अपनों की कीमत – गरिमा चौधरी 

सुधा बोलते-बोलते अपने बच्चों के बारे में बताने लगी। “और आप जानती हैं दीदी? लोग कहते हैं कि बच्चों को बीमारों से दूर रखना चाहिए। लेकिन मेरे दोनों बच्चे, आरव और मिष्टी, स्कूल से आते ही सबसे पहले अपनी दादी के कमरे में जाते हैं। सुबह-शाम उनके पास बैठकर अपनी तोतली ज़बान में उन्हें स्कूल के किस्से सुनाते हैं।

अम्मा जी अब कुछ बोल नहीं पातीं, लेकिन उन बच्चों को अपने पास देखकर उनकी थकी और सूनी आँखों में जो जीवन की चमक लौट आती है, उसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता। 

जून की तपती दोपहर ढल चुकी थी और शाम की हल्की हवा ने उमस से थोड़ी राहत दी थी। मैंने सोचा कि इसी बहाने पड़ोस में रहने वाली सुधा से मिल आऊँ। उसकी सासू माँ, रुक्मिणी देवी, पिछले डेढ़ साल से लकवे के कारण बिस्तर पर हैं। सुधा ही उनका सारा कामकाज संभालती है। सोचा, इसी बहाने उसकी थोड़ी मदद कर दूँगी और उसका मन भी हल्का हो जाएगा।

मैं सुधा के घर पहुँची और ड्राइंग रूम में बैठ गई। वह मेरे लिए ठंडी लस्सी ले आई। हम अभी बात शुरू ही करने वाले थे कि तभी उसकी दोनों देवरानियाँ—रीमा और पल्लवी—वहाँ आ गईं। दोनों पास की ही सोसाइटी में रहती हैं।

“प्रणाम भाभी! अम्मा जी कैसी हैं अब?” रीमा ने सोफे पर बैठते हुए एक रस्मी सवाल पूछा।

सुधा ने नम्रता से जवाब दिया, “कल रात दर्द थोड़ा ज्यादा था, पर अब दवा दी है तो सो रही हैं।”

बस, अम्मा जी की खैरियत का सिलसिला वहीं खत्म हो गया। इसके बाद दोनों देवरानियों ने लस्सी के गिलास हाथ में लिए और अपनी-अपनी दुनिया की बातें शुरू कर दीं। बातों-बातों में ज़िक्र फिर से रुक्मिणी देवी के अतीत पर आ गया।

पल्लवी मुंह बनाते हुए बोली, “अम्मा जी की तबीयत खराब है, इसका दुख तो है। लेकिन भाभी, आपको याद है जब मैं नई-नई ब्याह कर आई थी, तो इन्होंने मुझे मायके जाने के लिए कितना तरसा दिया था? बात-बात पर टोकना, ‘सब्जी में नमक कम है’, ‘पराठे जले हुए हैं’।”

रीमा ने भी सुर में सुर मिलाया, “और नहीं तो क्या! मुझे तो नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। इनका अनुशासन तो मिलिट्री वालों से भी ज्यादा सख्त था। सच कहूँ तो आज जब इन्हें इस लाचार हालत में देखती हूँ, तो लगता है कि इंसान को कभी अपने रुतबे का घमंड नहीं करना चाहिए।”

लगभग पैंतालीस मिनट तक दोनों रुक्मिणी देवी की पुरानी बातों की शिकायतें करती रहीं। सुधा चुपचाप सुनती रही, उसने एक बार भी उनकी बातों में हामी नहीं भरी और न ही कोई विरोध किया।

अचानक पल्लवी ने अपनी महंगी घड़ी देखी और उठ खड़ी हुई, “अरे बाप रे! सात बज गए। घर जाकर खाना भी बनाना है, बच्चे ट्यूशन से आने वाले होंगे। भाभी, हम चलते हैं।”

रीमा भी उठ गई। दोनों ने अपने-अपने पर्स उठाए और बिना एक बार भी उस कमरे की तरफ झांके—जहाँ उनकी बीमार सास लेटी थीं—वहाँ से विदा ले लीं।

उनके जाने के बाद कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। मेरे अंदर एक बेचैनी सी उठने लगी थी। मुझसे रहा नहीं गया और मैंने सुधा के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछ ही लिया।

“सुधा, मुझे एक बात समझ नहीं आती। अम्मा जी के तीन बेटे हैं, लेकिन पिछले डेढ़ साल से वे सिर्फ तुम्हारे पास हैं। दिन-रात उनकी तीमारदारी, उनके कपड़े बदलना, दवा-गोली… यह सब तुम अकेले करती हो। क्या तुम्हारे मन में कभी यह नहीं आता कि ये दोनों भी तो बहुएं हैं? इन्हें भी तो अपनी ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए? माँ तो आखिर सबकी है न?”

