*”एक सास ने हीरे की अंगूठी चुराकर रिश्तों में कांच की दरार डालनी चाही, पर उसे नहीं पता था कि उसकी बहुओं का विश्वास उस हीरे से भी ज्यादा खरा और अटूट है।”*
रसोई घर से आती खिलखिलाहट की आवाजें गायत्री देवी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं। वह अपने कमरे में बैठी माला जप रही थीं, लेकिन उनका ध्यान ईश्वर में कम और रसोई में चल रही अपनी दोनों बहुओं, मीरा और रिया की बातों पर ज्यादा था।
आम तौर पर सासें चाहती हैं कि घर में शांति रहे, लेकिन गायत्री देवी की समस्या यह थी कि उनके घर में ‘कुछ ज्यादा ही’ शांति और प्रेम था। बड़ी बहू मीरा को आए हुए पांच साल हो चुके थे और छोटी बहू रिया अभी छह महीने पहले ही आई थी। मीरा स्वभाव से बेहद सरल, कम पढ़ी-लिखी और गृहकार्य में दक्ष थी। वहीं रिया, एमबीए पास, एक मल्टीनेशनल कंपनी में एच.आर. मैनेजर थी और आधुनिक ख्यालों की थी।
गायत्री देवी ने रिया के आने से पहले ही एक पटकथा तैयार कर ली थी। उन्हें लगा था कि रिया के आते ही घर में ‘स्टेटस’ की लड़ाई शुरू होगी। मीरा को हीन भावना महसूस होगी और रिया को घमंड आएगा। तब गायत्री देवी दोनों के बीच “पंच” बनकर राज करेंगी। लेकिन हुआ इसके ठीक उलट।
रिया ने आते ही मीरा को ‘दीदी’ कम और ‘माँ’ का दर्जा ज्यादा दे दिया।
“दीदी, आपकी हाथ की बनी तोरई की सब्जी में भी शाही पनीर वाला स्वाद कैसे आता है?” रिया अक्सर मीरा से लिपटते हुए पूछती।
और मीरा, रिया की बलाएं लेती हुई कहती, “तू बस ऑफिस से थक कर मत आया कर, तेरे चेहरे की ये थकान मुझसे देखी नहीं जाती।”
गायत्री देवी को यह एकता खटकने लगी थी। उन्हें डर था कि अगर ये दोनों एक हो गईं, तो घर में उनकी सत्ता, उनका वर्चस्व खत्म हो जाएगा। उन्हें वो पुराना ज़माना याद आता जब सास की एक आवाज़ पर बहुएं थर्राती थीं। यहाँ तो हाल यह था कि अगर वो मीरा को डांटतीं, तो रिया ढाल बनकर खड़ी हो जाती, और रिया को कुछ कहतीं, तो मीरा आँखों में आंसू लिए मान-मनौव्वल करने लगती।
एक दिन मौका देखकर गायत्री देवी मीरा के पास गईं। मीरा चावल बीन रही थी।
“बहू, एक बात कहूँ? तू बुरा तो नहीं मानेगी?” गायत्री देवी ने बहुत ही सधे हुए स्वर में शुरुआत की।
“अरे माँ जी, आप कैसी बातें कर रही हैं? आप बड़ों की बात का क्या बुरा मानना,” मीरा ने सरलता से कहा।
“देख, तू तो भोली है। तुझे दुनियादारी की समझ नहीं है। यह रिया है न, यह बहुत चालाक है। कल मैंने उसे अपनी माँ से फोन पर बात करते सुना। कह रही थी कि ‘मेरी जेठानी तो बिल्कुल अनपढ़ गंवार है, उसे तो कुछ समझ ही नहीं आता। मैं जो पुरानी साड़ियाँ और मेकअप का सामान उसे देती हूँ, वो उसे ही पाकर ऐसे खुश हो जाती है जैसे खज़ाना मिल गया हो।'”
