खून का मोल

फ्लैट की बालकनी में टहलते हुए सिद्धांत की नजर बार-बार कमरे के भीतर जाती, जहां प्रिया पलंग पर सिरहाने के सहारे बैठी गहरी-गहरी सांसें ले रही थी। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि नौवां महीना लग चुका है और किसी भी दिन खुशखबरी आ सकती है। सिद्धांत के चेहरे पर खुशी की जगह बेचैनी की गहरी लकीरें खिंची हुई थीं। नौकरी की आपाधापी, अस्पताल की भागदौड़ और इस नाजुक दौर में प्रिया की शारीरिक स्थिति—यह सब अकेले संभाल पाना उसके लिए किसी कठिन इम्तिहान जैसा था। हालांकि उसने खाना बनाने और घर की देखभाल के लिए एक घरेलू सहायिका की व्यवस्था कर रखी थी, लेकिन जीवन के इस सबसे नाजुक मोड़ पर औरत को जिस आत्मिक संबल और मातृ-स्नेह की जरूरत होती है, वह पैसों से नहीं खरीदा जा सकता था।

सिद्धांत को पूरी उम्मीद थी कि इस बार जब वह अपने घर फोन करेगा, तो पुराने सारे गिले-शिकवे धुल जाएंगे। आखिर उनके खानदान का चिराग इस दुनिया में आने वाला था। उसकी मां चाहे कितनी भी सख्त क्यों न हों, दादी बनने की खबर सुनकर उनका दिल जरूर पिघल जाएगा।

परिवार की इस गहरी नाराजगी की वजह प्रिया थी। सिद्धांत ने चार साल पहले अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर प्रिया से प्रेम विवाह किया था। सिद्धांत एक संपन्न और रूढ़िवादी परिवार से ताल्लुक रखता था, जबकि प्रिया एक साधारण परिवार की अनाथ लड़की थी। शादी से पहले ही एक सड़क हादसे में प्रिया के माता-पिता गुजर चुके थे। उसका केवल एक छोटा भाई था, देव, जो अभी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था और खुद हॉस्टल में रहकर जीवन से जूझ रहा था। ऐसे में मायके की तरफ से प्रिया का कोई बड़ा सहारा नहीं था। सिद्धांत को केवल अपनी मां, कल्याणी देवी, से ही आस थी। उसने मन में सोचा था कि अगर मां किसी वजह से न भी आ पाईं, तो वह भाभी या अपनी बड़ी दीदी से हाथ जोड़कर विनती कर लेगा।

सिद्धांत ने भारी मन से फोन उठाया और अपनी मां का नंबर मिलाया। घंटी बजती रही और उसके दिल की धड़कनें तेज होती गईं। आखिरकार तीसरी बार में फोन उठा।

“प्रणाम मां,” सिद्धांत ने बहुत ही अदब और झिझक के साथ कहा।

“हां, कहो। आज कैसे हमारी याद आ गई?” कल्याणी देवी की आवाज में वही पुराना रूखापन और दूरी थी।

“मां… प्रिया का नौवां महीना शुरू हो गया है। डॉक्टर ने कहा है कि कभी भी अस्पताल जाना पड़ सकता है। मां, मैं यहां बिल्कुल अकेला पड़ गया हूं। दफ्तर भी देखना है और अस्पताल भी। आपकी बहुत याद आ रही है। अगर आप कुछ दिनों के लिए आ जातीं, तो सब संभल जाता। आपका पहला पोता या पोती आने वाली है मां।” सिद्धांत की आवाज में एक असहाय बेटे की गुहार साफ झलक रही थी।

दूसरी तरफ से कुछ पलों की चुप्पी रही, फिर कल्याणी देवी का सपाट जवाब आया, “देख सिद्धांत, मेरी कमर और घुटनों का दर्द इतना बढ़ गया है कि मैं घर में दो कदम नहीं चल पाती। और तेरे बाबूजी का मिजाज तो तू जानता ही है, उनकी दवाइयों से लेकर खाने तक का ध्यान मुझे ही रखना पड़ता है। इस बुढ़ापे में मुझसे इतना लंबा सफर नहीं झेला जाएगा।”

सिद्धांत का दिल बैठ गया। उसने कुछ दिन पहले ही अपने चचेरे भाई की सोशल मीडिया पोस्ट पर देखा था कि मां और बाबूजी पूरे परिवार के साथ हरिद्वार और ऋषिकेश की यात्रा पर गए थे और वहां खूब घूमे-फिरे थे। सिद्धांत को सब पता था, लेकिन उसने कड़वाहट का घूंट पी लिया और कोई उलाहना नहीं दिया।

