अनपढ़ माँ – रमा शुक्ला

सुधीर बाबू की आंखों से एक आंसू छलक कर उनके गाल पर आ गया, “तेरी उस अनपढ़ और गँवार मां ने मेरे पढ़े-लिखे फैसले को फाड़ कर डस्टबिन में फेंक दिया। वह मुझसे और डॉक्टरों से लड़ पड़ी। उसने कहा, ‘मैं लंदन नहीं जानती, मैं करियर नहीं जानती, मैं बस इतना जानती हूं

कि मेरे भीतर एक जान पल रही है और मैं उसे किसी भी कीमत पर मरने नहीं दूंगी। मेरी जान जाती है तो जाए।’ वह अनपढ़ थी ना बेटा! उसे कहां पता था कि करियर क्या होता है, उसे कहां पता था कि प्रैक्टिकल होकर सोचना किसे कहते हैं। उ

शाम का वक्त था और घर के आंगन में एक अजीब सी खुशी फैली हुई थी। पच्चीस साल के आकाश के हाथ में एक शानदार मल्टीनेशनल कंपनी का जॉइनिंग लेटर था।

महीनों की मेहनत, कई राउंड के इंटरव्यू और दिन-रात की पढ़ाई के बाद आखिरकार उसे वह मुकाम मिल गया था, जिसका सपना उसने और उसके पिता ने देखा था। पच्चीस लाख रुपये का सालाना पैकेज! एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह किसी लॉटरी के लगने से कम नहीं था।

आकाश के पिता, सुधीर बाबू, जो एक सरकारी दफ्तर में मामूली क्लर्क थे, अपनी पुरानी ऐनक के शीशे के पीछे से उस लेटर को ऐसे निहार रहे थे जैसे उन्होंने साक्षात भगवान के दर्शन कर लिए हों। उनकी आंखों में खुशी के आंसू तैर रहे थे।

उन्होंने आकाश की पीठ थपथपाई और गदगद आवाज में कहा, “शाबाश मेरे शेर! आज तूने मेरी जिंदगी भर की मेहनत को सफल कर दिया। मेरी सारी थकान आज इस एक कागज ने मिटा दी है।”

पिता की खुशी देखकर आकाश का सीना भी चौड़ा हो गया। सफलता का एक अपना ही नशा होता है, जो अक्सर इंसान की आंखों पर एक हल्का सा पर्दा डाल देता है।

सुधीर बाबू ने तुरंत रसोई की तरफ मुंह करके जोर से आवाज लगाई, “अरे सुशीला! सुन रही हो? गैस बंद करो और जल्दी बाहर आओ। हमारे बेटे ने कमाल कर दिया है। इसे बहुत बड़ी नौकरी मिल गई है। आज तो घर में गाजर का हलवा बनना चाहिए।”

रसोई से मसालों की खुशबू के साथ-साथ सुशीला की चूड़ियों की खनक भी बाहर आई। वह अपनी साड़ी के पल्लू से हल्दी और आटे से सने हाथ पोंछती हुई लगभग दौड़ती हुई बाहर आई। उसके सांवले चेहरे पर एक ऐसी चमक थी, जो दुनिया के किसी भी महंगे सौंदर्य प्रसाधन से नहीं आ सकती थी। यह एक माँ के चेहरे की चमक थी।

“सच में? मेरे लाल को इतनी बड़ी नौकरी मिल गई?” सुशीला की खुशी का ठिकाना नहीं था। वह आकाश के पास आई और उत्साह से अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए बोली, “ला बेटा, मुझे भी दिखा तेरा वह कागज! देखूं तो सही मेरी आंखों के तारे ने कौन सा बड़ा तीर मारा है।”

आकाश, जो अभी-अभी सफलता के आसमान में उड़ रहा था, अचानक यथार्थ के एक बहुत ही भद्दे और रूखे धरातल पर उतर आया। उसने लेटर अपनी मां के हाथ में देने के बजाय उसे हल्का सा पीछे खींच लिया और एक अजीब सी उपहास भरी हंसी के साथ बोला, “अरे मां! तुम इस कागज को देखकर क्या करोगी?

