दिल के रिश्ते: एक मां का फैसला – गीता गुप्ता

*जब बेटी ने पिता की चिता की राख ठंडी होने से पहले ही जायदाद का बंटवारा मांग लिया, तब एक मां ने जाना कि कोख से जन्म देने से कोई अपना नहीं होता। पढ़िए एक ऐसी मां की कहानी जिसने समाज के डर से नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान के लिए एक कठोर फैसला लिया।*

सावित्री देवी के मोबाइल की स्क्रीन पर एक हरे रंग का नोटिफिकेशन ब्लिंक कर रहा था। व्हाट्सएप पर एक पीडीएफ फाइल आई थी। भेजने वाले का नाम मोबाइल में ‘गरिमा’ सेव था। वह नाम, जिसे कभी पुकारते हुए सावित्री जी का गला प्यार से भर आता था, आज वही नाम उनकी छाती पर पत्थर की तरह भारी लग रहा था।

कांपते हाथों से उन्होंने फाइल खोली। वह एक डिजिटल निमंत्रण पत्र था।

*”पलक संग मयंक — सगाई समारोह”*

पलक… उनकी नातिन। गरिमा की बेटी।

फोटो में पलक कितनी बड़ी और सुंदर लग रही थी। सावित्री जी की आँखों के कोर गीले हो गए। आखिरी बार जब उन्होंने पलक को देखा था, तब वह फ्रॉक पहनकर नानी की गोद में खेलती थी। आज वह साड़ी पहनकर किसी और के घर की होने जा रही थी।

तभी मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर फिर वही नाम—’गरिमा’।

सावित्री जी ने एक गहरी सांस ली, खुद को संभाला और फोन उठाया।

“हेलो माँ…” उधर से एक हिचकिचाती हुई आवाज़ आई। पांच साल बाद यह आवाज़ कानों में पड़ी थी।

“हाँ, बोल गरिमा,” सावित्री जी की आवाज़ में न गुस्सा था, न प्यार, बस एक सपाट सन्नाटा था।

“माँ, आपने कार्ड देखा? मेरी पलक की सगाई है अगले हफ़्ते। लड़के वाले बहुत बड़े घर के हैं। मैंने सोचा… पुरानी बातें भूलकर आप और भैया-भाभी आ जाते तो…” गरिमा की आवाज़ में एक मीठापन था, वह मीठापन जो सावित्री जी बहुत अच्छी तरह पहचानती थीं—मतलब का मीठापन।

“पुरानी बातें भूल जाऊं?” सावित्री जी ने धीमे स्वर में दोहराया। “गरिमा, कुछ बातें यादों में नहीं, हड्डियों में चुभी होती हैं। तूने कार्ड भेजा, रस्म निभाई, अच्छा किया। पर मेरा वहाँ आना मुमकिन नहीं है।”

“माँ प्लीज! लड़के वाले पूछेंगे कि नानी क्यों नहीं आई। मेरी नाक कट जाएगी। कम से कम दिखावे के लिए ही आ जाओ,” गरिमा अब अपनी असलियत पर आ गई थी। उसे माँ की ज़रूरत नहीं थी, उसे ‘नानी’ के ओहदे की ज़रूरत थी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने के लिए।

सावित्री जी ने फोन काट दिया। मोबाइल हाथ में लिए वह बालकनी में रखी कुर्सी पर बैठ गईं। उनकी नज़रें सामने पार्क पर थीं, लेकिन मन अतीत के उस बवंडर में गोते लगा रहा था जिसने उनके हंसते-खेलते घर को उजाड़ दिया था।

बात दस साल पुरानी भी नहीं थी। दीनानाथ जी, सावित्री, बेटा आलोक और बहू स्मिता—एक आदर्श परिवार था। गरिमा, उनकी लाडली बेटी, दूसरे शहर में ब्याही थी। उसके पति, सुधीर, एक सरकारी अफ़सर थे।

दीनानाथ जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई, अपना पीएफ, सब कुछ बच्चों में बराबर बांटने की कोशिश की थी। आलोक ने कभी किसी चीज़ की मांग नहीं की। वह और स्मिता, दीनानाथ जी और सावित्री जी की सेवा में ही अपना सुख मानते थे।

लेकिन गरिमा… गरिमा का स्वभाव बचपन से ही जिद्दी था। शादी के बाद वह और ज्यादा महत्त्वाकांक्षी हो गई थी। उसे लगता था कि मायके की हर चीज़ पर पहला हक़ उसका है क्योंकि वह ‘बेटी’ है।