उसने फिर संकोच से कहा, “मां, अगर आपकी तबीयत ठीक नहीं है, तो क्या आप दीदी या नीलिमा भाभी को कुछ दिनों के लिए भेज सकती हैं? बस हफ्ते-दस दिन की बात है मां। मुझे सच में किसी अपने के सहारे की बहुत जरूरत है।”

यह सुनते ही कल्याणी देवी तिनक उठीं, “तू होश में तो है? दीदी के अपने ससुराल में कितनी जिम्मेदारियां हैं, बच्चे के बोर्ड के इम्तिहान हैं। और नीलिमा यहां पूरे घर की चौखट संभालती है। उसके बिना यहां चूल्हा कौन जलाएगा? अपनी मर्जी से ब्याह रचाते वक्त तो तूने खानदान की परवाह नहीं की थी, अब जब जिम्मेदारी सिर पर आई तो पूरे घर को नचाना चाहता है? फोन रख, मुझे बहुत काम है।”

बिना दूसरा शब्द सुने फोन कट गया। फोन कटने की बीप-बीप की आवाज सिद्धांत के कानों में हथौड़े की तरह बजने लगी। उसकी आंखों से आंसुओं की दो बूंदें फिसलकर गालों पर ढुलक गईं। यह वही मां थी जो बचपन में उसकी एक छींक पर रात-रात भर जागती थी, जो उसकी हर ख्वाहिश पूरी करने के लिए जान छिड़कती थी। सिर्फ एक शादी के फैसले ने बेटे को इतना बेगाना बना दिया कि आने वाले मासूम बच्चे के लिए भी उनके दिल में कोई जगह नहीं बची थी।

सिद्धांत कमरे के कोने में सिर पकड़कर बैठ गया। प्रिया ने पलंग से उठने की कोशिश की और धीरे-धीरे चलकर सिद्धांत के पास आई। उसने सिद्धांत के कंधे पर हाथ रखा और बेहद कोमल स्वर में कहा, “सिद्धांत, प्लीज खुद को मत गिराइए। मैं सब समझती हूं। जब मेरी अपनी मां मुझे छोड़कर भगवान के पास चली गई, तो मैंने अपनी किस्मत से समझौता करना सीख लिया था। आप परेशान मत होइए, ऊपर वाला सब देख रहा है। हम दोनों मिलकर यह वक्त भी काट लेंगे।”

तभी दरवाजे की ओट से एक मध्यम आयु वर्ग की महिला की झिझकती हुई आवाज आई, “भैया जी… मेमसाब… मुझे माफ कर दीजिएगा।”

दोनों ने मुड़कर देखा। वह शांति बाई थी। शांति पिछले दो महीनों से उनके घर में खाना बनाने और साफ-सफाई का काम कर रही थी। वह दरवाजे पर पल्लू संभाले खड़ी थी और उसकी आंखों में एक अजीब सी तड़प थी।

“क्या हुआ शांति मौसी? कुछ चाहिए था क्या?” प्रिया ने अपने आंसू पोंछते हुए पूछा।

शांति ने दोनों हाथ जोड़ लिए, “मेमसाब, मैं तो कमरे में बर्तन उठाने आई थी, पर बाबूजी की बातें कान में पड़ गईं। मैं कोई बहुत बड़ी बात तो नहीं कह सकती, पर अगर आप दोनों बुरा न मानें तो मेरी एक बात सुनेंगे?”

सिद्धांत ने शून्य नजरों से देखा, “हां मौसी, कहो।”

“भैया जी, मेरी अपनी कोई औलाद नहीं है। मेरी एक विधवा जेठानी है, जानकी दीदी। उन्होंने अपनी जवानी में गांव में न जाने कितनी औरतों के प्रसव करवाए हैं। जच्चा-बच्चा की देखभाल कैसे की जाती है, क्या खाना चाहिए, कैसे मालिश होनी चाहिए—उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। वो अकेली रहती हैं। अगर आप कहें, तो मैं आज ही उन्हें अपने साथ यहां ले आऊं? जब तक मेमसाब पूरी तरह ठीक नहीं हो जातीं, हम दोनों यहीं रहकर इनकी सेवा करेंगे।”

सिद्धांत और प्रिया एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। सिद्धांत ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा, “पर मौसी… वो बुजुर्ग महिला हैं। इस हालत में वो हमारे लिए इतनी परेशानी क्यों उठाएंगी? और वैसे भी, हम पराया समझकर किसी पर इतना बोझ कैसे डाल सकते हैं?”

शांति की आंखों में आंसू भर आए। उसने आगे बढ़कर प्रिया के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “भैया जी, पराया कौन होता है? क्या खून का रिश्ता ही सब कुछ होता है? इस घर में जब मैं पहले दिन काम करने आई थी और मुझे तेज बुखार था, तब मेमसाब ने मुझे काम करने से रोक दिया था, अपने हाथों से काढ़ा बनाकर पिलाया था और बिना काम किए पूरे महीने के पैसे दिए थे। आपने कभी मुझे नौकरानी नहीं समझा, हमेशा इंसान समझा। आज जब इस बिटिया को एक मां की जरूरत है, तो मैं कैसे पीछे हट सकती हूं? पैसों की बात तो अपने मुंह से निकालिएगा भी मत। इंसान ही तो इंसान के आड़े वक्त पर काम आता है।”

शांति की बातों ने सिद्धांत और प्रिया के कलेजे को ठंडक पहुंचा दी। प्रिया ने फूट-फूट कर शांति को गले लगा लिया।

“मौसी… आज से आप मुझे मेमसाब नहीं कहेंगी। आप मुझे अपनी बेटी कहेंगी,” प्रिया ने रुंधे गले से कहा।

“और मुझे बेटा!” सिद्धांत ने भी हाथ जोड़ते हुए कहा।

शांति की आंखों से ममता के आंसू छलक पड़े। उसी शाम शांति अपनी जेठानी जानकी को लेकर आ गई। जानकी अम्मा के सफेद बाल, चेहरे पर ममतामयी झुर्रियां और चेहरे का शांत भाव देखकर ऐसा लगा मानो साक्षात अन्नपूर्णा और वात्सल्य घर में उतर आया हो। आते ही जानकी अम्मा ने प्रिया के माथे को चूमा और कहा, “चिंता मत कर लाडो, जब तक तेरी यह अम्मा जिंदा है, तुझे कोई आंच नहीं आने देगी।”

अगले ही दिन से घर की फिजा बदल गई। जानकी अम्मा ने घर की रसोई और प्रिया की दिनचर्या की पूरी कमान संभाल ली। सुबह के मेथी के लड्डू, शाम का गर्म पौष्टिक सूप, जड़ी-बूटियों का काढ़ा और रात को प्रिया के पैरों की गुनगुने तेल से मालिश—जानकी अम्मा ने किसी सगी मां से भी बढ़कर प्रिया को संभाल लिया। सिद्धांत को अब दफ्तर जाने में कोई चिंता नहीं होती थी।

ठीक आठ दिन बाद आधी रात को प्रिया को प्रसव पीड़ा शुरू हुई। जानकी अम्मा और शांति ने एक पल भी गंवाए बिना सिद्धांत को ढांढस बंधाया, गाड़ी में प्रिया को संभाला और अस्पताल ले गए। अस्पताल के लेबर रूम के बाहर सिद्धांत घबराहट से चक्कर काट रहा था, जबकि जानकी अम्मा वहीं फर्श पर बैठकर लगातार भगवान से प्रार्थना कर रही थीं।

सुबह की पहली किरण के साथ अस्पताल के गलियारे में एक नन्ही किलकारी गूंज उठी। नर्स ने बाहर आकर मुस्कुराते हुए कहा, “बधाई हो, बहुत ही सुंदर और स्वस्थ बेटी हुई है!”

सिद्धांत खुशी से झूम उठा। जब उसने अपनी नन्ही परी को पहली बार देखा, तो उसकी आंखें भर आईं। लेकिन उस खुशी के पल में भी सबसे पहले उसने मुड़कर जानकी अम्मा और शांति के पैर छुए। जानकी अम्मा ने कांपते हाथों से बच्ची को गोद में उठाया, उसके कान में गायत्री मंत्र फूंका और अपनी साड़ी के पल्लू से नजर उतारी।

अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद घर में बच्ची का गृह प्रवेश हुआ। बच्ची का नाम रखा गया—’अन्वी’।

घर पर सिद्धांत ने अपने माता-पिता को फोन नहीं किया। उसके मन में कोई गुस्सा नहीं था, बस एक गहरा वैराग्य था। उसे समझ आ चुका था कि जहां भावनाएं न हों, वहां जबरन रिश्ते नहीं घसीटे जा सकते। लेकिन दूसरी तरफ, जानकी अम्मा और शांति ने पूरे सवा महीने तक अन्वी और प्रिया की ऐसी सेवा की जैसी शायद कोई सगी मां भी न कर पाती। जानकी अम्मा रात-रात भर जागकर अन्वी को अपनी छाती से चिपकाए रखतीं ताकि प्रिया आराम से सो सके।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। अन्वी अब एक साल की होने जा रही थी। घर में उसकी तोतली बोली और नन्हे कदमों की थाप ने पूरे वातावरण को खुशियों से भर दिया था।

अन्वी के पहले जन्मदिन पर सिद्धांत ने शहर के एक बड़े होटल में एक भव्य समारोह आयोजित करने का निश्चय किया। प्रिया ने सिद्धांत से कहा, “सिद्धांत, जीवन में चाहे जो हुआ हो, लेकिन बाबूजी और मां जी हमारे बड़े हैं। बच्ची के जन्मदिन पर उनका आशीर्वाद होना जरूरी है। हमें अपना फर्ज निभाना चाहिए, बाकी उनकी मर्जी।”

सिद्धांत ने पत्नी के इस बड़प्पन के आगे सिर झुका दिया। उसने अपने पैतृक घर जाकर स्वयं निमंत्रण पत्र दिया और हाथ जोड़कर आने की विनती की।

जन्मदिन की शाम हॉल रोशनी और फूलों से जगमगा रहा था। सिद्धांत के दफ्तर के सहयोगी, दोस्त और रिश्तेदार मौजूद थे। मंच पर एक तरफ सिद्धांत, प्रिया और गोदी में अन्वी खड़ी थी। मंच के ठीक सामने वाली विशेष कुर्सियों पर जानकी अम्मा और शांति बैठी थीं, जिन्हें प्रिया ने विशेष रूप से बनारसी साड़ियां पहनाकर सबसे आगे बैठाया था।

तभी हॉल के दरवाजे से कल्याणी देवी, बाबूजी, दीदी और भाभी ने प्रवेश किया। उनके चेहरों पर एक अजीब सी हिचकिचाहट और अपराधबोध का भाव था। वे चारों तरफ की भव्यता और सिद्धांत की कामयाबी को देख रहे थे।

कल्याणी देवी की नजर जब मंच पर गई, तो उन्होंने देखा कि उनकी पोती अपनी मां की गोद में खिलखिला रही थी। उनके कदम खुद-ब-खुद मंच की ओर बढ़ गए। उन्होंने आगे बढ़कर शगुन का एक भारी लिफाफा और सोने की चेन सिद्धांत की ओर बढ़ाई।

“जीती रहो बिटिया… बहुत सुंदर है,” कल्याणी देवी ने एक औपचारिक मुस्कान के साथ कहा। उनकी नजरें सिद्धांत से नहीं मिल पा रही थीं।

सिद्धांत ने शांत भाव से वह लिफाफा और उपहार स्वीकार किया, लेकिन उस लिफाफे को उसने अपनी जेब में रखने के बजाय सीधे आगे बढ़ाया और नीचे बैठी जानकी अम्मा की गोद में रख दिया।

पूरा हॉल इस दृश्य को देखकर हैरान रह गया। कल्याणी देवी का चेहरा फक पड़ गया, “यह क्या बदतमीजी है सिद्धांत? हमारी दी हुई भेंट तू इस नौकरानी के चरणों में डाल रहा है?”

सिद्धांत ने बहुत ही धीमे, लेकिन बेहद गंभीर स्वर में माइक हाथ में लिया। उसकी आवाज पूरे हॉल में गूंज उठी:

“मां, यह बदतमीजी नहीं, इंसाफ है। जब आपकी इस बहू को, जो इस दुनिया में पूरी तरह अनाथ थी, प्रसव के असहनीय दर्द में एक मां के आंचल की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब आपके पास घुटनों के दर्द का बहाना था। जब मुझे एक असहाय बेटे के रूप में परिवार के साथ की दरकार थी, तब इस पूरे खानदान के पास अपने-अपने काम थे। उस अंधेरी रात में, जब अपने खून के रिश्तों ने दरवाजे बंद कर लिए थे, तब इन दोनों महिलाओं ने—जिन्हें आप नौकरानी कह रही हैं—अपनी ममता का ऐसा समंदर बहा दिया जिसकी कोई कीमत नहीं चुकाई जा सकती।”

