*”हम अक्सर जिसे ‘कबाड़’ समझकर घर के कोने में फेंक देते हैं, मुसीबत के वक्त वही तिनका हमारी डूबती हुई नाव का सहारा बनता है। पढ़िए एक ऐसी सास की कहानी जिसने अपनी ‘कंजूसी’ से अपने बच्चों की दुनिया खरीद ली।”*
“मम्मी जी, प्लीज! अब इस पुराने, जंग लगे लोहे के संदूक को स्टोर रूम में ही रहने दीजिये। ड्राइंग रूम में सोफे के साथ यह कितना भद्दा लगता है। मेरी किटी पार्टी है आज, और मेरी सहेलियां देखेंगी तो क्या सोचेंगी? कि हम आज भी १८वीं सदी में जी रहे हैं?” सुमेधा ने अपनी सास, कावेरी देवी पर झल्लाते हुए कहा।
कावेरी देवी ने अपने पल्लू से उस पुराने संदूक को पोंछते हुए कहा, “बहु, यह संदूक नहीं, मेरे और तेरे ससुर जी की गृहस्थी की पहली निशानी है। इसमें मेरी यादें हैं, और… और भी बहुत कुछ है जो वक्त आने पर काम आएगा। इसे मैं अपनी नजरों से दूर नहीं कर सकती।”
“ओह गॉड! यादें!” सुमेधा ने माथा पीट लिया। “मम्मी जी, यादें दिल में होती हैं, कबाड़ में नहीं। आप और आपकी ये पुरानी जमावट की आदतें… उफ्फ! आकाश को ऑफिस से आने दीजिये, आज तो फैसला होकर रहेगा। या तो यह कबाड़ घर में रहेगा या फिर मैं मॉडर्न तरीके से रहूंगी।”
कावेरी देवी चुप रह गईं। वे जानती थीं कि सुमेधा दिल की बुरी नहीं है, बस आज कल की चकाचौंध और दिखावे की दुनिया में उसे पुराने लोग और पुरानी चीजें ‘आउटडेटेड’ लगती हैं। सुमेधा को लगता था कि कावेरी देवी बहुत कंजूस हैं। वे सब्जी वाले से दो रुपये के लिए बहस करतीं, पुराने कपड़ों को जोड़कर थैले बनातीं और घर की रद्दी बेचने से जो पैसे मिलते, उन्हें उस जंग लगे संदूक में डाल देती थीं। सुमेधा को यह सब ‘लो क्लास’ लगता था। वह एक हाई-प्रोफाइल लाइफस्टाइल जीना चाहती थी, जिसमें ब्रांडेड कपड़े हों, वीकेंड पार्टीज हों और घर का इंटीरियर किसी फाइव स्टार होटल जैसा हो।
शाम को जब आकाश थका-हारा ऑफिस से लौटा, तो घर में युद्ध का माहौल था। सुमेधा मुंह फुलाए बैठी थी और कावेरी देवी अपनी रामायण पढ़ रही थीं।
“क्या हुआ अब?” आकाश ने टाई ढीली करते हुए पूछा।
“आकाश, मैं अब थक चुकी हूँ,” सुमेधा फट पड़ी। “तुम्हारी माँ को न तो घर के डेकोरेशन की समझ है और न ही मेरे स्टेटस की परवाह। वो पुराना संदूक ड्राइंग रूम के बीचों-बीच रखा है। मेरी फ्रेंड्स मेरा मजाक उड़ाती हैं। मैं चाहती हूँ हम इस घर को रेनोवेट करवाएं और सारा पुराना फर्नीचर और वो कबाड़ बाहर फेंकें। और अगर मम्मी जी को अपने कबाड़ से इतना ही प्यार है, तो वो उसे अपने साथ अपने गाँव ले जा सकती हैं।”
आकाश अपनी माँ और पत्नी के बीच पिसता रहता था। उसने माँ को समझाने की कोशिश की, “माँ, सुमेधा ठीक कह रही है। हम थोड़ा मॉडर्न फर्नीचर ले आते हैं। आप क्यों ज़िद कर रही हैं?”
