स्वाभिमान का कन्यादान  – गरिमा चौधरी 

*शादी के मंडप में जब लड़की के पिता ने कांपते हाथों से शगुन का लिफाफा बढ़ाया, तो लड़के की माँ ने उसे ठुकरा दिया। सन्नाटा छा गया। सबने सोचा मांग बड़ी है, पर उस माँ ने जो किया, उसने बारातियों की आँखों में पानी ला दिया। क्या एक ‘बेटे वाली’ सच में ‘बेटी वाले’ का दर्द समझ सकती है?*

घर के आंगन में शहनाई की धुन गूंज रही थी, लेकिन गायत्री देवी के मन में एक अलग ही उथल-पुथल मची हुई थी। मेहमानों का तांता लगा हुआ था। हर तरफ हंसी-ठिठोली, गहनों की चमक और रेशमी साड़ियों की सरसराहट थी। आज गायत्री देवी के इकलौते बेटे, मयंक की शादी थी। वह मयंक, जिसे उन्होंने पति के गुजर जाने के बाद अकेले, सिलाई-कढ़ाई करके और ट्यूशन पढ़ाकर बड़ा किया था। आज वह इंजीनियर था और एक बड़े खानदान की बेटी, सुमेधा, उनके घर बहू बनकर आने वाली थी।

रसोई में हलवाई कचौड़ियां तल रहे थे और ड्राइंग रूम में गायत्री की बड़ी ननद, सरला जी, सोफे पर जमकर बैठी थीं। सरला जी स्वभाव से थोड़ी तेज और पुराने ख्यालातों की थीं। उनकी आवाज़ पूरे घर में गूंज रही थी।

“अरे गायत्री! सुन रही है? समधी जी ने जो शगुन के कपड़े भेजे हैं, वो देखे तूने? साड़ियां तो ठीक हैं, पर उनमें वो बात नहीं जो हमारे खानदान की शान के हिसाब से होनी चाहिए। और हाँ, मिलनी (रिश्तेदारों के स्वागत) के लिए जो लिस्ट दी थी, याद है न? मयंक के मामा, फूफा, ताऊ… सबको सोने की अंगूठी मिलनी चाहिए। आजकल तो रिवाज है, लड़के वाले हैं हम, थोड़ी तो धमक दिखनी चाहिए।”

गायत्री देवी पानी का ट्रे लेकर आईं और मेज पर रखते हुए मुस्कुराईं, “दीदी, सुमेधा के पिता, रमेश जी, साधारण स्कूल मास्टर हैं। उन्होंने अपनी हैसियत से बढ़कर इंतजाम किया है। हमें और क्या चाहिए? बच्ची गुणवान है, हमारा घर संभाल लेगी, यही सबसे बड़ा धन है।”

सरला जी ने नाक सिकोड़ी, “तू तो बस हमेशा संतोषी माता बनी रहियो। अरे, मयंक इंजीनियर है, लाखों का पैकेज है उसका। अगर हम मुंह खोलकर मांगते नहीं, तो कम से कम जो रिवाज है, वो तो ढंग से होना चाहिए। देख लेना, अगर बारात के स्वागत में कमी हुई, तो मैं तो वहीं टोक दूंगी। हमारी नाक नहीं कटनी चाहिए।”

गायत्री देवी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप वहां से हट गईं, लेकिन सरला दीदी की बातें उनके पुराने जख्म हरे कर गईं।

उन्हें याद आया अपना वक्त। पच्चीस साल पहले जब उनकी शादी हुई थी। उनके पिता ने अपनी पूरी जमा-पूंजी लगा दी थी। बारात के स्वागत में हर बाराती को चांदी का सिक्का दिया गया था, फिर भी सास ने ताना मारा था कि ‘सिक्के का वजन कम है’। उनके पिता, जो पूरे शहर में सम्मान की नज़र से देखे जाते थे, उस दिन समधियों के सामने हाथ जोड़े, सिर झुकाए खड़े थे। उनकी आँखों में वो लाचारी गायत्री कभी नहीं भूल पाई थीं। उस दिन गायत्री ने महसूस किया था कि बेटी का बाप होना जैसे कोई अपराध हो, जहाँ आपको अपनी ही कमाई और इज़्ज़त दूसरों के पैरों में रखनी पड़ती है।

