अगले कुछ दिन नेहा के लिए किसी मानसिक यातना से कम नहीं थे। वह हर रात विकास के कपड़ों से किसी अजनबी परफ्यूम की महक सूंघने की कोशिश करती। जब विकास सो जाता, तो वह दबे पाँव उसका फोन चेक करने की कोशिश करती, लेकिन फोन में नया पासवर्ड लगा था जो उसे नहीं पता था। शक अब एक खतरनाक बीमारी का रूप ले चुका था जिसने नेहा की रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया था।
शनिवार की रात थी। विकास ने वादा किया था कि वह जल्दी आएगा और वे सब बाहर डिनर पर जाएंगे। नेहा ने अहाना को तैयार कर दिया था और खुद भी तैयार होकर विकास का इंतज़ार कर रही थी। लेकिन रात के नौ बज गए और विकास का कोई अता-पता नहीं था। उसका फोन भी लगातार ‘नॉट रीचेबल’ आ रहा था।
नेहा और विकास की शादी को सात साल हो चुके थे। दोनों की एक प्यारी सी पाँच साल की बेटी थी, जिसका नाम अहाना था। विकास एक मल्टीनेशनल आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट के पद पर काम करता था, जबकि नेहा ने शादी के बाद अपने परिवार की खातिर अपना फैशन डिजाइनिंग का करियर छोड़ दिया था और एक कुशल गृहिणी बन गई थी। उनका जीवन बहुत ही शांति और प्रेम से बीत रहा था। विकास अपने परिवार से बहुत प्यार करता था और ऑफिस के बाद का सारा समय अपनी पत्नी और बेटी को ही देता था। रविवार की शामें आमतौर पर उनके लिए बाहर घूमने, फिल्म देखने या किसी अच्छे रेस्टोरेंट में खाना खाने के लिए आरक्षित होती थीं।
सब कुछ एक दम परफेक्ट चल रहा था, जब तक कि अचानक विकास के रूटीन में बदलाव नहीं आने लगा।
पिछले कुछ हफ्तों से विकास बहुत व्यस्त रहने लगा था। वह सुबह जल्दी घर से निकल जाता और रात को घर लौटने में उसे अक्सर दस या ग्यारह बज जाते। जब भी वह घर आता, बहुत थका हुआ दिखाई देता। खाना खाते समय भी उसका ध्यान अपने फोन पर ही होता था। कभी-कभी वह बालकनी में जाकर धीमी आवाज़ में किसी से बातें करता। नेहा ने जब भी उससे इस बदलाव के बारे में पूछा, तो विकास का रटा-रटाया जवाब होता, “नेहा, ऑफिस में एक नया प्रोजेक्ट आया है जिसकी डेडलाइन बहुत नज़दीक है। बस उसी का प्रेशर है, कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा।”
नेहा एक समझदार पत्नी थी। उसने विकास की बातों पर यकीन कर लिया और उसे सपोर्ट करने लगी। वह रात-रात भर जागकर उसके लिए खाना गरम रखती और उसकी थकान मिटाने के लिए उसके मनपसंद व्यंजन बनाती।
लेकिन एक दिन इस शांत झील में किसी ने शक का एक भारी पत्थर फेंक दिया।
बुधवार की दोपहर थी। अहाना स्कूल गई हुई थी और नेहा घर के कामों से फुरसत पाकर बालकनी में पौधे संवार रही थी। तभी पड़ोस में रहने वाली रचना भाभी वहाँ आ गईं। रचना भाभी की आदत थी कि उन्हें पूरे मोहल्ले और दुनिया भर की गपशप में बहुत दिलचस्पी रहती थी।
“और नेहा, कैसी हो? आज कल तो तुम्हारे विकास जी दिखाई ही नहीं देते!” रचना भाभी ने जाली के पास खड़े होकर पूछा।
“हाँ भाभी, ऑफिस में काम का बहुत दबाव है आजकल। रात को देर से आते हैं,” नेहा ने मुस्कुराते हुए सहजता से जवाब दिया।
