“पिता के बनाए साम्राज्य को अपने घमंड में राख कर देने वाले बेटे को जब अपनी ही गर्भवती पत्नी की दवाइयों के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं, तो उसे वो सबक मिला जो दुनिया की कोई किताब नहीं सिखा सकती थी… पढ़िए एक घमंडी बेटे के टूटकर दोबारा खड़े होने की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी।”
सत्यप्रकाश जी ने बेटे को सीने से लगा लिया और बोले, “बेटा, जब तूने सब कुछ बर्बाद किया था, तब मैं तुझे अपने पैसों से बचा सकता था। लेकिन अगर मैं तुझे बचा लेता, तो मेरा पैसा तो बच जाता, पर मेरा बेटा हमेशा के लिए कमज़ोर रह जाता। संसार में सभी चीज़ें ठोकर लगने से टूट जाती हैं। मगर सिर्फ इंसान ही एक ऐसा है जो ठोकर लगने के बाद ही बनता है। सोने को कुंदन बनने के लिए भट्टी में तपना ही पड़ता है। आज तू मेरा वो ‘बेटा’ बना है जिस पर मुझे अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई से भी ज़्यादा नाज़ है।”
शहर के सबसे नामी बिल्डर और करोड़ों की संपत्ति के मालिक, सत्यप्रकाश जी ने अपना पूरा जीवन कड़ी मेहनत और ईमानदारी से गुज़ारा था। उन्होंने एक छोटे से कमरे से अपना कंस्ट्रक्शन का काम शुरू किया था और आज उनकी कंपनी आसमान छू रही थी। उनका इकलौता बेटा, अभिनव, विदेश से बिज़नेस मैनेजमेंट की पढ़ाई करके लौटा था। अभिनव के पास डिग्रियां तो बहुत थीं, लेकिन अनुभव और ज़मीनी हकीकत की समझ बिल्कुल नहीं थी। उसमें एक ऐसा अहंकार था कि वह पुराने और वफादार कर्मचारियों को कुछ समझता ही नहीं था।
सत्यप्रकाश जी ने अपनी ढलती उम्र को देखते हुए कंपनी की पूरी ज़िम्मेदारी अभिनव को सौंप दी। अभिनव ने गद्दी पर बैठते ही पिता के पुराने और अनुभवी कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया और अपने उन ‘हाई-प्रोफाइल’ दोस्तों को कंपनी में रख लिया, जिन्हें काम से ज़्यादा पार्टियों में दिलचस्पी थी। अभिनव को लगता था कि पैसा ही सब कुछ है और वह अपने पिता से ज़्यादा स्मार्ट है।
कुछ ही समय में अभिनव ने बिना मार्केट रिसर्च किए एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट में कंपनी का सारा पैसा लगा दिया। उसने कई बैंकों से भारी लोन भी ले लिया। पिता ने उसे कई बार समझाया, लेकिन अभिनव ने यह कहकर उन्हें चुप करा दिया कि “पापा, आपका ज़माना पुराना था, आज के दौर में रिस्क लेना पड़ता है। आप घर पर आराम कीजिए।”
वक्त ने ऐसी करवट ली कि वह प्रोजेक्ट पूरी तरह से फ्लॉप हो गया। शेयर मार्केट में कंपनी के शेयर औंधे मुंह गिर पड़े। अभिनव के वो ‘स्मार्ट’ दोस्त, जो कल तक उसकी जी-हुज़ूरी करते थे, मुसीबत आते ही सबसे पहले कंपनी छोड़कर भाग गए। बैंकों ने लोन की रिकवरी के लिए कंपनी और सत्यप्रकाश जी का आलीशान बंगला सील कर दिया। करोड़ों का साम्राज्य कुछ ही महीनों में ताश के पत्तों की तरह ढह गया।
सत्यप्रकाश जी ने चुपचाप अपनी पत्नी और अभिनव की पत्नी, राधिका के साथ वह घर छोड़ दिया और शहर के एक दूरदराज़ इलाके में एक छोटे से किराए के मकान में रहने लगे। अभिनव पूरी तरह टूट चुका था। उसे लगता था कि उसके पिता अपने पुराने रसूख का इस्तेमाल करके उसे बचा लेंगे, लेकिन सत्यप्रकाश जी ने साफ़ कह दिया था कि “जिसने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है, दर्द भी उसी को सहना होगा।” अभिनव को अपने पिता पर बहुत गुस्सा आया। उसे लगा कि उसके पिता स्वार्थी हैं।
अब अभिनव को परिवार का पेट पालने के लिए नौकरी की तलाश करनी पड़ी। लेकिन जिस अभिनव का कभी बाज़ार में सिक्का चलता था, आज उसे कोई छोटी सी नौकरी देने को भी तैयार नहीं था। उसका घमंड और उसकी असफलता उसके आड़े आ रही थी। घर में राशन खत्म हो रहा था और राधिका सात महीने की गर्भवती थी। अभिनव जो कभी ब्रांडेड कपड़ों के बिना घर से नहीं निकलता था, आज फटे जूतों में चिलचिलाती धूप में पैदल इंटरव्यू देने जाता था।
