*बेटे ने पिता को बोझ समझकर वृद्धाश्रम की चौखट पर छोड़ना चाहा, लेकिन पिता की जेब से निकली एक चिट्ठी ने बेटे के जमीर को ऐसा झकझोरा कि वो सारी दुनिया से लड़ गया। जानिये आखिर क्या लिखा था उस ख़त में जिसने एक टूटते परिवार को फिर से जोड़ दिया?*
“ये कौन सी जगह है बेटा? हम तो हरिद्वार जा रहे थे ना?” हरिशंकर जी ने खिड़की से बाहर देखते हुए पूछा। वहां कई बुजुर्ग बगीचे में बैठे थे, कुछ अकेले, कुछ समूहों में। उदासी वहां की हवा में घुली हुई थी।
सुमित ने एक गहरी सांस ली और वह झूठ बोला जिसकी रिहर्सल उसने सौ बार की थी। “बाबूजी, हरिद्वार जाने से पहले मेरे एक दोस्त के पिता जी यहां रहते हैं, उनसे मिलना है। और रात हो गई है, तो आज हम यहीं रुक जाते हैं। यह एक गेस्ट हाउस जैसा ही है।”
सुबह की पहली किरण अभी खिड़की से अंदर झांक ही रही थी कि घर में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी, जो किसी आने वाले तूफान का संकेत दे रही थी। सुमित अपने कमरे में इधर-उधर टहल रहा था, माथे पर पसीने की बूंदें थीं, जबकि एसी पूरे शबाब पर चल रहा था।
बगल के कमरे से खांसने की आवाज आई। यह आवाज पिछले तीस सालों से इस घर की पहचान थी। यह उसके पिता, हरिशंकर जी थे। सत्तर वर्ष की उम्र, शरीर कमजोर, आंखों में मोतियाबिंद का हल्का जाला, लेकिन जुबान पर हमेशा बेटों के लिए दुआएं।
“सुमित… ओ सुमित!” पत्नी वंदना की तीखी आवाज ने सुमित की तंद्रा तोड़ी। वह कमरे में दाखिल हुई, हाथ में चाय का कप नहीं, बल्कि एक फाइल थी।
“आज का दिन याद है ना तुम्हें? या फिर से भूल गए?” वंदना ने फाइल मेज पर पटकते हुए कहा। उसकी आंखों में एक कठोरता थी जो सुमित को हमेशा डराती थी।
“याद है वंदना, सब याद है,” सुमित ने दबी जुबान में कहा।
“तो फिर देर किस बात की? जाकर कह दो बाबूजी से। मैंने आश्रम में बात कर ली है। मैनेजर शाम 5 बजे तक ही एडमिशन लेते हैं। अगर आज नहीं गए तो फिर एक महीना रुकना पड़ेगा, और मैं अब एक दिन भी इस घर में उस खट-खट और बीमारी की गंध को बर्दाश्त नहीं कर सकती,” वंदना ने अंतिम फैसला सुना दिया।
सुमित का कलेजा मुंह को आ गया। वह एक आईटी कंपनी में मैनेजर था, पचास लोगों की टीम को संभालता था, लेकिन आज अपनी पत्नी और अपने बूढ़े बाप के बीच पिसा हुआ महसूस कर रहा था। वंदना की शिकायतें गलत भी नहीं थीं—बाबूजी को रात-रात भर खांसी आती थी, कभी बिस्तर गीला हो जाता था, तो कभी याददाश्त कमजोर होने की वजह से वे गैस खुली छोड़ देते थे। वंदना का सोशल सर्कल हाई-फाई था, और उसे लगता था कि घर में एक बीमार बूढ़ा उसकी ‘इमेज’ खराब करता है।
सुमित भारी कदमों से पिता के कमरे की ओर बढ़ा। दरवाजा हल्का खुला था। हरिशंकर जी अपनी पुरानी संदूक में कुछ टटोल रहे थे। उनके हाथ कांप रहे थे।
“बाबूजी?” सुमित ने आवाज दी।
हरिशंकर जी ने पलटकर देखा। चेहरे पर झुर्रियों के बीच एक मुस्कान तैर गई। “आओ बेटा, आओ। मैं बस तुम्हारी ही राह देख रहा था।”
“बाबूजी, वो…” सुमित की जुबान लड़खड़ाई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे कहे कि ‘पिताजी, अपना सामान बांध लीजिये, मैं आपको वृद्धाश्रम छोड़ने जा रहा हूं।’
तभी हरिशंकर जी बोले, “अरे सुमित, तुझे याद है? तू बचपन में हमेशा कहता था कि तुझे ‘हरिद्वार’ जाना है? गंगा जी में नहाना है?”