मीरा का हाथ एक पल के लिए रुका। उसके चेहरे पर दुख की परछाई आई, लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। “माँ जी, रिया अभी बच्ची है। नए जमाने की है, शायद उसे मेरा रहन-सहन पुराना लगता हो। पर दिल की बुरी नहीं है।”
गायत्री देवी चिढ़ गईं। यह तीर निशाने पर नहीं लगा।
अगले दिन उन्होंने रिया को निशाना बनाया। रिया ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रही थी।
“रिया बेटा, थोड़ा संभल कर रहा कर। यह मीरा ऊपर से जितनी मीठी बनती है, अंदर से उतनी ही ज़हरीली है। उसे तेरी तरक्की और तेरे पैसों से जलन होती है। कल कह रही थी कि ‘छोटे घर की है, इसलिए इतना पैसा देखकर दिमाग खराब हो गया है। घर का काम करने में इसे शर्म आती है।'”
रिया ने अपनी घड़ी बांधी और मुस्कुराई, “मम्मी जी, दीदी शायद काम के बोझ से थक जाती होंगी, इसलिए ऐसा कह दिया होगा। मैं कोशिश करूँगी कि संडे को उनकी मदद कर सकूँ।”
गायत्री देवी ने अपना माथा पीट लिया। यह दोनों बहुएं थीं या फेविकोल का जोड़? टूटने का नाम ही नहीं ले रही थीं। उन्होंने समझ लिया कि छोटी-मोटी चुगलियों से काम नहीं बनेगा। अब कुछ बड़ा करना होगा। कुछ ऐसा जो इनके चरित्र और ईमानदारी पर चोट करे।
त्यौहारों का मौसम आ रहा था। दिवाली की सफाई शुरू हो चुकी थी। रिया ने अपनी पहली दिवाली के लिए एक बहुत कीमती हीरे की अंगूठी खरीदी थी। वह अंगूठी उसने बड़ी संभालकर अपनी अलमारी के लॉकर में रखी थी, जिसकी जानकारी सिर्फ मीरा और गायत्री देवी को थी क्योंकि एक बार चाबी खोने पर मीरा ने ही डुप्लीकेट चाबी बनवाने में मदद की थी।
योजना गायत्री देवी के दिमाग में बिजली की तरह कौंधी।
एक दोपहर, जब रिया ऑफिस में थी और मीरा छत पर पापड़ सुखा रही थी, गायत्री देवी ने रिया के कमरे में जाकर उसकी अलमारी से वह हीरे की अंगूठी निकाल ली। फिर दबे पाँव मीरा के कमरे में गईं और मीरा के कपड़ों की तह के बीच उस अंगूठी को छिपा दिया।
शाम को जब रिया लौटी, तो गायत्री देवी ने बहुत मासूमियत से कहा, “रिया बेटा, दिवाली आ रही है। तूने वो अंगूठी ली थी, एक बार पहन कर तो दिखा, मैं देखना चाहती थी कि मेरी बहू पर कैसी लगती है।”
रिया खुश होकर अपने कमरे में गई। पांच मिनट बाद वह घबराई हुई बाहर आई।
“मम्मी जी, अंगूठी वहां नहीं है! मैंने बॉक्स में ही रखी थी।”
गायत्री देवी ने अपनी आँखों में बनावटी आश्चर्य भरा। “अरे! ऐसे कैसे हो सकता है? घर में तो कोई बाहरी आया भी नहीं। नौकरानी भी आज छुट्टी पर थी।”
फिर उन्होंने तीखी नज़र मीरा की तरफ डाली, जो रसोई से चाय लेकर आ रही थी।
“मीरा, तू दोपहर में रिया के कमरे में झाड़ू लगाने गई थी न?”
