विश्वनाथ जी बोले, “नहीं आलोक, आज हिसाब होना जरूरी है क्योंकि जब परिवार में पैसों की दीवार खड़ी होने लगे, तो सच्चाई सामने आनी चाहिए। पल्लवी बेटी, परिवार कोई व्यापारिक साझेदारी नहीं होती जहां हर शाम तराजू लेकर बैठा जाए कि किसने कितना दिया और किसने कितना लिया। आज अगर तुम बच्चों को स्कूल छोड़ने में कुछ लीटर पेट्रोल का हिसाब जोड़ रही हो, तो कल जब तुम या सुमित बीमार पड़ोगे, तो क्या नीलिमा तुम्हारी तीमारदारी करने के घंटों का बिल बनाएगी? जब आरव छोटा था और तुम नौकरी की तलाश में इंटरव्यू देने जाती थीं, तब नीलिमा ने दो साल तक आरव को अपनी गोद में रखकर पाला है, क्या उसका कोई मोल चुका सकते हो तुम?”
कमरे का दरवाजा हल्के से बंद करते हुए पल्लवी ने अपने पति सुमित की तरफ देखा। सुमित ऑफिस से थके-हारे लौटे थे और अपने जूते उतार रहे थे। पल्लवी ने पानी का गिलास मेज पर रखा और पास आकर बैठ गई। उसके चेहरे पर कई दिनों से चल रही एक बेचैनी साफ झलक रही थी। उसने धीमी और गंभीर आवाज में कहा, “सुनिए, आपसे एक बात कई दिनों से कहना चाह रही हूं। पहले ही कह देती हूं कि गुस्सा मत करिएगा और ठंडे दिमाग से पूरी बात सुनिएगा। जब से हम इंदौर में इस बड़े घर में भैया-भाभी के साथ रहने आए हैं, हमारे खर्चे कम होने के बजाय आसमान छूने लगे हैं। भोपाल में जब हम अपनी अलग गृहस्थी में रहते थे, तो महीने के आखिर में कम से कम कुछ पैसे बैंक में जमा तो होते थे। हमने सोचा था कि अपने भरे-पूरे परिवार के साथ रहेंगे तो सब कुछ आसान हो जाएगा और बचत भी होगी, पर यहां तो गणित ही उलटा बैठ रहा है।”
सुमित ने माथे का पसीना पोंछा और गहरी सांस ली। वह कुछ पल खामोश रहे, फिर बोले, “पल्लवी, तुम्हारी बात में दम तो है, पर तुम ही सोचो अब इसमें क्या किया जा सकता है? जब संयुक्त परिवार में रहने का फैसला हुआ था, तो यह तुम्हारा और भाभी जी का ही तो आपसी तालमेल था। तय हुआ था कि राशन और रसोई का पूरा भार बड़े भैया संभालेंगे, और हमारे जिम्मे दोनों बच्चों की पढ़ाई, स्कूल छोड़ना-लेना और उनकी कॉपियों-किताबों का काम रहेगा। उस समय तो तुमने ही कहा था कि यह बंटवारा बहुत सही है। फिर अब अचानक तुम्हारे मन में यह खटास कहां से आ गई?”
