आँसुओं की छाँव में खिला सिंदूर

 कल्याणी जी उठकर खड़ी हो गईं। उन्होंने लाल चुनरी अवंतिका की गोद में रख दी। “फैसला अब तेरे हाथ में है। या तो इसी कमरे में बैठकर सारी ज़िंदगी आंसुओं के समंदर में डूबती रह और अपने पिता की आत्मा को भी कष्ट देती रह, या फिर एक वीर पिता की बहादुर बेटी बनकर उठ, अपने सुहाग के लिए सज और साबित कर कि वीरेंद्र जी ने हमें सचमुच एक कोहिनूर दिया था।”

इतना कहकर कल्याणी जी भारी कदमों से कमरे से बाहर निकल गईं।

भोपाल शहर की पुरानी गलियों में स्थित उस पुश्तैनी मकान के आंगन में हल्की-हल्की गुलाबी ठंडक उतर आई थी। कार्तिक का महीना था और चारों ओर पहले करवाचौथ की तैयारियाँ जोरों पर थीं। बाज़ार रंग-बिरंगी चूड़ियों, चमकती साड़ियों, पूजन की थालियों और मेहंदी की सौंधी खुशबू से महक रहे थे। मोहल्ले की औरतें एक-दूसरे के घर आ-जा रही थीं, हंसी-ठिठोली की आवाज़ें गूँज रही थीं। मगर उस विशाल और खुशहाल घर की ऊपरी मंजिल के एक कोने वाले कमरे में एक गहरा, भारी सन्नाटा पसरा हुआ था।

उस कमरे की खिड़की के पास बैठी अवंतिका शून्य में ताक रही थी। उसके हाथ में एक पुरानी, फ्रेम की हुई तस्वीर थी। तस्वीर भारतीय वायुसेना की वर्दी में मुस्कुराते हुए एक जांबाज अफ़सर की थी—उसके पिता, वीरेंद्र जी। अवंतिका की बड़ी-बड़ी कजरारी आँखों से लगातार आंसू बहकर तस्वीर के कांच पर गिर रहे थे। उसके होंठ कांप रहे थे और दिल के भीतर जैसे यादों का कोई भयानक बवंडर उठ रहा था।

तभी कमरे के दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। हाथ में शगुन की लाल चुनरी और काजू-पिस्ते की मिठाई की थाली लिए कल्याणी देवी कमरे में दाखिल हुईं। कल्याणी जी अवंतिका की सास थीं—चेहरे पर गजब का तेज, पर आँखों में अगाध ममता। अपनी इकलौती बहू को यूं घुटनों में सिर छिपाए रोते देखकर कल्याणी जी का कलेजा मुंह को आ गया। उन्होंने थाली मेज़ पर रखी और भारी कदमों से आगे बढ़कर अवंतिका के कंधे पर हाथ रख दिया।

“अवंतिका… अरे मेरी बच्ची, तू फिर अपनी इन प्यारी आँखों को समंदर बनाने बैठ गई? कितनी बार समझाया है मैंने तुझे कि जो पंछी इस नश्वर संसार को छोड़कर ईश्वर की गोद में चले जाते हैं, वे हमारे रोने से वापस नहीं आते। पर तू है कि पलकें सुखाने का नाम ही नहीं लेती! मुझे तेरी यह खामोशी, यह मुर्झाया हुआ चेहरा चीर कर रख देता है। ज़रा नीचे झांक कर देख, तेरा पहला करवाचौथ है। पूरा घर, पूरा मोहल्ला खुशियों से चहक रहा है। सभी औरतें सज-धज रही हैं। जा, ईशान (कल्याणी जी का बेटा) बाहर कार लिए खड़ा है, उसके साथ जाकर बाज़ार से अपने पसंद के कपड़े ले आ, हाथों में सुंदर सी मेहंदी रचवा ले।”

अवंतिका ने सिसकते हुए अपना सिर उठाया। उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था। उसने कांपती आवाज़ में कहा, “माँ जी… मैं सच में बहुत कोशिश करती हूँ। दिन भर खुद को कामों में उलझाए रखती हूँ, सबके सामने मुस्कुराने का ढोंग भी करती हूँ। पर जैसे ही कोई त्योहार आता है, जैसे ही खुशी का कोई लम्हा आता है, पापा की वो हँसती हुई सूरत मेरे सामने आ खड़ी होती है। बचपन से लेकर मेरी विदाई की तैयारियों तक, हर एक सांस में तो सिर्फ वही बसे थे। उनके बिना यह लाल रंग, यह शगुन… सब कुछ मुझे काटने को दौड़ता है माँ जी। मैं चाहकर भी अपने इस दर्द से बाहर नहीं निकल पा रही हूँ।”