यह पूरा का पूरा अंग्रेजी में लिखा हुआ है। इसमें कंपनी के टेक्निकल टर्म्स हैं, नियम और शर्तें हैं। तुम्हें तो ठीक से बैंक की जमा पर्ची भी भरनी नहीं आती, तुम इस जॉइनिंग लेटर में क्या पढ़ लोगोगी? रहने दो, तुम बस जाकर मेरे लिए गाजर का हलवा बनाओ।”

कमरे में छाई हुई खुशी की वह खुशनुमा हवा अचानक एक भारी सन्नाटे में बदल गई। सुशीला का आगे बढ़ा हुआ हाथ हवा में ही रुक गया। उसके चेहरे की वो दमकती हुई मुस्कान पल भर में मुरझा गई। बेटे के मुंह से निकले वे शब्द किसी पैने तीर की तरह सीधे उसके दिल में जा घुसे थे।

उसने एक बार अपने बेटे के चेहरे को देखा, फिर अपने मैले पल्लू को देखा। उसकी आंखों में पानी तैरने लगा, जिसे छिपाने के लिए उसने तुरंत अपना चेहरा घुमा लिया और रूंधे हुए गले से बोली, “हां बेटा… तू ठीक ही तो कह रहा है।

मैं तो अनपढ़ गँवार ठहरी, मुझे अंग्रेजी के ये काले अक्षर कहां समझ आएंगे। मैं हलवे की तैयारी करती हूं।” और वह भारी कदमों से वापस रसोई की तरफ लौट गई।

यह सब कुछ सुधीर बाबू अपनी जगह खड़े होकर देख रहे थे। उनका वह गर्व, जो कुछ पल पहले आसमान छू रहा था, अब मिट्टी में मिल चुका था। उन्हें अपने बेटे की उस ‘डिग्री’ से घिन आने लगी, जिसने उसे संस्कारहीन बना दिया था। उन्होंने आकाश के हाथ से वह जॉइनिंग लेटर लिया और उसे सोफे पर फेंक दिया।

आकाश कुछ समझ पाता, उससे पहले ही सुधीर बाबू ने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, “बिल्कुल सही कहा तूने आकाश। तेरी मां इस घर की सबसे अनपढ़ और गँवार औरत है। उसे दुनियादारी की कोई समझ नहीं है। उसमें बिल्कुल भी अक्ल नहीं है।”

आकाश थोड़ा झेंपा। उसे लगा पिता जी शायद मजाक कर रहे हैं। उसने सफाई देनी चाही, “पापा, मेरा वो मतलब नहीं था। मैं तो बस…”

“नहीं-नहीं, तेरा वही मतलब था और तू सौ प्रतिशत सही है,” सुधीर बाबू ने उसे बीच में ही टोकते हुए बहुत ही गंभीर और कठोर स्वर में कहा। “तेरी यह अनपढ़ मां सच में कुछ नहीं जानती। आज से छब्बीस साल पहले, जब हमारी नई-नई शादी हुई थी, तब मेरे ऑफिस की तरफ से मुझे दो साल के लिए लंदन जाने का एक बहुत बड़ा अवसर मिला था। वह मेरी जिंदगी और करियर का सबसे बड़ा चांस था। लेकिन उसी दौरान तेरी मां गर्भवती हो गई। डॉक्टर ने जब जांच की, तो पता चला कि तेरी मां के गर्भाशय में कुछ जटिलताएं हैं। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि अगर यह बच्चा पैदा हुआ, तो मां की जान को बहुत बड़ा खतरा है।”

सुधीर बाबू की आवाज भारी हो गई थी। उन्होंने आकाश की आंखों में सीधा देखते हुए अपनी बात जारी रखी।

