रोशनी की तलाश

कबीर ने सोहम को ऊपर से नीचे तक देखा। सोहम के पास न तो कोई खिलौना था, न ही कोई महँगे कपड़े। कबीर के मन में एक गहरा सवाल कौंधा। वह खुद को रोक नहीं पाया और संकोच करते हुए पूछ बैठा, “सोहम… तुम्हें दुख नहीं होता कि तुम इस दुनिया को नहीं देख सकते? न तुम आसमान का नीला रंग देख सकते हो, न तितलियों को, न कार्टून और न ही कोई वीडियो गेम खेल सकते हो। तुम यहाँ अकेले बैठकर उस कागज़ को छू रहे हो। क्या तुम्हें कभी भगवान पर गुस्सा नहीं आता कि उन्होंने तुम्हें आँखें क्यों नहीं दीं?”

मध्यमवर्गीय मोहल्ले की उस शांत गली में शाम ढलते ही बच्चों का शोर गूँजने लगता था, लेकिन मकान नंबर 42 के भीतर का माहौल पिछले तीन दिनों से काफी तनावपूर्ण था। ग्यारह वर्ष का कबीर अपने कमरे में मुँह फुलाए बैठा था। सामने मेज़ पर खुली किताबों पर उसका कोई ध्यान नहीं था। उसकी आँखें लगातार दीवार पर टंगे कैलेंडर की उस तारीख को घूर रही थीं, जिस पर लाल स्याही से एक घेरा बना हुआ था—उसका ग्यारहवां जन्मदिन।

कबीर के पिता, देवेश जी, एक साधारण प्राइवेट फर्म में अकाउंटेंट थे और माँ, वंदना, घर सँभालने के साथ-साथ मोहल्ले के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर परिवार के बजट में थोड़ा हाथ बँटाती थीं। सीमित आमदनी और बढ़ती महँगाई के बीच दोनों पति-पत्नी हर महीने की पाई-पाई जोड़कर घर की गाड़ी खींचते थे। उनकी हमेशा से यह कोशिश रहती थी कि कबीर की पढ़ाई-लिखाई या बुनियादी जरूरतों में कभी कोई कमी न रहे। लेकिन आज का दौर विज्ञापनों और दिखावे का था। स्कूल में दोस्तों के पास नए गैजेट्स, महँगी घड़ियाँ और चमकते उपकरण देखकर कबीर के मन में भी वैसी ही चीजें पाने की लालसा अक्सर जोर मारने लगती थी।

इस बार जन्मदिन से ठीक एक हफ़्ते पहले कबीर ने एक बड़ी ज़िद ठान ली थी। उसके सबसे अच्छे दोस्त मयंक को उसके पिता ने एक बेहद महँगा, रिमोट से चलने वाला नाइट-विज़न ड्रोन कैमरा और डिजिटल स्मार्टवॉच दिलाई थी। कबीर को भी वैसा ही ब्रांडेड ड्रोन चाहिए था, जिसकी कीमत देवेश जी के पूरे महीने के वेतन का लगभग तिहाई हिस्सा थी।

जब कबीर ने पहली बार यह फरमाइश रखी, तो वंदना ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था, “बेटा कबीर, तुम्हारे पास पिछले जन्मदिन पर मिला वह रिमोट कंट्रोल हेलीकॉप्टर और कार अभी भी बिल्कुल सही सलामत हैं। तुम उनसे खेल सकते हो। इतनी महँगी चीज़ों की अभी तुम्हें क्या ज़रूरत है? पिताजी की तनख्वाह से घर का राशन, तुम्हारी स्कूल की फ़ीस और दादी की दवाइयां भी आती हैं। जितनी चादर हो, हमें उतने ही पैर फैलाने चाहिए।”

