ऐसी भाभी सबको मिले – सीमा सिंघी 

जब से देवकी का विवाह बासु के साथ तय हुआ। तब से ही देवकी खुश तो थी मगर..एक अनजाना डर उसके अंदर समाए जा रहा था । वह अक्सर सोचती रहती थी कि… जब ब्याह कर वह उस घर में जाएगी तो… वहां उसे भाभी के साथ साथ मां का भी फर्ज निभाना होगा । वासु के सात वर्षीय भाई अक्षत और पांच वर्षीय बहन रेवती को भी मां बनकर संभालना होगा। उनकी जिम्मेदारियां लेनी होगी। उनका घर बसाना होगा। वह इतना कुछ कैसे कर पाएगी क्योंकि… अभी तो उसकी अपनी गृहस्थी भी नहीं बसी है। क्या वह ठीक से इन रिश्तों के साथ न्याय कर पाएगी…. अगर ठीक से न्याय नहीं कर पाई तो…. वासु से और खुद से कैसे नजरें मिलाएगी। यही सब सोचते सोचते वह मायके से ससुराल आ गई। 

ससुराल आकर धीरे-धीरे उसकी ये फिकर दूर होती चली गई क्योंकि… उसे हर वक्त वासु का भी साथ मिलता और अक्षत और रेवती का भी।

सुबह होते ही जैसे ही तैयार होकर देवकी रसोई में जाती। बासु भी देवकी को नाश्ता बनाने में… टिफिन तैयार करने में पूरी मदद करते और दोनों भाई बहन भी अपनी स्कूल बैग खुद तैयार कर लेते और घर की छोटी-मोटी साफ सफाई में भी मदद कर देते।  जब भी दोनों भाई बहन फ्री होते । 

देवकी के आगे पीछे घूमकर उसके काम में हाथ बंटाकर… उसके साथ खेल कर… अपना समय व्यतीत करते और सबसे खास बात… दोनों भाई बहन का देवकी को भाभी मां कह कर पुकाराना देवकी के दिल को गहराई तक छू जाता था। 

इस एक संबोधन ने देवकी के मन में ममता का बीज बो दिया था। जब भी अक्षत या रेवती उसे भाभी मां का कहकर पुकारते । वह तुरंत उनकी ओर वात्सल्य की नजरों से देखा करती और उनकी बातें बड़ी गौर से सुनती। 

उन पर भरपूर प्यार लुटाती। दोनों भाई बहन को लेकर जिस बात की फिकर उसे शादी के पहले अक्सर हो जाया करती थी। अब वही दोनों भाई बहन उसकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके थे।

बासु और देवकी की शादी को लगभग दो वर्ष बीतने को थे।

अब कभी-कभी देवकी का मन खुद की संतान के लिए भी मचल उठता था। 

मगर… फिर दो पल बाद ही वह अपनी इस ख्वाहिश को अपने दिल से निकाल देती थी क्योंकि अक्षत और रेवती भी तो उसके अपने ही थे।

धीरे-धीरे समय गुजरता गया। अब देवकी के काले घने बालों ने भी उससे किनारा करना शुरू कर दिया  था। बदन की झुर्रियां भी हल्की सलवटें लेने लगी थी। उसकी जिंदगी में बहुत कुछ बदल चुका था अगर…..नहीं बदला तो वह था पति वासु का प्यार…. और अक्षत और रेवती का स्नेह….

आज अचानक देवकी को ऐसी बुखार चढ़ी।  जो दवा लेने के बाद भी उतरने का नाम ही नहीं ले रही थी। अक्षत के कॉलेज से आते ही देवकी जैसे ही रसोई में चाय बनाने गई। चाय का पतीला उसके हाथ से छूट गया। 

अक्षत ने दौड़कर देवकी को संभालने की कोशिश की मगर जैसे ही बदन को छुआ तो देखा देवकी का पूरा बदन बुखार से तप रहा था। वह तुरंत प्यार से बोल उठा।

 भाभी मां आपकी बुखार अभी तक ठीक नहीं हुई है। आप मुझे देख कर क्यों रसोई में आ गई । चलिए मैं आपको बिस्तर तक छोड़ देता हूं और फिर आपकी और मेरी चाय मैं खुद बना कर ले आता हूं ।

 मैं बिल्कुल ठीक हूं अक्षत बेटा।  अभी दवा ली है… कुछ देर बाद ये अपने आप उतर जाएगी। तुम भी तो कॉलेज से अभी अभी आए हो।

अक्षत कुछ कहता उसके पहले ही रेवती भी करीब आ गई और तुरंत बोल उठी। भाभी मां अक्षत भैया बिल्कुल सही कह रहे हैं । आपको अब रसोई की और घर की कुछ भी फिक्र नहीं करनी है। वह मैं और भैया और पापा संभाल लेंगे। 

आपके बदन को अभी आराम की बहुत जरूरत है और वैसे भी भाभी मां आपने हमारे लिए कितना कुछ किया है । अब हमारी बारी है इसीलिए… प्लीज….अब आप आराम कीजिए और इस बीमार अवस्था में आप रसोई में तो बिल्कुल भी न आए। 

आपने इतने वर्षों में हमें जो सिखाया जो संस्कार दिए… कम से कम उसका नतीजा तो देख लीजिए।  हमने आपके संस्कार को स्वीकार किया या नहीं कहते हुए हंस पड़ी। 

रेवती की बात सुनकर अक्षत भी बड़े प्यार से फिर बोल उठा।  रेवती सही कह रही है। पता है भाभी मां…जब मां इस दुनिया से चली गई  थी तो… मैं उस वक्त सिर्फ पांच वर्ष का था और रेवती तीन वर्ष की।

 दो वर्षों में भैया ने भी हमारे लिए कोई कसर नहीं छोड़ी और आपके आने के बाद तो हमारी दुनिया ही बदल गई। हमें सिर्फ भाभी ही नहीं मिली बल्कि एक प्यारी सी भाभी मां मिल गई थी । मैं तो ईश्वर से प्रार्थना करता हूं….  ऐसी भाभी सबको मिले। 

रेवती भी कहां पीछे रहने वाली थी । वह भी तुरंत बड़े प्यार से बोल उठी।

 हां भाभी मां आपने कभी मां की कमी महसूस नहीं होने दी। मैं तो यह भी जानती हूं… आपने मेरे और अक्षत भैया के खातिर खुद का मां बनना भी स्वीकार नहीं किया। 

अचानक घर में बासु भी कदम रखते हुए देवकी की ओर देखकर कहने लगे।

हां देवकी मैं रेवती की बात से पूरी तरह सहमत हूं क्योंकि… मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूं कि… मां बनने की इच्छा किस नारी की नहीं होती मगर…. तुमने अक्षत और रेवती का ख्याल करके अपनी उस इच्छा का भी त्याग कर दिया । 

उसी दिन से मेरी नजरों में तुम्हारी जगह और भी ऊंची हो गई थी क्योंकि कुछ सम्मान कहने भर से नहीं बल्कि उसके किए हुए कर्मों से बिन कहे भी मिल जाते हैं।

बासु और दोनों बच्चों की बातें सुनकर देवकी की स्नेह से आंखें भर आई। वो भी फिर प्यार से बोल उठी। लगता है आज मेरे घर के सदस्यों ने मुझे पूरी तरह रुलाने की ठान रखी है।

 शायद इसीलिए आज मुझ पर जरूरत से ज्यादा ही प्यार उड़ेला जा रहा है। तुम तीनों इस तरह मुझ पर इतना प्यार बरसाओगे तो मैं तो रोज अपने बदन पर बुखार को न्योता देने को तैयार हूं कहकर वो मुस्कुराने लगी। बासु और दोनों बच्चे नहीं… कहकर एक साथ देवकी के गले लग गए। 

देवकी का बरसों पहले लिया गया फैसला आज उसे बहुत बड़ी खुशी दे रहा था क्योंकि.. अगर उसके खुद के बच्चे होते तो… सिर्फ मां कहकर ही पुकारते मगर… अक्षत और रेवती ने तो भाभी मां…. कहकर पुकारा। 

जो किसी की खुद की संतान के मां के संबोधन से कम तो नहीं था बल्कि…. उसमें भाभी शब्द जुड़कर उसे ऊपर वाले की और स्वयं की नजरों में भी बहुत ऊंचा ओहदा भी तो दे गया था।

स्वरचित 

सीमा सिंघी 

गोलाघाट असम

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