मेरे मन में उस समय चाचा और चाची के प्रति नफरत का एक ऐसा ज्वालामुखी धधक उठा था कि मैं रात को सोते हुए भी कांप उठती थी। सपने में भी अगर चाची का भयानक, तानों से भरा चेहरा नजर आता, तो मैं चीखकर उठ बैठती थी। जिस इंसान ने मेरी मां को बेबसी की उस आग में झोंका था, उसे मैं अपनी यादों में भी कोई जगह नहीं देना चाहती थी।
लेकिन मेरी मां ने कभी हार नहीं मानी। अपनी लाचारी को उन्होंने अपनी ताकत बना लिया। मां ने आंसुओं को पीकर हम तीनों बहनों के सिर पर हाथ रखकर एक ही बात कही थी,
कानपुर के स्वरूप नगर की उस पुरानी, दोमंजिला पुश्तैनी हवेली की लाल ईंटें आज भी जब मेरी स्मृतियों में उभरती हैं, तो सीने में एक अजीब सी टीस उठने लगती है। वह मकान केवल ईंट और गारे का ढांचा नहीं था, बल्कि मेरे दादाजी के पसीने और मर्यादा की नींव पर खड़ा हुआ एक साझा संसार था। हवेली के बीचों-बीच खुला बड़ा सा आंगन, चारों तरफ बने ऊंचे बरामदे और कोने में लगा हरसिंगार का पेड़—बचपन में मुझे लगता था कि हमारा यह परिवार कभी बिखर ही नहीं सकता।
उस विशाल हवेली में दो चूल्हे जलते थे, लेकिन दिल एक थे। एक हिस्से में हम रहते थे—मेरे पिता विद्याधर जी, मेरी मां जानकी, मैं और मेरी दो छोटी बहनें, अदिति और अवनि। दूसरे हिस्से में पिता के फूफाजी का परिवार रहता था, जिनके बेटे यानी हमारे रिश्ते के चाचा गिरीश थे। गिरीश चाचा को मेरे पिता ने हमेशा अपने सगे छोटे भाई से बढ़कर माना। जब फूफाजी का देहांत हुआ, तो पिता ने गिरीश चाचा की पढ़ाई से लेकर उनके करियर तक हर मोड़ पर अपनी जेब और दिल दोनों खुले रखे। घर में त्योहारों पर एक जैसी मिठाइयां बनतीं, और हर खुशी-गम दोनों परिवार एक साथ बांटते थे।
लेकिन समय का पहिया हमेशा एक सा नहीं घूमता। सब कुछ उस दिन से बदलने लगा जब गिरीश चाचा का विवाह रागिनी चाची से हुआ।
रागिनी चाची एक बेहद महत्त्वाकांक्षी और कटु स्वभाव की महिला थीं। हवेली में कदम रखते ही उनकी नजरें घर के प्रेम पर नहीं, बल्कि प्राइम लोकेशन पर स्थित उस बेशकीमती पुश्तैनी जमीन और मकान पर टिक गईं। शादी के बमुश्किल छह महीने बीते होंगे कि घर के आबोहवा में जहर घुलना शुरू हो गया। चाची को यह बात खटकने लगी कि इस बड़ी हवेली में विद्याधर जी का परिवार क्यों रह रहा है। उन्हें लगता था कि अगर किसी तरह इस सीधे-सादे परिवार को बाहर धकेल दिया जाए, तो पूरी हवेली और सामने की करोड़ों की जमीन अकेले उनके नाम हो जाएगी।
चाची ने गिरीश चाचा के कान भरने शुरू किए। चाचा, जो कभी पिता के सामने आंख उठाकर बात नहीं करते थे, धीरे-धीरे पिता से नजरें चुराने लगे और फिर खुलेआम बदतमीजी पर उतर आए। बात-बात पर ताने कसे जाने लगे। कभी नल से पानी भरने को लेकर विवाद खड़ा किया जाता, तो कभी आंगन में बच्चों के खेलने पर गालियां दी जातीं।
मेरे पिता बेहद शांत, स्वाभिमानी और संवेदनशील व्यक्ति थे। वे एक सरकारी स्कूल में साधारण अध्यापक थे। उन्होंने कभी किसी से विवाद नहीं किया था। जब अपने ही घर में उन्हें रोज जलील किया जाने लगा, तो वे भीतर ही भीतर घुटने लगे।
एक दिन जब पिता दफ्तर से लौटे, तो देखा कि चाचा ने मुख्य द्वार पर एक नया ताला जड़ दिया था और हमारे आने-जाने के लिए पीछे की संकरी, बदबूदार नाली वाली गली का दरवाजा खोल दिया था। पिता ने हाथ जोड़कर कहा, “गिरीश, यह क्या बचपना है? तुम मेरे छोटे भाई हो, अगर कोई तकलीफ है तो बैठकर बात कर लो।”
