समाज का डर – नेहा पटेल

रघुनाथ जी के कदम आज इतने भारी लग रहे थे जैसे उनके पैरों में मन भर का सीसा बांध दिया गया हो। साठ साल की उम्र में उन्होंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे थे। एक सरकारी स्कूल के रिटायर्ड हेडमास्टर होने के नाते पूरे मोहल्ले में उनकी एक अलग प्रतिष्ठा थी। लोग उनके आगे सिर झुकाकर निकलते थे।

लेकिन आज, उसी शहर की एक पॉश कॉलोनी की सड़क पर चलते हुए रघुनाथ जी को लग रहा था जैसे कोई उनके अस्तित्व को कुचल कर चला गया हो। आसमान पर काले बादल घिरे थे, लेकिन असली तूफान उनके सीने के भीतर उठ रहा था। उनकी आँखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी सूखी और पथराई हुई पीड़ा थी जो आंसुओं से कहीं ज्यादा गहरी होती है।

बात उनकी इकलौती और लाडली बेटी काव्या की थी। काव्या ने कॉलेज में साथ पढ़ने वाले समीर से प्रेम किया था। समीर ने उसे शादी के सुनहरे सपने दिखाए थे और जीवन भर साथ निभाने की कसमें खाई थीं। काव्या ने भी अंधे विश्वास में अपनी दुनिया समीर के इर्द-गिर्द बुन ली थी।

लेकिन जब बात दोनों परिवारों के सामने आई और शादी की चर्चा उठी, तो समीर अपने माता-पिता के दबाव में पीछे हट गया।

उसने काव्या का फोन उठाना बंद कर दिया और रातों-रात उससे सारे रिश्ते तोड़ लिए। काव्या इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने रो-रोकर अपने पिता को पूरी बात बताई। एक पिता, जो अपनी बेटी की आँखों में एक आंसू नहीं देख सकता था, उसने अपना सारा गुरूर और समाज का डर किनारे रख दिया।

काव्या की उजड़ती जिंदगी और उसके आंसुओं को देखकर रघुनाथ जी ने फैसला किया कि वह खुद समीर के घर जाएंगे और उसके माता-पिता से बात करेंगे। उन्हें लगा कि शायद बड़े-बुजुर्ग होने के नाते वे लोग बच्चों की भावनाओं को समझेंगे। इसी आस में वे आज समीर के घर गए थे।

लेकिन वहां जो कुछ हुआ, उसने रघुनाथ जी की आत्मा को छलनी कर दिया। समीर के आलीशान घर के ड्राइंग रूम में सोफे पर सिकुड़ कर बैठे रघुनाथ जी ने जब हाथ जोड़कर काव्या और समीर के रिश्ते की बात छेड़ी, तो समीर के पिता ने उन्हें बीच में ही टोक दिया। उनका लहजा इतना तीखा और अपमानजनक था कि रघुनाथ जी सिहर उठे।

“मास्टर जी, अपनी उम्र और अपनी हैसियत का तो कुछ लिहाज किया होता,” समीर के पिता ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा। “हमारा बेटा तो विदेश जाने वाला है। आप अपनी लड़की का पल्लू हमारे बेटे के गले बांधकर हमारी दौलत में हिस्सा चाहते हैं? ये सब चालबाजियां हम अच्छे से समझते हैं।”

रघुनाथ जी ने कांपती आवाज में कहा था, “भाई साहब, बात दौलत की नहीं है। आपके बेटे ने मेरी काव्या से वादे किए थे। मेरी बच्ची की जिंदगी दांव पर लगी है। मैं तो बस…”

इससे पहले कि वह अपनी बात पूरी कर पाते, समीर की माँ बीच में बोल पड़ीं। उनके शब्द किसी तेजाब की तरह रघुनाथ जी के कानों में पड़े। “कैसी जिंदगी और कैसे वादे?

आप अपनी लड़की को तो संभाल नहीं पाए और इल्जाम हमारे बेटे पर लगा रहे हैं? जो लड़की अपने घर की मर्यादा भूलकर लड़कों को फांसने का काम करती है, उसे हम अपने घर की बहू बनाएंगे? संस्कार तो दिए नहीं आपने अपनी बेटी को। खुली छूट देकर बिगाड़ दिया है। सीधे-सीधे कहूं तो ऐसी चरित्रहीन लड़की के लिए हमारे घर में कोई जगह नहीं है!”

