शहर की उस आलीशान सोसायटी के बड़े से लॉन में आज चहल-पहल कुछ ज्यादा ही थी। रंग-बिरंगे फूलों और झिलमिलाती लाइटों से सजे उस मंडप में खुशियों का शोर गूंज रहा था। मौका था स्मृति की देवरानी, नव्या की गोदभराई का। पूरे परिवार में एक अलग ही उल्लास था, आखिर घर में सालों बाद किसी नन्हे मेहमान की किलकारियां गूंजने वाली थीं। ढोलक की थाप, महिलाओं के लोकगीत और मेहमानों की बधाइयों के बीच स्मृति भी एक आदर्श जेठानी की तरह सारे इंतज़ाम संभाल रही थी। कैटरिंग से लेकर मेहमानों के स्वागत तक, स्मृति के चेहरे पर एक सधी हुई और खूबसूरत मुस्कान चिपकी हुई थी। वह दिखने में जितनी आधुनिक और सुलझी हुई थी, भीतर से उतनी ही टूट चुकी थी।
स्मृति और उसके पति रोहन की शादी को सात साल हो चुके थे। इन सात सालों में उन्होंने वो हर कोशिश कर ली थी, जो मेडिकल साइंस उन्हें दे सकती थी। आईवीएफ के कई असफल प्रयासों, ढेरों टेस्ट और समाज के तानों ने स्मृति को भीतर से खोखला कर दिया था। वह एक सफल सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी, जो तर्क और विज्ञान पर विश्वास करती थी। लेकिन जब बात उसके मातृत्व की आती, तो वह खुद को एक हारी हुई औरत महसूस करती। आज नव्या की गोदभराई में हर कोई खुश था, लेकिन स्मृति के लिए हर रस्म, हर गीत उसके अपने सूनेपन पर नमक छिड़कने जैसा था।
अचानक बाहर से ढोलक की एक अलग ही थाप सुनाई दी। यह उन लोगों की टोली थी, जो अक्सर घरों में खुशियों के मौके पर अपनी दुआएं देने आते हैं। किन्नरों का एक समूह नाचते-गाते लॉन में दाखिल हुआ। परिवार की पुरानी परंपराओं को मानते हुए, स्मृति की सास ने उसे शगुन का लिफाफा और मिठाइयां देकर उन लोगों को विदा करने का जिम्मा सौंपा।
स्मृति अपने महंगे सिल्क की साड़ी को संभालते हुए, चेहरे पर वही अपनी जानी-पहचानी आधुनिक और सधी हुई मुस्कान लेकर उनके पास गई। उसने टोली की सबसे बुजुर्ग और रोबदार दिखने वाली किन्नर की ओर लिफाफा बढ़ाया। उस किन्नर का नाम ‘चमेली’ था। चमेली की उम्र साठ के पार रही होगी, चेहरे पर झुर्रियां थीं लेकिन आँखों में एक अजीब सी चमक और गहराई थी।
चमेली ने लिफाफा लेने के बजाय स्मृति की आँखों में बहुत गहराई से देखा। वो निगाह इतनी तीक्ष्ण थी कि स्मृति को लगा जैसे वह उसके भीतर के सारे छिपे हुए दर्द को पढ़ रही हो। चमेली ने अपने दोनों हाथ स्मृति के सिर पर रख दिए और अचानक एक गहरी सांस लेते हुए बोली— “बेटी, बाहर से तू कितनी भी सजी-धजी क्यों न हो, लेकिन तेरे भीतर एक बहुत गहरा अँधेरा है। किसी ने तेरे भाग्य पर एक ऐसी भारी नज़र लगा दी है कि तेरी गोद हमेशा सूनी ही रहे।”
स्मृति, जो हमेशा से इन बातों को अंधविश्वास मानती थी, हल्की सी हंसी के साथ बोली, “अरे नहीं मौसी, यह सब बस कहने की बातें हैं। मैं 21वीं सदी की पढ़ी-लिखी महिला हूँ, मैं इन जादू-टोने, नज़र-वज़र के चक्करों में नहीं पड़ती। हमारी अपनी कुछ मेडिकल परेशानियां हैं, बस वही बात है। विज्ञान हर चीज़ का जवाब ढूंढ रहा है, और रही बात नज़र की, तो मुझे इन सब बातों पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं है।”
स्मृति का लहजा बहुत ही स्पष्ट और थोड़ा मज़ाकिया था। वह चाहती थी कि यह बातचीत जल्दी खत्म हो और वह अपने काम में वापस लौट जाए। वह अपनी कमजोरी को किसी भी ऐसे इंसान के सामने ज़ाहिर नहीं करना चाहती थी, जिसे वह जानती तक नहीं।
लेकिन चमेली ने बुरा मानने या तर्क करने के बजाय एक बहुत ही शांत और ममता भरी मुस्कान दी। उसने अपने खुरदरे लेकिन गर्म हाथ स्मृति के गालों पर रखे और बेहद कोमलता से कहा— “मुझे पता है पगली, तू बहुत समझदार है और तुझे इन सब चक्करों में पड़ने की जरूरत भी नहीं है। तू विज्ञान को मानती है, मान। लेकिन मन के घाव किसी मशीन में नहीं दिखते। तू मत कर विश्वास, मैं खुद ही तेरी सारी बलाएं और तेरा सारा दुख अपने ऊपर ले लेती हूँ।”