अवंतिका का यह विलाप कोई नया नहीं था, और न ही उसका दर्द बेवजह था। आज से ठीक चार महीने पहले, जब अवंतिका के विवाह की शहनाइयाँ बजने वाली थीं, नियति ने एक ऐसा क्रूर खेल खेला था जिसने हंसते-खेलते परिवार को राख के ढेर में बदल दिया था। अवंतिका अपने पिता वीरेंद्र जी की पहली औलाद थी। माँ का साया तो पहले ही उठ चुका था, इसलिए वीरेंद्र जी ने अपनी इस बेटी को मां और बाप दोनों बनकर पाला था। वे देश की सीमाओं पर तैनात वायुसेना के जांबाज विंग कमांडर थे, लेकिन जब भी छुट्टी पर घर आते, तो अपनी गुड़िया के लिए पूरी दुनिया की खुशियाँ समेट लाते थे।

विवाह से ठीक दस दिन पहले, वीरेंद्र जी अपनी बेटी की शादी के सारे इंतज़ाम पूरे करके, विदाई के गहने और कपड़े समेटकर, वायुसेना के एक ज़रूरी काम के सिलसिले में पास के बेस पर गए थे। रास्ते में एक भीषण सड़क दुर्घटना हुई, जिसमें वीरेंद्र जी शहीद हो गए। जिस घर में मंगलगीत गाए जा रहे थे, वहाँ पल भर में चीत्कार और मातम छा गया। अवंतिका के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई थी। वह बिल्कुल जड़ हो गई थी, मानो उसका जीवन ही समाप्त हो गया हो।

ऐसे विकट समय में कल्याणी देवी और उनके बेटे ईशान ने जो मिसाल पेश की, वह समाज में विरले ही देखने को मिलती है। कल्याणी जी के पति भी एक सम्मानित शिक्षक रहे थे और उनका परिवार बेहद संवेदनशील और संस्कारों से बंधा हुआ था। रिश्तेदारों ने कहा कि शादी टाल दी जाए, साल भर का शोक मनाया जाए। मगर कल्याणी देवी ने आगे बढ़कर अवंतिका के चाचा और रिश्तेदारों के हाथ थाम लिए थे। उन्होंने कहा था, “समधी जी वीरेंद्र जी देश के सच्चे सिपाही थे। वे अपनी पहली बेटी के हाथ पीले करने का सपना अपनी आँखों में संजोकर गए थे। उन्होंने विदाई की एक-एक रस्म खुद तय की थी। अगर आज यह मंडप सूना रह गया, तो वीरेंद्र भाई साहब की आत्मा को शांति कैसे मिलेगी? अवंतिका अब सिर्फ उनकी नहीं, हमारी भी बेटी है। विवाह उसी तय तिथि पर होगा, बिना किसी गाजे-बाजे के, पर पूरे मान-सम्मान और आशीर्वाद के साथ।”

विवाह तो हो गया था, पर उस मंडप में बैठी अवंतिका का जिस्म तो मौजूद था, मगर आत्मा जैसे कहीं खो गई थी। न उसे मंत्रों की आवाज़ सुनाई दे रही थी, न सिंदूरदान का अहसास हो रहा था। वह केवल अपनी सूनी आँखों से पिता की उस खाली कुर्सी को देख रही थी जहाँ उन्हें कन्यादान के लिए बैठना था।

ससुराल आने के बाद ईशान ने उसे एक पति से बढ़कर एक सच्चे दोस्त की तरह संभाला। उसने कभी अवंतिका पर अपने अधिकार नहीं थोपे। कल्याणी जी ने सास का कठोर मुखौटा उतारकर एक माँ का आंचल उसके सिर पर डाल दिया। मगर अवंतिका का मन उस गहरे सदमे से उबर नहीं पा रहा था। दिन में वह घर का काम यंत्रवत करती, पर रात होते ही तकिए में मुंह छिपाकर घंटों रोती। उसके पिता की कही हर बात, उनका वो गर्व से सीना तानकर मुस्कुराना, सब कुछ उसकी यादों में जिंदा था।