सुमित हैरान रह गया। उसे कुछ याद नहीं था, लेकिन उसने सिर हिला दिया।
“मैंने सोचा है बेटा,” हरिशंकर जी ने उत्साह से कहा, “अब मेरा भी अंतिम समय चल रहा है। घर में पड़े-पड़े वंदना बहू को भी तकलीफ होती है। क्यों न हम दोनों बाप-बेटे हरिद्वार हो आएं? एक तीर्थ भी हो जाएगा और कुछ पल सुकून के भी मिल जाएंगे।”
सुमित को लगा जैसे किसी ने अंधेरे में उसके हाथ में टॉर्च पकड़ा दी हो। यह तो बहुत आसान हो गया। उसे झूठ भी नहीं बोलना पड़ेगा। वह उन्हें हरिद्वार के बहाने ले जाएगा और वहीं पास के किसी अच्छे वृद्धाश्रम में…
“हां बाबूजी,” सुमित ने जल्दी से कहा, “बिल्कुल। आप तैयारी कीजिये, हम आज ही चलते हैं।”
हरिशंकर जी की आंखों में चमक आ गई। वे बच्चों की तरह खुश हो गए। “मैं अभी अपना झोला तैयार करता हूं। बस मेरी वो रामचरितमानस और चश्मा रख लूं। और हां, वंदना बहू के लिए प्रसाद लेता आऊंगा।”
सुमित कमरे से बाहर निकला तो वंदना खड़ी थी। “क्या हुआ?”
“काम हो गया,” सुमित ने नजरें चुराते हुए कहा। “उन्हें लग रहा है हम तीर्थ यात्रा पर जा रहे हैं। मैं उन्हें वहीं… छोड़ आऊंगा।”
वंदना के चेहरे पर विजय की मुस्कान थी। “अच्छा है। नाटक ही सही, पर बला तो टली। मैं उनका बाकी सामान बाद में कूरियर करवा दूंगी।”
दोपहर होते-होते कार तैयार थी। हरिशंकर जी ने एक धुली हुई धोती और पुराना कुर्ता पहना था। उनके हाथ में एक छोटा सा अटैची केस था। वंदना ने ऊपर से ही हाथ हिलाकर बाय कर दिया, नीचे उतरने की जहमत नहीं उठाई। हरिशंकर जी ने कार में बैठने से पहले मुड़कर अपने उस घर को देखा जिसे उन्होंने अपनी पीएफ की पाई-पाई जोड़कर बनाया था। उनकी आंखों में एक अजीब सा भाव था—शायद विदाई का, शायद मोह का।
कार शहर से बाहर निकलकर हाईवे पर दौड़ने लगी। सुमित स्टीयरिंग पकड़े हुए खामोश था, जबकि हरिशंकर जी लगातार बातें कर रहे थे।
“सुमित, तुझे याद है जब तू पांच साल का था और मेले में खो गया था? मैं पागलों की तरह रोया था। जब तू मिला, तो मैंने तुझे मारा नहीं, बस गले लगा लिया था। बाप का दिल ऐसा ही होता है बेटा, औलाद चाहे कितनी भी दूर चली जाए, धागा बंधा रहता है।”
सुमित के गले में एक गांठ सी बन गई। वह बस “हूँ… हां” कर रहा था।
रास्ते में एक ढाबे पर उन्होंने चाय पी। हरिशंकर जी ने अपने कांपते हाथों से बिस्कुट का पैकेट खोला और एक बिस्कुट सुमित के मुंह की तरफ बढ़ाया। “ले खा ले। तूने सुबह से कुछ नहीं खाया। वंदना बहू शायद टिफिन रखना भूल गई।”
सुमित की आंखों में नमी आ गई, लेकिन उसने उसे वंदना के डर और अपने ‘प्रैक्टिकल’ फैसले के पीछे छिपा लिया।
शाम ढलने लगी थी। हरिद्वार अभी दूर था, लेकिन शहर के बाहरी इलाके में वो वृद्धाश्रम आ गया, जिसकी बुकिंग वंदना ने करवाई थी। ‘शांति निकेतन’—बोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखा था।
सुमित ने कार की रफ्तार धीमी की और गेट के अंदर ले ली।
“ये कौन सी जगह है बेटा? हम तो हरिद्वार जा रहे थे ना?” हरिशंकर जी ने खिड़की से बाहर देखते हुए पूछा। वहां कई बुजुर्ग बगीचे में बैठे थे, कुछ अकेले, कुछ समूहों में। उदासी वहां की हवा में घुली हुई थी।
सुमित ने एक गहरी सांस ली और वह झूठ बोला जिसकी रिहर्सल उसने सौ बार की थी। “बाबूजी, हरिद्वार जाने से पहले मेरे एक दोस्त के पिता जी यहां रहते हैं, उनसे मिलना है। और रात हो गई है, तो आज हम यहीं रुक जाते हैं। यह एक गेस्ट हाउस जैसा ही है।”
हरिशंकर जी चुप हो गए। उन्होंने सुमित की तरफ देखा, फिर इमारत की तरफ। एक पल के लिए सुमित को लगा कि बाबूजी सब समझ गए हैं, लेकिन फिर वे मुस्कुराए। “अच्छा, ठीक है। तू जैसा कहे।”
सुमित रिसेप्शन पर गया। वहां औपचारिकताएं पूरी कीं। फॉर्म पर साइन करते वक्त उसके हाथ कांप रहे थे। ‘रिलेशन विद पेशेंट: सन’ (मरीज से रिश्ता: बेटा)। उसने जल्दी से साइन किया। मैनेजर ने कहा, “आप सामान कमरे में रखवा दीजिये। आप कब तक रुकेंगे?”
“मैं… मैं अभी निकल रहा हूं। मुझे अर्जेंट मीटिंग है। मैं इन्हें… बाद में देखूंगा,” सुमित ने हकलाते हुए कहा।
सुमित वापस आया। हरिशंकर जी एक बेंच पर बैठे थे, अपना छोटा सा अटैची केस गोद में लिए।
“बाबूजी,” सुमित ने पास जाकर कहा, “मुझे ऑफिस से बहुत जरूरी कॉल आया है। मुझे अभी वापस जाना होगा। आप… आप यहीं रुकिए। यहां सब सुविधाएं हैं। खाना, डॉक्टर, सब। मैं… मैं जल्दी आऊंगा आपको लेने।”
यह बोलते वक्त सुमित अपनी ही नजरों में गिर गया था। वह अपने पिता की आंखों में नहीं देख पा रहा था।
हरिशंकर जी ने कोई सवाल नहीं किया। न गुस्सा, न शिकायत। उन्होंने बस धीरे से अपना अटैची केस खोला। उसके अंदर फटे-पुराने कपड़ों के बीच एक लिफाफा और एक पुरानी डायरी रखी थी।
“बेटा सुमित,” हरिशंकर जी की आवाज बेहद शांत थी, “तू जा रहा है तो जा। पर जाने से पहले यह रख ले।”
उन्होंने वो लिफाफा सुमित के हाथ में थमा दिया।
“ये क्या है?” सुमित ने पूछा।
“खोल के देख ले,” हरिशंकर जी बोले।
सुमित ने लिफाफा खोला। अंदर घर के कागजात थे। वो घर, जो हरिशंकर जी के नाम पर था। और साथ में एक वसीयत थी, जिसमें लिखा था कि मेरे मरने के बाद यह घर और मेरी सारी जमा पूंजी सुमित के नाम होगी।
लेकिन सबसे नीचे एक मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा था, जिस पर कांपते हाथों से कुछ लिखा था। सुमित ने उसे पढ़ा।
*”मेरे प्यारे बेटे सुमित,*
*मुझे पता है हम हरिद्वार नहीं जा रहे। मुझे पता है यह ‘शांति निकेतन’ कोई गेस्ट हाउस नहीं, वृद्धाश्रम है। वंदना बहू को फोन पर बात करते हुए मैंने तीन दिन पहले ही सुन लिया था। मुझे यह भी पता है कि तू मुझे यहां छोड़कर वापस कभी नहीं आएगा।*
*पर बेटा, मैं तुझसे नाराज नहीं हूं। एक बाप अपनी औलाद से कभी नाराज नहीं हो सकता। शायद मेरी खांसी और बुढ़ापा सच में तुम्हारे आधुनिक जीवन में बाधा बन रहे थे। मुझे दुःख बस इस बात का है कि तूने मुझसे झूठ क्यों बोला? अगर तू सीधा कह देता कि ‘बाबूजी, अब आपका साथ भारी पड़ रहा है’, तो मैं खुद ही चला आता। तुझे इतना नाटक करने की, इतना पेट्रोल फूंकने की जरूरत नहीं पड़ती।*
*तू चिंता मत कर। मैंने मैनेजर साहब को बता दिया है कि मैं अपनी मर्जी से रह रहा हूं। और हां, यह घर के कागजात रख ले। वंदना कह रही थी कि उसे घर छोटा पड़ता है। अब मैं नहीं रहूंगा तो वो मेरा कमरा भी इस्तेमाल कर सकेगी। खुश रहना मेरे बच्चे। बस एक विनती है, अपने बेटे ‘आर्यन’ को कभी इस जगह का पता मत बताना। मैं नहीं चाहता कि कल को वो तेरे साथ वही करे, जो आज तूने मेरे साथ किया है। क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं, जो वो देखते हैं।*
*- तेरा अभागा बाप”*
चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते सुमित के हाथों से कागज छूटकर गिर गया। उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह जिसे ‘अनजान’ और ‘भोला’ समझ रहा था, वो पिता तो सब कुछ जानकर भी खामोश था। सिर्फ इसलिए कि बेटे को शर्मिंदा न होना पड़े। पिता ने अपना घर, अपना सम्मान, अपनी खुशियां—सब कुछ बेटे के झूठ पर कुर्बान कर दिया था, और बदले में सिर्फ बेटे की ख़ुशी मांगी थी।
सुमित ने सिर उठाकर देखा। हरिशंकर जी अपनी छड़ी टेकते हुए धीरे-धीरे आश्रम के गेट की तरफ बढ़ रहे थे, अपनी पीठ पर दुनिया भर का बोझ और अकेलेपन का अंधेरा लिए।
सुमित के अंदर का इंसान, जो वंदना की शिकायतों के नीचे दब गया था, अचानक चीख उठा। उसे वो बचपन याद आया जब वो पापा के कंधे पर बैठकर मेला देखने जाता था। उसे याद आया कि जब उसे बुखार होता था, तो यही पिता रात भर उसके सिर पर पट्टियां रखते थे।
“बाबूजी!” सुमित चिल्लाया और दौड़ पड़ा।
उसने दौड़कर हरिशंकर जी के पैर पकड़ लिए। वह वहीं सड़क पर घुटनों के बल बैठ गया और फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ़ कर दो बाबूजी! मुझे माफ़ कर दो! मैं अंधा हो गया था। मैं जानवर बन गया था। प्लीज मुझे माफ़ कर दो!”
हरिशंकर जी ने रुककर नीचे देखा। उनकी आंखों से भी आंसू बह निकले। उन्होंने झुककर सुमित को उठाया और गले लगा लिया।
“पागल है क्या? लोग देख रहे हैं,” हरिशंकर जी ने रूंधे गले से कहा।
“देखने दो दुनिया को! मुझे नहीं रहना उस घर में जहां मेरे पिता के लिए जगह न हो। अगर वंदना को दिक्कत है, तो वो घर छोड़कर जाए, लेकिन आप कहीं नहीं जाएंगे। आप मेरे साथ जाएंगे, अभी, इसी वक्त,” सुमित ने सुबकते हुए कहा।
उसने पिता का अटैची केस उठाया और वापस कार की तरफ चल दिया। मैनेजर पीछे से आवाज देता रहा, लेकिन सुमित ने अनसुना कर दिया।
गाड़ी में बैठते ही सुमित ने अपना मोबाइल निकाला और वंदना को फोन लगाया।
“हैलो, छोड़ दिया बुड्ढे को?” वंदना की आवाज आई।
सुमित की आवाज में एक ऐसी सख्ती थी जो आज से पहले कभी नहीं थी। “नहीं वंदना। मैं अपने पिता को वापस ला रहा हूं। और सुन लो, यह घर मेरे बाप की खून-पसीने की कमाई है। अगर तुम्हें उनकी खांसी से दिक्कत है, तो तुम अपने मायके जा सकती हो। आज मुझे समझ आ गया है कि पत्नी तो शायद दूसरी मिल सकती है, लेकिन बाप दोबारा नहीं मिलता।”
उसने फोन काट दिया।
सुमित ने गाड़ी मोड़ी। हरिशंकर जी ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा। उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके स्पर्श में जो सुकून था, उसने सुमित के मन की सारी उथल-पुथल शांत कर दी।
कार वापस शहर की ओर दौड़ रही थी। रात हो चुकी थी, लेकिन सुमित की जिंदगी में अब सवेरा हो चुका था। उसने जान लिया था कि तीर्थ किसी मंदिर या हरिद्वार में नहीं, बल्कि माता-पिता के चरणों में होता है। और जो सुकून उसे अपने पिता को वापस घर ले जाकर मिल रहा था, वो दुनिया की किसी दौलत में नहीं था।
आज सुमित ने अपने भविष्य को सुरक्षित कर लिया था—क्योंकि घर पर उसका बेटा आर्यन यह सब देख रहा था, और आज आर्यन ने सीखा था कि ‘रिश्ते निभाए कैसे जाते हैं’।
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**लेखक का संदेश:**
माता-पिता हमारे जीवन की वो नींव हैं, जिस पर हमारे सपनों का महल खड़ा होता है। नींव कभी दिखाई नहीं देती, लेकिन अगर वो हिल जाए, तो पूरा महल गिर जाता है। अपने माता-पिता को ‘बोझ’ नहीं, अपनी ‘पूंजी’ समझें।
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लेखिका : सविता गर्ग