कावेरी देवी ने चश्मा उतारकर बेटे को देखा। “बेटा, मॉडर्न फर्नीचर से घर सुंदर दिख सकता है, पर घर की नींव पुराने पत्थरों से ही मजबूत रहती है। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। अगर तुम्हें मेरे रहने या मेरे सामान से दिक्कत है, तो मैं अपने कमरे तक ही सीमित रहूँगी।”
सुमेधा ने ताना मारा, “हाँ, वही ठीक रहेगा। वैसे भी आपने जोड़-जोड़ कर रखा ही क्या है? बस पुराने कपड़े और रद्दी। आपके पास देने को है ही क्या जो हम आपसे उम्मीद रखें? बस हमारे स्टैंडर्ड के बीच में मत आया कीजिये।”
उस रात घर में खाना नहीं बना। अगले कुछ हफ्तों तक घर में शीतयुद्ध चलता रहा। सुमेधा ने आकाश को मना लिया कि वे एक नया फ्लैट बुक करें जो शहर के पॉश इलाके में हो।
“आकाश, वहां हम अपनी मर्जी से रह पाएंगे। यहाँ तो हर बात पर रोक-टोक और पुराना राग अलापा जाता है,” सुमेधा ने आकाश के कान भरे। आकाश, जो अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था और घर की रोज-रोज की किचकिच से तंग आ चुका था, मान गया।
उन्होंने एक निर्माणाधीन प्रोजेक्ट में अपनी सारी जमा-पूंजी लगाकर एक लग्जरी फ्लैट बुक कर लिया। कावेरी देवी को जब पता चला, तो वे चुप रहीं। उन्होंने बस इतना कहा, “बेटा, चादर देखकर पैर पसारने चाहिए। इतना बड़ा लोन लेना ठीक नहीं।”
सुमेधा ने तुनक कर कहा, “आप फिर शुरू हो गईं? आप अपनी पुरानी सोच अपने पास रखिये। आकाश की तरक्की आपसे देखी नहीं जा रही क्या?”
कावेरी देवी उस दिन के बाद एकदम शांत हो गईं। आकाश और सुमेधा नए घर के सपनों में खोए थे। लेकिन वक्त को कुछ और ही मंजूर था।
अचानक शेयर बाजार धड़ाम से गिर गया। आकाश ने जिस कंपनी में भारी निवेश किया था और जहाँ वह काम करता था, वहां बड़ा घोटाला सामने आया। रातों-रात कंपनी बंद हो गई। आकाश की नौकरी चली गई और उसने फ्लैट के लिए जो भारी-भरकम लोन लिया था, उसकी किश्तें सिर पर खड़ी हो गईं।
बैंक वालों ने नोटिस भेजना शुरू कर दिया। आकाश ने नई नौकरी ढूँढने की बहुत कोशिश की, लेकिन मंदी के दौर में उसे कहीं काम नहीं मिला। देखते ही देखते छह महीने बीत गए। उनकी सेविंग्स खत्म हो गईं। नौबत यहाँ तक आ गई कि घर का राशन लाने के लिए भी सोचना पड़ने लगा।
सुमेधा का सारा ‘स्टेटस’ और ‘स्टैंडर्ड’ धरा का धरा रह गया। उसकी किटी पार्टी की सहेलियों ने फोन उठाना बंद कर दिया। जिन रिश्तेदारों को वे अपनी कामयाबी दिखाते थे, उन्होंने भी मुँह फेर लिया।
एक शाम बैंक के रिकवरी एजेंट घर आ धमके। वे चिल्ला-चिल्लाकर बात कर रहे थे।
“मिस्टर आकाश, अगर कल तक बकाया दस लाख रुपये जमा नहीं हुए, तो हम आपके इस पुश्तैनी घर को सील कर देंगे और नीलामी की प्रक्रिया शुरू होगी। आपने इस घर के कागज़ात भी गिरवी रखे थे, याद है ना?”
आकाश के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने सुमेधा की ज़िद और अपनी मूर्खता में पिता का बनाया हुआ यह घर भी दांव पर लगा दिया था, यह बात उसने कावेरी देवी से छिपाई थी।
एजेंट्स के जाने के बाद आकाश सोफे पर सिर पकड़कर रोने लगा। सुमेधा भी डरी हुई थी।
“अब क्या होगा आकाश? हम सड़क पर आ जाएंगे। मेरी ज्वेलरी भी इतनी नहीं है कि इतना बड़ा कर्ज उतर सके,” सुमेधा सिसक रही थी। “काश हमने वो फ्लैट बुक न किया होता।”
तभी कावेरी देवी अपने कमरे से बाहर आईं। उनके हाथ में एक चाबी थी। वे धीरे-धीरे उस ‘जंग लगे, भद्दे’ संदूक के पास गईं जिसे सुमेधा हमेशा फेंकना चाहती थी।
“माँ, आप रहने दीजिये। वैसे ही बहुत टेंशन है,” आकाश ने झुंझलाते हुए कहा।
कावेरी देवी ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने कांपते हाथों से संदूक का ताला खोला। ढक्कन खुलने पर एक अजीब सी पुरानी महक आई—नेफ्थलीन बॉल्स और पुराने कागज़ों की महक।
सुमेधा ने सोचा कि अब सास अपने पुराने कपड़े निकालकर रोना-धोना शुरू करेंगी।
लेकिन कावेरी देवी ने कपड़ों की तह हटाई और नीचे से एक मखमली पोटली और कुछ पीले पड़ चुके लिफाफे निकाले। उन्होंने वह पोटली आकाश के सामने मेज पर रख दी।
“खोल इसे,” कावेरी देवी ने आदेश दिया।
आकाश ने पोटली खोली। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसमें सोने के पुराने सिक्के (गिन्नियां) और मोटे-मोटे सोने के कंगन थे। और उन लिफाफों में… उन लिफाफों में पुराने समय के बॉन्ड्स और फिक्स्ड डिपॉजिट के कागज़ात थे, जो अब मैच्योर हो चुके थे।
“यह… यह सब क्या है माँ?” आकाश हकलाया।
“बेटा, जब तेरे पापा नहीं रहे थे, तब लोगों ने कहा था कि कावेरी अब क्या करेगी? यह तो अनपढ़ है, घर कैसे चलाएगी? लेकिन मैं जानती थी कि जीवन में बुरा वक्त बताकर नहीं आता। मैं जो सब्जी वाले से दो-दो रुपये बचाती थी, घर का कबाड़ बेचती थी, अपनी साड़ियाँ नहीं खरीदती थी… वो सब बचा-बचाकर मैंने ये गिन्नियां खरीदी थीं। तेरे पापा ने जो थोड़ा पैसा छोड़ा था, उसे मैंने इन कागज़ों (बॉन्ड्स) में लगा दिया था। मैं बस इंतज़ार कर रही थी कि जब तुझे सच में ज़रूरत होगी, तब यह तुझे दूँगी।”
सुमेधा पत्थर की मूरत बनी खड़ी थी। वह जिस संदूक को ‘कबाड़’ समझती थी, वह असल में उनकी इज़्ज़त बचाने वाली तिजोरी थी। वह जिस सास को ‘कंजूस’ और ‘आउटडेटेड’ समझती थी, उनकी उसी कंजूसी ने आज उन्हें सड़क पर आने से बचा लिया था।
कावेरी देवी ने सुमेधा की ओर देखा और नरम आवाज़ में बोली, “बहु, तू हमेशा कहती थी ना कि मेरे पास देने को क्या है? मेरे पास बस यही ‘पुराने ख्यालात’ और यह ‘कबाड़’ था। मुझे माफ़ करना अगर यह तुम्हारे मॉडर्न सोफे के साथ मैच नहीं हुआ। लेकिन आज यह तुम्हारी छत ज़रूर बचा लेगा।”
सुमेधा फूट-फूट कर रो पड़ी। वह दौड़कर कावेरी देवी के पैरों में गिर गई। “मम्मी जी, मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं बहुत बुरी हूँ। मैंने आपके त्याग को कंजूसी समझा। मैंने आपकी सादगी को गंवारपन समझा। मैं अंधी हो गई थी दिखावे में। प्लीज मुझे माफ़ कर दीजिये।”
कावेरी देवी ने उसे उठाकर गले लगा लिया। “पगली, माँ से माफ़ी नहीं मांगते। बस याद रखना, नए जमाने के साथ चलना अच्छी बात है, लेकिन पुरानी जड़ों को काटोगे तो पेड़ खड़ा नहीं रह पाएगा। यह संदूक सिर्फ लोहे का डिब्बा नहीं है, यह एक माँ का अपने बच्चों के लिए जोड़ा हुआ ‘सुरक्षा कवच’ है।”
आकाश की आँखों से आंसू बह रहे थे। उन पैसों से न केवल बैंक का कर्ज़ उतरा, बल्कि आकाश को अपना छोटा व्यापार शुरू करने के लिए पूंजी भी मिल गई।
उस दिन के बाद, सुमेधा ने घर का इंटीरियर नहीं बदला। वह जंग लगा संदूक आज भी ड्राइंग रूम में शान से रखा है। जब भी कोई मेहमान आता है और उस संदूक के बारे में पूछता है, तो सुमेधा गर्व से कहती है, **”यह हमारे घर का सबसे कीमती फर्नीचर है। यह मेरी सासू माँ का आशीर्वाद है।”**
घर अब ‘मॉडर्न’ नहीं था, लेकिन उसमें ‘सुकून’ और ‘सम्मान’ की जो चमक थी, वह किसी भी फाइव स्टार होटल से ज्यादा थी।
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**निष्कर्ष:**
दोस्तों, अक्सर हम अपने बुजुर्गों की बचत करने की आदत और पुरानी चीजों को सहेजने की वृत्ति का मजाक उड़ाते हैं। हमें लगता है कि वे समय के साथ चल नहीं पा रहे हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि उन्होंने जीवन के वो धूप-छांव देखे हैं, जो अभी हमारी कल्पना से परे हैं। उनका अनुभव और उनकी छोटी-छोटी बचत ही वो नींव है जिस पर हमारी आलीशान जिंदगी की इमारत खड़ी होती है। कभी भी किसी को उसके पहनावे या पुरानी सोच से मत आंकिये, क्योंकि वक्त आने पर वही ‘पुराना’ सबसे ‘नया’ जीवनदान दे सकता है।
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मूल लेखिका : अर्चना खंडेलवाल