वह अजनबी, जो मेरी माँ से बढ़कर थी – नीतीश मिश्रा

 “मेरी प्यारी सुधा ताई, आज समझ में आता है कि आपने मेरे लिए क्या किया था। मेरी जन्म देने वाली माँ ने मुझे इस दुनिया में लाया जरूर था, लेकिन इस दुनिया में जिंदा कैसे रहना है, यह आपने सिखाया।

जब मेरे अपनों ने ही मेरे लिए चक्रव्यूह रचा था, तब आप मेरे लिए कृष्ण बनकर आईं। आपने मुझे समाज के तानों का ज़हर पीना सिखाया और फिर उसी ज़हर को अपनी ताकत बनाना सिखाया। आपने मुझे अपनाया ही नहीं, बल्कि मुझे खुद से मिलाया।

रात के ग्यारह बज चुके थे। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और कमरे में पसरी शांति के बीच सिर्फ दीवार घड़ी के टिक-टिक की आवाज़ गूंज रही थी। काव्या अपनी पुरानी लकड़ी की अलमारी के सामने बैठी थी। उसके हाथों में एक पुरानी, भूरे रंग के लेदर कवर वाली डायरी थी,

जिसके पन्ने अब पीले पड़ने लगे थे। आज उसकी इकलौती बेटी रिया की विदाई हुई थी। विदाई के वक्त रिया ने रोते हुए काव्या के गले लगकर कहा था, “माँ, आप कितनी मजबूत हैं। आपने कैसे मुझे और भैया को अकेले पाल लिया? कैसे आपने दुनिया के हर ताने, हर धोखे का डटकर सामना किया? मुझे भी आपके जैसी हिम्मत चाहिए माँ।” बेटी के उन शब्दों ने काव्या के मन के

किसी बहुत गहरे, शांत समंदर में एक कंकड़ मार दिया था। काव्या मजबूत नहीं थी, वह तो कभी मोम से भी ज्यादा नर्म हुआ करती थी। उसे पत्थर की तरह मजबूत तो किसी और ने बनाया था। काव्या ने डायरी खोली और उस पन्ने को पलटा जहाँ एक सूखे हुए गुलाब के फूल के नीचे सिर्फ एक नाम लिखा था—’सुधा ताई’।

काव्या की आँखें भर आईं। यह कहानी आज की नहीं, बल्कि अट्ठाईस साल पुरानी है। अट्ठाईस साल पहले काव्या महज तेईस वर्ष की एक बेहद डरी हुई, सहमी सी और दुनियादारी से बिल्कुल अनजान लड़की थी। उसकी दुनिया उसके पति मयंक और एक साल के बेटे आरव तक ही सीमित थी। काव्या की अपनी माँ ने उसे बचपन से सिर्फ एक ही सीख दी थी

—”बेटी को हमेशा झुक कर रहना चाहिए। ससुराल वालों की हर बात मानना ही एक आदर्श बहू की निशानी है। अपना कोई हक नहीं मांगना चाहिए।” काव्या इसी सीख को अपने जीवन का मूलमंत्र मानकर जी रही थी। लेकिन एक मनहूस रात ने काव्या की पूरी दुनिया उजाड़ दी।

एक सड़क हादसे में मयंक की अचानक मृत्यु हो गई। काव्या का सुहाग, उसका आसरा, उसका प्यार सब कुछ एक झटके में छिन गया। वह सफेद साड़ी में लिपटी, अपने एक साल के बच्चे को सीने से लगाए, एक कोने में बुत बनकर बैठी रहती थी।

मयंक के जाने के बाद तेरहवीं के संस्कार अभी पूरे भी नहीं हुए थे कि घर के असली रंग सामने आने लगे। काव्या के जेठ और जेठानी, जो मयंक के जीते जी उस पर जान छिड़कने का नाटक करते थे, अचानक बदल गए। एक दिन जेठ जी कुछ कागज़ात लेकर काव्या के पास आए। उनके चेहरे पर बनावटी हमदर्दी थी और स्वर में शहद घुला हुआ था। “छोटी, मयंक तो चला गया, लेकिन हम हैं न। तू अभी बहुत सदमे में है। मयंक के कुछ इंश्योरेंस के पैसे और इस घर का हिस्सा है। तू बस इन पेपर्स पर साइन कर दे, मैं बैंक और कोर्ट के सारे झमेले खुद संभाल लूंगा। तुझे कहीं धक्के खाने की जरूरत नहीं है। तेरा और आरव का सारा खर्च अब से मैं उठाऊंगा।” काव्या की आँखों में आँसू थे, उसे दुनिया के छल-कपट का कोई अंदाज़ा नहीं था। उसे लगा कि उसके जेठ सच में पिता समान हैं। उसने बिना कुछ सोचे-समझे, बिना कागज़ पढ़े, पेन उठा लिया। उसकी अपनी माँ भी वहीं खड़ी थीं, जिन्होंने दबी आवाज़ में कहा, “साइन कर दे बेटी, अब घर के बड़े ही तो तेरा सहारा हैं।”