“मैं एक पढ़ा-लिखा और समझदार इंसान था। मैंने तुरंत फैसला किया कि हम यह बच्चा गिरा देंगे। मैंने तेरी मां से कहा कि हम अभी युवा हैं, आगे और भी बच्चे हो जाएंगे। फिलहाल मेरा करियर ज्यादा जरूरी है और उससे भी ज्यादा तेरी जान जरूरी है। मैंने एबॉर्शन के कागजात पर साइन भी कर दिए थे।”

आकाश की धड़कनें तेज हो गई थीं। वह सांस रोके अपने पिता को सुन रहा था।

“लेकिन,” सुधीर बाबू की आंखों से एक आंसू छलक कर उनके गाल पर आ गया, “तेरी उस अनपढ़ और गँवार मां ने मेरे पढ़े-लिखे फैसले को फाड़ कर डस्टबिन में फेंक दिया। वह मुझसे और डॉक्टरों से लड़ पड़ी। उसने कहा, ‘मैं लंदन नहीं जानती, मैं करियर नहीं जानती, मैं बस इतना जानती हूं कि मेरे भीतर एक जान पल रही है और मैं उसे किसी भी कीमत पर मरने नहीं दूंगी। मेरी जान जाती है तो जाए।’ वह अनपढ़ थी ना बेटा! उसे कहां पता था कि करियर क्या होता है, उसे कहां पता था कि प्रैक्टिकल होकर सोचना किसे कहते हैं। उसने अपने खून से, अपनी हड्डियों को गला कर, मौत के मुंह में जाकर तुझे जन्म दिया। नौ महीने वह बिस्तर से नहीं उठी, ताकि तू सलामत इस दुनिया में आ सके।”

कमरे में अब सिर्फ सुधीर बाबू की भारी आवाज और रसोई से आती सुशीला की सिसकियों की आवाज गूंज रही थी।

“अगर उस दिन तेरी मां थोड़ी सी भी ‘पढ़ी-लिखी’ और ‘समझदार’ होती, तो आज तू इस दुनिया में नहीं होता, और ना ही तेरे हाथ में यह अंग्रेजी का पच्चीस लाख का लेटर होता। तेरी मां ने अपनी जिंदगी की किताब को कोरा रख दिया, ताकि तू अपनी सफलता की कहानी लिख सके। और आज… आज तू उसे उसकी अनपढ़ता का ताना दे रहा है?”

आकाश का सारा गुरूर, सारी सफलता का नशा और उसके अहंकार की वह ऊंची इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह चुकी थी। उसे अपने हाथों में पकड़ा वह कागज का टुकड़ा अपनी मां के पैरों की धूल से भी ज्यादा तुच्छ लगने लगा। उसके गालों पर आंसुओं की धारा बह निकली। वह बिना एक शब्द कहे रसोई की तरफ भागा।

सुशीला चूल्हे के सामने खड़ी आंसू पोंछ रही थी। आकाश सीधा जाकर अपनी मां के पैरों में गिर पड़ा। उसने अपनी मां के उन खुरदरे और अनपढ़ हाथों को पकड़कर चूम लिया और फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ कर दो मां। मैं सच में बहुत बड़ा जाहिल हूं। मेरी यह डिग्री, मेरी यह नौकरी सब बेकार है अगर मैं तुम्हारा सम्मान नहीं कर सकता। इस कागज की कोई अहमियत नहीं है मां, असली डिग्री तो तुम्हारा यह प्यार है।”

सुशीला ने ममता से अपने बेटे का माथा चूम लिया और उसे सीने से लगा लिया। एक मां का दिल ही तो है, जो सबसे बड़ा घाव सहकर भी सबसे जल्दी माफ कर देता है। सुधीर बाबू दरवाजे पर खड़े यह सब देख रहे थे। आज उन्हें लगा कि उनके बेटे ने सिर्फ एक नौकरी नहीं पाई है, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी और सच्ची शिक्षा भी हासिल कर ली है।

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लेखिका : रमा शुक्ला 

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