंत जवाब देती -” जो तुम्हारे लिए कबाड़ है  वह  मेरा उपयोगी खजाना है ।

फिर अपने कमरे में उन चीजों से क्राफ्ट की चीजे बनाती।  अपने पोते बंटू के लिए जोकि कक्षा 3 में पढता है । उसके लिए नई-नई क्राफ्ट की चीजें बनाती जिसे देखकर वो बहुत खुश होता और उनके बारे में अपने स्कूल में अपने दोस्तों और टीचर को भी बताता। और  उनको दिखाता भी था। उनका कमरा तो ऐसा लगता मानो कोई प्रदर्शनी  सजी हो। वॉल हैंगिंग, गुड़िया का  सेट , बंदनवार , आसनी जैसी चीजे बनाने में लगी रहतीं।एक बार दोनों ने नारियल की जटाओ से  और कागज की मदद से फ्लावर पॉट की तरह बना दिया जिसे देखकर एक बार अंकिता भी अचंभित हो गई थी।

    आज भी उन्होंने बहुत सारा ऐसा सामान निकाल लिया था जो उनको लग रहा था वह कभी भी काम आ सकता है।     आज भी उन्होंने सामान इकट्ठा किया और अपने कमरे में ले कर चली गई क्योंकि पहले तो सामान को वह स्टोर रूम में जहां सारा सामान रहता था वही एक कोने में रखती थीं लेकिन एक दिन अंकिता ने  कहा-  “मम्मी यह कबाड़ का सामान यहां क्यों रखती हैं? निगेटिविटी आती है ।”

अंकिता की बात उनको थोड़ी नागवार गुजरी ,लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं कहा और सारा सामान बीरेन से वहां से उठवाकर अपने कमरे में रख लिया । तब से अपने कमरे में ही सारा सामान रखवाती थीं। वही बैठ कर नयी नयी चीजे बनाया करती । 

    एक दिन अभय ने पूछा – “मम्मी इतनी मेहनत करने से आपको क्या मिलता है ? थोड़ा आराम कर लिया करिए।” कुसुम ने अभय को बिल्कुल उसी तरह देखा जब मां अपने छोटे बच्चे के भोलेपन  को महसूस करके देखती है । फिर बोली -“मुझे इसमें सुकून और खुशी मिलती है और मेरा समय भी अच्छा व्यतीत  हो जाता है वरना फिर पूरे दिन क्या करूंगी कितनी देर टीवी देखूं,  कितनी  किताबे पढ़ूं?”

   अजय को मां की यह बात बहुत अच्छी लगी तब से जब भी कोई पूछता ,अभय कहता मेरी मां तो कलाकार हैं। लेकिन अंकिता को अपनी सासू मां की ये आदत बिल्कुल पसंद नहीं थी। उसे लगता कि घर में कूड़ा इकट्ठा करने का मतलब है नकारात्मकता को लाना । जबकि वह जब भी यह बात कहती है कुसुम बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए जवाब देती 

 – “अरे अंकिता बेटा कूड़ा नहीं है और ना ही बेकार सामान है यह वह सामान है जो कभी जरूरत पड़ने पर जब कुछ  ना मिल रहा हो तो इसका उपयोग किया जा सकता है । इससे नकारात्मकता कैसे होती है ?” लेकिन कुसुम की बात अंकिता को कभी समझ नहीं आती । वहां से मुंह बनाकर चल देती।


एक दिन कुसुम ने अपने कमरे से सुना कि बंटू  रो रहा है। वहां से निकलकर अभय के कमरे तक आई और बोली -“क्या हुआ बंटू क्यों रो रहा है ?”

अभय  ने कहा –  शाम को इसने जितना क्राफ्ट का सामान बताया था वह सब अंकिता ले आई और अब यह बोल रहा है कि मुझे 10 -12 छोटी-छोटी लकड़ियां चाहिए जो एक बराबर की यानि छोटी स्केल के बराबर ऐसा बता रहा।  स्कूल में मंगवाया गया है कल ले जाना है। अब बताइए वह लकड़ियां अभी कहां मिलेंगी और सुबह  स्कूल बस  6:30 बजे ही आ जाती है। “

बंटू बराबर रोए जा रहा था और कह रहा था कि मैंने शाम को मम्मा को बताया था। जितनी बार वो ये बात कहता , उतनी बार अंकिता उसको डांट देती कि तुमने नहीं बताया था । कुसुम थोड़ी देर बात सुनती रही फिर अपने कमरे में लौट आयी। मगर थोड़ी ही देर में वह फिर वापस अभय के कमरे में  बंटू के सामने जाकर बोली – “देखो इससे तुम्हारा काम हो जाएगा ? उनके हाथ में खाली इस्तेमाल किए हुए खाली पेन थे , उनको देखते ही बंटू के कुछ बोलने से पहले ही अंकिता एकदम खुशी से उछल पड़ी और बोली -“अरे वाह इससे तो काम हो जाएगा क्यों बंटू!” अंकिता के चेहरे पर चमक आ गई थी और बट्टू का रोना बंद हो गया ।

वह खुश होते हुए बोला – ” वाउ दादी आपने तो मेरा काम बना दिया इतने पेन कहां थे? ” बंटू ने आश्चर्य से पूछा।

 अभय को उत्तर पता था मगर वह मुस्कुराते  हुए कुसुम की तरह देख रहा था । यह पेन कुसुम ने विद्या की चीज जानकर डस्टबिन में फेंकने से मना किया था। इसलिए उसने अपने पास रखे थे कि कभी कुछ बनाएंगी तो इस्तेमाल हो जाएंगे।

उनके बोलने से पहले ही अंकिता बोली – अरे बंटू ,यह दादी का खजाना है ।आज अंकिता ने भी मान लिया था कि जिसे वह कबाड़ कहती है वह सच में  उपयोगी खजाना बन गया था।

सब हंसने लगे।

 स्वरचित- उषा भारद्वाज

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