समस्या तब शुरू हुई जब दीनानाथ जी को कैंसर डिटेक्ट हुआ। बीमारी लंबी चली। आलोक ने अपनी छोटी सी दुकान से होने वाली सारी कमाई पिता के इलाज में लगा दी। स्मिता ने दिन-रात एक कर दिए। ससुर के कपड़े बदलने से लेकर, उन्हें नहलाने-धुलाने और अस्पताल के चक्कर काटने तक—स्मिता ने कभी उफ़ तक नहीं की।

उन छह महीनों में गरिमा सिर्फ दो बार देखने आई। और जब भी आई, खाली हाथ नहीं गई। कभी माँ की कोई साड़ी ले गई, कभी घर का कोई पुराना एंटीक पीस, तो कभी पिता जी से इमोशनल होकर पैसे मांग ले गई।

“बाबूजी, सुधीर जी ने नई कार ली है, थोड़ी किश्त कम पड़ रही है,” गरिमा ने ऑक्सीजन मास्क लगाए पड़े पिता से कहा था। और दीनानाथ जी ने अपनी दवाइयों के लिए रखे पैसे निकालकर बेटी के हाथ पर रख दिए थे।

स्मिता सब देखती थी, पर चुप रहती थी। आलोक भी बहन के मोह में कुछ नहीं बोलता था।

फिर वह काली रात आई जब दीनानाथ जी ने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं। घर में कोहराम मच गया। आलोक तो जैसे टूट ही गया था। सावित्री जी की सुध-बुध खो गई थी।

रिश्तेदार आए, सांत्वना देने वालों की भीड़ लग गई। गरिमा भी सपरिवार आई।

लेकिन तेरहवीं की रस्म पूरी होने से पहले ही गरिमा ने अपना असली रूप दिखा दिया।

शाम का वक्त था। घर के आंगन में अभी भी उदासी पसरी थी। गरिमा ने सावित्री जी के कमरे का दरवाज़ा बंद किया और आलोक-स्मिता को भी बुला लिया।

“माँ, अब बाबूजी तो रहे नहीं,” गरिमा ने बिना किसी भूमिका के शुरू किया। “मुझे वापस जाना है। सुधीर जी की छुट्टियां खत्म हो रही हैं। तो मैं चाहती थी कि जो भी हिसाब-किताब है, आज ही हो जाए।”

सावित्री जी सन्न रह गईं। “हिसाब-किताब? किस बात का बेटा?”

“अरे, बाबूजी का पीएफ, यह घर, और तुम्हारे गहने। मेरा भी तो हिस्सा है न इसमें। मुझे मेरा हिस्सा नकद दे दो या फिर इस घर को बेचकर बंटवारा कर लेते हैं,” गरिमा ने ऐसे कहा जैसे वह किसी सब्जी वाले से भाव-तोल कर रही हो।

आलोक को विश्वास नहीं हुआ। “दीदी, अभी बाबूजी की अस्थियां विसर्जित करके आए हैं हम। आपको शर्म नहीं आ रही? और घर बेचने की बात? माँ कहाँ रहेगी?”

“माँ तुम्हारे साथ रहेगी या मेरे साथ, बारी-बारी से रख लेंगे,” गरिमा ने तुनक कर कहा। “और स्मिता ने जो बाबूजी की अलमारी की चाबी अपने पास दबा रखी है, वो मुझे दो। मुझे पता है माँ के सारे भारी सेट उसी में हैं।”

स्मिता, जो कोने में खड़ी आंसू पोंछ रही थी, चौंक गई। “दीदी, चाबी तो माँ जी के पास ही रहती है। मैंने तो बस दवाइयां निकाली थीं।”

“रहने दे, बड़ी सती-सावित्री मत बन,” गरिमा चिल्लाई। “तुझे क्या लगता है मुझे नहीं पता? तूने ही बाबूजी को पट्टी पढ़ाई होगी कि सारा पैसा आलोक के नाम कर दें। सेवा का नाटक इसीलिए करती थी न तू?”

सावित्री जी ने कांपते हाथों से गरिमा को रोकने की कोशिश की। “गरिमा, चुप हो जा। स्मिता ने मेरे और तेरे बाबूजी की जो सेवा की है, वो सगी बेटी भी नहीं कर सकती। तू किस मुंह से यह सब बोल रही है?”

