अमावस  का सच – एम. पी. सिंह

बाबूलाल कें खेत की मुंडेर पर एक बरगद का पेड़ था ओर उसकें पास एक झोपडी मैं एक ब्रम्चारी साघु बाबा रहता था. आसपास कें सब गाँव मैं मशहूर था कि पेड़ पर भूत रहता हैं. बाबा सुबह शाम पेड़ कें नीचे पूजा पाठ करता जिससे गावं कें लोग भूत कें प्रकोप से बचें रहते. बदले मैं गावं वाले बाबा को खाना और कुछ पैसे दें देते थे.

ये सिलसिला कई बरसों से चल रहा था. लेकिन अमावस की रात को पेड़ से अजीब अजीब सी आवाजे रुक रुक कर आती और पेड़ की डालिओ से रौशनी भी निकलती.

अमावस की रात को बाबा भी ड़र के कारण गावं से चला जाता था और अगली सुबह वापस आ जाता था. कहते हैं की अमावस की काली रात मैं भूत प्रेत को असीम शक्तियाँ मिल जाती हैं.

गावं के स्कुल मैं शहर से नया हेड मास्टर आया. उसने भी भूत प्रेत की कहानी सुनी और एक अमावस को आवाजे भी सुनी और प्रकाश भी देखा. 

शहरी मास्टर होने की वजय से वो इन बातों मैं विश्वास नहीं करता था. एक दिन मास्टर ने गावं कें मुखिया को बताया की अगली अमावस को मैं बाबा की कुटिया मैं रहुगा और सच्चाई का पता लगाऊगा. लेकिन गावं वालों ने ऐसा करने से मना कर दिया. 

इसलिए एक अमावस को मास्टर ने बाबा का पीछा किया और देखा की बाबा जंगल के पास एक घर कें पास जाकर रुका, दरवाजा खुला और घर से एक ओरत और एक बच्चा बाहर निकला.

बच्चा बाबा, बाबा कहता हुआ गोदी मैं चढ़ गया और सब अंदर चलें गये. मास्टर को समझते देर नहीं लगी की यें उसकी पत्नि और बेटा हैं.

थोड़ी देर बाद मास्टर ने दरवाजा खटकाया तो बाबा ने दरवाजा खोला और मास्टर को सामने देखकर घबरा गया. मास्टर ने पूछा, यें सब क्या हैं ब्रम्चारी बाबा? भूत प्रेत और डरावनी आवाजो का सच्च क्या हैं. बताओ? बाबा हाथ जोड़कर खड़ा हों गया और बोला, पेट भरने और परिवार पालने के लिए यें सब करता हूँ. 

महीने मैं एक बार परिवार कें पास आता हूँ और  महीने भर की कमाई दें जाता हूँ. मैं पेड़ की डाल पर एक मोबाइल बांध कें आ जाता हूँ. भूतों की आवाजे वाली रिंग टोन लगा रखी हैं.

मैं खुद हीं बार बार काल करता हूँ और लोगों को लगता हैं की भूत बोल रहा हैं और फ़्लैश लाइट भी जलती बन्द होती हैं. मैं हर बार मोबाइल को अलग अलग डाल पर बांध कर आता था जिससे किसी को शक ना हों. 

बाबा फिर बोला, मुझे माफ कर दो, मैं गावं छोड़कर चला जसुगा. मास्टर बोला, तुम गावं छोड़कर नहीं जाओगे बल्कि अमावस पर भी वहीं रहोगे, गावं वालों कें दिमाग से भूत प्रेत का ड़र निकलना हैं जिससे सब लोग बिना भय और ड़र कें रात मैं भी कहीं आ जा सके.

उस दिन कें बाद से अमावस की रात को बरगद कें पेड़ से भूत प्रेत की आवाजे आना बन्द हों गई और ड़र का माहौल खत्म हों गया. गाँव वालों को बाबा कि चालाकी का पता नहीं लगा और बाबा ने भी बुराई से तौबा करली.

एम. पी. सिंह ‘मोहि’

स्वरचित 

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