मीरा सकपका गई, “हाँ माँ जी, वो रिया के कमरे की डस्टिंग रह गई थी तो…”
“तो क्या तूने अलमारी खोली थी?” गायत्री देवी ने आवाज़ ऊंची की।
“नहीं माँ जी! मैं अलमारी क्यों खोलूँगी?” मीरा की आँखों में आंसू आ गए।
“रिया, मुझे शक तो नहीं करना चाहिए, लेकिन घर में हम तीन ही लोग हैं। मैं तो तेरे कमरे में गई नहीं। अब बची मीरा। और सच कहूँ तो उस दिन मीरा कह रही थी कि ‘रिया के पास इतना पैसा है, एक अंगूठी कम भी हो जाए तो क्या फर्क पड़ता है’।”
रिया चुपचाप खड़ी थी। गायत्री देवी ने आग में घी डाला, “अगर मन में मैल नहीं है तो मीरा, तू अपनी अलमारी चेक क्यों नहीं करवा देती? दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।”
मीरा का स्वाभिमान तड़प उठा। “अगर आपको मुझ पर इतना ही शक है, तो देख लीजिये मेरी अलमारी।”
गायत्री देवी, रिया और मीरा तीनों मीरा के कमरे में गए। गायत्री देवी ने खुद लपककर अलमारी खोली और कपड़ों को उलट-पुलट करना शुरू किया। और वही हुआ जो तय था। मीरा की लाल साड़ी की तह से वह चमकती हुई हीरे की अंगूठी नीचे गिरी।
कमरे में सन्नाटा छा गया। मीरा पत्थर की मूर्ति बन गई। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
“यह… यह मैंने नहीं किया रिया! विश्वास कर मेरा, मुझे नहीं पता यह यहाँ कैसे आई!” मीरा रो पड़ी।
गायत्री देवी ने विजय मुस्कान के साथ रिया की ओर देखा। “देख लिया? मैं कहती थी न कि यह जलती है तुझसे। ऊपर से सती-सावित्री बनती है और अंदर से चोर है। आज इसने अंगूठी चुराई है, कल तिजोरी साफ़ कर देगी।”
रिया ने ज़मीन से अंगूठी उठाई। वह कुछ देर तक अंगूठी को देखती रही, फिर उसने मीरा की ओर देखा जो फूट-फूट कर रो रही थी और फिर गायत्री देवी की ओर, जिनके चेहरे पर एक क्रूर संतोष था।
रिया ने एक गहरी सांस ली।
“दीदी, आप रोना बंद कीजिये,” रिया की आवाज़ बेहद सख्त थी।
गायत्री देवी को लगा अब तमाशा होगा। अब रिया मीरा को खरी-खोटी सुनाएगी।
लेकिन रिया ने मीरा का हाथ पकड़ा और बोली, “मम्मी जी, यह अंगूठी दीदी ने नहीं चुराई।”
गायत्री देवी हक्की-बक्की रह गईं। “तू पागल हो गई है? अंगूठी इसकी साड़ी से मिली है और तू कह रही है इसने नहीं चुराई?”
“हाँ माँ जी,” रिया ने शांति से कहा। “क्योंकि यह अंगूठी नकली है। जो असली हीरे की अंगूठी थी, वो मैंने कल ही बैंक के लॉकर में रख दी थी। यह तो बस एक इमिटेशन (नकली) ज्वेलरी है जो मैं बाज़ार से 500 रुपये में लाई थी। दीदी को असली और नकली हीरे की परख नहीं है, लेकिन जिसने भी इसे चुराया, उसे लगा यह असली है।”
गायत्री देवी का चेहरा पीला पड़ गया। पसीने की बूंदें उनके माथे पर चमकने लगीं।
“और दूसरी बात,” रिया ने गायत्री देवी की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “दोपहर में मेरे फोन पर घर के सीसीटीवी का नोटिफिकेशन आया था। मैंने हाल ही में अपने कमरे में एक कैमरा लगवाया था, अपनी ज्वैलरी की सुरक्षा के लिए। मैंने अभी तक फुटेज चेक नहीं किया था, लेकिन अब लगता है करना पड़ेगा।”
सीसीटीवी का नाम सुनते ही गायत्री देवी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह कांपने लगीं। कैमरा? उन्हें तो पता ही नहीं था।
“नहीं… नहीं… कैमरे की क्या ज़रूरत है?” गायत्री देवी हड़बड़ा गईं। “हो सकता है… हो सकता है मैंने ही गलती से रख दी हो… मुझे याद आ रहा है, मैं सफाई कर रही थी तो…”
मीरा, जो अब तक रो रही थी, अब सब समझ चुकी थी। वह हैरान होकर अपनी सास को देख रही थी। रिया ने मीरा को आंख मारी। (हकीकत यह थी कि कोई कैमरा नहीं था और अंगूठी भी असली ही थी। रिया ने अपनी सास के चेहरे के भाव पढ़ लिए थे और एक दांव खेला था।)
रिया ने हंसते हुए कहा, “मम्मी जी, आप भी न! इतनी बड़ी बात भूल गईं? और दीदी पर चोरी का इल्जाम लगा दिया?”