कल्याणी जी ने अवंतिका के पास बैठकर उसके हाथ से वह तस्वीर ले ली। उन्होंने बड़े ही आदर से वीरेंद्र जी की तस्वीर को माथे से लगाया और फिर अवंतिका की ठोड़ी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया।

कल्याणी जी के चेहरे पर इस बार थोड़ी सख़्ती थी, पर उस सख़्ती के पीछे वात्सल्य का समंदर हिलोरे मार रहा था। वे भरे गले से बोलीं, “अवंतिका, मेरी बात कान खोलकर सुन ले। मैंने तुझसे यह कभी नहीं कहा कि तू अपने पिता को भूल जा। कोई औलाद अपने उस पिता को कैसे भूल सकती है जिसने उसे अपनी हथेलियों पर पाला हो? पर ज़रा अपनी अंतरात्मा से पूछ, क्या तू इस तरह तिल-तिल कर घुटने के लिए, हर वक्त मातम मनाने के लिए यहाँ ब्याह कर आई है? क्या तेरे पापा तुझे इस मुरझाए हुए रूप में देखकर ऊपर से खुश हो रहे होंगे?”

अवंतिका ने चौंक कर अपनी सास को देखा।

कल्याणी जी की आँखों में पुरानी यादें तैरने लगीं। वे भावुक स्वर में कहने लगीं, “तुझे याद है वो दिन जब वीरेंद्र जी पहली बार हमारा यह घर देखने आए थे? अपनी उस फौजी रौबदार आवाज़ में जब उन्होंने ड्राइंग रूम में कदम रखा था, तो पूरा घर उनकी सकारात्मक ऊर्जा से भर गया था। उन्होंने ईशान की योग्यता देखी, हमारे संस्कार देखे और फिर हाथ जोड़कर मुझसे क्या कहा था, जानती है? उन्होंने कहा था—’कल्याणी भाभी, मैं आपको कोई साधारण लड़की नहीं दे रहा हूँ। मैं अपने दिल का टुकड़ा, अपने सूने पड़े घर की इकलौती चिड़िया सौंप रहा हूँ। मेरी अवंतिका इतनी खुशमिजाज है कि जिस घर में जाएगी, वहाँ कभी उदासी फटक भी नहीं सकती। वो रोते हुए इंसान के चेहरे पर हंसी ला दे, वो चट्टानों में भी फूल खिला दे। मैं अपनी ज़िंदगी का सबसे अनमोल कोहिनूर हीरा आपकी झोली में डाल रहा हूँ, इसे संभाल कर रखना।’ “

कल्याणी जी ने एक गहरी सांस ली और सीधे अवंतिका की आँखों में आँखें डालकर पूछा, “अब तू ही मुझे बता अवंतिका, क्या तू वही हीरा है जिसकी चमक की कसमें तेरे पापा खा रहे थे? क्या तू वही चहकती हुई चिड़िया है जो अपने गीतों से पूरे घर को रोशन कर देती थी? मुझे तो नहीं लगता! मुझे तो यहाँ एक कमज़ोर, बिखरी हुई और अपनी जिम्मेदारियों से भागने वाली लड़की नज़र आ रही है, जिसने अपने पिता की दी हुई सीख और संस्कारों को आंसुओं में बहा दिया है।”

सास के ये शब्द अवंतिका के सीने में किसी खंजर की तरह चुभे, पर साथ ही उसके भीतर सोई हुई चेतना को झकझोर गए।

कल्याणी जी रुकी नहीं, वे आगे बोलीं, “सच्चा प्रेम और सच्ची श्रद्धांजलि किसी के जाने के बाद रोते रहने में नहीं होती बेटा, बल्कि उनके दिखाए रास्ते पर चलने में होती है। वीरेंद्र जी ने पूरी ज़िंदगी देश की सेवा में, अनुशासन में और मुस्कुराते हुए कुर्बानियों के बीच बिताई। उन्होंने तुझे एक फौजी की बेटी बनाया था, कायर नहीं! उन्होंने चाहा था कि तू इस घर को खुशियों से भर दे। और तू क्या कर रही है? तूने खुद को भी एक जिंदा लाश बना लिया है और अपने साथ-साथ उस लड़के को भी बेइंतहा दर्द दे रही है जो तुझसे बेपनाह मोहब्बत करता है। ईशान ने पिछले चार महीनों में एक बार भी तुझे किसी बात के लिए नहीं टोका, तेरी उदासी को अपनी तकदीर मानकर सह रहा है। क्या यही तेरे पापा के संस्कार हैं? क्या यही है वो सम्मान जो तू अपने पिता को देना चाहती है?”