लेकिन कबीर अपनी बाल-सुलभ हठ पर अड़ा रहा। उसने खाना-पीना कम कर दिया और माँ से रूठकर बैठ गया। उसने तुनककर कहा, “आप हमेशा यही कहती हैं माँ! जब भी मैं कुछ माँगता हूँ, आप पैसों की तंगी का बहाना बना देती हैं। स्कूल में सब दोस्त मेरी पुरानी चीज़ों का मज़ाक उड़ाते हैं। अगर इस जन्मदिन पर मुझे वह ड्रोन नहीं मिला, तो मैं अपना जन्मदिन ही नहीं मनाऊँगा और न ही स्कूल जाऊँगा।”

देवेश जी बेटे की इस ज़िद से काफी आहत हुए, लेकिन वंदना ने उन्हें शांत रहने का इशारा किया। वंदना जानती थी कि केवल डाँटने-डपटने से बच्चे की ज़िद दब तो सकती है, लेकिन उसका मन विद्रोही हो जाएगा। बच्चों को केवल यह कहना कि ‘हमारे पास पैसे नहीं हैं’, उनके मन में हीनभावना या असंतोष भर देता है; उन्हें जीवन के सच्चे मूल्यों और संतुष्टि का मर्म सिखाना पड़ता है।

अगले दिन सुबह जब कबीर नाश्ते की मेज़ पर बेमन से दूध का गिलास थामे बैठा था, तब वंदना ने उसके पास आकर बड़े स्नेह से कहा, “कबीर, चलो हमने एक रास्ता निकाला है। परसों तुम्हारा जन्मदिन है। हर साल की तरह हम सुबह शहर के उस विशेष विद्यालय और आश्रय गृह जाएँगे, जहाँ विशेष आवश्यकता वाले बच्चे रहते हैं। हम वहाँ बच्चों को तुम्हारी तरफ से फल, कॉपियाँ और मिठाइयाँ बाँटेंगे। वहाँ से लौटते समय हम बाज़ार चलेंगे और तुम्हें वही खिलौना दिला देंगे जो तुम चाहते हो। क्या तुम्हें यह मंजूर है?”

कबीर का चेहरा खुशी से खिल उठा। उसे लगा कि उसकी ज़िद आखिरकार रंग ले आई। उसने तुरंत हामी भर दी और अपनी माँ के गले लग गया। पूरे दिन वह अपनी डायरी में उस ड्रोन के फीचर्स लिखता रहा और सोचता रहा कि कैसे वह अगले दिन स्कूल जाकर मयंक और बाकी दोस्तों के सामने अपनी नई चीज़ की शेखी बघारेगा।

आखिरकार जन्मदिन की वह सुबह आ गई। कबीर सुबह जल्दी उठ गया। उसने नए कपड़े पहने, माता-पिता के चरण छूकर आशीर्वाद लिया। उसके चेहरे पर उत्साह साफ झलक रहा था, लेकिन यह उत्साह जन्मदिन के हवन या पूजा का नहीं, बल्कि उस खिलौने की दुकान पर जाने का था जिसका वादा माँ ने किया था।

गाड़ी में कॉपियों के बंडल, रंग-बिरंगी पेंसिलें, ताज़े सेब और केले रखकर देवेश और वंदना कबीर को लेकर शहर के बाहरी इलाके में स्थित ‘आशा किरण’ केंद्र पहुँचे। यह केंद्र उन बच्चों का आशियाना था जो शारीरिक रूप से दिव्यांग थे या जिनके सिर पर माता-पिता का साया नहीं था।

कबीर जब मुख्य द्वार से भीतर प्रविष्ट हुआ, तो उसने चारों ओर देखा। वहाँ एक बड़ा सा हरा-भरा मैदान था और सामने लंबी बरामदे वाली इमारत। मैदान में कई बच्चे धूप में बैठे थे। कोई व्हीलचेयर पर था, तो कोई बैसाखियों के सहारे खड़ा था। लेकिन कबीर को सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि उस पूरे परिसर में किसी के चेहरे पर रोने या दुखी होने का भाव नहीं था। हर तरफ बच्चों की मासूम हँसी और खिलखिलाहट गूँज रही थी।