फिर रिया का स्वर गंभीर हो गया। “मम्मी जी, मैंने कोई कैमरा नहीं लगवाया और यह अंगूठी भी असली है। मैंने सिर्फ झूठ बोला ताकि असली चोर का चेहरा सामने आ सके। मुझे दीदी पर खुद से ज्यादा भरोसा है। अगर यह अंगूठी उनकी जेब से मिलती, तो मैं यही मानती कि मेरी ही जेब फटी होगी, पर दीदी चोर नहीं हो सकतीं।”
मीरा दौड़कर रिया के गले लग गई। दोनों रने लगीं। गायत्री देवी शर्म से गड़ी जा रही थीं। उनका दांव उल्टा पड़ चुका था।
उस शाम, घर के पुरुष—मीरा के पति ‘रमन’ और रिया के पति ‘समीर’—जब घर लौटे, तो माहौल बदला हुआ था। लेकिन बहुओं ने समझदारी दिखाई। उन्होंने पतियों को कुछ नहीं बताया।
रात के खाने के बाद, रिया और मीरा गायत्री देवी के कमरे में गईं। गायत्री देवी डर गई थीं कि अब ये दोनों बेटों से शिकायत करेंगी।
मीरा ने उनके पैर दबाते हुए कहा, “माँ जी, हमें तोड़ने के लिए आपको इतना नाटक करने की ज़रूरत नहीं थी। आप बस कह देतीं, हम वैसे ही अलग हो जाते। लेकिन एक बात याद रखियेगा, दीवारों के अलग होने से दिल अलग नहीं होते।”
रिया ने कहा, “मम्मी जी, आप घर की नींव हैं। अगर नींव ही दीवारों को गिराने की साजिश करेगी, तो छत (बेटे) कैसे टिकेंगे? हम दोनों अलग-अलग नहीं हैं, हम आपकी ही दो लाठियां हैं। एक को तोड़ेंगी तो आप ही कमजोर होंगी।”
गायत्री देवी की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उन्होंने दोनों के हाथ पकड़ लिए। “मुझे माफ़ कर दो। मुझे लगा मेरी अहमियत कम हो जाएगी। मुझे ईर्ष्या हो गई थी तुम दोनों के प्यार से। मैं भूल गई थी कि सास का मान डर से नहीं, प्यार से बढ़ता है।”
उस दिन के बाद से गायत्री देवी ने अपनी साजिशों की डायरी बंद कर दी। अब वह मोहल्ले में गर्व से कहती हैं, “मेरी बहुएं बहुएं नहीं, सगी बहनें हैं। राम-लक्ष्मण की जोड़ी तो सुनी होगी, मेरे घर में सीता-उर्मिला की जोड़ी है।”
अब भी कभी-कभी मीरा और रिया आपस में लड़ती हैं, लेकिन अब गायत्री देवी आग नहीं लगातीं, बल्कि पानी बनकर मामला शांत करवाती हैं। क्योंकि उन्हें समझ आ गया है कि *घर कांच के बर्तनों से नहीं सजता, रिश्तों की मिठास से सजता है।*
—
—
**लेखक का संदेश:**
यह कहानी उन सभी घरों के लिए एक आईना है जहाँ असुरक्षा की भावना रिश्तों को दीमक की तरह चाट जाती है। जेठानी और देवरानी का रिश्ता प्रतिस्पर्धा का नहीं, पूरक (complementary) होने का होता है। एक अगर घर की ढाल है, तो दूसरी घर की तलवार। जब दोनों मिल जाएं, तो कोई बाहरी ताकत, यहाँ तक कि घर की भीतरी राजनीति भी उन्हें नहीं तोड़ सकती। विश्वास वो धागा है जो एक बार पक्का हो जाए, तो कैंची भी उसे नहीं काट सकती।
**क्या रिया का तरीका सही था?**
क्या रिया को सबके सामने अपनी सास का पर्दाफाश करना चाहिए था या उसने अकेले में बात करके सही किया? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।
**”अगर इस कहानी ने आपको रिश्तों की नई अहमियत समझाई है, तो इसे लाइक करें और अपनी देवरानी, जेठानी या बहन के साथ शेयर करें। ऐसी ही दिल को छू लेने वाली पारिवारिक कहानियों के लिए हमारे पेज को फॉलो करना न भूलें। धन्यवाद!”**
मूल लेखिका : शुभ्रा बनर्जी