पल्लवी ने त्यौरियां चढ़ाते हुए कहा, “तब मुझे क्या पता था कि गांव की पुश्तैनी जमीन से गेहूं, चावल, दाल और तेल के पीपे साल भर मुफ्त में आ जाते हैं! राशन में भैया की जेब से लगता ही कितना है? सारा अनाज तो खेत का आ जाता है। और दूसरी तरफ हमारे हिस्से क्या आया? हर महीने पेट्रोल का भारी-भरकम बिल! पेट्रोल के दाम तो देखिए कैसे बढ़ रहे हैं। ऊपर से शहर का भारी ट्रैफिक। अंशुल और पलक का स्कूल आपके दफ्तर से ठीक उल्टी दिशा में है। रोज सुबह गाड़ी दौड़ाना, दोपहर में उन्हें लाना, शाम को प्रोजेक्ट का सामान दिलाना। मैं तो मानती हूं कि बच्चों को शाम को घर पर पढ़ाकर मैंने ट्यूशन के पैसे बचा लिए, पर यह जो रोज-रोज गाड़ी में तेल फूंकना पड़ता है, इसका बोझ केवल हमारे ही सिर पर क्यों पड़े? इसका कुछ न कुछ स्थायी हल तो निकालना ही पड़ेगा।”
सुमित ने तंग आकर कहा, “तो तुम ही कोई उपाय बता दो? क्या जाकर बड़े भैया से कह दूं कि पेट्रोल महंगा हो गया है, इसलिए अपने बच्चों को स्कूल पैदल भेजो या रिक्शे का अलग से पैसा दो? रिश्ते ऐसे नफा-नुकसान से नहीं चलते पल्लवी।”
पल्लवी मुंह बनाकर बोली, “आप तो बस आदर्शवादी बातें करना जानते हैं। दुनियादारी मुझे समझनी पड़ती है। अगर मैंने अपने दिमाग के घोड़े नहीं दौड़ाए, तो इस तथाकथित अपनेपन के चक्कर में हमारी अपनी जमा-पूंजी खत्म हो जाएगी। हमारा बेटा आरव भी अब बड़ा हो रहा है, उसके भविष्य के लिए भी तो कुछ जोड़ना है। आप चिंता मत करिए, मुझे अच्छे से पता है कि चीजों को कैसे रास्ते पर लाना है।”
पल्लवी के मन में यह बात घर कर चुकी थी। वह पिछले कुछ हफ्तों से रोज कोई न कोई नया बहाना ढूंढने लगी थी। कभी गाड़ी में खराबी का बहाना, तो कभी सुमित की जल्दी मीटिंग का बहाना। जेठानी नीलिमा बेहद सीधी, शांत और सरल स्वभाव की महिला थीं। वह घर की रसोई, सास-ससुर की सेवा और खेती-किसानी से आने वाले अनाज के रख-रखाव में सुबह से शाम तक लगी रहती थीं। उन्होंने कई बार महसूस किया कि पल्लवी के व्यवहार में एक अजीब सा खिंचाव आ गया है, लेकिन परिवार की शांति के लिए उन्होंने कभी कोई सवाल नहीं उठाया।
बुधवार की सुबह जब घर में सब अपने-अपने कामों में लगे थे, पल्लवी ने घड़ी देखी। अभी बच्चों के स्कूल वैन या तैयार होने का सामान्य समय भी नहीं हुआ था। उसने कमरे से बाहर आकर तेज आवाज में पुकारा, “अंशुल, पलक! अरे तुम लोग अभी तक तैयार नहीं हुए? तुम्हारे चाचा जी को आज दफ्तर के लिए बहुत जल्दी निकलना है। अगर उनके साथ चलना है तो दो मिनट में बाहर आ जाओ, वरना वह निकल जाएंगे।”
कमरे में जाकर पल्लवी ने सुमित से कहा, “सुनिए, आपकी आज वो नौ बजे वाली जरूरी मीटिंग है न? आप तुरंत निकलिए, लेट हो जाएंगे तो साहब नाराज होंगे।” सुमित ने घड़ी देखी और हड़बड़ाहट में अपना बैग उठाया और बाइक स्टार्ट करके तेजी से निकल गए। पल्लवी के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई।
करीब दस मिनट बाद अंशुल और पलक अपने भारी बस्ते कंधे पर लटकाए बाहर आए। उन्होंने इधर-उधर देखा और पूछा, “चाची जी, चाचा जी कहां हैं?”