रचना भाभी ने अपने चेहरे पर एक अजीब सी रहस्यमयी मुस्कान लाते हुए अपनी आवाज़ धीमी की, “अच्छा! काम का दबाव है? पर नेहा बुरा मत मानना, कल शाम मैंने विकास जी को ‘द ओशन लाउंज’ कैफे में देखा था। उनके साथ कोई क्लाइंट वगैरह नहीं थी, बल्कि एक बहुत ही मॉडर्न और खूबसूरत सी जवान लड़की थी। दोनों बड़ी देर तक हँस-हँस कर बातें कर रहे थे। मुझे तो देखकर ऐसा लगा जैसे दोनों एक-दूसरे को बहुत करीब से जानते हों।”
यह सुनकर नेहा के दिल की धड़कन एक पल के लिए रुक गई, लेकिन उसने खुद को संभालते हुए कहा, “भाभी, वो कोई ऑफिस की कलीग होगी या कोई क्लाइंट। विकास का काम ही ऐसा है, मीटिंग्स होती रहती हैं।”
रचना भाभी ने होंठ सिकोड़ते हुए कहा, “अरे मेरी भोली नेहा! कलीग के साथ कोई ऐसे कॉफी पीते हुए आँखों में आँखें डालकर बातें नहीं करता। मुझे तो दाल में बहुत कुछ काला लग रहा है। तू ज़रा सावधान रहना। आजकल के आदमियों का कोई भरोसा नहीं होता। कब कहाँ फिसल जाएं, पता ही नहीं चलता। खैर, मुझे क्या, मैंने तो तुझे अपनी बहन समझकर बता दिया। बाकी तेरी मर्जी।” यह कहकर रचना भाभी तो वहां से चली गईं, लेकिन उनके शब्द नेहा के दिमाग में किसी हथौड़े की तरह बजने लगे।
उस दिन के बाद से नेहा का मन किसी काम में नहीं लगा। शक का एक छोटा सा बीज अब उसके दिलो-दिमाग में अपनी जड़ें जमाने लगा था। उसने खुद से हजार बार कहा कि विकास ऐसा नहीं कर सकता, लेकिन रचना भाभी की बातें और विकास का बदलता व्यवहार—उसका देर से आना, फोन पर पासवर्ड बदल लेना, छुपकर बातें करना—यह सब एक अजीब सा इशारा कर रहे थे।
अगले कुछ दिन नेहा के लिए किसी मानसिक यातना से कम नहीं थे। वह हर रात विकास के कपड़ों से किसी अजनबी परफ्यूम की महक सूंघने की कोशिश करती। जब विकास सो जाता, तो वह दबे पाँव उसका फोन चेक करने की कोशिश करती, लेकिन फोन में नया पासवर्ड लगा था जो उसे नहीं पता था। शक अब एक खतरनाक बीमारी का रूप ले चुका था जिसने नेहा की रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया था।
शनिवार की रात थी। विकास ने वादा किया था कि वह जल्दी आएगा और वे सब बाहर डिनर पर जाएंगे। नेहा ने अहाना को तैयार कर दिया था और खुद भी तैयार होकर विकास का इंतज़ार कर रही थी। लेकिन रात के नौ बज गए और विकास का कोई अता-पता नहीं था। उसका फोन भी लगातार ‘नॉट रीचेबल’ आ रहा था।
नेहा के सब्र का बांध अब टूटने की कगार पर था। रात के साढ़े दस बजे जब दरवाज़े की घंटी बजी, तो नेहा ने जाकर दरवाज़ा खोला। सामने विकास खड़ा था। उसके बाल बिखरे हुए थे और चेहरे पर गहरी थकान थी।
“सॉरी नेहा! आज फिर बहुत देर हो गई। प्रोजेक्ट में एक बड़ा बग आ गया था, उसे फिक्स करते-करते टाइम का पता ही नहीं चला,” विकास ने घर में दाखिल होते हुए जूते उतारे और बोला।
लेकिन आज नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। वह बेडरूम में गई और अपना सूटकेस निकालकर उसमें अपने और अहाना के कपड़े ठूंसने लगी।
विकास भागता हुआ बेडरूम में आया, “ये क्या कर रही हो तुम? कहाँ जा रही हो इतनी रात को?”
नेहा अचानक पलट कर चीखी, “मैं अपनी बेटी को लेकर यहाँ से जा रही हूँ विकास! और तुम ये ऑफिस के काम का झूठा नाटक बंद करो। मुझे सब पता चल गया है!”
विकास हैरान रह गया। “क्या पता चल गया है? तुम क्या बकवास कर रही हो नेहा?”
“बकवास मैं कर रही हूँ या तुम कर रहे हो पिछले दो महीनों से?” नेहा फूट-फूट कर रोने लगी। “तुम्हारा वो नया प्रोजेक्ट, तुम्हारी वो लेट नाइट मीटिंग्स, फोन का पासवर्ड बदलना… सब समझती हूँ मैं! मुझे बेवकूफ मत समझो। मुझे पता है कि तुम कैफे में किस से मिलते हो। वो मॉडर्न लड़की कौन है जिसके साथ तुम आजकल ‘मीटिंग्स’ करते हो? अगर तुम्हें मुझसे कोई दिलचस्पी नहीं रही, तो साफ़-साफ़ बता दो, मैं तुम्हें आज़ाद कर दूँगी। लेकिन मुझे ऐसे धोखे में मत रखो!”
कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। अहाना दूसरे कमरे में सो रही थी। विकास कुछ पल के लिए स्तब्ध खड़ा रहा। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि उसकी पत्नी, जो कल तक उस पर इतना भरोसा करती थी, अचानक यह क्या कह रही है।
कुछ देर बाद विकास ने गहरी सांस ली। वह चुपचाप मुड़ा और अपने लैपटॉप बैग की तरफ गया। उसने बैग की चेन खोली और उसमें से एक भूरे रंग का मोटा सा लिफाफा और एक छोटी सी मखमली डिब्बी निकाली और लाकर बेड पर नेहा के सामने फेंक दी।
“यही देखना था न तुम्हें? तो देखो इसे… और अपनी उस घटिया सोच को भी देखो जिसने हमारे सात साल के रिश्ते पर एक पल में सवाल उठा दिया,” विकास की आवाज़ में गुस्सा भी था और एक गहरा दर्द भी।
नेहा ने कांपते हाथों से वह लिफाफा खोला। उसके अंदर कुछ कानूनी दस्तावेज़ थे। सबसे ऊपर वाले पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा था— “दुकान का लीज़ एग्रीमेंट”। और उसके नीचे जो नाम लिखा था, उसे पढ़कर नेहा के होश उड़ गए। वहां लिखा था— “किरायेदार: नेहा शर्मा – ‘नेहाज़ क्रिएशन्स एंड बुटीक'”।
नेहा ने चौंक कर विकास की तरफ देखा।
विकास ने एक उदास मुस्कुराहट के साथ कहा, “तुम्हें याद है नेहा, शादी से पहले तुम्हारा सपना था कि तुम्हारा अपना एक डिज़ाइनर बुटीक हो? तुमने मेरे लिए, हमारे परिवार और अहाना के लिए अपने उस सपने का गला घोंट दिया। मैं जानता था कि तुम आज भी डिज़ाइनिंग से कितना प्यार करती हो। अगले महीने हमारी शादी की सालगिरह है। मैं तुम्हें ये बुटीक सरप्राइज में देना चाहता था।”
नेहा की आँखें फटी की फटी रह गई थीं। लिफाफे के अंदर एक शानदार बुटीक के 3डी डिज़ाइन और इंटीरियर की तस्वीरें भी थीं।
“और तुम जिस लड़की की बात कर रही हो… वो श्रुति है, मेरी कंपनी की इंटीरियर डिज़ाइनर। मैं कैफे में उससे इसी बुटीक के डिज़ाइन और फर्नीचर को लेकर मीटिंग कर रहा था,” विकास ने आगे कहा। “तुम पूछ रही थी न कि मैं लेट क्यों आता हूँ? क्योंकि ऑफिस की जॉब के पैसों से घर चलता है नेहा, इस बुटीक के एडवांस और इंटीरियर के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। इसलिए पिछले दो महीने से मैं ऑफिस के काम के बाद एक विदेशी क्लाइंट के लिए फ्रीलांस कोडिंग का काम कर रहा था ताकि मैं इसके लिए पैसे जमा कर सकूँ। मैं अपनी नींदें उड़ा कर, दिन-रात एक कर रहा था ताकि अपनी पत्नी के चेहरे पर वो ख़ुशी देख सकूँ जो उसने मेरे लिए कुर्बान कर दी थी। और तुमने… तुमने क्या सोचा?”
