*समाज कहता था कि जिसका अपना खून नहीं, वह वारिस कैसा? लेकिन उस सास ने भरी पंचायत में अपनी बहू के आंसू पोंछकर साबित कर दिया कि माँ बनने के लिए कोख की नहीं, कलेजे की ज़रूरत होती है।*
“राघव, आप दूसरी शादी कर लीजिये,” सुमन ने सिसकते हुए कहा। “मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से आपके वंश का अंत हो। बुआ जी सही कह रही थीं। मैं अभागन हूँ।”
“पागल हो गई हो क्या सुमन?” राघव ने उसे डांटा। “बच्चा होना या न होना हमारे हाथ में नहीं है। मैं तुमसे प्यार करता हूँ, किसी बच्चे की वजह से नहीं। हम ऐसे ही खुश रह लेंगे।”
“लेकिन समाज? मम्मी जी? पापा जी? उनका क्या? वो तो पोते का मुंह देखना चाहते हैं न?” सुमन का गला रुंध गया।
बनारस के घाटों पर गूंजती घंटियों की आवाज़ आज ‘रघुवंशी सदन’ की खामोशी को नहीं तोड़ पा रही थी। घर के बाहर तो चहल-पहल थी, लेकिन अंदर का माहौल किसी तूफ़ान से पहले की शांति जैसा था। यह रघुनंदन जी और सावित्री देवी का घर था, जो शहर के प्रतिष्ठित कपड़ा व्यापारी थे। उनका बेटा राघव और बहू सुमन, दोनों ही संस्कारी और सुलझे हुए थे। शादी को सात साल हो चुके थे।
सात साल… सुनने में छोटा अरसा लगता है, लेकिन सुमन के लिए यह सात साल किसी वनवास से कम नहीं थे। शादी के पहले दो साल तो हंसी-खुशी बीते, लेकिन जैसे ही तीसरा साल शुरू हुआ, रिश्तेदारों और पड़ोसियों की ज़ुबान कैंची की तरह चलने लगी।
“अरे सावित्री, अब तो पोते का मुंह दिखा दो।”
“सुमन, किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाया या नहीं?”
“लगता है तुम्हारे घर का चिराग बुझने वाला है।”
शुरुआत में ये बातें दबी ज़ुबान में होती थीं, लेकिन अब तो लोग सुमन के सामने ही ताने मारने लगे थे। सुमन और राघव ने हर मुमकिन कोशिश की। बड़े से बड़े डॉक्टर, महंगे से महंगे इलाज, यहाँ तक कि सावित्री देवी के कहने पर कई मन्नतें भी मांगीं। लेकिन मेडिकल रिपोर्ट का सच पत्थर की लकीर बन गया था—सुमन कभी माँ नहीं बन सकती थी।
उस दिन घर में सत्यनारायण की कथा थी। रघुनंदन जी की बड़ी बहन, यानी राघव की बुआ ‘कांता जी’ आई हुई थीं। कांता जी का स्वभाव ही था जले पर नमक छिड़कना। पूजा खत्म होने के बाद जब सुमन प्रसाद बांट रही थी, तो कांता जी ने जानबूझकर ज़ोर से कहा, “अरे सावित्री, प्रसाद तो ठीक है, पर वंश आगे बढ़ाने की क्या सोची है? यह कोठी, यह जायदाद क्या ट्रस्ट को दान करोगी? बहू की गोद तो भरने से रही, अब तो राघव की दूसरी शादी के बारे में सोचो। अभी लड़का जवान है, देर नहीं हुई है।”
सुमन के हाथ से प्रसाद की थाली छूटते-छूटते बची। उसका चेहरा पीला पड़ गया। राघव ने कुछ कहना चाहा, “बुआ जी…” लेकिन सुमन वहां से रोते हुए अपने कमरे में भाग गई।