पल्लवी ने बनावटी अफसोस जताते हुए हाथ फैलाए, “अरे बेटा, मैंने तो कितनी आवाजें लगाईं तुम दोनों को। तुम्हारे चाचा जी कितनी देर खड़े रहते? उनके दफ्तर में आज कोई बड़ा अफसर आने वाला था, इसलिए उन्हें तुरंत निकलना पड़ा। अब मैं क्या करूं? तुम लोगों का स्कूल भी तो उनके दफ्तर के रास्ते में नहीं पड़ता, पूरा बाईपास घूमकर जाना पड़ता है। रोज-रोज इतनी दूर चक्कर लगाने से उन्हें देर भी हो जाती है और पेट्रोल भी बहुत जलता है।”
बच्चे मायूस हो गए। बेटी पलक की आंखों में आंसू छलक आए क्योंकि आज स्कूल में उनकी छमाही परीक्षा का पहला दिन था। तभी नीलिमा रसोई से हाथ पोंछती हुई बाहर आईं। बच्चों को रोता देखकर उनका दिल बैठ गया। उन्होंने पूछा, “क्या हुआ पल्लवी? क्या सुमित चले गए? बच्चे तो बस जूते ही पहन रहे थे।”
पल्लवी ने तल्खी से जवाब दिया, “भाभी, अगर देवर जी को जल्दी जाना था तो बच्चों को पहले से तैयार रहना चाहिए था न? अब रोज-रोज किसी के दफ्तर का समय तो बच्चों की वजह से खराब नहीं हो सकता। वैसे भी जेठ जी की जो हार्डवेयर की दुकान है, वहां दो लड़के काम करते हैं। आप जेठ जी से क्यों नहीं कहतीं कि उनमें से किसी को भेजकर बच्चों को स्कूल छुड़वा दिया करें? जब से इनका प्रमोशन हुआ है, इन पर काम का बहुत दबाव रहता है। रोज-रोज यह सब नहीं झेला जाता।”
नीलिमा कोई नासमझ नहीं थीं। वह देवरानी की बातों के पीछे छिपे मंतव्य को बहुत अच्छी तरह समझ गईं। उन्होंने कोई बहस नहीं की। उन्होंने आगे बढ़कर दोनों बच्चों के आंसू पोंछे, उनके माथे को चूमा और कहा, “चिंता मत करो बच्चों, तुम लोग परीक्षा देने जरूर जाओगे।”
नीलिमा सीधे अंदर बड़े कमरे में गईं, जहां ससुर विश्वनाथ जी अपनी चाय पीकर अखबार पढ़ रहे थे। नीलिमा ने संयत स्वर में कहा, “बाबूजी, इनके पापा तो सुबह ही दुकान का माल उतरवाने मंडी की तरफ निकल गए हैं और सुमित को आज दफ्तर जल्दी जाना पड़ा। आज बच्चों की परीक्षा है और समय निकला जा रहा है। अगर आपकी तबीयत ठीक हो, तो क्या आप बच्चों को अपने साथ ले जाकर स्कूल छोड़ आएंगे?”
विश्वनाथ जी ने चश्मा उतारा और नीलिमा की तरफ देखा। उन्होंने घर के बदलते माहौल को बहुत पहले ही भांप लिया था। उन्होंने गंभीर आवाज में कहा, “सुमित को अगर जल्दी जाना था, तो उसने कल रात क्यों नहीं बताया? या सुबह जाते समय बच्चों के कमरे में झांककर एक बार आवाज क्यों नहीं दी? यह उसकी पुरानी आदत तो नहीं है। खैर, तुम फिक्र मत करो बहू। आज बच्चों को उनके दादा जी स्कूल छोड़ने जाएंगे। चलो बच्चों, गाड़ी निकालो।”
दादा जी का हाथ पकड़कर बच्चे खुश होते हुए बाहर निकल गए। इधर पल्लवी ने तुरंत सुमित को फोन मिला दिया और कहा, “घर में आज अच्छा-खासा नाटक हो गया। भाभी ने बाबूजी के कान भर दिए हैं। बाबूजी खुद बच्चों को छोड़ने गए हैं और उनका पारा चढ़ा हुआ है। जब शाम को घर लौटें, तो बाबूजी के सामने दबना मत। साफ-साफ कह दीजिएगा कि अगर हमारी सुविधा का ख्याल नहीं रखा जा सकता, तो हम अपना अलग इंतजाम कर लेंगे या घर छोड़ देंगे।” सुमित फोन पर परेशान हो गए, “पल्लवी, तुम बात का बतंगड़ क्यों बना रही हो? बाबूजी से इस तरह बात करना हमारे संस्कारों में नहीं है।” पल्लवी ने कहा, “संस्कार अपनी जगह हैं और अपनी जेब अपनी जगह। आप बस मेरी बात याद रखिएगा।”
शाम को जब सुमित घर पहुंचे, तो घर का वातावरण बिल्कुल शांत था। रात का खाना सबने खामोशी से खाया। खाने के बाद विश्वनाथ जी ने बैठक में सबको बुलाया। उन्होंने बड़े बेटे आलोक, बहू नीलिमा, छोटे बेटे सुमित और पल्लवी—चारों को सामने बैठने का इशारा किया।
विश्वनाथ जी ने सुमित की आंखों में देखते हुए बड़े ही शांत स्वर में पूछा, “सुमित बेटा, सब ठीक तो है न? कोई परेशानी है तो अपने पिता से कहो।”
सुमित ने नजरें झुका लीं, “नहीं बाबूजी, सब ठीक है। आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?”