“नहीं,” गायत्री ने मन ही मन एक फैसला लिया। “मैं अपने बेटे की शादी में इतिहास नहीं दोहराने दूंगी। मैं एक बेटी की माँ नहीं बन पाई, तो क्या हुआ? मैं एक ‘बेटे वाली’ होकर भी ‘बेटी वाले’ का दर्द समझती हूँ।”

शाम को बारात सज-धज कर निकली। मयंक घोड़ी पर सवार था, दोस्त नाच रहे थे। गायत्री देवी सबसे आगे चल रही थीं, चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान थी। लेकिन उनके हाथ में एक विशेष थैला था, जिसे उन्होंने किसी को पकड़ने नहीं दिया था।

बारात जब जनवासे (विवाह स्थल) पर पहुंची, तो वहां का नज़ारा देख गायत्री का दिल पसीज गया।

सुमेधा के पिता, रमेश जी, गेट पर खड़े थे। उन्होंने अपनी पुरानी शेरवानी पहन रखी थी, जिसे शायद ड्राई-क्लीन करवाकर नया जैसा दिखाने की कोशिश की गई थी। उनके चेहरे पर पसीने की बूंदें थीं और आँखों में एक घबराहट। वह बार-बार टेंट वालों को, वेटर को निर्देश दे रहे थे। उनके हाथ कांप रहे थे। जैसे ही बारात पास आई, रमेश जी दौड़कर आगे आए और मयंक की घोड़ी के पास खड़े होकर हाथ जोड़ लिए। उनके पीछे सुमेधा की माँ, जानकी देवी, आरती की थाली लिए खड़ी थीं, उनके चेहरे पर भी वही ‘दबे हुए’ होने का भाव था जो अक्सर लड़की वालों के चेहरे पर होता है।

मिलनी की रस्म शुरू हुई। सरला दीदी सबसे आगे खड़ी होकर निगरानी कर रही थीं। रमेश जी एक-एक करके मयंक के रिश्तेदारों को गले मिल रहे थे और हर बार उनकी जेब में एक भारी लिफाफा और सोने की गिन्नी का डिब्बा डाल रहे थे। सरला दीदी के पति (मयंक के फूफा) ने लिफाफा टटोला और फिर नाक चढ़ाते हुए अपने साले साहब (मयंक के मामा) के कान में कुछ कहा। दोनों हंसे। रमेश जी ने यह देख लिया, उनका चेहरा फक पड़ गया। वह और ज्यादा झुक गए, जैसे माफ़ी मांग रहे हों।

अब बारी थी समधी-मिलan की। रमेश जी ने एक बड़ा सा थाल उठाया जिसमें मयंक के लिए कपड़े, घड़ी, और एक बहुत मोटा लिफाफा था। वह गायत्री देवी और मयंक के दिवंगत पिता की तस्वीर की ओर बढ़े।

रमेश जी की आवाज़ कांप रही थी, “समधिन जी, हमारी हैसियत तो नहीं कि इंजीनियर दामाद का सत्कार कर सकें, पर जो बन पड़ा, किया है। अगर कोई भूल-चूक हो जाए तो अपनी बेटी समझकर माफ़ कर दीजियेगा। यह… यह शगुन स्वीकार करें।”

रमेश जी ने झुककर वह थाल गायत्री देवी के पैरों में रखने की कोशिश की। सरला दीदी की आँखों में चमक आ गई, उन्हें लगा लिफाफे में जरूर बड़ी रकम होगी।

तभी, गायत्री देवी ने रमेश जी के हाथ पकड़ लिए। उन्होंने थाल को ज़मीन पर नहीं रखने दिया।

“रुकिए समधी जी,” गायत्री देवी की आवाज़ में एक ऐसी खनक थी जिसने बैंड-बाजे के शोर को भी चीर दिया।

सब चुप हो गए। सरला दीदी बुदबुदाई, “लो, अब गायत्री भी नखरे दिखाएगी। जरूर कम लगा होगा शगुन।”

रमेश जी का रंग उड़ गया। “जी… जी? कुछ कमी रह गई क्या?”

गायत्री देवी ने रमेश जी के हाथों से वह थाल लिया और पास खड़े अपने भाई को पकड़ा दिया। फिर उन्होंने अपने उस थैले को खोला जो वह साथ लाई थीं।

उसमें से उन्होंने एक बेहद कीमती, मखमली पशमीना शॉल और एक चांदी का नारियल निकाला।

गायत्री देवी ने वह शॉल रमेश जी के कंधों पर ओढ़ा दी और हाथ जोड़कर बोलीं, “रमेश भाई साहब, आप यह क्या कर रहे हैं? आप ‘दाता’ हैं, और हम ‘याचक’। हमारी झोली में आप अपनी जिगर का टुकड़ा, अपनी ‘लक्ष्मी’ डाल रहे हैं। दुनिया का कौन सा धन, कौन सा शगुन इस दान से बड़ा हो सकता है? आप झुक क्यों रहे हैं? झुकना तो हमें चाहिए कि हम आपका आंगन सूना करके अपने घर में रोशनी ले जा रहे हैं।”

पूरे मंडप में सन्नाटा छा गया। रमेश जी की आँखें फटी की फटी रह गईं।

गायत्री देवी ने आगे कहा, “आज तक मैंने देखा है कि बेटी वाला हमेशा हाथ जोड़े खड़ा रहता है, जैसे उसने बेटी पैदा करके कोई गुनाह कर दिया हो। क्यों? क्या बेटी को पालने में, पढ़ाने में, उसे संस्कार देने में बेटे से कम मेहनत लगती है? आपने सुमेधा को इंजीनियर बनाया, उसे इस काबिल बनाया कि वह मेरे घर को संभाल सके। उसका कर्ज़ तो मैं सात जन्मों में नहीं उतार सकती। यह शगुन, यह लिफाफे… यह सब बहुत छोटी चीज़ें हैं भाई साहब। आज से आपकी पगड़ी मेरे चरणों में नहीं, मेरे सिर का ताज होगी।”

कहते-कहते गायत्री देवी ने रमेश जी के पैर छू लिए।

“अरे! अरे! यह क्या कर रही हैं समधिन जी? गज़ब हो जाएगा!” रमेश जी पीछे हट गए, उनकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली।

सरला दीदी तो जैसे पत्थर की मूरत बन गई थीं। मयंक, जो घोड़ी से उतर चुका था, दौड़कर अपनी माँ के पास आया। उसने अपनी माँ को गले लगा लिया।

“माँ, आज आपने मेरा सिर गर्व से इतना ऊंचा कर दिया है कि मैं बता नहीं सकता,” मयंक ने रुंधे गले से कहा।

गायत्री देवी ने फिर सरला दीदी की तरफ देखा, जो शर्मिंदा होकर नज़रे चुरा रही थीं। गायत्री ने माइक लिया और सभी मेहमानों से मुखातिब हुईं।

“मेरे परिवार के सभी लोग, और मेरे सभी रिश्तेदार सुन लें। आज मेरे घर लक्ष्मी आ रही है। और लक्ष्मी के साथ कोई सौदा नहीं होता। रमेश जी ने अपनी बेटी देकर हमें खरीद लिया है। अब अगर किसी ने भी दहेज, शगुन या मिलनी में कमी की बात की, या लड़की वालों को नीचा दिखाने की कोशिश की, तो वो मेरा अपमान होगा। आज से रमेश जी का सम्मान, मेरा सम्मान है।”

फिर गायत्री देवी सुमेधा की माँ, जानकी देवी के पास गईं। जानकी देवी तो रो ही रही थीं। गायत्री ने अपने गले से सोने का एक भारी हार उतारा और जानकी देवी के गले में पहना दिया।

“यह मेरी सास ने मुझे दिया था, यह कहकर कि बेटे की माँ हूँ, मेरा हक़ ज्यादा है। आज मैं यह रीत तोड़ रही हूँ। यह हार आपका है समधिन जी, क्योंकि एक बेटी को विदा करने के लिए जिस जिगरे की ज़रूरत होती है, वो सिर्फ एक माँ के पास होता है। आप मुझसे बड़ी हैं, क्योंकि आपने त्याग किया है, मैंने तो सिर्फ पाया है।”

वहां मौजूद हर शख्स की आँखें नम थीं। जो बाराती पहले खाने और व्यवस्था में नुक़्स निकाल रहे थे, अब उनकी जुबान बंद थी। माहौल पूरी तरह बदल चुका था। अब वहां ‘लड़के वाले’ और ‘लड़की वाले’ का भेद मिट गया था। वहां सिर्फ दो परिवार थे जो एक नए रिश्ते की डोर में बंध रहे थे।