सावित्री देवी, जो अब तक चुपचाप बैठी थीं, उन्होंने अपनी ननद को एक तीखी नज़र से देखा, लेकिन उस वक्त कुछ नहीं बोलीं। मेहमानों के जाने के बाद रात को घर में सन्नाटा था। राघव सुमन को चुप कराने की कोशिश कर रहा था, लेकिन सुमन का रोना नहीं रुक रहा था।
“राघव, आप दूसरी शादी कर लीजिये,” सुमन ने सिसकते हुए कहा। “मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से आपके वंश का अंत हो। बुआ जी सही कह रही थीं। मैं अभागन हूँ।”
“पागल हो गई हो क्या सुमन?” राघव ने उसे डांटा। “बच्चा होना या न होना हमारे हाथ में नहीं है। मैं तुमसे प्यार करता हूँ, किसी बच्चे की वजह से नहीं। हम ऐसे ही खुश रह लेंगे।”
“लेकिन समाज? मम्मी जी? पापा जी? उनका क्या? वो तो पोते का मुंह देखना चाहते हैं न?” सुमन का गला रुंध गया।
तभी दरवाजे पर एक दस्तक हुई। सावित्री देवी खड़ी थीं। उनके चेहरे पर एक गम्भीरता थी जिसे पढ़ पाना मुश्किल था। सुमन और राघव दोनों खड़े हो गए। सुमन ने जल्दी से अपने आंसू पोंछे।
“मम्मी जी, आप? कुछ चाहिए था?” सुमन ने कांपती आवाज़ में पूछा।
सावित्री देवी कमरे में आईं और बिस्तर पर बैठ गईं। “सुमन, इधर आ मेरे पास।”
सुमन डरते-डरते उनके पास जाकर बैठ गई। उसे लगा कि अब सास भी वही कहेंगी जो बुआ जी कह रही थीं। आखिर हर सास को वारिस चाहिए होता है।
सावित्री देवी ने सुमन का चेहरा अपने हाथों में लिया। “आज कांता ने जो कहा, उसका तुझे बुरा लगा?”
सुमन की आँखों से फिर झर-झर आंसू बह निकले। उसने सिर झुका लिया।
“सुमन, रोना बंद कर। आंसू कमजोरों का हथियार होते हैं और मेरे घर की बहू कमजोर नहीं है,” सावित्री देवी की आवाज़ में एक दृढ़ता थी। “सुन, मैं और तेरे ससुर जी पिछले कुछ दिनों से एक बात सोच रहे थे। हमें वारिस चाहिए, यह सच है। हमें इस घर में बच्चों की किलकारियां चाहिए, यह भी सच है। लेकिन उसके लिए राघव दूसरी शादी करे, यह न तो धर्म है और न ही न्याय।”
सुमन और राघव ने हैरानी से सावित्री देवी को देखा।
“तो फिर माँ? क्या रास्ता है?” राघव ने पूछा।
सावित्री देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से एक ब्रोशर (Pamphlet) निकाला। यह शहर के एक अनाथालय ‘वात्सल्य छाया’ का ब्रोशर था।
“राघव, सुमन… क्या यशौदा ने कृष्ण को जन्म दिया था? नहीं न? फिर भी दुनिया कृष्ण को यशौदा-नंदन कहती है। माँ वो नहीं होती जो बच्चे को जन्म देती है, माँ वो होती है जो बच्चे को जीवन देती है। अगर तुम्हारी कोख सूनी है, तो क्या हुआ? अनाथालय में ऐसे हज़ारों बच्चे हैं जिनकी दुनिया सूनी है। क्यों न तुम दोनों किसी एक बच्चे की दुनिया भर दो?”
सुमन को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। एक पुराने ख्यालात वाली सास, जो पूजा-पाठ और संस्कारों में इतना विश्वास रखती थी, वह गोद लेने (Adoption) की बात कर रही थी?