इस पर रागिनी चाची अंदर से निकलकर आईं और जहर उगलते हुए बोलीं, “भाई होंगे आप बाहर की दुनिया के लिए! यह मकान हमारे ससुर की कमाई का हिस्सा है। अपनी तीन-तीन बेटियों का बोझ लेकर हमारे सिर पर क्यों बैठे हैं? जाइए, कहीं किराए का कमरा ढूंढिए। जब तक खाली नहीं करेंगे, चैन से सांस नहीं लेने देंगे।”
पिता उस दिन पहली बार अपनी ही चौखट पर अपमान का घूंट पीकर रो पड़े। वे स्वाभिमान के धनी थे, लेकिन अपनी तीन मासूम बच्चियों और पत्नी की सुरक्षा के आगे लाचार हो गए। रोज-रोज के मानसिक क्लेश, अपमान और अपनों के विश्वासघात ने पिता के दिल पर ऐसा गहरा घाव किया कि उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा। वे दिन-रात यही सोचते रहते कि अगर मुझे कुछ हो गया, तो मेरी इन अनाथ जैसी बच्चियों का क्या होगा।
और वही अनहोनी एक दिन घट गई।
अत्यधिक मानसिक तनाव के कारण एक रात पिता को सीने में तेज दर्द उठा। अस्पताल ले जाने के लिए जब मां ने रोते हुए चाचा से गाड़ी निकालने की गुहार लगाई, तो चाचा ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया और बाहर नहीं निकले। जब तक पड़ोसियों की मदद से ऑटो का इंतजाम हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अस्पताल के डॉक्टरों ने पिता को मृत घोषित कर दिया। उस मनहूस रात हमारे सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया।
हम तीनों बहनें और मां उस रात जिस तरह रोए, शायद पत्थर भी पिघल जाता। लेकिन हवेली के दूसरे हिस्से में किसी की आंख से एक आंसू नहीं टपका। पिता के अंतिम संस्कार के तेरहवें दिन ही रागिनी चाची और गिरीश चाचा ने अपना असली क्रूर चेहरा दिखा दिया।
शोक सभा अभी खत्म ही हुई थी कि चाची ने मां के सामने अल्टीमेटम रख दिया, “विद्याधर जी तो चले गए। अब तुम औरत जात यहां क्या करोगी? सीधे-सीधे यह मकान खाली करो और अपने मायके की राह नापो। वरना हम सामान सड़क पर फेंक देंगे।”
मेरी मां जानकी, जो हमेशा घूंघट में रहने वाली एक सीधी-सादी घरेलू स्त्री थीं, उस दिन चाची के पैरों में गिर पड़ीं। मां ने दोनों हाथ जोड़कर, अपनी साड़ी का पल्लू फैलाकर भीख मांगी, “रागिनी, भगवान के लिए मुझ पर नहीं, इन तीन अनाथ बच्चियों पर तरस खाओ। बड़ी अभी दसवीं में है, बाकी दोनों उससे भी छोटी हैं। मेरे मायके में अब कोई नहीं बचा जो हमें सहारा दे। मैं वचन देती हूं, जैसे ही मेरी लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी हो जाएंगी या इनकी शादी हो जाएगी, हम खुद यह घर छोड़कर चले जाएंगे। तब तक हमें इस कोने में एक छत के नीचे जिंदा रहने दो।”
लेकिन उस पत्थर दिल औरत पर मां के आंसुओं का कोई असर नहीं हुआ। उसने हिकारत से मां को झिड़क दिया और कहा, “यह कोई धर्मशाला नहीं है। रोने-धोने का नाटक कहीं और जाकर करना।”
उसके बाद शुरू हुआ हमारे जीवन का सबसे भयानक और त्रासद दौर। हमें घर से निकालने के लिए हर रोज नए-नए अमानवीय हथकंडे अपनाए जाने लगे। कभी रात को हमारी पानी की टंकी की पाइप काट दी जाती, तो कभी बिजली का मुख्य फ्यूज निकाल दिया जाता ताकि हम अंधेरे और गर्मी में तड़पें। बारिश के मौसम में हमारी छत की नालियों को बंद कर दिया जाता जिससे हमारे कमरों में पानी भर जाए।