काव्या जैसे ही कागज़ पर अपना हस्ताक्षर करने वाली थी, अचानक किसी ने झटके से उसके हाथ से पेन छीन लिया। काव्या ने घबराकर ऊपर देखा। सामने सुधा ताई खड़ी थीं। सुधा ताई काव्या की कोई सगी रिश्तेदार नहीं थीं। वे मयंक की दूर की एक मुंहबोली बुआ थीं, जो पास के ही मोहल्ले में अकेली रहती थीं। वे एक रिटायर्ड हेडमिस्ट्रेस थीं और पूरे खानदान में अपनी बेबाक और कड़क आवाज़ के लिए जानी जाती थीं। परिवार के लोग उन्हें मुँहफट और झगड़ालू कहकर उनसे दूर ही रहते थे।

“क्या कर रही है बेवकूफ लड़की?” सुधा ताई की आवाज़ पूरे कमरे में गूंज गई। “तेरा सुहाग उजड़ा है, दिमाग तो नहीं? ये पावर ऑफ अटॉर्नी है। एक बार इस पर साइन कर दिया, तो ये लोग तुझे और तेरे बच्चे को इस घर से धक्के मारकर निकाल देंगे। एक फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी तुझे।”

जेठ जी का चेहरा गुस्से और घबराहट से लाल हो गया। “ताई, आप हमारे घर के मामले में दखल मत दीजिए। हम काव्या का भला चाहते हैं।”

सुधा ताई ने कागज़ फाड़कर हवा में उछाल दिए और जेठ की आँखों में आँखें डालकर बोलीं, “शर्म आनी चाहिए तुम्हें! भाई की चिता की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई और तुम इस बेसहारा बच्ची को लूटने आ गए। खबरदार जो आज के बाद किसी भी कागज़ पर इससे साइन करवाने की कोशिश की।” फिर उन्होंने काव्या की माँ की तरफ मुड़कर कहा, “और तुम? कैसी माँ हो तुम? अपनी बेटी को बलि का बकरा बनते देख रही हो? ये रोना-धोना बंद करो और इसे अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाओ।”

उस दिन सुधा ताई ने जो बवंडर खड़ा किया, उसने काव्या की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। काव्या के मायके वालों ने तो हाथ खड़े कर दिए कि वे एक विधवा बेटी का बोझ नहीं उठा सकते। ससुराल वाले काव्या के दुश्मन बन गए थे, क्योंकि सुधा ताई ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया था। ऐसे में सुधा ताई ने काव्या का हाथ पकड़ा। वे काव्या को अपने घर ले आईं।

सुधा ताई का घर एक छोटा सा लेकिन बेहद सलीके से सजा हुआ आशियाना था। पहले कुछ दिन काव्या सिर्फ रोती रही। एक दिन सुधा ताई ने काव्या के कंधे से पकड़कर उसे झकझोरा। “सुन काव्या, तेरी पैदा करने वाली माँ ने तुझे रोटी बनाना सिखाया, सिर झुकाना सिखाया, लेकिन मैं तुझे सिर उठाकर जीना सिखाऊंगी। ये आँसू पोंछ ले। इस जालिम समाज में आँसुओं को सिर्फ कमजोरी माना जाता है, कोई इन्हें पीता नहीं है। तुझे अपने बेटे आरव के लिए जीना है, और उसके लिए तुझे खुद ढाल बनना पड़ेगा।”

सुधा ताई काव्या के लिए सिर्फ एक सहारा नहीं थीं, बल्कि एक पूरी पाठशाला बन गईं। उन्होंने सबसे पहले काव्या को कानूनी दांव-पेच सिखाए। कैसे वकीलों से बात करनी है, कैसे बैंक के फॉर्म भरने हैं, कैसे मयंक के इंश्योरेंस और प्रॉपर्टी के हक़ के लिए कोर्ट में बिना डरे गवाही देनी है। काव्या, जो कभी घर की दहलीज से बाहर अकेले नहीं गई थी, अब सुधा ताई के साथ सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही थी। रास्ते में समाज के लोग तरह-तरह के ताने मारते। “जवान विधवा है, इसे तो घर में बैठकर भगवान का नाम लेना चाहिए, देखो कैसे मर्दों की तरह बाहर घूम रही है।” काव्या ये ताने सुनकर सहम जाती, लेकिन सुधा ताई उसका हाथ कसकर पकड़ लेतीं। “कान बंद कर ले काव्या। जो लोग तेरा पेट नहीं पाल सकते, उन्हें तेरी ज़िंदगी पर टिप्पणी करने का कोई हक नहीं है। समाज के ताने तेरी ढाल पर पड़ने वाले वो पत्थर हैं, जिनसे तुझे अपनी इमारत बनानी है।”