“लेकिन मम्मी जी… समाज? बुआ जी? वो लोग क्या कहेंगे? वो कहेंगे कि खून का रिश्ता नहीं है, पता नहीं किसकी औलाद है, कैसी जात है?” सुमन ने अपनी सबसे बड़ी आशंका जताई।
सावित्री देवी खड़ी हो गईं। उनका कद अचानक बहुत बड़ा लगने लगा। “समाज का काम है कहना। जब सीता मैया को नहीं बख्शा, तो हम क्या चीज़ हैं? और रही बात खून के रिश्ते की, तो सुन सुमन… प्यार का रिश्ता खून के रिश्ते से बड़ा होता है। तू मेरी सगी बेटी नहीं है, पर मैंने तुझे बेटी माना है न? तो क्या हमारा रिश्ता झूठा है? जब तू उस बच्चे को सीने से लगाएगी, तो वो अपने आप हमारे कुल का दीपक बन जाएगा। तुझे बस ‘हाँ’ कहनी है, बाकी दुनिया से निपटने के लिए यह ‘सावित्री’ अभी ज़िंदा है।”
सुमन उठकर अपनी सास के गले लग गई और फूट-फूट कर रोई। आज उसके आंसू दुख के नहीं, बल्कि राहत और खुशी के थे।
एक महीने बाद, राघव और सुमन ‘वात्सल्य छाया’ गए। वहां एक तीन साल की बच्ची थी, ‘गुड़िया’। बड़ी-बड़ी आँखें, घुंघराले बाल, और गाल पर एक छोटा सा काला तिल। जैसे ही सुमन ने उसे देखा, गुड़िया ने दौड़कर सुमन की उंगली पकड़ ली। उस नन्हे स्पर्श ने सुमन के अंदर सोई हुई ममता को एक पल में जगा दिया। कागजी कार्रवाई पूरी हुई और जिस दिन गुड़िया घर आने वाली थी, उस दिन सावित्री देवी ने घर को दुल्हन की तरह सजवाया।
उन्होंने एक बड़ा आयोजन रखा—’दतक ग्रहण समारोह’ (Adoption Ceremony)। शहर के सभी रिश्तेदारों, पड़ोसियों और यहाँ तक कि कांता बुआ को भी न्योता दिया गया।
घर के आंगन में हवन चल रहा था। सुमन और राघव हवन कुंड के सामने बैठे थे, और उनकी गोद में गुलाबी फ्रॉक पहने गुड़िया बैठी थी, जो अब ‘अनन्या’ बन चुकी थी। पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे।
तभी कांता बुआ, जो अब तक मुंह फुलाए बैठी थीं, बीच में बोल पड़ीं, “अरे सावित्री, यह सब क्या नौटंकी है? अनाथालय से लायी हुई लड़की के लिए इतना तामझाम? और कैसी पूजा? इसका गोत्र क्या है? कुल क्या है? किसका खून है यह? इसे तुम रघुवंशी खानदान का नाम दोगी? यह तो अधर्म है!”
पूरे मंडप में सन्नाटा छा गया। मेहमान कानाफूसी करने लगे। “हाँ भाई, बात तो सही है। पता नहीं कौन है, कहाँ से आई है।”
सुमन ने अनन्या को कसकर अपनी छाती से लगा लिया, जैसे उसे दुनिया की बुरी नज़रों से बचा रही हो। राघव गुस्से में खड़ा होने ही वाला था कि सावित्री देवी ने उसे हाथ के इशारे से रोक दिया।
सावित्री देवी अपनी जगह से उठीं और कांता बुआ के सामने जाकर खड़ी हो गईं। माइक हाथ में लिया ताकि उनकी आवाज़ हर उस शख्स तक पहुंचे जिसके मन में यह सवाल था।
“कांता दीदी,” सावित्री देवी की आवाज़ में शेरनी जैसी दहाड़ और माँ जैसी नरमी दोनों थी। “आप पूछ रही हैं इसका गोत्र क्या है? इसका खून किसका है? तो सुनिए… आज, अभी और इसी वक्त, अग्नि को साक्षी मानकर मैं कहती हूँ कि इसका गोत्र ‘मानवता’ है और इसका खून ‘प्रेम’ का है।”
उन्होंने अनन्या को सुमन की गोद से लेकर अपनी गोद में उठाया और सबके सामने खड़ी हो गईं।