जब हम बहनें स्कूल से लौटतीं, तो चाची हमारे बस्ते छीनकर बाहर फेंक देतीं और दरवाजे पर गंदी गालियां लिख देतीं। मां सिलाई-कढ़ाई करके और पड़ोस के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर किसी तरह हमारा पेट पालती थीं। कई रातें ऐसी बीतीं जब घर में केवल एक सूखी रोटी होती थी, जिसे मां हम तीनों बहनों में बांट देती थीं और खुद पानी पीकर सो जाती थीं। मां पूरी रात जागकर पिता की तस्वीर के आगे घुटनों में सिर छुपाकर खून के आंसू रोती थीं। उनकी सिसकियों की आवाज आज भी मेरे कानों में गूंजती है।
मेरे मन में उस समय चाचा और चाची के प्रति नफरत का एक ऐसा ज्वालामुखी धधक उठा था कि मैं रात को सोते हुए भी कांप उठती थी। सपने में भी अगर चाची का भयानक, तानों से भरा चेहरा नजर आता, तो मैं चीखकर उठ बैठती थी। जिस इंसान ने मेरी मां को बेबसी की उस आग में झोंका था, उसे मैं अपनी यादों में भी कोई जगह नहीं देना चाहती थी।
लेकिन मेरी मां ने कभी हार नहीं मानी। अपनी लाचारी को उन्होंने अपनी ताकत बना लिया। मां ने आंसुओं को पीकर हम तीनों बहनों के सिर पर हाथ रखकर एक ही बात कही थी, “मेरी बच्चियों, हमारे पास रोने का वक्त नहीं है। हमारे अपमान का बदला किसी गाली या लड़ाई से नहीं, तुम्हारी कामयाबी से पूरा होगा। पढ़ो, इतना पढ़ो कि दुनिया तुम्हारे सामने झुक जाए।”
मां की उस सीख को हमने अपनी सांसों में उतार लिया। हम फटे हुए बस्तों, पुरानी किताबों और कभी-कभी दीये की रोशनी में पढ़ते रहे। लालच और नफरत के उस माहौल के बीच हमने अपनी पढ़ाई को ही अपनी ढाल बना लिया।
वर्ष बीतते गए। मेरी मेहनत रंग लाई और मैंने राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा पहले ही प्रयास में उत्तीर्ण कर ली और मुझे डिप्टी कलेक्टर का पद मिला। मेरी छोटी बहन अदिति ने मेडिकल की परीक्षा पास की और एक जानी-मानी डॉक्टर बनी, जबकि सबसे छोटी अवनि ने चार्टर्ड अकाउंटेंसी पूरी करके एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद हासिल किया।
जिस दिन मेरा पहला नियुक्ति पत्र आया, उस दिन मेरी मां हवेली के आंगन में पिता की तस्वीर के सामने खड़ी होकर फूट-फूट कर रोईं। लेकिन इस बार वे आंसू बेबसी के नहीं, आत्मसम्मान और विजय के थे।
हमने बिना किसी विवाद, बिना किसी झगड़े के अपनी मर्जी से वह पुरानी हवेली छोड़ दी। हमने शहर के सबसे पॉश इलाके में एक बेहद खूबसूरत, आधुनिक और खुला बंगला खरीदा, जिसके सामने हमने हरसिंगार का वही पौधा लगाया जो कभी बचपन में पिता के साथ देखा था। हमने मां को उस नए घर की दहलीज पर बैठाया और कहा, “मां, यह तुम्हारा अपना साम्राज्य है, जहां कोई तुम्हें कभी बेबस नहीं कर सकता।”
दूसरी तरफ, कर्मों का हिसाब बहुत सटीक और निर्मम होता है। जिस लालच की खातिर गिरीश चाचा और रागिनी चाची ने एक बेसहारा विधवा और अनाथ बच्चियों को खून के आंसू रुलाया था, वही लालच उनके अपने विनाश का कारण बन गया।
पूरी हवेली पर कब्जा करने के बाद चाचा ने रातों-रात अमीर बनने के चक्कर में जमीन पर भारी कर्ज ले लिया और एक सट्टेबाजी वाले रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में पैसा लगा दिया। कुछ ही वर्षों में वह प्रोजेक्ट पूरी तरह डूब गया। कर्जदार रोज उनके दरवाजे पर आकर तकादा करने लगे। उनका इकलौता बेटा, जिसे उन्होंने बड़े लाड़-प्यार और अहंकार में पाला था, बुरी सोहबत में पड़कर नशे का आदी हो गया। उसने जुए और अय्याशी में बची-खुची दौलत भी उड़ा दी। अंततः उस पुश्तैनी हवेली की नीलामी हो गई।
