सुशीला देवी को लगा जैसे किसी ने उनके गाल पर ज़ोरदार तमाचा मारा हो। उनका अपना ही तर्क, उनके अपने ही शब्द, अब उन्हें चुभ रहे थे। जो ममता अपनी बेटी के लिए उमड़ रही थी, वही ममता बहू के लिए क्यों सूख गई थी?
उनके हाथ से फोन का रिसीवर लगभग छूट ही गया। उन्हें अपनी कही बात याद आई—*”बहू के होते हुए भला हम क्यों नाश्ता बनाएंगे?”
घड़ी की सुई सुबह के आठ बजा रही थी। सुशीला देवी ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी, हाथ में अखबार लिए, बार-बार रसोई की तरफ देख रही थीं। उनके चेहरे पर झुंझलाहट साफ़ दिखाई दे रही थी। रसोई से न तो बर्तनों की खनखनाहट आ रही थी और न ही छौंक की खुशबू।
पास ही उनके पति, दीनानाथ जी, अपनी चाय की खाली प्याली मेज पर रखकर बोले, “अरे भाई, आज क्या बात है? आठ बज गए, न नाश्ता मिला न दूसरी चाय। मेरी शुगर की दवाई का समय हो रहा है।”
सुशीला देवी ने अखबार पटकते हुए अपनी आवाज़ ऊंची की, ताकि उनकी आवाज़ ऊपर वाले कमरे तक पहुँच जाए, “अजी, अब मैं क्या बताऊँ? आजकल की बहुओं को तो महारानी बनकर सोने की आदत है। सूरज सिर पर आ गया है, पर मजाल है जो बिस्तर छोड़ दें। अब **बहू के होते हुए… भला हम लोग नाश्ता क्यों बनाएंगे??** हमारा भी तो कोई रुतबा है, बुढ़ापे में हम ही खटेंगे तो लोग क्या कहेंगे कि बहू के आते ही सास कामवाली बन गई।”
ऊपर के कमरे में, रश्मि ने अपनी सास की ये कड़वी बातें सुनीं। उसने उठने की कोशिश की, लेकिन उसका सिर चकरा गया और वह वापस तकिये पर गिर पड़ी। उसका पूरा बदन बुखार से तप रहा था। कल रात से ही उसे ठंड लग रही थी, उसने विकास (अपने पति) को बताया भी था, पर विकास ऑफिस की फाइलें निपटाने में इतना व्यस्त था कि उसने बस एक पैरासिटामोल देकर कह दिया, “सो जाओ, सुबह ठीक हो जाओगी।”
लेकिन सुबह हालत और बिगड़ गई थी। रश्मि की आँखों से गरम हवा निकल रही थी और गला इतना सूख गया था कि आवाज़ भी नहीं निकल रही थी। फिर भी, सास के ताने उसके कानों में पिघले शीशे की तरह उतर रहे थे। वह जानती थी कि अगर वह नीचे नहीं गई, तो घर में महाभारत छिड़ जाएगा।
उसने अपनी पूरी ताकत समेटी। कांपते हाथों से बालों का जूड़ा बनाया और दीवार का सहारा लेकर धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरने लगी। हर कदम पर उसे लग रहा था कि वह गिर जाएगी।
जैसे ही वह रसोई में पहुंची, सुशीला देवी वहां आ धमकीं।
“आ गई महारानी? अरे, आठ बज रहे हैं। तेरे ससुर जी की दवाई का समय निकल गया। विकास को ऑफिस जाना है। तुझे ज़रा भी ज़िम्मेदारी का अहसास है या नहीं? मायके में माँ ने यही सिखाया है कि ससुराल जाकर दोपहर तक सोती रहना?”