“आप लोग कहते हैं कि अपना खून ही वारिस होता है? मैंने ऐसे कई ‘सगे’ बेटे देखे हैं जिन्होंने अपने बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रम में फेंक दिया। और मैंने ऐसे कई गोद लिए बच्चे देखे हैं जिन्होंने अपने माँ-बाप को भगवान की तरह पूजा। रिश्ता खून में नहीं, संस्कारों में होता है। यह बच्ची आज से रघुवंशी खानदान की बेटी है। और रही बात अधर्म की, तो एक अनाथ को छत देना, उसे नाम देना और उसे जीवन देना… अगर यह अधर्म है, तो मुझे यह अधर्म सौ बार मंजूर है।”
फिर सावित्री देवी ने कांता बुआ की आँखों में आँखें डालकर कहा, “दीदी, आप कह रही थीं कि राघव की दूसरी शादी करा दूं? क्यों? सिर्फ़ वंश के लिए? क्या एक औरत सिर्फ़ बच्चे पैदा करने की मशीन है? मेरी बहू सुमन इस घर की लक्ष्मी है। अगर लक्ष्मी खुश नहीं, तो घर में बरकत कैसे होगी? मुझे पोता या पोती चाहिए थी, जो मुझे मिल गई। यह मेरी अनन्या है। और आज के बाद अगर किसी ने मेरी पोती या मेरी बहू के खिलाफ एक शब्द भी कहा, तो समझ लेना कि उसका रिश्ता इस घर से हमेशा के लिए खत्म है।”
पंडाल में एक पल की खामोशी के बाद तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। जो लोग कल तक सुमन को ‘बांझ’ कहकर ताने मार रहे थे, आज सावित्री देवी के इस रूप को देखकर नतमस्तक थे। कांता बुआ का चेहरा शर्म से लाल हो गया था, वे चुपचाप अपनी कुर्सी पर बैठ गईं।
रघुनंदन जी अपनी पत्नी को गर्व से देख रहे थे। सुमन की आँखों में अब आंसू नहीं, बल्कि एक अजीब सा सुकून और आत्मविश्वास था। उसे पता था कि जब तक उसकी सासू माँ उसके साथ हैं, दुनिया की कोई ताकत उसकी खुशियों को नज़र नहीं लगा सकती।
हवन पूरा हुआ। अनन्या ने अपनी तोतली आवाज़ में सावित्री देवी को “दादी” कहा, और उस एक शब्द ने सावित्री देवी की सारी तपस्या सफल कर दी।
वक्त बीतता गया। अनन्या अब घर की जान थी। दादा जी की छड़ी वही ढूंढती, दादी को दवाई वही देती। सुमन और राघव की ज़िंदगी खुशियों से भर गई थी। लोग धीरे-धीरे भूल गए कि वह गोद ली हुई है, क्योंकि अनन्या के संस्कारों में रघुनंदन सदन की छाप साफ़ दिखाई देती थी।
पांच साल बाद, अनन्या ने स्कूल की रेस में गोल्ड मेडल जीता। जब वह मेडल लेकर मंच से उतरी, तो सबसे पहले अपनी माँ सुमन के पास नहीं, बल्कि अपनी दादी सावित्री देवी के पास दौड़ी।
“दादी, देखो मैं जीत गई!”
सावित्री देवी ने उसे गले लगाया और कांता बुआ (जो अब कभी-कभी आती थीं) की तरफ देखकर मुस्कुराईं।
“देख लो दीदी, यह है मेरा खून। यह है मेरी परवरिश। कोई शक?”
कांता बुआ ने भी मुस्कुराकर अनन्या के सिर पर हाथ फेरा। “नहीं सावित्री, तू जीत गई। तूने साबित कर दिया कि कोख से बड़ा दिल होता है।”
उस शाम, सावित्री देवी ने सुमन से कहा, “देख सुमन, लोग कहते हैं कि सास कभी माँ नहीं बन सकती। पर सच तो यह है कि जब बहू, बेटी बन जाती है न, तो सास को माँ बनना ही पड़ता है। हमने दुनिया की नहीं सुनी, अपने दिल की सुनी, इसलिए आज हमारा आंगन महक रहा है।”
दोस्तों, यह कहानी सिर्फ़ सावित्री और सुमन की नहीं है। यह हर उस घर की कहानी हो सकती है जहाँ एक औरत दूसरी औरत का हाथ थाम ले। अगर सास अपनी बहू के साथ खड़ी हो जाए, तो समाज की क्या मजाल कि वो घर की खुशियों में ज़हर घोल सके। वंश खून से नहीं, बल्कि प्यार और विश्वास से आगे बढ़ता है।
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मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश