फासलों के बीच सिमटती दुनिया

  बरामदे में रखी आराम कुर्सी पर बैठे माधव जी के हाथों में उनका टैबलेट था और उनके चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान तैर रही थी। पास ही बैठी उनकी पत्नी, सुमित्रा, अपने फोन पर किसी को अपनी नई बुनाई का डिजाइन समझा रही थीं। जो भी उन्हें बाहर से देखता, उसे यही लगता कि उम्र के इस पड़ाव पर ये दोनों कितने शांत और संतुष्ट हैं। लेकिन इस शांति और संतुष्टि के पीछे एक लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा थी।

पैंतीस साल पहले, जब माधव और सुमित्रा ने एक-दूसरे का हाथ थामने का फैसला किया था, तब उनके इस प्रेम विवाह को किसी ने स्वीकार नहीं किया था। परिवार, रिश्तेदार, समाज—सबने उनसे मुंह मोड़ लिया था। अपनी गृहस्थी की नींव उन्होंने बिल्कुल शून्य से रखी थी। एक छोटे से किराए के कमरे से शुरू हुआ उनका सफर, आज इस सुंदर से घर ‘आशियाना’ तक पहुँच चुका था। उन्होंने अपने जीवन का हर एक कतरा अपने दो बच्चों, बेटे सिद्धार्थ और बेटी अवनि, के भविष्य को संवारने में लगा दिया था।

समय पंख लगाकर उड़ गया। अवनि की शादी एक बहुत अच्छे परिवार में हो गई और वह अपने पति के साथ मुंबई में बस गई। वहीं, सिद्धार्थ को उसकी काबिलियत के दम पर लंदन की एक बहुत बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। बच्चों की तरक्की देखकर माधव और सुमित्रा का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। लेकिन जब माधव जी बैंक की अपनी नौकरी से रिटायर हुए, तब अचानक उन्हें महसूस हुआ कि घर में कितनी खामोशी है।

शुरुआत के कुछ महीने बहुत भारी गुजरे। सुबह की भागदौड़, टिफिन बनाने की जल्दी, रात को बच्चों के साथ बैठकर टीवी देखना—सब कुछ जैसे एक झटके में अतीत का हिस्सा बन गया था। घर का हर कोना उन्हें काटने को दौड़ता। ऐसे में, तकनीक और सोशल मीडिया ने उनके जीवन में एक मसीहा की तरह प्रवेश किया।

सिद्धार्थ ने ही लंदन जाने से पहले उन्हें स्मार्टफोन और टैबलेट चलाना सिखाया था। पहले जो माधव जी स्क्रीन छूने से भी कतराते थे, वे अब यूट्यूब पर बागवानी के नए तरीके सीखने लगे थे। उन्होंने फेसबुक पर अपने कॉलेज के उन पुराने दोस्तों को ढूंढ निकाला था, जिनसे पिछले तीस सालों से कोई संपर्क नहीं था। दूसरी तरफ, सुमित्रा जी ने कुकिंग और बुनाई के कई ऑनलाइन ग्रुप्स जॉइन कर लिए थे। वह अपनी रेसिपी की तस्वीरें डालतीं और जब दुनिया भर से लोग उनकी तारीफ करते, तो उनका मन बच्चों की तरह खिल उठता।

डिजिटल दुनिया ने उनके एकांत को एक नए रंग से भर दिया था। अब उन्हें दिन भर सिद्धार्थ या अवनि के फोन का इंतजार नहीं करना पड़ता था। वे समझ गए थे कि बच्चों की अपनी जिंदगी है, उनकी अपनी जिम्मेदारियां और चुनौतियां हैं। इसलिए, उन्होंने अपनी एक अलग और खुशनुमा दुनिया बसा ली थी।

इसी बीच, एक दिन सिद्धार्थ का फोन आया, “मां, मैं और शिखा (सिद्धार्थ की पत्नी) अगले हफ्ते पंद्रह दिन के लिए इंडिया आ रहे हैं।” यह खबर सुनते ही माधव और सुमित्रा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। पूरे घर में जैसे एक नई जान आ गई। सुमित्रा ने सिद्धार्थ की पसंद के सारे अचार और मिठाइयां बनानी शुरू कर दीं।

जब सिद्धार्थ और शिखा घर आए, तो ‘आशियाना’ फिर से चहक उठा। कुछ दिन रिश्तेदारों से मिलने और घूमने-फिरने में बीत गए। लेकिन इस बीच, सिद्धार्थ बड़ी बारीकी से अपने माता-पिता को देख रहा था। उसने नोटिस किया कि उसके पापा सुबह उठकर अखबार पढ़ने के बाद अपना फेसबुक और व्हाट्सएप चेक करते हैं, दोस्तों के साथ वीडियो कॉल पर ठहाके लगाते हैं। मां भी दोपहर के समय अपने ऑनलाइन सहेलियों के साथ व्यस्त रहती हैं।

एक दिन रात के खाने के बाद, जब माधव और सुमित्रा अपने-अपने फोन में कुछ देख रहे थे, सिद्धार्थ का मन भर आया। उसे लगा कि उसके माता-पिता अंदर से बहुत अकेले हो गए हैं और सिर्फ अपना समय काटने के लिए इस आभासी दुनिया (वर्चुअल वर्ल्ड) का सहारा ले रहे हैं। उसे खुद पर बहुत ग्लानि महसूस हुई कि वह बुढ़ापे में अपने माता-पिता का सहारा नहीं बन पा रहा है।

सिद्धार्थ धीरे से माधव जी की आराम कुर्सी के पास गया और वहीं फर्श पर बैठ गया। उसने अपने पापा के घुटनों पर हाथ रखते हुए, रुंधे हुए गले से कहा, “पापा… एक बात पूछूं? आप और मां जब अकेले होते हैं, तो यह वक्त काटना कितना मुश्किल होता होगा ना? मुझे पता है, आप दोनों हमें परेशान नहीं करना चाहते, इसलिए फोन में अपना मन बहलाते रहते हैं। मुझे बहुत गिल्ट होता है पापा, कि मैं आपके बुढ़ापे में आपके पास नहीं हूँ।”

सिद्धार्थ की बात सुनकर कमरे में कुछ पल के लिए गहरी शांति छा गई। सुमित्रा जी ने अपना फोन किनारे रखा और सिद्धार्थ के पास आकर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोलीं, “मेरे पागल बच्चे, तू क्या सोच रहा है? हम दुखी हैं? हम तो इस बात से सबसे ज्यादा खुश हैं कि तूने अपनी जिंदगी में वो मुकाम हासिल किया है, जिसका हमने सपना देखा था।”

माधव जी ने चश्मा उतारते हुए बहुत ही शांत और गंभीर स्वर में कहा, “सिद्धार्थ बेटा, समय काटना और समय को जीना, दोनों में बहुत फर्क होता है। एक समय था जब हमारे माता-पिता की पीढ़ी रिटायर होने के बाद सिर्फ अपने घर के ओटे पर बैठकर राहगीरों को देखती थी, या फिर बीमारियों का रोना रोती थी। उनके पास वक्त गुजारने का कोई साधन नहीं था। लेकिन आज, इस तकनीक और सोशल मीडिया ने हमें एक नई जिंदगी दी है।”

सुमित्रा जी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “बेटा, हम जानते हैं कि तू अपनी नौकरी छोड़कर यहाँ नहीं आ सकता, और इस उम्र में हम लंदन जाकर वहाँ के मौसम और तौर-तरीकों में ढल नहीं सकते। तो क्या हम इस दूरी को अपनी कमजोरी बना लें? बिल्कुल नहीं! जब हमें तुम्हारी याद आती है, तो हम एक बटन दबाकर तुम्हें वीडियो कॉल पर देख लेते हैं। ऐसा लगता है जैसे तुम यहीं हमारे सामने बैठे हो। अवनि की बेटी की पहली मुस्कान मैंने व्हाट्सएप वीडियो पर ही तो देखी थी।”

माधव जी ने मुस्कुराते हुए सिद्धार्थ का हाथ अपने हाथों में लिया, “तुम इसे हमारा अकेलापन समझ रहे हो, जबकि यह हमारी आत्मीयता का नया साधन है। मुझे सोशल मीडिया पर दूसरों की कहानियां पढ़कर कभी-कभी उनके दुखों से तकलीफ जरूर होती है, लेकिन साथ ही मुझे दुनिया से जुड़े रहने का अहसास भी होता है। मुझे अपने पुराने दोस्त मिल गए हैं, तुम्हारी मां को अपनी कला का सम्मान मिल रहा है। हमारे पास किसी चीज की कमी नहीं है बेटा। हमें तुम पर बहुत नाज़ है।”

सिद्धार्थ अवाक होकर अपने माता-पिता को सुन रहा था। उसके दिल पर रखा अपराधबोध का वह भारी पत्थर अचानक कहीं गायब हो गया था।

सुमित्रा जी हंसते हुए बोलीं, “और सच कहूं तो बेटा, थैंक्स टू सोशल मीडिया! अगर यह नहीं होता, तो शायद हम सच में अकेलेपन का शिकार हो जाते। लेकिन अब ऐसा नहीं है। इसलिए तुम वहाँ बिना किसी टेंशन के, पूरी मेहनत से अपना काम करो। मस्त रहो और खुश रहो। हमारी चिंता बिल्कुल मत करना। हम यहाँ अपनी दूसरी पारी बहुत मजे से खेल रहे हैं।”

यह सुनकर सिद्धार्थ की आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। पास ही खड़ी उसकी पत्नी शिखा भी यह सब सुन रही थी, उसके चेहरे पर भी एक गहरी संतुष्टि थी। उन्हें यह समझ आ गया था कि रिश्ते दूरियों से नहीं टूटते, और अगर माता-पिता समझदार हों, तो वे अपने बच्चों की उड़ान में कभी बेड़ियां नहीं डालते, बल्कि उनके आसमान का सबसे चमकीला सितारा बन जाते हैं।

अगले दिन जब सिद्धार्थ और शिखा वापस लंदन जाने के लिए एयरपोर्ट के लिए निकले, तो वे उदास नहीं थे। उन्हें पता था कि वे दूर जाकर भी अपने माता-पिता से सिर्फ एक वीडियो कॉल की दूरी पर हैं। और पीछे छूट गए माधव और सुमित्रा के चेहरों पर किसी तरह की कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि अपनी नई डिजिटल दुनिया में अपने बच्चों की सफलता का जश्न मनाने का एक गहरा सुकून था।

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