रश्मि ने बड़ी मुश्किल से कहा, “मा… मांजी, वो मेरी तबीयत…”
सुशीला देवी ने उसकी बात काट दी। “रहने दे, रहने दे। बहाने मत बना। ज़रा सा सिर क्या दुखने लगा, तुम लड़कियों को तो जैसे पहाड़ टूटने लगता है। हम भी बहुएं थीं, 102 डिग्री बुखार में भी पूरे घर का खाना बनाते थे, मजाल है उफ़ भी निकल जाए। चल जल्दी हाथ चला, पोहा और अदरक वाली चाय बना।”
रश्मि की आँखों में आंसू आ गए। उसने कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप गैस के पास गई। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने माचिस जलाई, पर तीली उसके हाथ से छूट गई।
उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा रहा था। जैसे-तैसे उसने कड़ाही चढ़ाई।
तभी विकास तैयार होकर नीचे आया। “माँ, नाश्ता तैयार है? मुझे लेट हो रहा है,” उसने अपनी घड़ी देखते हुए कहा।
“देख ले अपनी जोरू को। अभी कड़ाही चढ़ाई है। भूखा ही जाना पड़ेगा तुझे आज,” सुशीला देवी ने तंज कसा।
विकास रसोई में आया। उसने रश्मि को देखा। रश्मि का चेहरा लाल पड़ा था और वह पसीने से तर-बतर थी। विकास उसके पास गया और उसका हाथ पकड़ा। रश्मि का हाथ तवे जैसा गर्म था।
“रश्मि! तुम्हें तो बहुत तेज़ बुखार है!” विकास चौंका। “तुम यहाँ क्यों खड़ी हो? तुम्हें तो बिस्तर पर होना चाहिए।”
सुशीला देवी ने तुरंत कहा, “अरे कुछ नहीं हुआ, बस हरारत है। थोड़ा काम करेगी तो पसीना निकलेगा, बुखार उतर जाएगा। तुम मर्दों को ये औरतों के नखरे समझ नहीं आते।”
रश्मि को चक्कर आया और वह विकास की बाहों में झूल गई। विकास ने उसे संभाला और कुर्सी पर बैठाया।
“माँ, यह नखरे नहीं कर रही। यह जल रही है बुखार में। अगर इसे कुछ हो गया तो?” विकास ने पहली बार माँ के सामने आवाज़ ऊंची की।
सुशीला देवी का मुंह बन गया। “हाँ-हाँ, अब तू भी जोरू का गुलाम बन जा। माँ तो दुश्मन है तेरी।”
तभी घर का लैंडलाइन फोन बजा। दीनानाथ जी ने फोन उठाया।
“हेलो?”
दूसरी तरफ से रोने की आवाज़ आई।
“पापा… पापा…”
दीनानाथ जी घबरा गए। “गुड़िया? बेटा क्या हुआ? तू रो क्यों रही है?”
यह सुशीला देवी की बेटी, ‘कोमल’ का फोन था, जो दूसरे शहर में ब्याही थी।
सुशीला देवी दौड़कर फोन के पास आईं। “कोमल? क्या हुआ मेरी बच्ची? सब ठीक तो है ससुराल में?”
उन्होंने स्पीकर ऑन कर दिया ताकि सब सुन सकें।
कोमल सिसकते हुए बोली, “माँ… मुझे कल रात से बहुत तेज़ वायरल फीवर है। डॉक्टर ने कहा है कि रेस्ट की ज़रूरत है। लेकिन… लेकिन मेरी सास कह रही हैं कि आज घर में कीर्तन है और पचास लोगों का खाना मुझे ही बनाना पड़ेगा। मैंने कहा कि मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा, तो वो बोलीं कि नाटक मत कर, काम करने से बुखार भाग जाता है। माँ, मेरा शरीर टूट रहा है… मैं क्या करूँ?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सुशीला देवी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उनकी ममता जाग उठी।
“तेरी सास की इतनी हिम्मत? बीमार बच्ची से काम करवाएगी? तू रुक, मैं अभी फोन करके उनकी खबर लेती हूँ। इंसानियत मर गई है क्या उन लोगों की? उन्हें समझ नहीं आता कि घर की बहू भी इंसान होती है, कोई मशीन नहीं। तू फिक्र मत कर, तू अभी जाकर लेट जा। मैं देखती हूँ तुझे कौन हाथ लगाता है।”
सुशीला देवी गुस्से में बड़बड़ा रही थीं, “कैसे लोग हैं, राक्षस कहीं के! 103 बुखार में लड़की को रसोई में झोंक दिया। शर्म नहीं आती।”
तभी उन्हें महसूस हुआ कि कमरे में बहुत शांति है। उन्होंने पलटकर देखा।
दीनानाथ जी और विकास उन्हें ही देख रहे थे। और रसोई की कुर्सी पर बैठी रश्मि, जो बुखार में तप रही थी, अपनी सास को आश्चर्य और दर्द भरी नज़रों से देख रही थी।
दीनानाथ जी ने धीरे से कहा, “सुशीला, कोमल की सास राक्षस है क्योंकि उसने बीमार बहू से काम करवाया?”
सुशीला देवी तमतमा कर बोलीं, “और नहीं तो क्या? मेरी फूल सी बच्ची वहां तड़प रही है और वो बुढ़िया…”
“और यहाँ जो किसी की ‘फूल सी बच्ची’ तड़प रही है, उसके लिए तुम क्या हो?” दीनानाथ जी ने रश्मि की तरफ इशारा किया।
सुशीला देवी के शब्द गले में ही अटक गए। उनकी नज़र रश्मि पर पड़ी। रश्मि की हालत हूबहू वैसी ही थी जैसी कोमल फोन पर बता रही थी। कांपते हाथ, लाल चेहरा, और बेबसी।
दीनानाथ जी ने आगे कहा, “जब तुम्हारी बेटी बीमार पड़ी, तो तुम्हें उसकी सास ‘राक्षस’ लगी। और जब तुम्हारे घर की बहू बीमार पड़ी, तो तुम्हें वो ‘बहानेबाज’ और ‘कामचोर’ लगी? रश्मि भी तो किसी की कोमल है सुशीला। उसकी माँ को भी अगर पता चलेगा कि तुम 102 बुखार में उससे पोहा बनवा रही हो, तो उनके दिल पर क्या बीतेगी?”
विकास ने भी कहा, “माँ, आप अभी कह रही थीं ना कि काम करने से बुखार उतर जाता है? तो फिर कोमल को आराम करने के लिए क्यों कह रही हैं? उसे भी कहिये कि पचास लोगों का खाना बनाए, पसीना निकलेगा तो ठीक हो जाएगी।”
सुशीला देवी को लगा जैसे किसी ने उनके गाल पर ज़ोरदार तमाचा मारा हो। उनका अपना ही तर्क, उनके अपने ही शब्द, अब उन्हें चुभ रहे थे। जो ममता अपनी बेटी के लिए उमड़ रही थी, वही ममता बहू के लिए क्यों सूख गई थी?
उनके हाथ से फोन का रिसीवर लगभग छूट ही गया। उन्हें अपनी कही बात याद आई—*”बहू के होते हुए भला हम क्यों नाश्ता बनाएंगे?”*
आज उनकी आँखों के सामने से ‘सास’ का पर्दा हट गया था और एक ‘माँ’ और ‘इंसान’ का चेहरा सामने आ गया था।
सुशीला देवी चुपचाप रश्मि के पास गईं। रश्मि डर गई, उसे लगा शायद अब और डांट पड़ेगी। उसने उठने की कोशिश की।
“माँजी, मैं… मैं अभी बनाती हूँ…”
सुशीला देवी ने रश्मि के कंधे पर हाथ रखा और उसे वापस कुर्सी पर बैठा दिया। उन्होंने रश्मि का माथा छुआ। वह सचमुच तवे की तरह जल रहा था।
सुशीला देवी की आँखों में पानी आ गया। “नहीं बेटा। तू कुछ नहीं बनाएगी।”
उन्होंने विकास की ओर देखा। “विकास, इसे कमरे में ले जा। एसी चला और ठंडी पट्टियां रख। मैं डॉक्टर को बुलाती हूँ।”
रश्मि को अपनी कानों पर विश्वास नहीं हुआ। “माँजी… नाश्ता?”