एक शाम अभिनव बहुत निराश होकर लौट रहा था। उसकी जेब में सिर्फ पचास रुपये थे, जिससे उसे राधिका के लिए कुछ ज़रूरी दवाइयां लेनी थीं। अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई। अभिनव बस स्टॉप की तरफ भाग रहा था कि तभी उसका पैर कीचड़ से भरे एक गड्ढे में पड़ा और वह धड़ाम से सड़क पर गिर गया। उसके कपड़े कीचड़ से सन गए, हाथ छिल गए और वो पचास रुपये का नोट भी नाली में बह गया।
उस कीचड़ में सना हुआ अभिनव वहीं सड़क पर घुटनों के बल बैठा और फूट-फूट कर रोने लगा। यह केवल एक शारीरिक ठोकर नहीं थी, यह उसके अहंकार, उसकी नासमझी और उसके खोखले रुतबे पर वक्त की सबसे बड़ी ठोकर थी। आज उसे एहसास हुआ कि उसने अपने पिता के उस खून-पसीने को कैसे मिट्टी में मिला दिया था, जिसे उन्होंने दशकों तक सींचा था।
घर पहुँचकर अभिनव ने राधिका से नज़रे नहीं मिलाईं। लेकिन राधिका ने कुछ नहीं पूछा। उसने चुपचाप अभिनव का हाथ पकड़ा और अपनी माँ की दी हुई आखिरी सोने की चूड़ी अभिनव के हाथ में रख दी। “इसे बेचकर कुछ काम शुरू करो अभिनव। मुझे तुम्हारी डिग्रियों पर नहीं, तुम्हारी मेहनत पर भरोसा है।”
उस दिन के बाद अभिनव बदल गया। उसने उस चूड़ी को बेचकर एक छोटा सा ठेला लगाया, जहाँ वह कंस्ट्रक्शन साइट्स पर मज़दूरों को चाय और नाश्ता बेचने लगा। जिन लोगों ने उसे कभी सूट-बूट में देखा था, वे आज उसे केतली पकड़े देखकर मज़ाक उड़ाते थे, लेकिन अभिनव ने अपना सिर नहीं उठाया। वह हर ताने को पी गया। उसने अपने अहंकार को उसी कीचड़ में दफना दिया था जहाँ वह उस दिन गिरा था।
धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाई। चाय के ठेले से उसने टिफिन सर्विस शुरू की। फिर कुछ पुराने वफादार लोगों से माफ़ी मांगी और एक छोटा सा कंस्ट्रक्शन कॉन्ट्रैक्ट लिया। अभिनव ने दिन-रात एक कर दिया। वह मज़दूरों के साथ खुद ईंटें उठाता, खुद सीमेंट मिलाता। पांच सालों की इस हाड़-तोड़ मेहनत और ईमानदारी ने अभिनव को फिर से बाज़ार में खड़ा कर दिया। उसने बैंक का सारा कर्ज़ चुका दिया और अपना खोया हुआ पुराना बंगला भी वापस खरीद लिया।
गृह प्रवेश के दिन अभिनव ने सबसे पहले अपने पिता, सत्यप्रकाश जी के पैर धोए। अभिनव की आँखों में आंसू थे। “पापा, मुझे माफ़ कर दीजिए। अगर उस दिन आपने मुझे नहीं गिरने दिया होता, तो मैं कभी चलना नहीं सीख पाता। आपने मुझे मेरे हाल पर छोड़कर मुझे सबसे बड़ी शिक्षा दी थी।”
सत्यप्रकाश जी ने बेटे को सीने से लगा लिया और बोले, “बेटा, जब तूने सब कुछ बर्बाद किया था, तब मैं तुझे अपने पैसों से बचा सकता था। लेकिन अगर मैं तुझे बचा लेता, तो मेरा पैसा तो बच जाता, पर मेरा बेटा हमेशा के लिए कमज़ोर रह जाता। संसार में सभी चीज़ें ठोकर लगने से टूट जाती हैं। मगर सिर्फ इंसान ही एक ऐसा है जो ठोकर लगने के बाद ही बनता है। सोने को कुंदन बनने के लिए भट्टी में तपना ही पड़ता है। आज तू मेरा वो ‘बेटा’ बना है जिस पर मुझे अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई से भी ज़्यादा नाज़ है।”
अभिनव ने समझ लिया था कि सफलता की नींव अक्सर असफलताओं और ठोकरों के मलबे पर ही टिकी होती है। जिस ठोकर ने उसका घमंड तोड़ा था, उसी ठोकर ने उसके अंदर एक सच्चे, ज़िम्मेदार और ज़मीनी इंसान को जन्म दिया था।
क्या आपके जीवन में भी कभी कोई ऐसी बड़ी ठोकर लगी है जिसने आपको तोड़ने की बजाय एक नया और मज़बूत इंसान बना दिया? क्या आपको भी लगता है कि बुरा वक्त ही इंसान का सबसे बड़ा शिक्षक होता है? अपने अनुभव और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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सारांश:
सत्यप्रकाश जी का इकलौता बेटा अभिनव, विदेश से पढ़कर लौटा और अपने अहंकार में पिता का करोड़ों का कारोबार डुबा बैठा। सब कुछ छिन जाने पर पिता ने उसकी आर्थिक मदद करने से इंकार कर दिया ताकि वह ज़िंदगी की हकीकत समझे। गर्भवती पत्नी की दवाइयों के लिए दर-दर भटकते अभिनव को सड़क पर कीचड़ में गिरने पर अपनी गलतियों का असली एहसास हुआ। अपनी पत्नी की आखिरी चूड़ी बेचकर उसने सड़क पर चाय बेचने से शुरुआत की और पांच साल की हाड़-तोड़ मेहनत से अपना खोया साम्राज्य वापस खड़ा कर लिया। ठोकर ने उसे तोड़कर एक बेहतरीन इंसान बना दिया।