फेरों के वक्त जब कन्यादान की रस्म आई, तो पंडित जी ने रमेश जी को बुलाया। रमेश जी का आत्मविश्वास अब देखने लायक था। वह अब एक लाचार पिता की तरह नहीं, बल्कि एक गौरवान्वित पिता की तरह बैठे थे। जब उन्होंने सुमेधा का हाथ मयंक के हाथ में दिया, तो उनकी आँखों में आंसू थे, लेकिन होठों पर सुकून की मुस्कान थी कि उनकी बेटी एक ऐसे घर में जा रही है जहाँ उसे ‘दहेज़’ के तराजू में नहीं, बल्कि ‘बेटियों’ के मान-सम्मान के पलड़े में तौला जाएगा।

विदाई के समय सुमेधा अपनी माँ से लिपटकर रो रही थी। गायत्री देवी ने आगे बढ़कर सुमेधा के आंसू पोंछे।

“रो मत बेटा। तू एक घर छोड़कर दूसरे घर जा रही है, पर पराई नहीं हो रही। वहां भी तुझे एक माँ मिलेगी, सास नहीं। और रमेश भाई साहब, आप चिंता मत कीजियेगा। आपकी बेटी अब मेरी भी बेटी है। अगर इसकी आँखों में एक भी आंसू आया, तो जवाबदेही मेरी होगी।”

गाड़ी जब चली, तो रमेश जी और जानकी देवी हाथ हिला रहे थे। रमेश जी ने अपनी पत्नी से कहा, “जानकी, सुना था कि जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन आज देख लिया कि स्वर्ग जैसे रिश्ते धरती पर भी बन सकते हैं। गायत्री जी ने आज मुझे खरीद लिया।”

उधर, गाड़ी में बैठी सरला दीदी चुप थीं। थोड़ी देर बाद उन्होंने धीरे से गायत्री के हाथ पर अपना हाथ रखा।

“गायत्री, मुझे माफ़ कर दे। मैं उम्र में बड़ी हूँ, पर समझ में आज तूने मुझे बहुत पीछे छोड़ दिया। हम तो बस सोने-चांदी की चमक में उलझे रहे, तूने तो आज इंसानियत का हीरा जड़ दिया। मुझे अपनी छोटी सोच पर **धिक्कार** है।”

गायत्री मुस्कुराईं। “दीदी, गलती आपकी नहीं, इस समाज की रीत की है। हम औरतें ही अगर औरत का दर्द नहीं समझेंगी, तो कौन समझेगा? बेटा हो या बेटी, दर्द और खुशी का रंग एक ही होता है। बस हमें उस रंग को पहचानने की ज़रूरत है।”

उस रात, शहर में इस शादी की चर्चा खाने-पीने या सजावट के लिए नहीं थी। चर्चा थी उस ‘स्वाभिमान’ की जो एक लड़के की माँ ने एक लड़की के पिता को लौटाया था। गायत्री ने साबित कर दिया था कि बड़ा वो नहीं जो लेता है, बड़ा वो है जो सम्मान देता है।

**कहानी का शीर्षक:**

**स्वाभिमान का कन्यादान और रिश्तों की नई रीत**

**हूक लाइन:**

*”दहेज के नाम पर झुकती हुई पगड़ियों के इस दौर में, एक माँ ने रस्मों का ऐसा रुख मोड़ा कि समधी के बहते आंसुओं में पीढ़ियों का दर्द धुल गया। पढ़िए कैसे एक ‘इंकार’ ने दो परिवारों को हमेशा के लिए एक कर दिया।”*

**कहानी के अंत में एक विचार:**

दोस्तो, हम अक्सर कहते हैं “लड़की पराया धन है”, लेकिन क्या कभी सोचा है कि उस धन को सौंपने वाले पिता का दिल कितना भारी होता है? गायत्री देवी ने जो पहल की, क्या हम और आप अपने परिवारों में ऐसी शुरुआत कर सकते हैं? क्या लड़की वालों का झुकना ज़रूरी है?

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मूल लेखिका : गरिमा चौधरी 

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