सुशीला देवी की आवाज़ भर्रा गई। “नाश्ता मैं बनाऊँगी। और सिर्फ़ आज नहीं, जब तक तू पूरी तरह ठीक नहीं हो जाती, रसोई में कदम भी नहीं रखेगी। मुझे माफ़ कर दे रश्मि… मैं अपनी बेटी के दर्द में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे तेरे दर्द का अहसास ही नहीं हुआ। मैं भूल गई थी कि तू भी इस घर की बेटी है।”
फिर उन्होंने दीनानाथ जी की ओर देखा। “आप कोमल की सास को फोन लगाइये। और उनसे कहिये कि हम अभी कोमल को लेने आ रहे हैं। और अगर उन्होंने कोमल से काम करवाया, तो पुलिस में शिकायत कर देंगे। और हाँ… मैं रश्मि के लिए सूप बना रही हूँ।”
विकास रश्मि को लेकर ऊपर गया। रश्मि ने मुड़कर देखा, उसकी सास—जो कुछ देर पहले एक तानाशाह लग रही थीं—अब एक माँ की तरह रसोई में सूप की तैयारी कर रही थीं।
कुछ देर बाद, जब रश्मि बिस्तर पर लेटी थी और सुशीला देवी अपने हाथों से उसे सूप पिला रही थीं, तो रश्मि ने धीरे से कहा, “थैंक यू माँ।”
सुशीला देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरा। “थैंक यू मत बोल पगली। मैंने तो बस आज आईने में अपना असली चेहरा देख लिया। कोमल के फोन ने मुझे जगा दिया। वरना मैं तो पाप की भागी बन रही थी।”
उस दिन के बाद उस घर का नियम बदल गया।
अब वहां “बहू के होते हुए हम काम क्यों करें” वाला जुमला नहीं, बल्कि “हम सब मिलकर घर संभालेंगे” वाला मंत्र गूंजने लगा। सुशीला देवी समझ गई थीं कि इज़्ज़त काम करवाने से नहीं, बल्कि अपनी बहू को बेटी जैसा प्यार देने से मिलती है।
जब कोमल ठीक होकर वापस आई और उसने अपनी माँ को रश्मि के साथ हंसते-खेलते और काम में हाथ बंटाते देखा, तो उसने रश्मि के कान में कहा, “भाभी, लगता है मेरे बुखार ने आपके घर का टेम्परेचर सही कर दिया।”
दोनों हंस पड़ीं।
दीनानाथ जी अखबार पढ़ते हुए मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। देर से ही सही, पर उनके घर में ‘इंसानियत’ का नाश्ता अब रोज़ बनने लगा था।
**कहानी के अंत में पाठकों के लिए:**
दोस्तों, यह कहानी सिर्फ़ रश्मि या सुशीला देवी की नहीं है, यह हकीकत है हमारे समाज के हज़ारों घरों की। हम अक्सर भूल जाते हैं कि बहू भी किसी की नाज़ों से पली बेटी है। अगर हम अपनी बेटी के लिए ससुराल में प्यार और इज़्ज़त की उम्मीद करते हैं, तो वही प्यार हमें अपनी बहू को भी देना होगा। बदलाव की शुरुआत अपने घर से होती है।
**सवाल:**
क्या आपके साथ या आपके आस-पास कभी ऐसा हुआ है कि बीमारी में भी बहू से काम की उम्मीद की गई हो? सुशीला देवी का बदलाव आपको कैसा लगा? कमेंट करके ज़रूर बताएं।
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मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश