संस्कारों की अनमोल धरोहर

मगर कौशल्या जी का दिल पिघलने का नाम नहीं ले रहा था। जब भी कोई बात होती, वे ताना मारने से नहीं चूकतीं, “अरे बहू, तुम्हारे मायके में तो शायद साबुन भी गिनकर इस्तेमाल होता होगा, यहाँ थोड़ा सलीके से रहा करो। हमारे बड़े घरों के कायदे-कानून अलग होते हैं।” ऐसे कड़वे तीर रोज सृष्टि के दिल को छलनी करते थे, पर वह कभी पलटकर जवाब नहीं देती थी। वह अपनी नम आँखों को पल्लू से पोंछती और फिर से अपने काम में जुट जाती। अर्णव जब रात को कमरे में आता और अपनी पत्नी की उदासी भांप लेता, तो उसका हाथ थामकर कहता, “सृष्टि, माँ का स्वभाव थोड़ा कठोर जरूर है, पर दिल बुरा नहीं है। तुम बस हिम्मत मत हारना। तुम्हारा धैर्य एक दिन उनका दिल जरूर जीत लेगा।”

शहर की सबसे प्रतिष्ठित और शांत रिहायशी कॉलोनी में रायबहादुर हरिनारायण जी की कोठी ‘सत्यम’ अपनी भव्यता के लिए जानी जाती थी। हरिनारायण जी जितने उसूलपसंद और विनम्र इंसान थे, उनकी धर्मपत्नी कौशल्या जी का मिजाज उतना ही अभिमान और कुलीनता के दिखावे से भरा हुआ था। कौशल्या जी को अपने खानदान के नाम, अपनी दौलत और समाज में अपनी ऊंची हैसियत पर बेहद नाज था। वे हमेशा अपनी बराबरी वालों में ही उठना-बैठना पसंद करती थीं। इस दंपत्ति के दो बेटे थे—अर्णव और अनिकेत। छोटा बेटा अनिकेत अभी विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था, जबकि बड़ा बेटा अर्णव बचपन से ही शांत, गंभीर और कुशाग्र बुद्धि का धनी था। अर्णव को फिजूलखर्ची या अपनी अमीरी का ढिंढोरा पीटना कभी रास नहीं आया। उसने अपनी मेहनत के दम पर सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण की थी और अब वह कलेक्ट्रेट में एक जिम्मेदार उच्च पद पर अपनी सेवाएं दे रहा था।

अर्णव जब भी सुबह अपनी गाड़ी से दफ्तर के लिए निकलता, तो रास्ते के चौराहे पर बने बस स्टॉप के पास अक्सर उसकी नजर एक लड़की पर पड़ती। वह लड़की हाथ में किताबों का थैला लिए रोज उसी वक्त बस का इंतजार करती दिखती थी। सादगी में भी एक अजब सा तेज था उसके चेहरे पर। सूती कुर्ते में लिपटी, आंखों में गंभीरता और चेहरे पर एक सौम्य गरिमा लिए वह लड़की अर्णव के मन में एक अनूठी छाप छोड़ गई थी। अर्णव रोज उसे एक नजर देखता और आगे बढ़ जाता। धीरे-धीरे यह रोज का सिलसिला उसके दिल की धड़कन बन गया। अर्णव उस लड़की से बात करने, उसका नाम जानने के लिए बेचैन रहने लगा, पर उसके संकोची स्वभाव ने कभी उसे बीच रास्ते में गाड़ी रोककर आगे बढ़ने की इजाजत नहीं दी।

एक दिन कॉलोनी के एक सामाजिक उत्सव में अर्णव ने उसी लड़की को देखा। वह समारोह की व्यवस्था में बड़े सलीके से हाथ बंटा रही थी। अर्णव का दिल जोर से धड़क उठा। उसने अपनी हिचकिचाहट को परे धकेला और आगे बढ़कर बड़ी शालीनता से नमस्कार किया।

“नमस्ते… मैं अर्णव हूँ,” अर्णव ने अपनी धड़कनों को काबू करते हुए कहा।

लड़की ने पलकें उठाईं और एक अत्यंत मधुर व संयमित मुस्कान के साथ जवाब दिया, “जी नमस्ते, मैं सृष्टि हूँ।”

उस संक्षिप्त सी मुलाकात ने दोनों के दिलों में छुपी भावनाओं के द्वार खोल दिए। सृष्टि उसी इलाके में एक छोटे से किराए के मकान में रहने वाले एक सीधे-सादे दर्जी की बेटी थी। परिवार में माता-पिता और एक छोटी बहन थी। सृष्टि दिन में एक निजी विद्यालय में बच्चों को पढ़ाती थी और शाम को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करती थी। उसके घर की माली हालत बेहद साधारण थी, जहाँ महीने के अंत में हर एक पैसे का हिसाब लगाना पड़ता था। जब सृष्टि को पता चला कि अर्णव उसी शहर के सबसे रईस और बड़े घराने का बेटा है, तो उसने झिझकते हुए अर्णव से दूरी बनानी चाही। वह जानती थी कि दो किनारों का मिलना कभी आसान नहीं होता। पर अर्णव दौलत के झूठे चश्मे से दुनिया को नहीं देखता था। उसने सृष्टि की सादगी, उसकी कर्तव्यनिष्ठा और उसके स्वाभिमान को दिल से अपना लिया था।

एक शाम अर्णव ने अपने घर के ड्राइंग रूम में बैठकर अपने दिल की बात परिजनों के सामने रखी। उसने बड़ी सहजता से कहा, “माँ, बाबूजी… मैंने अपने जीवनसाथी के रूप में सृष्टि को चुना है। वह एक बेहद सुलझी हुई और स्वाभिमानी लड़की है। मैं उसी से विवाह करना चाहता हूँ।”

यह सुनते ही कौशल्या जी के हाथ से चाय की प्याली छूटते-छूटते बची। उनके चेहरे पर गुस्सा और अविश्वास साफ झलकने लगा। उन्होंने तिनक कर कहा, “क्या कहा तुमने? एक दर्जी की बेटी? जो अपनी रोजी-रोटी के लिए मोहल्ले के स्कूल में धक्के खाती फिरती है? अर्णव, तू अपनी हैसियत भूल गया है क्या? हमारे खानदान की एक साख है, बिरादरी में एक रुतबा है। ऐसी कंगाल लड़कियों को मैं अच्छी तरह जानती हूँ, जो अमीर घरों के लड़कों पर डोरे डालकर अपनी किस्मत चमकाने का ख्वाब देखती हैं। यह शादी इस घर में कभी नहीं हो सकती!”

हरिनारायण जी ने अपनी पत्नी को शांत करने का प्रयास किया और गंभीरता से बोले, “कौशल्या, अपने शब्दों पर थोड़ा संयम रखो। मैंने उस बच्ची को देखा है। गरीबी कोई अपराध नहीं होती। सृष्टि संस्कारी और पढ़ी-लिखी लड़की है। हमें किस बात की कमी है जो हम सामने वाले की तिजोरी देखकर रिश्ता तय करें? हमारे बेटे की खुशी इसी में है, तो हमें यह रिश्ता स्वीकार करना चाहिए।”

पर कौशल्या जी टस से मस नहीं हुईं। वे अपनी जिद पर अड़ी रहीं, “मैं इस खानदान की बहू किसी सड़क छाप झोपड़ी से उठाकर नहीं लाऊँगी। समाज में क्या मुंह दिखाऊँगी?”