कल्याणी जी उठकर खड़ी हो गईं। उन्होंने लाल चुनरी अवंतिका की गोद में रख दी। “फैसला अब तेरे हाथ में है। या तो इसी कमरे में बैठकर सारी ज़िंदगी आंसुओं के समंदर में डूबती रह और अपने पिता की आत्मा को भी कष्ट देती रह, या फिर एक वीर पिता की बहादुर बेटी बनकर उठ, अपने सुहाग के लिए सज और साबित कर कि वीरेंद्र जी ने हमें सचमुच एक कोहिनूर दिया था।”

इतना कहकर कल्याणी जी भारी कदमों से कमरे से बाहर निकल गईं।

कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया था, लेकिन इस बार वह सन्नाटा अवसाद का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का था। अवंतिका ज़मीन पर बैठ गई। उसने अपने कांपते हाथों से गोद में रखी लाल चुनरी को छुआ। गोटे और सितारों से सजी वह चुनरी धूप में चमक रही थी। उसने नज़र उठाकर मेज़ पर रखी पिता की तस्वीर को देखा। तस्वीर में वीरेंद्र जी अपनी वही चिर-परिचित, गर्व भरी मुस्कान के साथ खड़े थे।

अवंतिका को लगा जैसे तस्वीर से उसके पापा की आवाज़ गूँज रही हो—‘मेरी गुड़िया कभी हार नहीं मान सकती। फौजी की बेटी है, सर उठाकर जीना सीख!’

अवंतिका के भीतर अचानक कुछ टूटकर बिखर गया और उस टूटन से एक नई ताकत ने जन्म लिया। उसे पहली बार अहसास हुआ कि अपने गम में अंधी होकर उसने उस परिवार के दर्द को अनदेखा कर दिया था जिसने उसे बिन माँगे इतना मान-सम्मान और अपनापन दिया। उसने ईशान के उस मौन प्यार को नज़रअंदाज़ किया था जो हर रोज़ उसके आंसुओं को पोंछने के लिए खुद के अरमानों का गला घोंट रहा था।

अवंतिका ने अपने दोनों हाथों से आंसुओं को पोंछा। उसकी आँखों में अब बेबसी नहीं, बल्कि एक नया संकल्प था। उसने आईने के सामने जाकर खुद को देखा—बिखरे हुए बाल, सूनी आँखें। उसने गहरी सांस ली।

वह कमरे से निकली और नीचे उतर आई। आंगन में कल्याणी जी तुलसी के पौधे के पास बैठी थीं और ईशान बाहर बरामदे में खड़ा फोन पर किसी से अनमने ढंग से बात कर रहा था। उसके चेहरे पर उदासी साफ झलक रही थी।

अवंतिका सीधे ईशान के पास पहुँची। ईशान ने पीछे मुड़कर देखा और चौंक गया।

“ईशान…” अवंतिका ने बेहद धीमी मगर स्थिर आवाज़ में कहा।

ईशान ने फिक्र से पूछा, “हाँ अवंतिका, क्या हुआ? सब ठीक है ना? तबीयत तो ठीक है तुम्हारी?”

अवंतिका ने पहली बार अपनी पलकें उठाकर सीधे ईशान की आँखों में देखा और उसके होंठों पर चार महीनों बाद एक नन्हीं, सच्ची मुस्कान तैर गई। “आप अभी भी चलेंगे मेरे साथ बाज़ार? मुझे… मुझे मेहंदी लगवानी है। और हाँ, पूजा के लिए कुछ सामान भी लाना है।”

ईशान जैसे अपनी जगह पर जम गया। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। उसने मुड़कर आंगन में बैठी माँ को देखा। कल्याणी जी की आँखें नम थीं, मगर उनके चेहरे पर एक असीम विजय और तृप्ति का भाव था।

ईशान की आँखों में चमक आ गई। उसने तुरंत मुस्कुराते हुए कार की चाबी उठाई, “हाँ, बिल्कुल! चलो, अभी चलते हैं।”

