छठी का उपहार – अर्चना सिंह

घर के हर कोने में पकवानों की खुशबू बिखरी हुई थी । चारु घर के अंदर घुसते ही अपनी माँ सुधा जी को मिठाई के डिब्बे पकड़ाते हुए बोली…”लो माँ ! अभी इसको सम्भाल कर रखो जब अपनी भतीजी का मुँह देखूँगी तब तुमसे ले लूंगी। सुधा जी ने सवालिया निगाहों से चारु को देखते हुए पूछा..ये क्या बेटा,,? यही लाई है या और कुछ भी देगी भतीजी को आखिर बुआ जो …चारु ने माँ की बात बीच में ही काटते हुए कहा…”मैं तो घर में सबसे छोटी हूँ माँ ! मैं क्या दे सकती हूँ ?चल..चल , तू और तेरी बातें । ये कहीं नहीं लिखा है कि छोटे सिर्फ़ लेते हैं देते नहीं । ऐसा बोलते हुए सुधा जी ने कहा..खीर चढ़ा है एक बार चेक करके बंद कर देना । चारु खीर की महक साँसों में भरते हुए बाकी बर्तनों के ढक्कन हटाकर देखते हुए बोली..छठी पूजा के लिए इतने व्यंजन फिर डिनर के लिए अलग से व्यंजन ? क्या हो गया है तुम्हें माँ , हमारे समय में तो इतना खर्च नहीं करती थी । 

चारु पानी की बोतल निकालने के लिए ही फ्रिज खोली थी कि उसके पापा प्रकाश जी आए । चारु ने चरण स्पर्श किया और प्रकाश जी ने खुश रहो बोलते हुए कहा..चारु ! हलवाई को देख लो बेटा सारे व्यंजन तुमलोगों के मनपसंद तो हैं न ? जी पापा बोलकर चारु फिर माँ से बोलने लगी ..मम्मी, नीरू दीदी से मेरी बात नहीं हो पाई वो कब तक पहुँचने वाली हैं, उनका टिकट तो कल का ही था , और पूर्णिमा भाभी दीपाली भाभी नहीं दिख रहीं वो कहाँ हैं? चारु के बोलते ही उसके दोनों भैया जय और रवि सामने से आते दिखे और छोटे भाई रवि ने छेड़ते हुए कहा..”मोटी हो गई है इसलिए नहीं चल पा रही, छत पर जाकर देख दोनों भाभियाँ वहीं हैं । चारु अपनी तीन वर्ष की बेटी को गोद में उठाई और छत पर चढ़ गई । घर का तो पूरा हुलिया ही बदला हुआ था, चारु देखकर अवाक रह गई । मम्मी को कितना बोलती थी सफाई करा दो मेरा एक कोने में कमरा होगा मेहमानों का बार – बार मुझे सामना नहीं करना पड़ेगा तब तो माँ ने मुझे नहीं दिया  अब पूरा दिन खुद रसोई में लगी रहती हैं और माँ बेटी यहाँ घर के एक शानदार कोने में रहती हैं पूरे सुख सुविधा के साथ ।

पूर्णिमा की नजरें टकरा गईं चारु से । बैठने का इशारा करते हुए पूर्णिमा ने चारु से कहा..अभी तो दीपाली ब्यूटिशियन के साथ है दीदी बात नहीं कर पाएगी । आप मम्मी – पापा जी और भाइयों से मिल लीं ? हूँ ! एक शब्द में रूखा सा उत्तर देते हुए चारु ने अपनी बेटी को पूर्णिमा के हाथ में सौंप दिया और भतीजी को प्यार से गोद में उठा लिया । बच्ची के सिर के पास वेलवेट का एक सुंदर सा बड़ा बॉक्स रखा था । बहुत उत्सुकता हो रही थी चारु को वो देखने की पर जलन के कारण वह मुँह खोल ना सकी । पूजा के लिए मेहमान आने शुरू हो गए थे । दीपाली के बाद अब पूर्णिमा के तैयार होने की बारी थी । दीपाली ने चारु को देखकर खुशी से गले लगा लिया और बोलने लगी..”दीदी ! आपको भी ब्यूटिशियन तैयार कर देगी शादी से पहले आपको बहुत शौक होता था ना, आज तो मौका भी बहुत अच्छा है । मेरी जिंदगी में बहुत मुश्किल से ये पल आठ साल बाद आया है, मेरी खुशी का अंदाजा मैं बयान नहीं कर सकती । 

चारु को अच्छा लगा दीपाली की बात सुनकर । पर वो दीपाली को अपना दुश्मन समझती थी क्योंकि दीपाली ने आने के बाद पूरे घर को बहुत कायदे से सम्भाल रखा था जब चारु की शादी नहीं हुई थी और दीपाली शादी होकर आई थी तभी उसके गुणों को देखकर सुधा जी ने बोलना शुरू कर दिया था ..कितनी अच्छी लड़की है, उम्र में तुमसे बड़ी नहीं है पर आते ही इसने अपने प्यार और परवाह से अपनी गृहस्थी सम्भाल ली । तब से हर छोटे कामों में चारु ने उसे अपना दुश्मन मान लिया ।

पंडित जी आ चुके थे । प्रकाश जी ने घर के अंदर पंडित जी को बिठाकर कहा..”नीरू और प्रभाकर बाबू स्टेशन पहुंचने वाले हैं , मैं लेकर आता हूं उन्हें । तभी चारु के पति निखिल ने पॉकेट से गाड़ी की चाभी लहराते हुए कहा..”आप बैठिए पापा जी ! मैं उनलोगों को लेकर आता हूँ । सब अपने कामों में व्यस्त थे, चारु के मन के भीतर बहुत ऊहापोह चल रही थी वेलवेट बॉक्स देखने की , बहुत नियंत्रण करके खुद को रोकी रही फिर सबको अपने कामों में मशगूल देखकर उसे बर्दाश्त नहीं हुआ और वो छत वाले कमरे में जाकर टटोलने  लगी ..हाथ में बॉक्स उठाया था, खोलकर देखने ही वाली थी भाभियों को क्या मिला है तब तक सुधा जी ने उसे आवाज़ दी और हड़बड़ाहट में चारु ने बॉक्स को अपने पर्स में डाल दिया । जल्दी से नीचे आ गई और सुधा जी अपनी अलमारी खोल के बैठी  सब सामानों को निकाल रही थीं कि चारु ने जमीन पर बैठते हुए कहा…”कुछ बोल रही थी माँ ? “हाँ”…जो भी देने वाले सामान हैं बेटा निकाल लो और सुधा जी ने अपने द्वारा लाए गए सभी सामान चारु को दिखाया । चारु ने भी अपनी ट्रॉली से बच्चे के दो सेट कपड़े और तौलिया निकाला । सुधा जी ने पूछा…”इतने सामान दोनों भाभियों ने तुम्हें मिल के दिया था तुम्हारी बेटी सिया के होने पर और ये तुम क्या दे रही हो बेटा ? थोड़ा सोचना चाहिए जो खुद को अच्छा लगे वही देना चाहिए । जब सिया हुई थी तब तो तुमने ढिंढोरा पिटवा दिया कि मेरे ससुराल के लोग देखेंगे अच्छी से अच्छी चीजें चाहिए तो उसके मायके वालों को लिए भी तो ये सोचना चाहिए । जब तुम्हारे विचार ऐसे होंगे तो फिर तो तुम्हारी भाभियां और भाई मेरे जाने के बाद कोई नहीं पूछेंगे तुम्हें । नीरू आकर उसी कमरे में खड़ी हो गई और दीपाली व माँ  से गले लगकर एक बैग दिखाते हुए मम्मी को बोलने लगी..”मम्मी ! मैं नहाकर आती हूं ये आप एक बार देख लीजिए छुटकी के लिए लाई हूँ । चारु की आँखें फटी रह गईं..उस बैग में बहुत सारी चीजों के साथ भैया का कुर्ता पायजामा और भाभी की साड़ी और श्रृंगार भी थे । थोड़ी देर के लिए दीपाली को लगा कि ये जीजू और दीदी ने शाम की पार्टी में पहनने के लिए कपड़े रखे होंगे।  पर नीरू नहाकर आई तो चारु को पूछने लगी ..तुम क्या क्या लाई ? सुधा जी ने बोला..”सिर्फ दो कपड़े लाई है बताओ बेटा ! ऐसे अच्छा लगता है क्या ? जब देने की क्षमता है इतनी और लेने का शौक भी है तो देना भी चाहिए । ये उपहार तो परस्पर होते हैं। कम देना बुरा नहीं पर ज्यादा की अपेक्षा रखना बुरा है ।