तब अर्णव ने अपनी नजरें उठाकर मां की ओर देखा। उसकी आवाज में बगावत नहीं, बल्कि एक अटल फैसला था, “माँ, मैंने जीवन में कभी आपकी किसी बात की नाफरमानी नहीं की, पर आज अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला ले रहा हूँ। अगर मैं शादी करूँगा तो सिर्फ सृष्टि से, वरना मैं जीवन भर कुंवारा रहूँगा।”

बेटे के इस अडिग रुख के आगे कौशल्या जी को झुकना पड़ा, पर उनके दिल का जहर कम नहीं हुआ। कुछ ही महीनों में शादी संपन्न हो गई। सृष्टि जब विदा होकर ‘सत्यम’ की चौखट पर आई, तो उसने मन ही मन संकल्प लिया कि वह इस परिवार को अपना सर्वस्व देगी। सृष्टि बहुत समझदार थी। उसने ससुराल के हर नियम, तौर-तरीके और पसंद-नापसंद को बहुत जल्दी सीख लिया। सुबह सबसे पहले उठकर पूजा की थाली सजाना, बाबूजी की दवाइयों का ध्यान रखना और रसोई में सबकी पसंद का भोजन बनाना—उसने हर जिम्मेदारी को हंसते हुए संभाला। वह कौशल्या जी के हर छोटे-बड़े काम को बिना कहे पूरा कर देती।

मगर कौशल्या जी का दिल पिघलने का नाम नहीं ले रहा था। जब भी कोई बात होती, वे ताना मारने से नहीं चूकतीं, “अरे बहू, तुम्हारे मायके में तो शायद साबुन भी गिनकर इस्तेमाल होता होगा, यहाँ थोड़ा सलीके से रहा करो। हमारे बड़े घरों के कायदे-कानून अलग होते हैं।” ऐसे कड़वे तीर रोज सृष्टि के दिल को छलनी करते थे, पर वह कभी पलटकर जवाब नहीं देती थी। वह अपनी नम आँखों को पल्लू से पोंछती और फिर से अपने काम में जुट जाती। अर्णव जब रात को कमरे में आता और अपनी पत्नी की उदासी भांप लेता, तो उसका हाथ थामकर कहता, “सृष्टि, माँ का स्वभाव थोड़ा कठोर जरूर है, पर दिल बुरा नहीं है। तुम बस हिम्मत मत हारना। तुम्हारा धैर्य एक दिन उनका दिल जरूर जीत लेगा।”

शादी के दो साल बीत गए। इस दौरान कौशल्या जी ने अपने छोटे बेटे अनिकेत के लिए एक बहुत बड़े उद्योगपति की बेटी, राधिका का रिश्ता तय किया। राधिका अकूत दौलत के साए में पली-बढ़ी थी। शादी में करोड़ों का लेन-देन हुआ, विदेशी गाड़ियां और हीरे-जवाहरात आए। कौशल्या जी के अरमान जैसे पूरे हो गए। वे फूली नहीं समा रही थीं। पूरे समाज में उन्होंने ढोल पीट दिया कि वे अपने घर में असली खानदानी बहू लेकर आई हैं।

जब भी कोई रिश्तेदार घर आता, कौशल्या जी सृष्टि के सामने ही राधिका की शान में कसीदे पढ़तीं, “यह देखो मेरी छोटी बहू! इसके मायके में दर्जनों नौकर आगे-पीछे घूमते हैं। बड़े घर की बेटियों की बात ही कुछ और होती है, चेहरे से ही रईसी टपकती है।” सृष्टि कोने में खड़ी बस खामोशी से सुनती रहती और चुपचाप मेहमानों के लिए नाश्ता परोसती।

पर हकीकत का पर्दा उठने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। राधिका दौलत के नशे में चूर थी। उसे अपने पति अनिकेत के अलावा घर में किसी दूसरे इंसान की परवाह नहीं थी। वह दोपहर तक सोती, उठकर जिम या पार्लर निकल जाती और रात को देर से लौटती। घर की रसोई में कदम रखना तो दूर, सास-ससुर को पानी पूछना भी वह अपनी तौहीन समझती थी। जब कौशल्या जी ने एक दिन उससे कहा कि वह थोड़ा समय परिवार के साथ बिताए, तो राधिका ने साफ शब्दों में कह दिया, “मम्मी जी, मैं यहाँ आपकी नौकरानी बनकर नहीं आई हूँ। मेरे डैड ने मुझे करोड़ों की दौलत दी है, ऐश करने के लिए। घर संभालने के लिए आपने नौकर रखे हैं और जो कम पड़े तो आपकी बड़ी बहू तो है ही, वो ये सब काम मुफ्त में करती ही है।”