संस्था के संचालक जी ने आगे बढ़कर कबीर के परिवार का स्वागत किया और जन्मदिन की शुभकामनाएँ दीं। एक बड़े से बरामदे में सभी बच्चों को एकत्र किया गया। कबीर ने अपने हाथों से बच्चों को स्टेशनरी के पैकेट और फल देने शुरू किए। बच्चे उपहार पाकर कबीर को हाथ जोड़कर “थैंक यू भैया!” और “हैप्पी बर्थडे!” कह रहे थे। उनके चेहरों पर जो निश्छल चमक थी, वह कबीर के दिल में एक अनजानी सी हलचल पैदा कर रही थी।

उपहार बाँटने के बाद जब देवेश जी और वंदना संचालक महोदय से कागजी औपचारिकताओं और कुछ दान की रसीद के सिलसिले में बात करने कार्यालय में गए, तो कबीर बरामदे के एक कोने में खड़ा होकर उन बच्चों को देखने लगा।

तभी उसकी नज़र बरामदे के ठीक सामने, एक बड़े नीम के पेड़ के नीचे बैठे एक लड़के पर पड़ी। उस लड़के की उम्र कबीर जितनी ही, लगभग दस-ग्यारह साल रही होगी। उसने एक साधारण सा कुर्ता-पाजामा पहन रखा था। वह लड़का जमीन पर पालथी मारकर बैठा था और उसके सामने एक बोर्ड पर कागज़ लगा हुआ था। वह अपने बाएँ हाथ की उंगलियों से उस कागज़ पर उभरे हुए बिंदुओं को बड़े ध्यान से छू रहा था और उसके होठों पर एक अद्भुत, शांत मुस्कान तैर रही थी।

कबीर ने गौर से देखा तो पाया कि उस बच्चे की दोनों आँखें पूरी तरह बंद थीं। उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, कोई निराशा नहीं थी। वह अपनी उंगलियों के स्पर्श से कुछ पढ़ रहा था और बीच-बीच में पेड़ की डालियों से आती ठंडी हवा को महसूस करके गहरा साँस ले रहा था।

कबीर के कदम अपने-आप उस नीम के पेड़ की तरफ बढ़ गए। वह उस लड़के के करीब जाकर खड़ा हो गया। कबीर की आहट सुनकर उस लड़के ने अपना सिर उठाया और अपनी बंद आँखों को उसी दिशा में घुमाते हुए बहुत ही मीठी आवाज़ में पूछा, “कौन है वहाँ? क्या आप वही भैया हैं जिनका आज जन्मदिन है?”

कबीर चौंक गया। उसने धीरे से कहा, “हाँ… मेरा नाम कबीर है। लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि मैं वही हूँ? तुमने तो मुझे देखा भी नहीं।”

लड़का खिलखिलाकर हँस पड़ा। उसकी हँसी इतनी निर्मल थी जैसे कोई पहाड़ी झरना बह निकला हो। उसने कहा, “भैया, देखने के लिए सिर्फ आँखों की ही ज़रूरत थोड़ी होती है! जब आप सब आए थे, तो आपकी खुशबू, बच्चों की शुभकामनाओं की आवाज़ और अब आपके जूतों की यह नई सी आवाज़… मैंने पहचान लिया। मेरा नाम सोहम है।”

कबीर ने सोहम को ऊपर से नीचे तक देखा। सोहम के पास न तो कोई खिलौना था, न ही कोई महँगे कपड़े। कबीर के मन में एक गहरा सवाल कौंधा। वह खुद को रोक नहीं पाया और संकोच करते हुए पूछ बैठा, “सोहम… तुम्हें दुख नहीं होता कि तुम इस दुनिया को नहीं देख सकते? न तुम आसमान का नीला रंग देख सकते हो, न तितलियों को, न कार्टून और न ही कोई वीडियो गेम खेल सकते हो। तुम यहाँ अकेले बैठकर उस कागज़ को छू रहे हो। क्या तुम्हें कभी भगवान पर गुस्सा नहीं आता कि उन्होंने तुम्हें आँखें क्यों नहीं दीं?”

सोहम के चेहरे से मुस्कान एक पल के लिए भी ओझल नहीं हुई। उसने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए और कबीर के हाथों को थाम लिया। सोहम के हाथ बहुत कोमल और शांत थे।

सोहम ने बड़ी सहजता से कहा, “कबीर भैया, जब मैं छोटा था, तब शायद कभी-कभी सोचता था। लेकिन फिर हमारे गुरुजी ने हमें एक बहुत सुंदर बात सिखाई। उन्होंने कहा कि जो चीज़ हमारे पास नहीं है, अगर हम पूरी ज़िंदगी उसी का रोना रोते रहेंगे, तो जो हमारे पास है, हम उसकी मिठास को भी कभी महसूस नहीं कर पाएँगे।”

सोहम ने एक गहरी साँस ली और चारों तरफ हाथ फैलाते हुए बोला, “भगवान ने मुझे आँखें नहीं दीं, तो क्या हुआ? उन्होंने मुझे सुनने के लिए दो प्यारे कान दिए हैं, जिनसे मैं कोयल की कूक, बारिश की बूँदों की छम-छम और आप जैसे अच्छे दोस्तों की आवाज़ सुन सकता हूँ। उन्होंने मुझे स्पर्श करने के लिए यह हाथ दिए हैं, जिनसे मैं ब्रेल लिपि की किताबें पढ़कर कहानियाँ जान सकता हूँ, पेड़ की पत्तियों को छू सकता हूँ। और सबसे बड़ी बात, उन्होंने मुझे साँस लेने के लिए यह सुंदर जीवन और खुश रहने वाला दिल दिया है। दुनिया में ऐसे भी तो कई लोग हैं जिनके पास न हाथ हैं, न कान। मैं रोज़ सुबह उठकर ईश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने मुझे इतना कुछ दिया है। जब मेरे पास ईश्वर का दिया इतना बड़ा खजाना है, तो मैं दो आँखों के न होने पर दुखी क्यों होऊँ?”

सोहम के यह शब्द किसी भारी हथौड़े की तरह कबीर के बाल-मन पर पड़े। कबीर बिल्कुल सुन्न रह गया। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

वह मन ही मन अपनी तुलना सोहम से करने लगा। एक तरफ यह सोहम था, जिसके पास इस खूबसूरत दुनिया की रोशनी देखने के लिए आँखें तक नहीं थीं, फिर भी उसके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी, कोई असंतोष नहीं था; वह केवल ईश्वर के प्रति कृतज्ञता से भरा हुआ था। और दूसरी तरफ वह खुद था—ईश्वर ने उसे दो स्वस्थ आँखें दी थीं, दौड़ने के लिए दो मजबूत पैर दिए थे, हर सुख-सुविधा देने वाले माता-पिता दिए थे, एक अच्छा घर दिया था, खेलने के लिए कई खिलौने दिए थे… और फिर भी वह एक महँगे, बेजान प्लास्टिक के ड्रोन के लिए अपने माता-पिता को रुला रहा था, खाना छोड़ रहा था और घर का सुकून छीन रहा था!

कबीर के भीतर जैसे कोई बहुत बड़ा अंधकार छँट गया और एक दिव्य उजाला फैल गया। उसे अपने व्यवहार पर इतनी गहरी शर्मिंदगी महसूस हुई कि उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने झुककर सोहम के हाथ को अपने गाल से लगा लिया।

“सोहम… तुम सचमुच बहुत अच्छे हो। आज तुमने मुझे वह दिखा दिया जो मेरी दोनों आँखें भी नहीं देख पा रही थीं,” कबीर की आवाज़ रुँध गई थी।

सोहम ने कबीर के आँसुओं को अपनी उंगलियों से महसूस किया और घबराकर बोला, “अरे भैया, आप रो क्यों रहे हैं? आज तो आपका जन्मदिन है। आज तो हँसने का दिन है!”

कबीर ने अपने आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं सोहम, यह रोना नहीं है। यह तो खुशी है कि मुझे आज अपने जीवन का सबसे अनमोल तोहफ़ा मिल गया है।”

इतने में वंदना और देवेश जी कार्यालय से बाहर आए। उन्होंने कबीर को नीम के पेड़ के नीचे खड़े देखा और उसकी तरफ बढ़े। वंदना ने कबीर के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “चलो कबीर, यहाँ का काम पूरा हो गया। अब तुम्हारी बारी है। चलो बाज़ार चलते हैं, तुम्हारे उस ड्रोन की दुकान पर।”

कबीर मुड़ा। उसकी आँखें नम थीं, लेकिन उसके चेहरे पर एक ऐसा आत्मिक सुकून और ठहराव था जो उसके माता-पिता ने पहले कभी नहीं देखा था।

कबीर ने धीरे से अपनी माँ का हाथ पकड़ा और फिर अपने पिता का हाथ थामा। उसने बहुत ही शांत और परिपक्व आवाज़ में कहा, “माँ… मुझे वह खिलौना नहीं चाहिए। मुझे कोई नया ड्रोन, कोई स्मार्टवॉच नहीं चाहिए।”

देवेश जी और वंदना हैरान रह गए। देवेश जी ने झुककर पूछा, “क्या हुआ बेटा? अभी तो तुम कह रहे थे कि बिना उसके तुम्हारा जन्मदिन अधूरा है। क्या तुम्हें कोई दूसरा खिलौना पसंद आ गया है?”

“नहीं पिताजी,” कबीर ने सिर हिलाया। उसने नीम के पेड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा, “पिताजी, भगवान ने मुझे सब कुछ दिया है—स्वस्थ शरीर, आप दोनों का प्यार, रहने को घर और ज़रूरत की हर चीज़। मेरे पास जो खिलौने पहले से हैं, वे बिल्कुल ठीक हैं और मैं उन्हीं से खेलूँगा। इस भाई सोहम के पास तो आँखें भी नहीं हैं, फिर भी यह ईश्वर से कोई शिकायत नहीं करता और हर पल खुश रहता है। और मैं… मैं उस चीज़ के लिए रो रहा था जिसकी मुझे सचमुच कोई ज़रूरत ही नहीं थी। माँ, आपने बिल्कुल सही कहा था कि जितनी चादर हो, उतने ही पैर फैलाने चाहिए। जब मुझे सचमुच किसी चीज़ की ज़रूरत होगी, हम तब ले लेंगे। आज मुझे बाज़ार नहीं जाना।”

कबीर की बात सुनकर वंदना की आँखों से ममता के आँसू बह निकले। उसने तुरंत आगे बढ़कर कबीर को अपनी छाती से भींच लिया। देवेश जी की आँखें भी भर आईं। उन्होंने गर्व से अपने बेटे के सिर पर हाथ रखा। एक पिता के लिए इससे बड़ा कोई पल नहीं हो सकता था जब उसका बच्चा अभाव में नहीं, बल्कि समझदारी और संस्कारों में बड़ा हो जाए।

कबीर ने अपने जन्मदिन के बचे हुए सारे पैसे, जो उसे दादी ने लिफाफे में दिए थे, वहीं आश्रम के गुल्लक में सोहम और उसके साथियों की ब्रेल किताबों के लिए जमा करवा दिए। उसने सोहम से वादा किया कि वह हर महीने उससे मिलने आएगा और उसे नई-नई कहानियाँ पढ़कर सुनाएगा।

आश्रम से लौटते समय गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए कबीर के चेहरे पर एक अनोखी चमक थी। आज उसके हाथ में कोई महँगा गैजेट या खिलौना नहीं था, लेकिन उसका दिल एक ऐसी तृप्ति और संतुष्टि से भरा था जो दुनिया की कोई भी दौलत नहीं खरीद सकती थी। उसने जीवन का सबसे बड़ा सच सीख लिया था—खुशी बाहर की महँगी चीज़ों को बटोरने में नहीं, बल्कि अपने पास जो है, उसकी कद्र करने और दूसरों के जीवन में मुस्कान बिखेरने में है।

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लेखिका : निधि गुप्ता

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