विश्वनाथ जी बोले, “बेटा, तुमने बचपन से कभी किसी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा। फिर आज ऐसा क्या हुआ कि तुम अपने बेटे आरव को तो उसके स्कूल छोड़ आए, लेकिन अपने ही बड़े भाई के बच्चों को घर पर रोता हुआ छोड़कर अकेले दफ्तर चले गए? क्या वे बच्चे तुम्हारे अपने नहीं हैं?”
सुमित कुछ बोलने ही वाले थे कि पल्लवी बीच में बोल पड़ी, “बाबूजी, कसूर इनका नहीं है। असल बात यह है कि आरव का स्कूल इनके दफ्तर के बिल्कुल पास है, इसलिए उसे छोड़ना आसान था। भैया के बच्चों का स्कूल शहर के दूसरे कोने में है। रोज-रोज वहां जाने में समय की बर्बादी होती है और पेट्रोल का भारी खर्चा हमारी जेब पर पड़ता है। हमने जब जिम्मेदारी बांटी थी, तब हमें नहीं पता था कि सारा बोझ केवल हमारे ही हिस्से आएगा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित ने पल्लवी को रोकने की कोशिश की, पर पल्लवी नहीं रुकी। उसने आगे कहा, “रसोई में तो ज्यादातर सामान गांव की खेती से आ जाता है, तो भैया का क्या खर्चा होता है? सारा भार तो हमारे ही सिर पर है।”
यह सुनकर बड़े भाई आलोक की आंखों में नमी आ गई। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस सिर झुका लिया। तब विश्वनाथ जी अपनी कुर्सी से उठे और अलमारी से एक पुरानी डायरी और कुछ रसीदें निकालकर मेज पर रख दीं।
विश्वनाथ जी ने पल्लवी और सुमित की ओर देखते हुए कहा, “बहू, तुमने हिसाब बहुत बारीकी से लगाया, पर शायद तुमने सिर्फ वही पन्ने देखे जो तुम्हें दिखाए गए। अब जरा इस बूढ़े बाप का हिसाब भी सुन लो।”
विश्वनाथ जी ने डायरी खोली और बोले, “तुम कहती हो कि गांव से अनाज मुफ्त में आता है। पल्लवी, क्या तुम्हें पता है कि पिछले साल जब गांव में ओले गिरे थे और फसल बर्बाद हो गई थी, तब आलोक ने अपनी दुकान से पचास हजार रुपये कर्ज लेकर गांव के बटाईदारों को दिए थे ताकि हमारे खेत आबाद रह सकें? हर महीने गांव से जो अनाज, शुद्ध घी और तेल आता है, उसके पीछे आलोक का पसीना और पैसा लगता है। आलोक ने कभी एक बार भी नहीं कहा कि यह अनाज सिर्फ मेरे बच्चों के लिए है।”
विश्वनाथ जी ने फिर एक रसीद उठाई, “और सुनो सुमित, जब तुम पिछले महीने टाइफाइड से बीमार पड़े थे और दस दिन अस्पताल में भर्ती थे, तब तुम्हारी कंपनी का इंश्योरेंस कम पड़ गया था। उस समय अस्सी हजार रुपये का बिल किसने भरा था? तुम्हारे इस बड़े भाई ने अपनी दुकान की नई खेप का माल रोककर वह बिल चुपचाप चुकाया था ताकि तुम्हारे माथे पर चिंता की लकीर न आए। उसने आज तक तुमसे एक धेला मांगा? क्या उसने कभी पेट्रोल और दवाइयों के खर्च का हिसाब तुमसे मांगा?”
