खामोशियों का नेटवर्क

कावेरी ने एक गहरी ठंडी सांस छोड़ी। “आजकल के बच्चों का प्यार भी इन मशीनों के अंदर ही कैद होकर रह गया है। ये साथ बैठकर बातें नहीं करते, एक-दूसरे को ‘टैग’ करते हैं। इनकी रूठने-मनाने की प्रक्रिया भी ‘ब्लॉक’ और ‘अनब्लॉक’ तक सीमित हो गई है। हमारी तरह छोटी-छोटी बातों पर रूठना, और फिर एक कप चाय के बहाने मान जाना… ये सब तो जैसे ये जानते ही नहीं।”

सर्दियों की एक शांत शाम ढल रही थी। शहर के कोलाहल से दूर, घर के आंगन में बिछी पुरानी खटिया पर बैठे पंडित विद्याधर अपने चश्मे के शीशे को धोती के पल्लू से साफ़ कर रहे थे। उनके सामने, एक छोटी सी मोढ़े वाली कुर्सी पर बैठी उनकी पत्नी, कावेरी, स्वेटर बुन रही थीं। ऊन के गोलों और सलाई की खट-खट के बीच एक अजीब सा सुकून था।

कांच के बड़े दरवाजे के उस पार, ड्राइंग रूम में उनका बेटा अंशुल और बहू राधिका बैठे थे। दोनों बिल्कुल पास-पास सोफे पर बैठे थे, लेकिन उनके बीच मीलों की दूरी थी। अंशुल की उंगलियां उसके लैपटॉप और फोन के बीच दौड़ रही थीं, जबकि राधिका अपने मोबाइल स्क्रीन पर किसी वीडियो को देखकर मुस्कुरा रही थी। पिछले एक घंटे में दोनों ने एक-दूसरे से शायद ही एक शब्द कहा हो, सिवाय इसके कि “मेरा चार्जर पास कर देना।”

विद्याधर जी ने एक गहरी सांस ली, चश्मा वापस अपनी आंखों पर टिकाया और कावेरी की तरफ देखते हुए धीमी आवाज़ में बोले, “जानती हो कावेरी, मैं अक्सर सोचता हूँ कि हमारे ज़माने में ये मोबाइल फोन, ये इंटरनेट, ये सब क्यों नहीं थे?”

कावेरी ने सलाई रोककर उनकी तरफ देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ बोलीं, “अच्छा ही था जो नहीं थे। अगर होते, तो शायद हम वो सब कभी महसूस ही नहीं कर पाते, जो हमने इन चालीस सालों में किया है।”

विद्याधर जी मुस्कुराए, “बिल्कुल सही कहा। तुम्हें याद है, जब मेरी पोस्टिंग उस छोटे से पहाड़ी कस्बे में हुई थी? वहां तो चिट्ठी पहुंचने में भी पंद्रह दिन लग जाते थे। और एक बार वहां अचानक बर्फबारी शुरू हो गई थी। मेरे पास कोई गर्म कोट नहीं था। मैं रात को कांपते हुए सोच रहा था कि काश तुम्हारे हाथ का बुना हुआ वो मोटा स्वेटर मेरे पास होता। मैंने सुबह उठकर तुम्हें एक पोस्टकार्ड लिखने का सोचा ही था कि डाकिया एक पार्सल लेकर आ गया। उसमें वही स्वेटर था। तुमने वो पार्सल मेरे सोचने से दस दिन पहले ही भेज दिया था।”

कावेरी की आंखों में एक पुरानी चमक आ गई। वो बोलीं, “मुझे कोई अंतर्यामी होने का वरदान थोड़े ही था! बस उस दिन जब मैं छत पर कपड़े सुखा रही थी, तो अचानक ठंडी हवा का एक झोंका आया और मुझे लगा जैसे तुम ठंड से सिकुड़ रहे हो। मेरा मन इतना बेचैन हुआ कि मैंने उसी वक्त संदूक से स्वेटर निकाला और अगले ही दिन पोस्ट ऑफिस जाकर पार्सल कर दिया। मुझे पता था कि तुम्हें उसकी ज़रूरत पड़ने वाली है।”

विद्याधर जी ने सिर हिलाते हुए कहा, “यही तो बात थी कावेरी। आज के बच्चों को अगर किसी चीज़ की ज़रूरत होती है, तो वो तुरंत मैसेज कर देते हैं। लेकिन हमारे समय में ज़रूरतें शब्दों की मोहताज नहीं थीं। खामोशियां खुद सफर तय करती थीं।”

कुछ पल के लिए दोनों के बीच शांति छा गई। सलाई फिर से चलने लगी थी। ड्राइंग रूम से अचानक राधिका की झुंझलाई हुई आवाज़ आई, “अंशुल! मैंने तुम्हें दो घंटे पहले मैसेज किया था कि आते हुए मेरे लिए सिरदर्द की गोली ले आना। तुमने मैसेज ‘सीन’ कर लिया पर रिप्लाई नहीं किया और दवा भी नहीं लाए!”