विकास की आवाज़ भर्रा गई। उसने कहा, “और रही बात फोन के पासवर्ड की… तो वो मैंने इसलिए बदला था क्योंकि उस दिन श्रुति का मैसेज आया था कि उसने डिज़ाइन फाइनल कर दिए हैं और मैं नहीं चाहता था कि तुम गलती से भी वो मैसेज पढ़ लो और मेरा सरप्राइज खराब हो जाए।”
यह सब सुनकर नेहा को ऐसा लगा जैसे ज़मीन फट गई हो और वह उसमें समा जाना चाहती हो। उसे खुद पर, अपनी सोच पर और रचना भाभी की बातों में आने पर भयंकर घिन आ रही थी। सामने रखा वह लीज़ एग्रीमेंट और मखमली डिब्बी उसके शक का तमाशा बना रहे थे।
वह रोते हुए विकास के पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गई। उसने अपने दोनों कान पकड़ लिए, “मुझे माफ़ कर दो विकास… मैं सच में बहुत बड़ी बेवकूफ हूँ। मैं उस पड़ोसन की बातों में आ गई। मुझे नहीं पता कि मेरे दिमाग में ये सब कैसे बैठ गया। प्लीज मुझे माफ़ कर दो… तुम मेरे लिए इतना कुछ कर रहे थे और मैं तुम पर इतना घटिया शक कर रही थी।”
विकास ने कुछ देर उसे ऐसे ही रोते हुए देखा। फिर वह भी नीचे झुका और उसने नेहा को अपने गले से लगा लिया।
“रिश्तों में जब कोई तीसरा इंसान दखल देता है नेहा, तो दिमाग अक्सर काम करना बंद कर देता है,” विकास ने प्यार से उसके बाल सहलाते हुए कहा। “लेकिन आगे से याद रखना, दुनिया वाले जो चाहें कहें, अगर तुम्हारे मन में कोई भी सवाल हो, तो बिना किसी झिझक के मुझसे सीधे आकर पूछना। दूसरों की बातों से अपना घर नहीं तोड़ा करते।”
नेहा अभी भी सुबक रही थी। “मैं वादा करती हूँ विकास, अब कभी ऐसा नहीं होगा। मुझे माफ़ कर दो।”
तभी विकास ने अचानक एक नकली गुस्से वाला चेहरा बनाया और ज़ोर से चिल्लाया, “लेकिन तुमने मेरा पूरा सरप्राइज ख़राब कर दिया नेहा! मुझे तुम्हें सालगिरह वाले दिन वहाँ लेकर जाना था और तुम्हारी आँखों पर पट्टी बांधनी थी। सब गुड़-गोबर कर दिया तुमने!”
विकास के इस तरह चिल्लाने पर नेहा एक पल के लिए सहम गई, लेकिन फिर जब विकास ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा, तो नेहा को भी अपने बेवकूफी भरे शक पर हँसी आ गई। उसने वो मखमली डिब्बी खोली, जिसमें बुटीक की चाबियां रखी हुई थीं। आँसुओं और मुस्कुराहट के बीच नेहा ने उन चाबियों को सीने से लगा लिया। उसे एहसास हो गया था कि उसका पति उससे कितना बेइंतहा प्यार करता है, और यह भी कि सच्चा प्यार हर शक की दरार को भर सकता है।
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