‘चरित्रहीन’… यह एक शब्द रघुनाथ जी के कानों में बम की तरह फटा था। जिस बेटी को उन्होंने फूल की तरह पाला था, जिसके चरित्र की कसमें वे खा सकते थे, आज सरेआम उसे चरित्रहीन कहा जा रहा था और वे कुछ नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने एक बार समीर की तरफ देखा जो वहीं चुपचाप खड़ा था, उसने अपनी नज़रें चुरा लीं। रघुनाथ जी समझ गए कि वहां रुकना अब अपने बचे-खुचे स्वाभिमान की हत्या करने के बराबर है। वे बिना कुछ कहे वहां से उठ खड़े हुए। उनका सिर जो हमेशा गर्व से तना रहता था, आज शर्म और बेइज्जती के बोझ से झुक गया था।

वे इसी अपमान का कड़वा घूंट पीते हुए घर वापस आ रहे थे। घर का दरवाजा खोलकर जब वे अंदर दाखिल हुए, तो उनकी पत्नी सुलोचना और बेटी काव्या उम्मीद भरी नजरों से उन्हें देखने लगीं। काव्या की आँखें लाल थीं, वह शायद पिता के आने का ही इंतजार कर रही थी।

“क्या हुआ जी? क्या कहा उन्होंने?” सुलोचना ने पानी का गिलास आगे बढ़ाते हुए पूछा।

रघुनाथ जी ने गिलास हाथ से झटक दिया। पानी फर्श पर बिखर गया और कांच के टुकड़े-टुकड़े हो गए। घर में एक खौफनाक सन्नाटा छा गया। रघुनाथ जी की आँखें लाल सुर्ख थीं। उन्होंने काव्या की तरफ देखा। उस नजर में न तो पिता का प्यार था और न ही कोई सहानुभूति। उसमें सिर्फ एक हारे हुए इंसान का गुस्सा और अपमान की आग थी।

“आज के बाद…” रघुनाथ जी की आवाज में एक ऐसा कंपन और कठोरता थी जो सुलोचना ने अपनी पूरी जिंदगी में नहीं सुनी थी। “आज के बाद इस घर में काव्या का नाम कोई नहीं लेगा।”

काव्या धक्क से रह गई। “पापा…” वह रुंधे गले से आगे बढ़ी।

“रुक जा वहीं!” रघुनाथ जी चीख पड़े। “मुझे पापा कहने का हक तू उसी दिन खो चुकी थी जिस दिन तूने उस घर की तरफ कदम बढ़ाया था। मैंने आज तेरे लिए अपनी पगड़ी उन लोगों के पैरों में रख दी, और बदले में उन्होंने मुझे क्या दिया? उन्होंने मेरे मुंह पर थूक दिया! मेरी बेटी को चरित्रहीन कहा और मुझे एक नाकाम बाप बताया जो अपनी औलाद को संभाल नहीं सका।”

रघुनाथ जी हांफ रहे थे। उनके आंसू अब बह निकले थे। “तूने सिर्फ अपना दिल नहीं तोड़ा काव्या, तूने मेरा मान, मेरी इज्जत, मेरा सब कुछ चकनाचूर कर दिया। अब मेरे लिए तू मर चुकी है। इस घर के दरवाजे तेरे लिए आज से बंद हैं। अगर कोई भी तेरा नाम लेगा, तो उसे मेरी लाश से गुजरना होगा।”

काव्या वहीं फर्श पर गिर पड़ी। सुलोचना रोते हुए अपने पति के पैरों में गिर गई, लेकिन रघुनाथ जी मुड़कर अपने कमरे में चले गए और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उस खामोश चौखट के पीछे एक पिता रो रहा था, जो अपनी बेटी से प्यार तो बहुत करता था, लेकिन समाज के दिए गए अपमान के जहर ने उस प्यार का गला घोंट दिया था। एक ही झटके में काव्या ने अपना प्यार और अपना परिवार, दोनों खो दिए थे।

क्या रघुनाथ जी का अपनी बेटी से मुँह मोड़ लेना सही था, या समाज के कठोर तानों ने एक लाचार पिता को ऐसा क्रूर कदम उठाने पर मजबूर कर दिया? जब गलती दो लोगों की थी, तो सजा सिर्फ एक पिता और बेटी को क्यों मिली? आपकी क्या राय है? कमेंट करके जरूर बताएं।

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लेखिका : नेहा पटेल

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