एक अधूरी विदाई

यह सुनकर काव्या के आंसू छलक पड़े थे। यह खुशी के आंसू थे। बारह सालों की तपस्या पूरी होने वाली थी। कल रात भर वह सोई नहीं। उसने पूरा घर साफ किया, विवान की पसंद का गाजर का हलवा बनाया और अपनी उस लाल साड़ी को निकालकर इस्त्री किया जो विवान को बहुत पसंद थी। सुबह से ही आसमान में काले बादल छाए हुए थे, लेकिन काव्या के लिए यह सावन खुशियों की बारात लेकर आया था। वह बार-बार दरवाजे तक जाती और बारिश में भीगती हुई सड़क को देखती।

 काव्या बेसुध सी ज़मीन पर बैठी थी। खिड़की से अंदर आती बारिश की बौछारें उसके चेहरे को भिगो रही थीं, लेकिन उसे इसका कोई अहसास नहीं था। क्योंकि जो तूफान उसके सीने के अंदर चल रहा था, उसके आगे बाहर की यह बारिश बहुत मामूली लग रही थी। आंगन में पानी लबालब भर चुका था, इतनी तेज़ बारिश थी कि एक कदम बाहर रखना भी मुमकिन नहीं था। लेकिन काव्या को अब कहीं जाना भी तो नहीं था। उसकी आँखों से गिरते आंसू बाहर की बारिश के पानी के साथ मिलकर ज़मीन पर एक हो रहे थे। उसके हाथ में एक पुराना, घिसा हुआ मोबाइल फोन था, जिसकी स्क्रीन कुछ देर पहले ही हमेशा के लिए काली हो चुकी थी—बिल्कुल काव्या के भविष्य की तरह।

यह कोई आज की बात नहीं थी। काव्या की उम्र के तीस सावन ऐसे ही अकेले बीत चुके थे। उसने कभी अपने हाथों में किसी और के नाम की मेहंदी नहीं रची, कभी किसी और के साथ सात फेरे लेने का ख्वाब नहीं देखा। और यह सब सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने अपना दिल, अपनी रूह और अपनी पूरी जिंदगी विवान के नाम कर दी थी। विवान, जो उसका बचपन का प्यार था। जब विवान को अपने करियर और परिवार की जिम्मेदारियों के चलते शहर से बहुत दूर एक दूसरे देश जाना पड़ा था, तब उसने काव्या का हाथ पकड़कर कहा था, “बस कुछ साल काव्या, मैं अपने पैरों पर खड़ा होकर वापस आऊंगा और तुम्हें अपनी दुल्हन बनाकर ले जाऊंगा।” उस एक वादे ने काव्या की पूरी दुनिया को उस इंतज़ार के धागे से बांध दिया था।

दिन, महीने और फिर साल गुजरते गए। हर दीवाली, हर होली पर विवान का सिर्फ एक ही संदेश आता, “बस कुछ और समय काव्या, मैं आ रहा हूं।” उस ‘आ रहा हूं’ के इंतज़ार में काव्या ने अपनी जवानी की सबसे खूबसूरत दहलीज़ पार कर ली। धीरे-धीरे समय ने अपनी क्रूरता दिखानी शुरू की। एक लंबी बीमारी के बाद काव्या के माता-पिता उसे इस दुनिया में बिल्कुल अकेला छोड़कर चले गए। उस वक्त भी विवान नहीं आ सका था। नाते-रिश्तेदारों ने ताने मारे, समाज ने उसे एक कुंवारी, अकेली और बेसहारा औरत का तमगा दे दिया। लेकिन काव्या ने किसी की नहीं सुनी। उसने उस खाली और बड़े से घर में खुद को समेट लिया। दिन में वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती और रात में विवान के पुराने खतों और उसके वादों के सहारे अपनी नींद को बुलाती। वह उस टिमटिमाते दीये की तरह थी जो किसी भी पल बुझ सकता था, लेकिन इस उम्मीद में जल रहा था कि एक दिन हवा का झोंका खुशबू लेकर आएगा।

और वह दिन कल ही तो आया था। बारह सालों के उस लंबे और थका देने वाले इंतज़ार के बाद कल सुबह जब फोन की घंटी बजी, तो स्क्रीन पर विवान का नंबर देखकर काव्या की धड़कनें रुक सी गई थीं। विवान की आवाज़ में एक अजीब सी खुशी और सुकून था। उसने कहा था, “काव्या, मेरा इंतज़ार खत्म हुआ। मैंने वहां सब कुछ समेट लिया है। अब मैं हमेशा के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूं। मेरी फ्लाइट कल सुबह लैंड करेगी और वहां से मैं सीधा टैक्सी लेकर तुम्हारे पास पहुंचूंगा। इस बार कोई बहाना नहीं, कोई दूरी नहीं। अब हम एक होंगे।”

यह सुनकर काव्या के आंसू छलक पड़े थे। यह खुशी के आंसू थे। बारह सालों की तपस्या पूरी होने वाली थी। कल रात भर वह सोई नहीं। उसने पूरा घर साफ किया, विवान की पसंद का गाजर का हलवा बनाया और अपनी उस लाल साड़ी को निकालकर इस्त्री किया जो विवान को बहुत पसंद थी। सुबह से ही आसमान में काले बादल छाए हुए थे, लेकिन काव्या के लिए यह सावन खुशियों की बारात लेकर आया था। वह बार-बार दरवाजे तक जाती और बारिश में भीगती हुई सड़क को देखती।

दोपहर के तीन बज चुके थे। बारिश ने अब एक भयंकर तूफान का रूप ले लिया था। तभी काव्या के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर एक अनजान नंबर फ्लैश हो रहा था। काव्या ने धड़कते दिल से फोन उठाया।

“हैलो… क्या मेरी बात काव्या जी से हो रही है?” दूसरी तरफ से एक भारी और अजनबी सी आवाज़ आई।

“जी, मैं काव्या बोल रही हूं। आप कौन?” काव्या ने घबराहट से पूछा।

“मैं सिटी अस्पताल से डॉक्टर माथुर बोल रहा हूं। मैडम, बहुत भारी मन से आपको एक सूचना देनी पड़ रही है। हाइवे पर भारी बारिश और लैंडस्लाइड के कारण एक टैक्सी खाई में गिर गई है। उस टैक्सी में जो यात्री थे… वो अब इस दुनिया में नहीं रहे।”

काव्या के कानों में भनभनाहट सी होने लगी। उसका गला सूख गया। “आप… आप मुझे यह क्यों बता रहे हैं?”

डॉक्टर की आवाज़ में एक गहरी सहानुभूति थी, “हमें उनके सामान से एक डायरी मिली है, जिसके पहले पन्ने पर सिर्फ आपका नाम और नंबर लिखा है। और… और उनके फोन के कॉल लॉग में आखिरी डायल किया गया नंबर भी आप ही का है। क्या आप विवान जी को जानती हैं? पुलिस उनकी बॉडी को मोर्चरी में शिफ्ट कर रही है। उनका सामान थाने में है, आप आकर ले सकती हैं।”

फोन काव्या के हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। उसकी बैटरी पहले से ही कम थी और वह झटके से बंद हो गया। लेकिन काव्या के अंदर का सब कुछ पहले ही बंद हो चुका था।

वह शख्स, जिसके लिए उसने अपनी पूरी ज़िंदगी दांव पर लगा दी, जो बारह सालों बाद उसकी मांग भरने आ रहा था, वह अब सिर्फ एक सामान बनकर किसी पुलिस थाने में पड़ा था। जिस मिलन के लिए उसने माता-पिता की मौत का दुख अकेले सहा, लोगों के ताने सुने, वह मिलन एक सड़क दुर्घटना की भेंट चढ़ गया था। बाहर बादलों का गर्जना जारी था, लेकिन काव्या के अंदर एक ऐसा सन्नाटा पसर गया था जिसे शायद अब मौत भी नहीं तोड़ सकती थी। वह घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गई और आसमान की तरफ देखकर बस इतना ही कह पाई, “यह कैसा इंसाफ है… जब मिलाना ही नहीं था, तो इतना लंबा इंतज़ार क्यों करवाया?”

आंगन में भरता बारिश का पानी अब कमरे की दहलीज पार कर अंदर आ रहा था, ठीक वैसे ही जैसे विवान के जाने का यह कभी न खत्म होने वाला दुख काव्या के पूरे वजूद को अपने अंदर डुबोता जा रहा था।

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