कर्ज – निधि गुप्ता

देव वहीं आंगन की मिट्टी में माथा टेके फूट-फूट कर रो रहा था। आज उसके पास गाड़ी थी, बड़ा पद था, दौलत थी, लेकिन वो सब कुछ उस बीस हज़ार रुपये के कर्ज के सामने बहुत छोटा और बेमानी लग रहा था। सफलता का जश्न उस दिन मातम में बदल चुका था।

सूरज ढलने को था और चंदनपुर गाँव की पगडंडियों पर उड़ती धूल के बीच एक चमचमाती सफेद कार आकर रुकी। कार का दरवाज़ा खुला और उसमें से पच्चीस-छब्बीस साल का एक नौजवान बाहर निकला। यह देव था। वही देव, जो कभी इसी गाँव की गलियों में फटे कपड़ों और नंगे पैर घूमा करता था।

आज वह शहर का एक बड़ा इंजीनियर बन चुका था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और दिल में बेकरारी थी। वह अपने सबसे अच्छे दोस्त, अपने भाई से बढ़कर अजीज ‘माधव’ से मिलने आया था।

माधव और देव की दोस्ती गाँव भर में मशहूर थी। देव पढ़ने में बहुत होशियार था, लेकिन उसके पिता एक गरीब मजदूर थे। वहीं माधव का परिवार थोड़ा संपन्न था।

माधव का मन पढ़ाई में कम और खेतों-खलिहानों में ज्यादा लगता था। देव ने मन ही मन तय किया था कि जब तक वह कुछ बड़ा नहीं बन जाता, वह माधव को अपनी शक्ल नहीं दिखाएगा। वह उसे एक शानदार सरप्राइज देना चाहता था। आज देव के हाथ में उसकी पहली बड़ी कमाई और कुछ मिठाइयों के डिब्बे थे।

वह तेज कदमों से माधव के पुश्तैनी घर के आंगन में पहुंचा। लेकिन आंगन में कदम रखते ही देव के पैर ठिठक गए। घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था।

दीवारें उदास लग रही थीं और तुलसी का चौबना भी सूखा हुआ था। तभी उसकी नज़र बरामदे में बैठी एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी। सफेद सूती साड़ी, बिखरे बाल और पथराई हुई आँखें। देव का दिल धक से रह गया। वह माधव की माँ, सुमित्रा काकी थीं।

“काकी…” देव ने कांपती आवाज़ में पुकारा और उनके चरणों में झुक गया।

सुमित्रा ने धीरे से अपनी शून्य आँखें उठाईं और देव को देखा। उनकी आँखों में कोई हलचल नहीं हुई। कुछ पलों बाद उन्होंने धीमी और सूखी आवाज़ में कहा, “देव? तू आ गया बेटा? बहुत बड़ा आदमी बन गया तू तो।”

देव ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, “हाँ काकी, आपका देव आज इंजीनियर बन गया है। देखिए, मैं आपके लिए क्या लाया हूँ। लेकिन… माधव कहाँ है? उसे बुलाइए। उसने मुझसे वादा किया था कि वो मुझे शहर के स्टेशन पर छोड़ने आएगा, लेकिन आया नहीं। मैंने भी जिद पकड़ ली थी कि जब तक अफसर नहीं बनूंगा, उसे फोन नहीं करूंगा। आज मैं उसकी सारी शिकायतें दूर कर दूंगा। कहाँ है वो?”

सुमित्रा की पथराई आँखों से अचानक आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपाकर फफक-फफक कर रोने लगीं। उनका रोना इतना हृदयविदारक था कि देव के हाथों से मिठाई का डिब्बा छूटकर जमीन पर गिर पड़ा।

“क्या हुआ काकी? आप रो क्यों रही हैं? माधव ठीक तो है ना?” देव ने घबराते हुए पूछा।

सुमित्रा ने अपने कांपते हाथों से देव का सिर पकड़ा और रुंधे गले से बोलीं, “अब किसे ढूंढ़ रहा है बेटा? तेरा माधव तो चला गया। आठ महीने हो गए। उसे तेज़ बुखार और पीलिया हुआ था। शहर के अस्पताल तक ले गए, पर वो हमें छोड़कर हमेशा के लिए चला गया।”

देव को लगा जैसे किसी ने उसके पैरों तले से जमीन खींच ली हो। उसके कानों में सुन्न सी आवाज़ गूंजने लगी। माधव नहीं रहा? वह माधव जिसके बिना उसका बचपन अधूरा था? देव वहीं जमीन पर धड़ाम से बैठ गया। उसकी आँखों से आंसू बहने लगे और उसका सीना किसी भारी बोझ से फटने लगा।

“ओहह… इतना कुछ हो गया और मुझे खबर तक नहीं लगी…” देव जोर-जोर से रोने लगा। “मैं तो सोच रहा था कि जब मेरी नौकरी लगेगी, तो सबसे पहले उसे यह खुशखबरी देने आऊंगा। मैं उसे अपनी गाड़ी में बिठाकर घुमाऊंगा। पर… मैंने बहुत देर कर दी काकी।”

देव को रोते देख सुमित्रा ने अपने आंसू पोंछे और देव के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “रो मत बेटा। उसकी किस्मत में इतना ही लिखा था। वो वैसे भी किसी काम का नहीं था। तुझे याद है ना, जब तू शहर जा रहा था, उसी दिन उसके बापू ने उसे अपना काम शुरू करने के लिए बीस हज़ार रुपये दिए थे। और उस नालायक ने स्टेशन पर वो पैसे चोरी करवा दिए। सारी जिंदगी उसके बापू ने उसे उस चोरी के लिए कोसा। मरते दम तक वो निकम्मा ही रहा।”

सुमित्रा की यह बात सुनते ही देव की आँखों में एक ऐसा दर्द उभरा, जिसे वह पिछले पाँच सालों से अपने सीने में दबाए हुए था। वह अचानक घुटनों के बल सुमित्रा के सामने बैठ गया और अपने बैग से एक मोटा लिफाफा निकालकर सुमित्रा के कांपते हाथों में रख दिया।

“काकी… वो बहुत भला था…” देव सिसकते हुए बोला। “उस दिन स्टेशन पर वो बीस हज़ार रुपये चोरी नहीं हुए थे काकी। वो माधव ही था जिसने वो पैसे अपनी मर्जी से मुझे दिए थे।”

सुमित्रा चौंक गईं। “तू… तू क्या कह रहा है देव?”

देव ने आंसुओं से भीगे चेहरे के साथ सच उगलना शुरू किया। “हाँ काकी। उस दिन जब मुझे शहर जाकर अपनी आगे की पढ़ाई करनी थी, मेरे बापू के पास एक फूटी कौड़ी नहीं थी। मैं स्टेशन के बाहर बैठा रो रहा था कि मेरा भविष्य अब यहीं खत्म हो जाएगा। तभी माधव वहाँ मुझे ढूंढ़ता हुआ आया। मैंने उससे कहा कि मुझे भी शहर जाकर पढ़ाई करनी है, पर बापू के पास पैसे नहीं हैं।”

देव एक पल के लिए रुका, जैसे माधव का मुस्कुराता हुआ चेहरा उसकी आँखों के सामने आ गया हो।

“उसने मुझे रोते हुए देखा, तो हँसने लगा। उसने हँसते-हँसते अपनी जेब से वो बीस हज़ार रुपये निकाले और मेरे हाथ में थमा दिए। उसने कहा— ‘लगता है ये तेरे काम के हैं। तू पढ़ाई में होशियार है, जा शहर जा और कुछ बड़ा अफसर बन। मैं तो वहाँ जाकर भी ये पैसे किसी फालतू काम में डूबा दूँगा। बापू से कह दूँगा कि भीड़ में पैसे चोरी हो गए। तू बस मन लगाकर पढ़ना।’ काकी… उसने मेरा भविष्य बनाने के लिए अपने ऊपर जिंदगी भर का कलंक ले लिया। आपके और काका के ताने सहे, लोगों की गालियाँ सुनीं, पर कभी अपना मुंह नहीं खोला कि उसने वो पैसे कहाँ दिए।”

सुमित्रा यह सुनकर सन्न रह गईं। जिस बेटे को उन्होंने सारी जिंदगी गैर-जिम्मेदार और आवारा समझा, वह दरअसल एक ऐसा देवता था जिसने अपने दोस्त की जिंदगी संवारने के लिए अपना मान-सम्मान सब कुछ दांव पर लगा दिया था।

“ये लो काकी,” देव ने लिफाफे को सुमित्रा की हथेलियों में दबाते हुए कहा, “मैं तो बस उसके वो ही पैसे लौटाने आया था। मैं उसे ये बताने आया था कि उसके उस पैसे ने इस गरीब के बेटे को इंजीनियर बना दिया। पर क्या पता था कि मैं अपनी कामयाबी के घमंड में उसकी खोज-खबर लेने में इतनी देर कर दूँगा कि वो मुझे कभी मिलेगा ही नहीं।”

सुमित्रा लिफाफे को अपने सीने से लगाकर इस तरह दहाड़ें मार कर रोने लगीं, जैसे आज उन्हें अपने बेटे की मौत का असली दुख हुआ हो। उन्हें दुख इस बात का नहीं था कि वो चला गया, बल्कि इस बात का था कि वो एक ‘हीरा’ था, जिसे पूरा घर जिंदगी भर ‘पत्थर’ समझता रहा।

देव वहीं आंगन की मिट्टी में माथा टेके फूट-फूट कर रो रहा था। आज उसके पास गाड़ी थी, बड़ा पद था, दौलत थी, लेकिन वो सब कुछ उस बीस हज़ार रुपये के कर्ज के सामने बहुत छोटा और बेमानी लग रहा था। सफलता का जश्न उस दिन मातम में बदल चुका था। देव को समझ आ गया था कि जिंदगी में सफलता हासिल करना तो आसान है, लेकिन उन रिश्तों को सहेज कर रखना बहुत मुश्किल है, जो बिना किसी स्वार्थ के आपके लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देते हैं।

क्या आपको भी लगता है कि जिंदगी की दौड़ में हम उन लोगों को पीछे छोड़ देते हैं, जो हमारी जीत के असली हकदार होते हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।

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लेखिका : निधि गुप्ता 

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