सुधा ताई ने सिर्फ बाहर की दुनिया से लड़ना ही नहीं सिखाया, बल्कि अपनों के बीच छुपे दुश्मनों को पहचानना भी सिखाया। काव्या के जेठ और ससुराल वाले अक्सर त्योहारों पर मीठी-मीठी बातें करके आरव को काव्या से दूर करने की कोशिश करते। वे बच्चे के कान भरते। काव्या परेशान हो जाती कि वह अपने ही रिश्तेदारों से कैसे लड़े। तब सुधा ताई ने उसे रिश्तों की राजनीति समझाई। “काव्या, हर लड़ाई चिल्लाकर नहीं लड़ी जाती। अगर तुम आरव को उनसे मिलने से रोकोगी, तो तुम बुरी बन जाओगी। तुम बच्चे के अंदर इतने गहरे संस्कार डालो, उसे इतना प्यार और सच की समझ दो कि कोई भी बाहरी इंसान उसके मन में ज़हर न घोल सके। अपने बच्चे की जड़ें इतनी मजबूत कर दो कि आंधी उसे हिला न पाए।”

सुधा ताई की डांट के पीछे एक ऐसा निस्वार्थ प्रेम था, जो काव्या ने पहले कभी महसूस नहीं किया था। जब काव्या रात-रात भर जागकर बी.एड (B.Ed) की पढ़ाई करती, तो सुधा ताई चुपचाप उसके पास चाय का कप रख जातीं। जब काव्या डिप्रेशन में आकर हार मानने लगती, तो सुधा ताई एक सख्त पिता की तरह उसे डांटकर वापस ट्रैक पर लातीं। उन्होंने काव्या को एक स्कूल में नौकरी लगवाई। धीरे-धीरे काव्या आत्मविश्वास से भर उठी। वह अब वह डरी हुई लड़की नहीं थी, बल्कि एक आत्मनिर्भर और मजबूत महिला थी, जो आँखों में आँखें डालकर बात करना जानती थी।

वक्त पंख लगाकर उड़ने लगा। काव्या ने एक स्कूल टीचर से लेकर प्रिंसिपल तक का सफर तय किया। उसने आरव को एक सफल डॉक्टर बनाया और अपनी बेटी रिया (जिसे उसने एक अनाथालय से गोद लिया था, क्योंकि सुधा ताई ने सिखाया था कि प्यार सिर्फ खून का मोहताज नहीं होता) को एक कामयाब आर्किटेक्ट बनाया। सुधा ताई बूढ़ी हो चली थीं, लेकिन उनका रुतबा काव्या के घर में किसी राजमाता से कम नहीं था। काव्या हर छोटा-बड़ा फैसला उनसे पूछकर ही लेती थी।

लेकिन इंसान की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो व्यक्ति हमारे लिए हमेशा मौजूद रहता है, हम उसे ‘ग्रांटेड’ (सहज उपलब्ध) मान लेते हैं। काव्या अपने करियर, बच्चों की पढ़ाई और ज़िंदगी की भागदौड़ में इतनी व्यस्त हो गई कि उसने कभी रुककर सुधा ताई की आँखों में आँखें डालकर यह नहीं कहा कि “ताई, अगर आप न होतीं, तो आज काव्या का वजूद मिट चुका होता।” उसने कभी ताई के गले लगकर फफकते हुए उन्हें ‘धन्यवाद’ नहीं कहा। उसे लगता था कि ताई तो उसकी अपनी हैं, वे सब जानती हैं। जताना कैसा?