अंशुल ने बिना स्क्रीन से नज़रें हटाए कहा, “यार, मैं उस वक्त एक ज़रूरी मीटिंग में था। मैसेज पढ़ लिया था पर भूल गया। तुम एक रिमाइंडर डाल देतीं या फिर किसी ऐप से ऑर्डर कर लेतीं, दस मिनट में आ जाती।”

बाहर बैठे विद्याधर जी और कावेरी ने एक-दूसरे की तरफ देखा। कावेरी के चेहरे पर एक अजीब सी करुणा थी। वो बोलीं, “सुना आपने? इन्हें सिरदर्द बताने के लिए भी मैसेज करना पड़ता है, और याद दिलाने के लिए रिमाइंडर।”

विद्याधर जी अतीत के पन्नों में खो गए। “और तुम्हें याद है कावेरी, जब अंशुल होने वाला था? तुम अपने मायके में थीं। मैं शहर में अपनी ड्यूटी पर था। उन दिनों मेरी फैक्ट्री में बहुत काम था। अचानक एक दोपहर मुझे काम करते-करते ऐसा लगा जैसे तुमने मुझे आवाज़ दी हो। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़कने लगा कि मैं फैक्ट्री के मैनेजर से लड़-झगड़ कर छुट्टी लेकर सीधा रेलवे स्टेशन की तरफ भागा। तुम्हारे गांव पहुंचने में मुझे पूरा दिन लग गया। जब मैं वहां पहुंचा, तो पता चला कि तुम प्रसव पीड़ा से तड़प रही हो। जैसे ही मैंने कमरे में कदम रखा और तुम्हारा हाथ पकड़ा, तुमने कहा था – ‘मुझे पता था तुम आ जाओगे।'”

कावेरी के हाथ अचानक रुक गए। उनकी आंखों के किनारे हल्के से भीग गए थे। “हाँ… उस दिन जब दर्द शुरू हुआ था, तो मेरे होंठों पर सिर्फ तुम्हारा ही नाम था। मेरे पिताजी स्टेशन पर किसी को भेजने वाले थे, पर मैंने उन्हें रोक दिया था। मैंने कहा था कि उन्हें खबर करने की ज़रूरत नहीं है, वो खुद आ रहे होंगे। मेरे घरवाले मुझे पागल समझ रहे थे। लेकिन जब तुम दरवाज़े पर खड़े दिखे, तो जैसे मेरी सारी तकलीफ छूमंतर हो गई थी। बिना किसी फोन कॉल के, बिना किसी टेलीग्राम के, तुम ठीक उसी वक्त मेरे पास थे जब मुझे तुम्हारी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।”

“वो कोई चमत्कार नहीं था कावेरी,” विद्याधर जी ने गहरी आवाज़ में कहा, “वो हमारा एक-दूसरे से जुड़ाव था। हमारे समय में लोकेशन शेयर नहीं होती थी, लेकिन हम हमेशा एक-दूसरे के दिल के पते पर मौजूद रहते थे।”

कावेरी ने सहमति में सिर हिलाया और कहा, “और आपकी वो आदत! जब भी मुझे रसोई में कोई खास चीज़ खाने का मन होता, जैसे कद्दू की सब्ज़ी या गाजर का हलवा… मैं सोचती थी कि शाम को आपको बताऊंगी। लेकिन शाम को आप जब दफ्तर से लौटते, तो आपके हाथ में उसी चीज़ का थैला होता था। मैं आज तक नहीं समझ पाई कि आप मेरे दिमाग को कैसे पढ़ लेते थे।”

विद्याधर जी ज़ोर से हंस पड़े, जिससे उनके चेहरे की झुर्रियां और भी गहरी हो गईं। “अरे भाग्यवान! दिमाग क्या पढ़ना, बस दिन में काम करते-करते अचानक मन में आता था कि आज अगर कावेरी के हाथ का गाजर का हलवा मिल जाए तो दिन बन जाए। मैं बाज़ार से गाजर ले आता और तुम पहले से ही दूध उबाल कर मेरा इंतज़ार कर रही होती थीं। हमारी फरमाइशें भी एक ही समय पर एक जैसी ही होती थीं।”

अंदर से फिर आवाज़ आई। इस बार अंशुल हंस रहा था। “राधिका, देखो मैंने फेसबुक पर हमारी एनिवर्सरी की फोटो डाली है। मैंने उसमें लिखा है ‘टू द मोस्ट ब्यूटीफुल वाइफ इन द वर्ल्ड’। देखो कितने सारे लाइक्स आ गए हैं!”

राधिका ने बिना मुड़े कहा, “हाँ, मैंने देख लिया। मैंने भी उस पर ‘लव यू’ का कमेंट और एक दिल वाला इमोजी डाल दिया है।”

दोनों एक ही कमरे में बैठे थे, एक-दूसरे से सिर्फ दो फीट की दूरी पर, लेकिन अपनी खूबसूरती की तारीफ राधिका ने अंशुल के मुंह से नहीं, बल्कि फेसबुक की स्क्रीन पर पढ़ी थी।

कावेरी ने एक गहरी ठंडी सांस छोड़ी। “आजकल के बच्चों का प्यार भी इन मशीनों के अंदर ही कैद होकर रह गया है। ये साथ बैठकर बातें नहीं करते, एक-दूसरे को ‘टैग’ करते हैं। इनकी रूठने-मनाने की प्रक्रिया भी ‘ब्लॉक’ और ‘अनब्लॉक’ तक सीमित हो गई है। हमारी तरह छोटी-छोटी बातों पर रूठना, और फिर एक कप चाय के बहाने मान जाना… ये सब तो जैसे ये जानते ही नहीं।”

“हाँ कावेरी,” विद्याधर जी ने आसमान में टिमटिमाते पहले तारे को देखते हुए कहा, “हमारे समय में नेटवर्क नहीं था, पर हम एक-दूसरे के कवरेज एरिया में हमेशा रहते थे। हमारे पास ‘इमोजी’ नहीं थे, पर जब तुम अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से मुझे देखती थीं, तो वो एक नज़ारा हज़ारों शब्दों से ज़्यादा भारी होता था। जब मैं तुम्हारे लिए बाज़ार से बिना बताए गजरा ले आता था, तो तुम्हारी वो मुस्कान किसी भी ‘सुपर लाइक’ से कहीं बड़ी होती थी।”

कावेरी मुस्कुराईं, उनकी उम्रदराज़ आंखों में आज भी वही पुरानी शर्म और हया थी। उन्होंने अपनी सलाई और ऊन को समेटकर एक तरफ रखा।

“अच्छा, बहुत हो गईं पुरानी बातें। शाम बहुत ढल गई है और ओस भी गिरने लगी है,” कावेरी अपनी जगह से उठते हुए बोलीं।

विद्याधर जी ने भी अपनी छड़ी उठाई और खड़े हो गए।

कावेरी रसोई की तरफ मुड़ने ही वाली थीं कि विद्याधर जी बोले, “और हाँ, सुनो…”

कावेरी बिना मुड़े ही मुस्कुराईं और बोलीं, “जानती हूँ… अदरक वाली बनानी है, और चीनी थोड़ी कम रखनी है, है ना?”

विद्याधर जी अवाक रह गए और फिर ठहाका मारकर हंस पड़े। “कमाल करती हो कावेरी! मैंने तो अभी कुछ कहा भी नहीं था।”

“तीस साल हो गए आपके साथ रहते-रहते। अब इन छोटी-छोटी बातों के लिए किसी नोटिफिकेशन की ज़रूरत नहीं पड़ती मुझे। आपका मन ही मेरा सबसे बड़ा मैसेज बॉक्स है,” कावेरी ने रसोई के दरवाज़े से पलटकर एक प्यारी सी झिड़की देते हुए कहा।

विद्याधर जी अपनी कुर्सी पर वापस बैठ गए। उनके चेहरे पर एक असीम शांति थी। उन्होंने अंदर बैठे अपने बेटे और बहू की तरफ एक आखिरी बार देखा, जो अब भी अपने-अपने मोबाइलों में सिर झुकाए बैठे थे। विद्याधर जी ने बुदबुदाते हुए कहा, “हाँ… हमारे ज़माने में मोबाइल नहीं थे… पर हमारे पास एक-दूसरे के लिए पूरा वक़्त और एक सच्चा अहसास था।”

क्या आपको भी लगता है कि आज हम तकनीक के इतने करीब आ गए हैं कि असल रिश्तों की गर्माहट और वो अनकहा अहसास कहीं पीछे छूट गया है? क्या आपने भी कभी अपने किसी करीबी के साथ ऐसी बिना शब्दों की बातचीत महसूस की है? अपने विचार और अपने दिल की बात कमेंट्स में जरूर साझा करें।

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लेखिका : सीमा श्रीवास्तव

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