चाचा पर फालिज (पैरालिसिस) का हमला हुआ और वे पूरी तरह बिस्तर पर पड़ गए। रागिनी चाची, जो कभी दूसरों के आंसुओं पर अट्टहास करती थीं, आज अपने ही बेटे के दुर्व्यवहार और दरिद्रता के बोझ तले दबकर तिल-तिल मरने को मजबूर हो गईं। उनका पूरा परिवार तिनके की तरह बिखर गया।
एक दिन जब मैं अपने सरकारी वाहन से एक निरीक्षण के सिलसिले में शहर के पुराने इलाके से गुजर रही थी, तो मेरी नजर एक जर्जर, टूटे-फूटे किराए के मकान के बाहर बैठी एक लाचार, सफेद बालों वाली बूढ़ी औरत पर पड़ी। उसके चेहरे पर गहरी झुर्रियां थीं और कपड़े मैले-कुचैले थे। वह रागिनी चाची थीं।
गाड़ी रुकते ही वे सहम गईं। जब मैं गाड़ी से नीचे उतरी और उनके सामने जाकर खड़ी हुई, तो उन्होंने पहचान लिया। उनके चेहरे पर जो गहरा अपराधबोध, शर्म और खौफ उभरा, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। वे कांपते हुए अपनी नजरें जमीन में गड़ाए रहीं, उनकी हिम्मत नहीं हुई कि मेरी आंखों में देख सकें।
मेरे मन में एक पल के लिए बचपन के वे सारे जख्म, मां के आंसू और पिता की असहाय मौत की यादें कौंध गईं। लेकिन अगले ही पल मेरी मां के संस्कार मेरे सामने आ गए। नफरत का जवाब नफरत से देकर मैं अपने पिता के दिए संस्कारों को छोटा नहीं कर सकती थी।
मैंने चुपचाप आगे बढ़कर अपने ड्राइवर से कहकर गाड़ी से राशन के पैकेट और कुछ जरूरी दवाइयों के बक्से उतरवाए और उनके दरवाजे पर रखवा दिए। फिर मैंने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और कांपते हुए चाची के हाथों में रख दिए।
चाची ने सजल नेत्रों से कांपते होंठों के साथ कहा, “बेटी… तू? हमने तो तेरे परिवार के साथ… जानवरों से भी बदतर सुलूक किया था। तूने हमें बर्बाद करने के बजाय यह क्यों किया?”
मैंने बहुत शांत और धीमे स्वर में कहा, “चाची, अगर मैं आपसे बदला लेती या आपकी बर्बादी पर खुश होती, तो मुझमें और आप में क्या फर्क रह जाता? मेरी मां ने हमें जुल्म सहकर भी इंसानियत नहीं भूलना सिखाया है। आपने हमें आंसुओं के सिवा कुछ नहीं दिया था, लेकिन उन आंसुओं ने हमें मजबूत बनाया। आप अपने कर्मों का फल भुगत रही हैं, और हम अपने पिता के आशीर्वाद का। भगवान आपको सद्बुद्धि दे।”
यह कहकर मैं मुड़ी और अपनी गाड़ी में बैठ गई।
गाड़ी के शीशे से जब मैंने पीछे देखा, तो चाची वहीं धूल में बैठकर अपने सिर पर हाथ रखकर रो रही थीं। आज उनके रोने में कोई बनावट नहीं थी, बल्कि अपने किए पापों का असहनीय पश्चाताप था।
मैंने एक गहरी सांस ली। मेरे दिल से बरसों पुरानी नफरत का वह आखिरी बोझ भी उतर चुका था। मुझे समझ आ गया था कि जिंदगी में सबसे बड़ा प्रतिशोध बदला लेना नहीं, बल्कि अपने चरित्र और कामयाबी से सामने वाले के अहंकार को आईना दिखा देना है। कुदरत की अदालत में देर जरूर हो सकती है, लेकिन अंधेर कभी नहीं होती। जो दूसरों की आंखों में आंसू बोते हैं, उन्हें एक दिन अपने ही कर्मों की कड़वी फसल काटनी ही पड़ती है।
जीवन में जब अपने ही लोग स्वार्थ और लालच के वशीभूत होकर अपनों का हक छीनने लगें और आंसुओं का कारण बन जाएं, तो कभी भी धैर्य और सच्चाई का मार्ग मत छोड़िए। समय हर जुल्म का हिसाब खुद करता है। क्या आपने भी अपने जीवन या आस-पड़ोस में कभी कर्मों के ऐसे न्याय को घटते देखा है? इस कहानी और इसके संदेश पर अपनी राय और अनुभव कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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मूल लेखिका : रंजीता अवस्थी
शाहजहांपुर