“ओहो! तो अब बहू सगी हो गई और बेटी पराई?” गरिमा ने ताना मारा। “ठीक है। अगर मुझे मेरा हिस्सा नहीं मिला, तो मैं कोर्ट जाउंगी। और हाँ, जब तक पैसे नहीं मिलते, मैं माँ को अपने साथ नहीं ले जाउंगी। और न ही कभी इस घर की शक्ल देखूंगी।”

उस रात, उस घर में जो महाभारत हुई, उसने सावित्री जी को अंदर से मार दिया।

आलोक ने अपनी बचत, माँ के कुछ गहने और दोस्तों से उधार लेकर एक मोटी रकम गरिमा के मुंह पर मारी।

“ये लो दीदी। ले जाओ सब। लेकिन आज के बाद यह मत कहना कि तुम्हारा कोई भाई या माँ है। तुमने आज बाबूजी की मौत का सौदा किया है।”

गरिमा पैसे लेकर चली गई। जाते-जाते उसने स्मिता को कहा था, “तूने मेरा मायका छीना है, तू कभी सुखी नहीं रहेगी।”

उस दिन के बाद से गरिमा ने कभी पलटकर नहीं देखा कि माँ ज़िंदा भी है या मर गई। पांच साल बीत गए। आलोक और स्मिता ने सावित्री जी को पलकों पर बिठाकर रखा। स्मिता ने कभी उन्हें बेटी की कमी महसूस नहीं होने दी।

“माँ जी… चाय।”

स्मिता की आवाज़ ने सावित्री जी को वर्तमान में खींच लिया। स्मिता हाथ में अदरक वाली चाय का कप लिए खड़ी थी। उसके चेहरे पर वही सौम्यता थी, वही आदर था।

सावित्री जी ने स्मिता को देखा। उम्र के साथ स्मिता के बालों में थोड़ी सफेदी आ गई थी, आँखों के नीचे हल्के घेरे थे—जो घर की जिम्मेदारियों और सास की सेवा के निशान थे। यह वो औरत थी जिसे उनकी अपनी बेटी ने ‘चोर’ और ‘मटका करने वाली’ कहा था।

सावित्री जी ने चाय का कप लिया और स्मिता का हाथ पकड़कर उसे पास वाली कुर्सी पर बिठाया।

“स्मिता, गरिमा का फोन आया था। पलक की सगाई है।”

स्मिता के चेहरे पर एक पल के लिए छाया आई, फिर उसने सामान्य होने का नाटक किया। “अरे वाह, यह तो बहुत खुशी की बात है माँ जी। बधाई हो आपको। कब जाना है? मैं आपकी वो बनारसी साड़ी निकाल दूं? या फिर नई साड़ी ले आएं?”

सावित्री जी ने स्मिता की आँखों में देखा। वहां कोई कड़वाहट नहीं थी, सिर्फ परिवार को जोड़े रखने की कोशिश थी।

“तुझे बुरा नहीं लगेगा अगर मैं गई?” सावित्री जी ने पूछा।

स्मिता मुस्कुराई। “माँ जी, वो आपकी बेटी है। खून का रिश्ता है। मेरे बुरा मानने से क्या होगा? और पलक तो आपकी नातिन है। बच्चों की क्या गलती? आपको जाना चाहिए। आलोक को भी मैं समझा दूंगी।”

सावित्री जी की आँखों से झर-झर आंसू बह निकले। उन्होंने कप मेज पर रखा और स्मिता को गले लगा लिया।

“पगली… यही फर्क है तुझमें और उसमें। खून का रिश्ता उसने बनाया था, पर दिल का रिश्ता तूने निभाया है। उसने मुझे तब छोड़ा जब मेरे पास देने को सिवाय दुआओं के कुछ नहीं था। और तूने मुझे तब संभाला जब मैं अंदर से खाली हो चुकी थी।”

“माँ जी…” स्मिता भी भावुक हो गई।

“मैंने फैसला कर लिया है स्मिता,” सावित्री जी ने आंसू पोंछते हुए कहा। “मैं उस सगाई में नहीं जाउंगी। और न ही आलोक जाएगा।”

“पर माँ जी, समाज क्या कहेगा? लोग बातें बनाएंगे,” स्मिता ने समझाया।

“समाज?” सावित्री जी की आवाज़ सख्त हो गई। “समाज तब कहाँ था जब मेरी बेटी मेरे मरे हुए पति की लाश के पास खड़े होकर गहनों का बंटवारा कर रही थी? समाज तब कहाँ था जब तू मेरे पति के गंदे कपड़े धोती थी और गरिमा नाक सिकोड़ती थी? स्मिता, सम्मान मांगने से नहीं मिलता, कमाना पड़ता है। गरिमा ने आज फोन इसलिए नहीं किया कि उसे मेरी याद आई है। उसने फोन इसलिए किया क्योंकि उसे वहां ‘दिखाने’ के लिए माँ चाहिए। मैं कोई शो-पीस नहीं हूँ जिसे वो अपनी ज़रुरत के हिसाब से सजा ले।”

सावित्री जी ने अपना मोबाइल उठाया। व्हाट्सएप खोला और गरिमा के मैसेज का जवाब टाइप किया। उनकी उंगलियां अब कांप नहीं रही थीं।

*”गरिमा,*

*पलक को मेरा आशीर्वाद देना। वह खुश रहे। लेकिन मैं इस सगाई में नहीं आ सकती। तूने कहा था कि पुरानी बातें भूल जाऊं। मैं भूल सकती थी अगर वो बातें मेरे और तेरे बीच होतीं। लेकिन तूने उस औरत का अपमान किया था जिसने तेरे पिता को अपने पिता से बढ़कर सेवा दी। तूने उस भाई का दिल तोड़ा था जिसने अपनी पढ़ाई छोड़कर तेरी शादी के लिए पैसे जोड़े थे।*

*तूने जिस दिन जायदाद के लिए रिश्ते तोड़े थे, उसी दिन तूने यह हक़ खो दिया था कि मैं तेरी खुशियों में शामिल हूँ। मेरे लिए मेरी असली बेटी वो है जो मेरे बुढ़ापे की लाठी बनी, न कि वो जो मेरी चिता सजने का इंतज़ार कर रही थी। दिखावे के रिश्ते मुझे नहीं चाहिए। खुश रह।”*

मैसेज भेजकर सावित्री जी ने मोबाइल साइड में रख दिया। उन्हें ऐसा लगा जैसे छाती पर रखा बरसों पुराना बोझ उतर गया हो।

आलोक भी दुकान से लौट आया था। माँ और पत्नी को बालकनी में बैठे देख वह भी वहीं आ गया।

“क्या बातें हो रही हैं सास-बहू में?” आलोक ने मुस्कुराते हुए पूछा।

सावित्री जी ने आलोक का हाथ एक तरफ और स्मिता का हाथ दूसरी तरफ थामा।

“कुछ नहीं बेटा, बस यह बात कर रहे थे कि ‘अपना’ वो नहीं होता जिसके साथ खून का रिश्ता हो, अपना वो होता है जो खून के रिश्तों के वार सहकर भी साथ खड़ा रहे। आज मैंने अपनी वसीयत पक्की कर दी।”

“वसीयत?” आलोक चौंक गया।

“हाँ,” सावित्री जी ने आसमान की तरफ देखा जहाँ एक तारा चमक रहा था। “मेरी वसीयत यह है कि मेरी इज़्ज़त, मेरा मान और मेरा प्यार सिर्फ तुम दोनों के लिए है। गरिमा मेरी बेटी थी, लेकिन स्मिता… स्मिता मेरी ‘संतान’ है।”

रात गहरी हो गई थी, लेकिन सावित्री जी के घर में आज एक अलग ही उजाला था—सच्चाई और स्वाभिमान का उजाला।

**निष्कर्ष:**

रिश्ते नाम से नहीं, काम से बनते हैं। हम अक्सर बेटियों को ‘पराया धन’ और बहुओं को ‘बाहरी’ समझते हैं। लेकिन सच तो यह है कि जो बुढ़ापे में आपकी लाठी बने, आपके आंसुओं को पोंछे, वही आपकी असली संतान है—चाहे वह बेटा हो, बेटी हो या बहू। सावित्री जी ने समाज के डर को दरकिनार कर उस रिश्ते को चुना जिसने उन्हें इज़्ज़त दी, न कि उसे जिसने उन्हें दुत्कारा।

**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**

क्या सावित्री जी ने गरिमा की बेटी की सगाई में न जाकर सही किया? क्या एक माँ को अपनी बेटी की गलतियों को भुला देना चाहिए था, या आत्मसम्मान की रक्षा करना ज़रूरी था?

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मूल लेखिका : गीता गुप्ता

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