मेरे इस सवाल पर सुधा कुछ पल खामोश रही। उसने गहरी साँस ली और उसके चेहरे पर एक ऐसी अलौकिक शांति छा गई, जिसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया।

वह एक हल्की सी मुस्कान के साथ बोली, “दीदी, लोग कहते हैं कि बीमार इंसान की सेवा करना बहुत बड़ा संघर्ष है। लेकिन मैं इसे संघर्ष नहीं मानती। रुक्मिणी देवी सिर्फ मेरी सास नहीं हैं, वे उस विशाल वटवृक्ष की जड़ हैं जिसकी छाँव में आज हम सब सुकून से बैठे हैं।”

सुधा मेरी तरफ मुड़ी और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। “दीदी, अम्मा जी तीस साल की उम्र में विधवा हो गई थीं। उस ज़माने में एक अकेली औरत के लिए चार बच्चों को पालना क्या होता है, इसका हम और आप सिर्फ अंदाज़ा लगा सकते हैं। इन्होंने लोगों के कपड़े सिले, पापड़-अचार बेचे, लेकिन अपने बच्चों की शिक्षा में कोई कमी नहीं आने दी। खुद कई रातें सिर्फ पानी पीकर सोईं, ताकि बच्चों को भरपेट खाना मिल सके।”

सुधा की आवाज़ में एक भारीपन आ गया था। “आज जिस पति पर मुझे इतना गर्व है, जो मुझे पलकों पर बिठा कर रखता है, वह संस्कार किसने दिए हैं? अम्मा जी ने। आज जिस आलीशान घर के सोफे पर हम बैठे हैं, उसकी नींव में अम्मा जी का पसीना और त्याग मिला हुआ है। पल्लवी और रीमा को उनका पुराना कड़क स्वभाव याद है, लेकिन वे यह भूल जाती हैं कि अगर वह उस वक्त कड़क नहीं होतीं, तो शायद उनके पति आज इतने बड़े मुकाम पर नहीं होते।”

उसने आगे कहा, “दीदी, सब अपनी-अपनी समझ और नज़रिए की बात है। अगर मैं यह सोचूँ कि मैं उन पर कोई अहसान कर रही हूँ, तो यह मेरा सबसे बड़ा अहंकार होगा। मैं तो बस उस कर्ज की एक छोटी सी किश्त चुका रही हूँ, जो उन्होंने अपना जीवन होम करके हम पर चढ़ाया है। मैं तो सोचती हूँ कि मेरे पास जितना भी वक्त है, मैं इन्हें अपनी पलकों पर बिठा कर रखूँ।”

सुधा बोलते-बोलते अपने बच्चों के बारे में बताने लगी। “और आप जानती हैं दीदी? लोग कहते हैं कि बच्चों को बीमारों से दूर रखना चाहिए। लेकिन मेरे दोनों बच्चे, आरव और मिष्टी, स्कूल से आते ही सबसे पहले अपनी दादी के कमरे में जाते हैं। सुबह-शाम उनके पास बैठकर अपनी तोतली ज़बान में उन्हें स्कूल के किस्से सुनाते हैं। अम्मा जी अब कुछ बोल नहीं पातीं, लेकिन उन बच्चों को अपने पास देखकर उनकी थकी और सूनी आँखों में जो जीवन की चमक लौट आती है, उसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता। अम्मा जी के कांपते हाथ जब मेरे बच्चों के सिर पर आशीर्वाद के लिए उठते हैं, तो उनकी आँखों से सुकून के आंसू बहने लगते हैं। उन आंसुओं में जो दुआएं होती हैं, वो दुनिया की किसी दौलत से नहीं खरीदी जा सकतीं।”

सुधा की बातें सुनकर मेरी आँखें भर आई थीं। मेरे अंदर का सारा खोखलापन और शिकायतें जैसे उन आंसुओं में बह गई थीं। आज सुधा ने मुझे जीवन का एक ऐसा फलसफा सिखा दिया था जो बड़ी-बड़ी किताबों में भी नहीं मिलता। उसने साबित कर दिया था कि रिश्ते सिर्फ खून से नहीं, बल्कि कृतज्ञता, समर्पण और निस्वार्थ प्रेम से सींचे जाते हैं। जो समाज अपने बुजुर्गों को बोझ समझने लगता है, वह यह भूल जाता है कि आज वह जिस इमारत की ऊंचाई पर इतरा रहा है, उसकी नींव उसी पुरानी और जर्जर हो चुकी ईंट ने संभाली हुई है।

क्या आपके विचार में भी सुधा की तरह बुजुर्गों की सेवा एक ‘बोझ’ नहीं बल्कि उनके त्याग का ‘सम्मान’ है? क्या आज की पीढ़ी इस कृतज्ञता को भूलती जा रही है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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लेखिका : गरिमा चौधरी 

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