नीरू ने सिर पर हाथ रखते हुए माँ से कहा..”थोड़ी देर के लिए ट्रेन लेट हो गई और भाभी पूजा पर बैठ गईं नहीं तो ये साड़ी और कुर्ता मेरा दिया हुआ पहन कर बैठते तो कितना अच्छा लगता । चारु का मन आत्म ग्लानि से भर रहा था नीरू की बातें सुनकर । नीरू ने चारु के कंधे पर हाथ रखकर कहा..” देने में तुम्हारा मन इतना छोटा क्यों हो जाता है ? आखिर बड़े भतीजे में दिया था तो इसमें भी तो बराबर करना बनता है ना? इतने अच्छे ओहदे पर तुम्हारे पति हैं और तुम भी क्रेच से कमा लेती हो पैसे फिर इतना होते हुए भी तुम दो जोड़ी कपड़े लाई । चारु ने तुनक कर कहा..”छोटी हूँ मैं और दीपाली भाभी ने मुझे या मेरी बेटी को क्या दिया, एक जोड़ी कपड़े ही ना ? पूर्णिमा भाभी ने तो बहुत अच्छे से मेरे लिए और ससुराल वालों के लिए भेजा था । चारु तुम भूल रही हो , तुमने ही अपने ससुराल वालों को खुश करने के लिए माँगा था , तुम सिर्फ अपना स्वार्थ देखती हो और भूल जाती हो । हमारी भाभियां इतनी अच्छी हैं कि तुम्हारी बातों का बुरा नहीं मानती हैं वरना तुम्हारी सोच जिस तरह है वैसे ही भाभियां भी सोचने लगें तब तो तुम एक दिन टिक नहीं पाओगी इस घर में । नीरू ने चारु को समझाते हुए कहा । और हाँ बेटा ..बार बार जो छोटे होने की दलीलें देती है ना बिल्कुल गलत है । रवि की आय ही कितनी है, छोटी सी स्टेशनरी दुकान है ज्यादा चलती भी नहीं, कितना करेगा वो ? और तुम भूल रही हो कितने कपड़े तुमने दीपाली से सिलवाए है अब तक, कॉलेज के दिनों और शादी की रस्मों में भी तुमने उसके बनाए कपड़े पहने । ऐसे ही तो चलता है बेटा । “अब क्या ..? घर की बात है मम्मी मुझे उसके भी पैसे देने चाहिए थे क्या ? चारु ने खीझते हुए कहा । फिर सुधा जी ने बोला तुम बात ही नहीं समझना चाह रही हो बाहर इन्हीं  मेहनत के तो पैसे लेते हैं ना । पैसे देने नहीं कह रही लेकिन दोनों भाभी जब एक जगह है तो एक जैसा करना चाहिए । जिसके पास होता है उसे तो अब देते हैं पर जिसके  पास नहीं हो उसके लिए भी सोचना चाहिए।  जैसे छोटे लेने की क्षमता रखते हैं वैसे देने की भी क्षमता रखनी चाहिए । हर समय शिकायत मत किया करो, जैसे वक्त बदलता है उस तरह से चलना चाहिए । सुधा जी ने चारु की आँखों में आँखें डालकर कहा ।

सबकी हिदायत भरी बातें सुनकर चारु का चेहरा बुझने सा लगा।  उसे लग रहा था जैसे वो घर से निकल जाए । “आपलोग को कब से पंडित जी बुला रहे हैं । चलिए जल्दी, पूजा कितने देर से चल रही है लेकिन आपकी बातें अभी तक खत्म नहीं हुई? पूर्णिमा  की आवाज सुनकर सब थोड़ा सामान्य होने की कोशिश करने लगे ।  रवि ने धीरे से आकर माँ के कान में पूछा..”दीपाली ने जो चेन मंगवाया था दीदी लोग को देने के लिए वो नहीं मिल रहा । सुधा जी कमरे से निकलते हुए ठिठक सी गईं । अभी कुछ सोच पातीं तब तक मेहमानों के सामने भी शोर हो गया कि उपहार में देने वाला चेन नहीं मिल रहा । छत के कमरे में जाकर सब खोजने लगे …इधर चारु को होश आया कि वो हड़बड़ में नीचे आ गई और ना उपहार देख पाई ना उस जगह पर रख पाई । उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें ये सोचकर उभरने लगीं कि सारे रिश्तेदार, मेहमान के सामने पर्स से निकालूंगी तो मेरी बेज्जती होगी और चोरी का इल्जाम लगेगा । दीपाली के पास जाकर चारु ने पूछा..अभी क्या काम है बॉक्स का ! दीपाली ने मुस्कुराते हुए कहा..”कैसी बात कर रही हैं दीदी ! मेरी जिंदगी में इतनी बड़ी खुशी आई है तो मैने बच्ची के दोनों बुआओं के लिए उपहार स्वरूप कुछ बनवा रखा था यहीं लेकिन व्यस्तता के कारण शायद इधर उधर हो गया है ।

दीपाली की बातें सुनकर चारु झेंप गई उसे खुद पर शर्मिंदगी होने लगी । पुरानी सारी बातें और दोनों नन्द भाभी का रिश्ता उसके द्वारा खराब किया गया सब उसके दिमाग में चलचित्र की भांति घूम गया । भीतर ही भीतर चारु सुलग रही थी कि मैने कैसे ये सोच लिया दोनों भाभियों ने खुद के लिए बनवाया है । कितनी अच्छी है सच में मेरी भाभी । पूर्णिमा ने सभी परिवार वाले और दोस्तों को कहा ..आपलोग चलिए खाने, मिल जाएगा बॉक्स।

ज्यादा तमाशा बनता इससे पहले बड़ी हिम्मत करके चारु ने अपने पर्स से बॉक्स निकालकर हकलाते हुए दीपाली के हाथ में देकर कहा.. ग.. ग…”गलती से मेरे पर्स में रखा गया था भाभी ! चारु को देख सब बिल्कुल निशब्द  थे । सुधा जी गुस्से में उसे एकटक देख रही थीं तभी दीपाली ने सुधा जी के कंधे पर हाथ रखते हुए बात को संभाला ..चलिए मम्मी जी ! पूजा और काज वाले घरों में सामान हो ही जाता है इधर – उधर । आज का दिन बहुत शुभ है इसे नाराजगी में नहीं गंवाना है ।

सबको जाते हुए देखकर चारु दौड़ कर ज़ोर से फफक कर दीपाली की बाहों में बोलते हुए चिपक गई ..”आप बहुत अच्छी हैं भाभी । #ऐसी भाभी सबको मिले । दीपाली ने भी चारु के कंधे पर हाथ रखकर उसके प्यार को स्वीकृत किया ।

#ऐसी भाभी सबको मिले

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मौलिक, स्वरचित

अर्चना सिंह

#ऐसी भाभी सबको मिले

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