राधिका की इस बदतमीजी ने कौशल्या जी के पैरों तले से जमीन खिसका दी। जिस दौलत पर वे नाज कर रही थीं, वही दौलत आज उनके मुंह पर तमाचा मार रही थी। अब धीरे-धीरे कौशल्या जी को समझ आने लगा था कि सृष्टि चुपचाप कितना बोझ उठाती है और बिना किसी शिकायत के पूरे घर को संभाले हुए है। पर अपने झूठे अहंकार के कारण वे अब भी सृष्टि से खुलकर बात नहीं कर पा रही थीं।

फिर एक दिन अनहोनी घट गई।

अर्णव और हरिनारायण जी किसी काम के सिलसिले में शहर से बाहर गए हुए थे। अनिकेत अपने दफ्तर में था। दोपहर के वक्त कौशल्या जी छत से कपड़े उतारने गईं। अचानक चक्कर आने से उनका संतुलन बिगड़ा और वे सीढ़ियों से लुढ़कती हुई सीधे नीचे आ गिरीं। एक भयानक चीख के साथ वे फर्श पर बेसुध हो गईं।

उस वक्त घर में सिर्फ छोटी बहू राधिका अपने कमरे में थी। चीख सुनकर जब वह बाहर आई, तो उसने देखा कि सास खून से लथपथ पड़ी हैं और दर्द से कराह रही हैं। राधिका घबरा गई, पर उसकी संवेदनहीनता देखिए—उसने अपनी सास को हाथ तक नहीं लगाया। उसने तुरंत फोन उठाया और बाजार में सब्जी लेने गई सृष्टि को फोन मिला दिया।

“हेलो सृष्टि, मम्मी जी सीढ़ियों से गिर गई हैं और काफी खून बह रहा है। मैं खून देखकर बेहोश हो जाती हूँ, इसलिए मैं अपने एक दोस्त के साथ बाहर जा रही हूँ। तुम जल्दी घर पहुँचो और उन्हें देख लो।” इतना कहकर राधिका ने फोन काट दिया और अपनी गाड़ी की चाबी उठाकर तुरंत घर से निकल गई। उसने एक बार भी मुड़कर यह नहीं देखा कि उसकी सास जिंदा भी हैं या नहीं।

सृष्टि बदहवास हालत में दौड़ती हुई घर पहुँची। सामने का मंजर देखकर उसकी रूह कांप गई। कौशल्या जी दर्द से तड़प रही थीं और उनके दोनों पैरों से खून की धार बह रही थी। सृष्टि ने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने पड़ोस के ड्राइवर की मदद से सास को संभाला, गाड़ी में लिटाया और सीधे शहर के सबसे बड़े अस्पताल की इमरजेंसी में ले गई। रास्ते भर वह कौशल्या जी का सिर अपनी गोद में रखे उनके माथे को सहलाती रही और रोते हुए प्रार्थना करती रही, “माँ जी, हिम्मत रखिए, कुछ नहीं होगा आपको।”

अस्पताल पहुँचते ही डॉक्टरों ने कौशल्या जी को तुरंत ऑपरेशन थिएटर में ले लिया। जांच के बाद डॉक्टर ने बाहर आकर बताया कि दोनों पैरों की हड्डियां कई जगह से टूट चुकी हैं और अगर आधे घंटे की और देरी हो जाती, तो अत्यधिक खून बहने की वजह से जान भी जा सकती थी। ऑपरेशन कई घंटों तक चला। सृष्टि अकेले अस्पताल के गलियारे में भूखी-प्यासी खड़ी रही। उसने अस्पताल के सारे बिल जमा किए, दवाइयों का इंतजाम किया और हरिनारायण जी व अर्णव को फोन पर सूचित किया।