यह कहते हुए चमेली ने बड़े ही वात्सल्य के साथ स्मृति के माथे को चूमा और उसके सिर पर हाथ फेरने लगी।
स्मृति के लिए वह स्पर्श किसी जादू से कम नहीं था। जैसे ही चमेली का हाथ उसके माथे पर लगा, स्मृति को लगा जैसे किसी ने उसके भीतर सालों से बने एक बहुत बड़े बांध के दरवाजे खोल दिए हों। वह खुद को रोक नहीं पाई। उसकी वह आधुनिक, मजबूत और तर्कशील महिला वाली छवि एक पल में ताश के पत्तों की तरह ढह गई। उसकी आँखों से आंसुओं का ऐसा सैलाब उमड़ा जिसे वह चाहकर भी रोक नहीं पा रही थी।
वह भरे लॉन में, मेहमानों की परवाह किए बिना चमेली के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वह इस अजनबी किन्नर के सामने इतनी कमजोर क्यों पड़ गई थी। शायद इसलिए क्योंकि चमेली का वह स्पर्श बिल्कुल निस्वार्थ था। उसमें समाज के तानों जैसी चुभन नहीं थी, बल्कि एक ऐसी माँ की गर्माहट थी, जो बिना कुछ पूछे अपने बच्चे का दर्द खींच लेना चाहती हो।
स्मृति को इस तरह रोता देख चमेली ने उसे अपने सीने से लगा लिया। वह उसे वैसे ही थपथपाने लगी जैसे कोई माँ अपनी बच्ची को लोरी सुनाते हुए थपथपाती है। जब स्मृति का रोना थोड़ा कम हुआ, तो चमेली ने उसके आँसू पोंछे और उसकी आँखों में देखकर जो कहा, उसने स्मृति के जीवन को देखने का नज़रिया हमेशा के लिए बदल दिया।
चमेली ने गहरी आवाज़ में कहा, “रोती क्यों है मेरी बच्ची? माना कि आज तेरा आंगन सूना है, लेकिन तू ज़रा पलट कर देख, तेरे पीछे पूरा एक परिवार खड़ा है। तेरा वो पति है, जो तुझे पागलों की तरह चाहता है। तेरे पास एक घर है जहाँ तेरी इज्जत है। और सबसे बड़ी बात… तेरे पास एक ‘उम्मीद’ है। कल को कोई दवा, कोई दुआ, या कोई चमत्कार शायद तेरी गोद भर दे। तेरे पास इंतज़ार करने के लिए एक कल है।”
चमेली की आवाज़ थोड़ी भर्रा गई, उसने आसमान की तरफ देखते हुए कहा, “कभी हमारी तरफ देख बेटी। हम किस लिए रोएं? हमारा न कोई परिवार है, न हमारा कोई घर। जिस दिन हम पैदा होते हैं, हमारे अपने ही माँ-बाप हमें दुनिया के डर से छोड़ देते हैं। हमारे पास न तो बच्चे की उम्मीद है, न ही इस बात की कि कल को कोई हमें अपना कहेगा। हमारी तो मौत पर भी कोई आंसू बहाने वाला नहीं होता। हम बिना उम्मीद के भी दूसरों की खुशियों में ताली बजाकर दुआएं देते हैं, तो तू इतनी सारी नेमतों के बीच एक कमी के लिए जिंदगी से इतनी निराश क्यों हो गई?”
चमेली के उन चंद वाक्यों ने स्मृति के मन पर एक हथौड़े की तरह वार किया। स्मृति को अचानक अपनी उस शून्यता पर शर्म आने लगी जिसे उसने अपनी पूरी दुनिया बना लिया था। वह हर पल सिर्फ उस चीज़ के लिए रो रही थी जो उसके पास नहीं थी, और उन अनगिनत खुशियों को नज़रअंदाज़ कर रही थी जो उसे मिली हुई थीं। रोहन का प्यार, परिवार का सम्मान, उसकी अपनी एक पहचान—ये सब उसे मामूली लगने लगे थे सिर्फ इसलिए क्योंकि वह माँ नहीं बन पा रही थी।
आज चमेली ने उसे सिखा दिया था कि दुआएं सिर्फ शब्दों के मंत्र नहीं होते। दुआएं वो होती हैं जब एक इंसान, जिसके पास खुद कुछ नहीं है, वो अपने हिस्से की सकारात्मकता किसी ऐसे व्यक्ति को दे दे जो सब कुछ होते हुए भी भीतर से टूट चुका हो। वो चमेली का सिर्फ एक आशीर्वाद नहीं था; वो एक ऐसी रूह से मिली हिम्मत थी, जिसने अकेलेपन और तिरस्कार की सबसे गहरी खाइयों को देखा था।
उस दिन स्मृति का रोना बंद हो गया। उसने चमेली के पैर छुए, जो उसने आज तक कभी किसी के नहीं छुए थे। उसने चमेली को सम्मान से विदा किया। उस दिन के बाद स्मृति ने बच्चे के लिए रोना और परेशान होना छोड़ दिया। उसने खुद को, रोहन को और अपनी ज़िंदगी को उसकी संपूर्णता में स्वीकार करना सीख लिया। उसने अपनी ‘उम्मीद’ को अपनी ताकत बनाया, अपनी कमजोरी नहीं।
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