उस दिन बाज़ार में अवंतिका ने खुद घूम-घूम कर पूजा की थाली, लाल चूड़ियाँ और करवाचौथ का सारा सामान खरीदा। उसने अपने हाथों पर गहरी मेहंदी रचवाई। जब मेहंदी लगाने वाले ने पूछा कि हथेली पर क्या नाम लिखना है, तो उसने शर्माते हुए कहा—’ईशान’। जब वह मेहंदी रचे हाथों के साथ घर लौटी, तो उसने सबसे पहले अपनी हथेलियाँ कल्याणी जी के सामने फैला दीं।

कल्याणी जी ने उसकी मेहंदी की खुशबू को महसूस किया और अवंतिका के माथे को चूम लिया। दोनों की आँखों में आंसू थे, लेकिन इस बार ये आंसू किसी विदाई या गम के नहीं, बल्कि मिलन और नई शुरुआत के थे।

शाम ढलते-ढलते पूरा घर रोशनी से जगमगा उठा। अवंतिका ने लाल रंग का भारी जोड़ा पहना था। मांग में सिंदूर, माथे पर बिंदिया और हाथों में खनकती चूड़ियों के साथ जब वह सज-धजकर छत पर आई, तो ऐसा लगा मानो साक्षात लक्ष्मी उतर आई हो। छत पर परिवार के अन्य लोग भी मौजूद थे।

चांद निकलने का समय हो चुका था। बादलों की ओट से जब चंदा मामा ने अपनी शीतल किरणें बिखेरीं, तो शंख और घंटियों की मधुर ध्वनि गूँज उठी। अवंतिका ने छलनी उठाई। छलनी के उस पार उसने पहले चांद को देखा, और फिर धीरे से छलनी घुमाकर अपने पति ईशान के चेहरे को देखा। ईशान की आँखों में प्यार और गर्व का समंदर उमड़ रहा था।

अवंतिका ने ईशान के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। ईशान ने उसे पानी पिलाकर उसका व्रत खोला और एक सुंदर सी सोने की पायल उसके पैरों में पहनाई।

व्रत पूरा होने के बाद, अवंतिका नीचे मंदिर में आई। उसने मंदिर के पास रखी अपने पिता वीरेंद्र जी की तस्वीर के आगे एक घी का दीया जलाया। उसने हाथ जोड़कर आँखें बंद कीं और मन ही मन कहा, “पापा, देखिए, आपकी गुड़िया ने रोना छोड़ दिया है। मैं इस घर को उसी तरह रोशन रखूंगी जैसा सपना आपने देखा था। आपका कोहिनूर कभी अपनी चमक नहीं खोएगा।”

जब उसने आँखें खोलीं, तो उसने देखा कि कल्याणी जी और ईशान उसके पीछे खड़े थे। कल्याणी जी ने आगे बढ़कर अवंतिका को अपने सीने से लगा लिया। उस आलिंगन में अवंतिका को उस खोई हुई माँ का स्पर्श महसूस हुआ जिसे वह बरसों पहले भूल चुकी थी। उस घर का आंगन, जो महीनों से गमगीन था, आज अवंतिका की पायल की छन-छन और खिलखिलाहट से फिर से गूँज उठा था।

दुख इंसान को तोड़ता ज़रूर है, मगर अपनों का सच्चा प्यार और सही मार्गदर्शन उस टूटे हुए इंसान को फिर से जीने की नई ताकत दे देता है। अवंतिका ने अपने पिता को भूला नहीं था, बल्कि उन्हें अपनी मुस्कान और अपने संस्कारों में हमेशा के लिए ज़िंदा कर लिया था।

जीवन में कई बार हम अपने किसी बेहद करीबी को खोकर इस कदर टूट जाते हैं कि हमारे इर्द-गिर्द मौजूद उन जीवित रिश्तों की कद्र करना भूल जाते हैं जो हमें बेपनाह प्यार दे रहे होते हैं। कल्याणी जी जैसी समझदार सास और अवंतिका जैसी संवेदनशील बहू का यह रिश्ता हमें सिखाता है कि अतीत के गहरे घावों को वर्तमान के प्यार और समझदारी से भरा जा सकता है।

क्या आपको भी लगता है कि किसी अपने के चले जाने के बाद सारी ज़िंदगी मातम मनाने के बजाय, उनके देखे गए सपनों को पूरा करना और उनके संस्कारों को अपनी मुस्कान में ज़िंदा रखना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है? आपकी अपनी ज़िंदगी में इस बारे में क्या राय है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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