आलोक ने रुंधे गले से कहा, “बाबूजी, रहने दीजिए। इन बातों को दोहराने की जरूरत नहीं है। सुमित मेरा छोटा भाई है, उसके लिए कुछ किया तो कोई अहसान नहीं किया।”
विश्वनाथ जी बोले, “नहीं आलोक, आज हिसाब होना जरूरी है क्योंकि जब परिवार में पैसों की दीवार खड़ी होने लगे, तो सच्चाई सामने आनी चाहिए। पल्लवी बेटी, परिवार कोई व्यापारिक साझेदारी नहीं होती जहां हर शाम तराजू लेकर बैठा जाए कि किसने कितना दिया और किसने कितना लिया। आज अगर तुम बच्चों को स्कूल छोड़ने में कुछ लीटर पेट्रोल का हिसाब जोड़ रही हो, तो कल जब तुम या सुमित बीमार पड़ोगे, तो क्या नीलिमा तुम्हारी तीमारदारी करने के घंटों का बिल बनाएगी? जब आरव छोटा था और तुम नौकरी की तलाश में इंटरव्यू देने जाती थीं, तब नीलिमा ने दो साल तक आरव को अपनी गोद में रखकर पाला है, क्या उसका कोई मोल चुका सकते हो तुम?”
पल्लवी का सिर शर्म से झुक गया। उसके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं बचा था। जिन बातों को वह अपनी समझदारी मान रही थी, वे असल में उसके मन का संकीर्ण स्वार्थ थीं। उसने देखा कि जेठानी नीलिमा की आंखों में कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गहरा दुख और अपनापन था।
सुमित की आंखों से आंसू बहने लगे। वह उठकर बड़े भाई आलोक के पैरों में गिर पड़ा, “भैया, मुझे माफ कर दीजिए। मैं पैसों की इस छोटी सी उलझन में इतना अंधा हो गया कि आपका त्याग और प्यार भूल गया। मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है।”
आलोक ने तुरंत सुमित को उठाकर गले से लगा लिया, “अरे पगले, तू मेरा छोटा भाई है। भाइयों में कैसा माफी मांगना? अगर तुझे कोई परेशानी थी तो मुझसे खुलकर कहता, हम मिलकर कोई दूसरा रास्ता निकाल लेते।”
पल्लवी से भी अब रहा नहीं गया। वह आगे बढ़ी और उसने नीलिमा और बाबूजी के हाथ पकड़ लिए। उसकी आवाज कांप रही थी, “बाबूजी, भाभी… मुझे माफ कर दीजिए। मैं शहर की इस मतलबी दौड़ में इतनी अंधी हो गई थी कि रिश्तों की असली कीमत भूल बैठी। मुझे लगा कि मैं पैसे बचाकर होशियारी कर रही हूं, पर मैं तो अपने ही परिवार की नींव खोद रही थी। अब से ऐसी गलती कभी नहीं होगी। अंशुल और पलक भी मेरे ही बच्चे हैं, उनका ध्यान रखना मेरा भी उतना ही फर्ज है जितना आरव का।”
नीलिमा ने मुस्कुराते हुए पल्लवी के आंसू पोंछे और उसे गले से लगा लिया, “चलो पल्लवी, जो हुआ सो हुआ। परिवार में ऐसी बातें होती रहती हैं, पर मन में गांठ नहीं पड़नी चाहिए। कल सुबह से बच्चे तुम्हारे और सुमित के साथ ही जाएंगे, और हां, शाम को उनके लिए गरम-गरम हलवा मैं बनाऊंगी।”
विश्वनाथ जी के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान खिल उठी। घर का तनाव एक ही पल में घुल गया था और उस बैठक में एक बार फिर अपनों के प्यार और विश्वास की महक भर गई थी।
परिवार में हिसाब-किताब जरूरी है या अपनों का निस्वार्थ प्यार? क्या आपने भी कभी अपने आसपास रिश्तों को ऐसे नफा-नुकसान की तराजू में तौलते देखा है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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लेखिका : रमा शुक्ला