सिद्धांत की आंखों में आंसू थे, लेकिन उसकी आवाज में सच्चाई की अटूट ताकत थी।

उसने आगे कहा, “इन्होंने एक पैसा लिए बिना सवा महीने तक मेरी पत्नी के गंदे कपड़े धोए, मेरी बच्ची का मल-मूत्र साफ किया और रातों को जागकर उसे अपनी लोरियों से सुलाया। मां, रिश्ते केवल पेट से जन्म लेने या एक ही कुल का नाम रखने से नहीं बनते। रिश्ते बनते हैं समर्पण से, प्रेम से और जरूरत के वक्त साथ खड़े होने से। आपने जो शगुन दिया है, उस पर इस घर में सिर्फ और सिर्फ इन दोनों माताओं का हक है, जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के हमें अपना परिवार माना।”

हॉल में मौजूद हर इंसान की आंखें नम हो गईं। किसी की हिम्मत नहीं हुई कि सिद्धांत की बात का खंडन कर सके।

कल्याणी देवी को लगा जैसे किसी ने उनके चेहरे पर आईना रख दिया हो। उनकी झूठी शान, उनका अभिमान और उनका खोखला अहंकार उस एक साल की मासूम बच्ची की मुस्कान और एक बेटे के आंसुओं के सामने चूर-चूर होकर बिखर गया था। उन्हें अपनी उस गलती का अहसास हुआ जिसकी भरपाई शायद अब कभी पूरी नहीं हो सकती थी।

बाबूजी आगे बढ़े। उनकी आंखें भी आंसुओं से भीगी थीं। उन्होंने जानकी अम्मा के सामने दोनों हाथ जोड़ दिए और रुंधे गले से कहा, “बहन जी… हमें माफ कर दीजिए। हम तो अपनी झूठी शान के अंधे कुएं में पड़े रहे, लेकिन आपने हमारे बच्चों को संभालकर हम पर ऐसा उपकार किया है जिसे हम जिंदगी भर नहीं उतार सकते।”

जानकी अम्मा उठ खड़ी हुईं। उन्होंने कल्याणी देवी और बाबूजी के हाथों को थाम लिया और बहुत ही सहज भाव से कहा, “भाई साहब, ऐसा मत कहिए। बच्चे तो सबके सांझे होते हैं। गलती किससे नहीं होती? अगर आज आपको अपनी गलती का अहसास हो गया है, तो समझ लीजिए कि यह नन्ही गुड़िया अपने साथ पूरे परिवार को जोड़ने का वरदान लेकर आई है। अब पुरानी बातें भूल जाइए और अपनी पोती को अपनी गोद में लीजिए।”

जानकी अम्मा ने अन्वी को उठाकर कल्याणी देवी की कांपती बांहों में थमा दिया। जैसे ही नन्ही अन्वी ने कल्याणी देवी के चेहरे को अपने छोटे-छोटे हाथों से छुआ, कल्याणी देवी फूट-फूट कर रो पड़ीं। उन्होंने बच्ची को सीने से लगा लिया और वहीं मंच पर बैठकर प्रिया का हाथ पकड़कर कहा, “मुझे माफ कर दे बहू… मैं एक अच्छी सास तो क्या, एक अच्छी औरत भी न बन सकी। मुझे माफ कर दे।”

प्रिया ने तुरंत अपनी सास को संभाला और उनके गले लग गई।

उस रात उस भव्य हॉल में केवल एक बच्ची का जन्मदिन नहीं मनाया गया था, बल्कि वहां अहंकारों की आहुति दी गई थी और टूटे हुए रिश्ते दोबारा जुड़ रहे थे। एक पराए ने अपने निस्वार्थ प्रेम से वह चमत्कार कर दिखाया था, जो शायद बरसों की बहस भी नहीं कर पाती। सिद्धांत ने महसूस किया कि दुनिया में प्रेम ही एकमात्र ऐसी शक्ति है जो पराए को अपना और पत्थर को भी मोम बना सकती है।

जीवन में अक्सर हम खून के रिश्तों को ही सर्वोपरि मान बैठते हैं, लेकिन कभी-कभी कोई अजनबी इंसान आकर हमारे जीवन में ऐसा निस्वार्थ प्रेम और सहारा दे जाता है जो जिंदगी भर के लिए एक अनमोल मिसाल बन जाता है। क्या आपके जीवन में भी कभी किसी पराए ने अपनों से बढ़कर आपका साथ निभाया है? अपने उस भावुक और सच्चे अनुभव को कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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