शाम तक अर्णव और हरिनारायण जी अस्पताल पहुंचे। अनिकेत भी आ गया, पर राधिका का कहीं अता-पता नहीं था। वह रात को नौ बजे केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए अस्पताल आई और आधे घंटे बाद ही यह कहकर चली गई कि उसे अस्पताल के माहौल से घबराहट होती है।

कौशल्या जी का ऑपरेशन सफल तो रहा, पर डॉक्टर ने साफ कह दिया कि वे अगले छह महीने तक अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाएंगी। उन्हें चौबीसों घंटे पूरी देखभाल, दवाइयों और मालिश की जरूरत थी। जब कौशल्या जी को डिस्चार्ज कराकर घर लाया गया, तो राधिका ने पहले ही दिन अपना पल्ला झाड़ लिया। उसने अनिकेत से साफ कह दिया कि वह किसी मरीज की तीमारदारी नहीं कर सकती, अगर सास की सेवा करवानी है तो कोई चौबीस घंटे की नर्स रख ली जाए।

उस कठिन दौर में सृष्टि कौशल्या जी के लिए साक्षात देवी बनकर खड़ी हो गई। उसने किसी नर्स को रखने की जरूरत नहीं पड़ने दी। सुबह की चाय से लेकर रात को सुलाने तक, सृष्टि ने एक पल के लिए भी सास का साथ नहीं छोड़ा। वह अपने हाथों से उन्हें दलिया और सूप खिलाती, समय पर दवाइयां देती, उनके मैले कपड़े बदलती और उनके दर्द से भरे पैरों पर घंटों गुनगुने तेल से मालिश करती। कई बार रात में जब दर्द के मारे कौशल्या जी कराह उठतीं, तो सृष्टि अपनी नींद छोड़कर पूरी रात उनके सिरहाने बैठकर उनके पैर दबाती रहती।

कौशल्या जी जब बिस्तर पर लाचार पड़ी होतीं, तो वे सृष्टि के चेहरे को देखतीं। वही चेहरा, जिसे उन्होंने कभी ‘गरीब और कंगाल’ कहकर दुत्कारा था, आज बिना किसी स्वार्थ, बिना किसी शिकायत और बिना किसी बदले की भावना के उनके मलमूत्र तक को साफ कर रहा था। दूसरी तरफ वह बहू थी, जिसकी तिजोरी और खानदान का ढिंढोरा वे पूरे शहर में पीटती थीं, उसने एक बार कमरे में झांककर उनका हाल तक नहीं पूछा था। पश्चाताप और आत्मग्लानि की आग में कौशल्या जी अंदर ही अंदर जल रही थीं। उनके सीने पर जैसे पत्थरों का पहाड़ रख दिया गया था।

सृष्टि की निस्वार्थ सेवा, उसकी लगन और डॉक्टरों के इलाज के दम पर आखिरकार चार महीने बाद वह दिन आ गया जब कौशल्या जी वॉकर के सहारे अपने पैरों पर खड़ी होने लायक हो गईं।

उस सुबह जब सृष्टि पूजा की थाली लेकर कमरे में आई, तो उसने देखा कि कौशल्या जी वॉकर का सहारा छोड़कर दीवार पकड़कर खड़ी होने की कोशिश कर रही थीं। सृष्टि घबराकर थाली मेज पर रखकर दौड़ी, “अरे माँ जी! आप यह क्या कर रही हैं? अभी आपको बिना सहारे के नहीं चलना है, गिर जाएंगी आप।”

जैसे ही सृष्टि ने उन्हें सहारा देने के लिए हाथ बढ़ाया, कौशल्या जी ने उसका हाथ पकड़ लिया और एक झटके में उसे अपने सीने से लगा लिया।

कौशल्या जी की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वे जोर-जोर से रोने लगीं। सृष्टि अवाक रह गई। उसने घबराकर पूछा, “क्या हुआ माँ जी? कहीं दर्द हो रहा है क्या?”

“हाँ बहू, बहुत दर्द हो रहा है… यहाँ मेरे सीने में दर्द हो रहा है,” कौशल्या जी ने रोते हुए सृष्टि के चेहरे को अपने कांपते हाथों में थाम लिया। उनकी आवाज पश्चाताप के आंसुओं से भीगी हुई थी, “मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… मुझे माफ कर दे। मैं कितनी अंधी थी जो पत्थरों की चमक में हीरों की पहचान भूल गई थी। मैंने तुझे क्या-क्या नहीं कहा, कदम-कदम पर तेरी गरीबी का मजाक उड़ाया, तुझे नीचा दिखाया। पर जब मेरी जान पर बन आई, तो उसी दौलत ने मुझे ठोकर मार दी जिस पर मैं घमंड करती थी। और तू… तूने अपनी रातें, अपनी खुशियां, अपनी नींद सब कुछ मुझ पर न्योछावर कर दिया।”

कौशल्या जी ने झुककर सृष्टि के हाथ चूम लिए। सृष्टि की आँखों से भी आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी। उसने सास को संभाला और बोली, “माँ जी, ऐसा मत कहिए। आप मेरी माँ हैं, और माँ की सेवा करना कोई अहसान नहीं होता, वह तो औलाद का फर्ज होता है।”

उसी वक्त दरवाजे पर हरिनारायण जी, अर्णव और अनिकेत आकर खड़े हो गए। उनकी आँखें भी इस दृश्य को देखकर भीग गई थीं।

कौशल्या जी ने मुड़कर अपने पूरे परिवार की ओर देखा और बहुत ही दृढ़ व गर्व भरी आवाज में कहा, “आज इस घर की मालकिन होने के नाते मैं एक सच स्वीकार करती हूँ। कोई भी इंसान अपने पैसों या खानदान के नाम से बड़ा नहीं होता। घर बड़ा तब बनता है जब उसमें संस्कारों की नींव मजबूत हो। दौलत तो कल आ सकती है और परसों जा सकती है, पर जो निस्वार्थ प्यार और संस्कार होते हैं, वही जिंदगी की सबसे बड़ी पूंजी हैं। आज से इस घर की असली वारिस, इस घर की असली रानी मेरी यह बड़ी बहू सृष्टि है। इसने न केवल मुझे एक नई जिंदगी दी है, बल्कि इस परिवार को बिखरने से भी बचा लिया है।”

कौशल्या जी ने अपने गले से खानदानी सोने का भारी हार उतारा और अपने कांपते हाथों से सृष्टि के गले में पहना दिया। सृष्टि ने झुककर अपनी सास के चरण छुए। कौशल्या जी ने उसे उठाकर अपने दिल से लगा लिया। आज उस घर से झूठे अहंकार की दीवारें हमेशा के लिए ढह चुकी थीं और प्रेम, सम्मान व संस्कारों की एक नई भोर का उदय हो चुका था।

जीवन में दौलत और सामाजिक रुतबा चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, पर इंसान की असली पहचान उसके संस्कारों, त्याग और आचरण से ही होती है। जब रिश्तों को पैसों की तराजू पर तौला जाता है, तो अंत में केवल खोखलापन और पछतावा ही हाथ लगता है। क्या आपको भी लगता है कि आज के भौतिकवादी दौर में लोग संस्कारों से ज्यादा अहमियत अमीरी और बाहरी चमक-दमक को देने लगे हैं? आपकी नजर में एक आदर्श परिवार की असली ताकत क्या होनी चाहिए? अपने अनमोल विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमारे साथ जरूर साझा करें।

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 लेखिका : गरिमा चौधरी

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