और फिर एक दिन, वह बरगद का पेड़, जिसकी छांव में काव्या ने अपनी पूरी गृहस्थी बसाई थी, अचानक गिर गया। सुधा ताई को एक रात सोते-सोते दिल का दौरा पड़ा और वे बिना किसी को परेशान किए इस दुनिया से विदा हो गईं। उस दिन काव्या की दुनिया दूसरी बार उजड़ी थी। लेकिन इस बार वह रोई नहीं, क्योंकि सुधा ताई ने उसे रोना नहीं सिखाया था। उसने बहुत मजबूती से ताई का अंतिम संस्कार अपनी हाथों से किया, बिल्कुल एक बेटे की तरह। समाज ने फिर उंगलियां उठाईं, लेकिन काव्या की आँखों की सख्ती देखकर सब चुप रह गए।

आज इतने सालों बाद, जब रिया की विदाई हुई और घर में एक खालीपन छा गया, तो काव्या को सुधा ताई की एक-एक बात याद आ रही थी। जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर, जब भी काव्या किसी समस्या में फंसी, तो उसके अवचेतन मन से सुधा ताई की ही कोई न कोई सीख एक जादुई छड़ी की तरह निकल कर आई और उसे बचा ले गई। चाहे वह दफ्तर की राजनीति हो, रिश्तेदारों का पाखंड हो, या बच्चों के परवरिश की चुनौतियां—सुधा ताई का दिया हुआ ज्ञान ही काव्या का असली हथियार था।

काव्या ने अपनी डायरी पर से वह सूखा हुआ गुलाब उठाया। यह गुलाब सुधा ताई ने उसे तब दिया था जब उसे अपनी पहली सैलरी मिली थी। काव्या ने पेन उठाया और डायरी के पन्नों पर अपने आँसुओं को स्याही बनाकर लिखना शुरू किया:

“मेरी प्यारी सुधा ताई, आज समझ में आता है कि आपने मेरे लिए क्या किया था। मेरी जन्म देने वाली माँ ने मुझे इस दुनिया में लाया जरूर था, लेकिन इस दुनिया में जिंदा कैसे रहना है, यह आपने सिखाया। जब मेरे अपनों ने ही मेरे लिए चक्रव्यूह रचा था, तब आप मेरे लिए कृष्ण बनकर आईं। आपने मुझे समाज के तानों का ज़हर पीना सिखाया और फिर उसी ज़हर को अपनी ताकत बनाना सिखाया। आपने मुझे अपनाया ही नहीं, बल्कि मुझे खुद से मिलाया।

मुझे आज भी याद है जब आरव ने किशोरावस्था में बगावत करनी शुरू की थी और मैं टूट गई थी। तब आपने ही मुझे समझाया था कि एक माँ को कभी-कभी अपने ही बच्चे की खातिर कठोर बनना पड़ता है। आपने मुझे सही और गलत रिश्तों के बीच की लकीर खींचना सिखाया। ताई, जैसे-जैसे मेरी उम्र ढल रही है, मुझे आपकी हर कड़वी बात में छुपा हुआ अमृत समझ आ रहा है।

मुझे इस बात का जिंदगी भर पछतावा रहेगा कि जब समय था, तब मैंने आपका हाथ चूमकर आपको धन्यवाद नहीं कहा। मैंने कभी आपको यह नहीं जताया कि आप मेरे लिए क्या मायने रखती थीं। मैं अपनी भागदौड़ में यह भूल गई कि जो हाथ हमें चलना सिखाते हैं, उन्हें भी कभी-कभी हमारे सहारे और आभार की जरूरत होती है। आज मेरे पास सब कुछ है—पैसा, रुतबा, समाज में इज्जत—लेकिन आज मेरे पास आप नहीं हैं, जिन्हें मैं यह सब दिखा सकूं।

यह एक ऐसी पाती है ताई, जो मैं कभी आपके पते पर पोस्ट नहीं कर सकती। क्योंकि यह पत्र उस पते के लिए है जो स्वर्ग में कहीं है। लेकिन मैं जानती हूँ, आज जहाँ भी आप होंगी, मुझे देखकर आपकी उन सख्त आँखों में एक प्यार भरी मुस्कान जरूर होगी। आपका यह कर्ज़ मैं कभी नहीं चुका सकती, लेकिन मैं वादा करती हूँ कि आपकी दी हुई इस ढाल से मैं किसी और बेसहाय ‘काव्या’ को टूटने से जरूर बचाऊंगी। आपकी काव्या।”

काव्या ने डायरी बंद की और उसे अपने सीने से लगा लिया। बाहर बारिश अब रुक चुकी थी और बादलों के बीच से चाँद की एक बहुत ही कोमल सी रोशनी खिड़की से होकर काव्या के चेहरे पर पड़ रही थी। उसे महसूस हुआ जैसे किसी ने बहुत ही प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा हो। काव्या के होठों पर एक संतोष भरी मुस्कान छा गई। रिश्ते वो नहीं होते जो खून से बनते हैं, रिश्ते तो वो होते हैं जो आत्मा से जुड़ते हैं और जीवन को एक नई दिशा दे जाते हैं। सुधा ताई का वह अनकहा आभार आज काव्या के आँसुओं के जरिए अदा हो चुका था।


अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।


 लेखक : नीतीश मिश्रा

error: Content is protected !!