*लिबास की चमक आँखों को धोखा दे सकती है, लेकिन संस्कारों की खुशबू रूह में उतर जाती है। देखिये कैसे एक सास ने दुनिया के ताने को अपनी समधन के सम्मान में बदल दिया!*
“ये मेरी समधन, सावित्री जी हैं। अवनि आज जो कुछ भी है—इतनी समझदार, इतनी सहनशील, और घर को जोड़कर रखने वाली—ये सब इन्हीं की परवरिश का नतीजा है। आप लोगों को इनकी सूती साड़ी दिख रही है, लेकिन मुझे उस साड़ी के पल्लू में वो संस्कार दिख रहे हैं, जिसने मेरे घर को स्वर्ग बना दिया है।”
शहर के सबसे पॉश इलाके ‘गुलमोहर पार्क’ में बने “सिंघानिया विला” के बाहर आज महंगी गाड़ियों की कतार लगी थी। घर के अंदर की सजावट देखते ही बनती थी। झूमर की रोशनी, विदेशी फूलों की महक और हल्के वाद्य संगीत ने माहौल को खुशनुमा बना रखा था। आज शहर की जानी-मानी समाज सेविका और बिजनेस टायकून, सुलोचना देवी की 60वीं सालगिरह की पार्टी थी।
घर की बड़ी बहू, अवनि, एक पैर पर खड़ी थी। उसने क्रीम कलर की डिजाइनर सिल्क साड़ी पहनी थी और हीरे का सेट उसके गले की शोभा बढ़ा रहा था। वह न केवल दिखने में सुंदर थी, बल्कि पूरे घर की व्यवस्था संभालने में भी माहिर थी। सुलोचना देवी अपनी बहू पर जान छिड़कती थीं। अवनि एक मध्यमवर्गीय परिवार से थी, लेकिन अपने संस्कारों और समझदारी से उसने सिंघानिया परिवार के हर सदस्य का दिल जीत लिया था।
पार्टी शबाब पर थी। शहर की रईस महिलाएं, जो खुद को ‘हाई सोसाइटी’ का हिस्सा मानती थीं, अपने ब्रांडेड बैग्स और ज्वेल्स का प्रदर्शन कर रही थीं। मिसेज कपूर, जो अपनी तीखी जुबान और दिखावे के लिए मशहूर थीं, अवनि के पास आईं।
“अरे अवनि डार्लिंग, क्या अरेंजमेंट्स हैं! मान गए तुम्हारी चोइस को। सुना है ये कैटरिंग तुमने इटली वाले शेफ से करवाई है?” मिसेज कपूर ने अपनी शैम्पेन का घूंट भरते हुए कहा।
“जी आंटी, मम्मी जी को इटैलियन पसंद है, तो बस कोशिश की है,” अवनि ने विनम्रता से जवाब दिया।
तभी मुख्य द्वार पर थोड़ी हलचल हुई। सिक्योरिटी गार्ड किसी को रोकने की कोशिश कर रहा था।
“अरे अम्मा, कहा ना ये सर्विस एंट्री नहीं है। पीछे के गेट से जाओ,” गार्ड की ऊँची आवाज़ संगीत के बीच सुनाई दी।
सबकी नज़रें दरवाजे की ओर मुड़ गईं। वहां एक बुजुर्ग महिला खड़ी थी। कद काठी से कमजोर, चेहरे पर झुर्रियां, और बदन पर एक बहुत ही साधारण, थोड़ी फीकी पड़ चुकी सूती साड़ी। पैरों में हवाई चप्पल थी और हाथ में कपड़े का एक पुराना सा थैला (झोला) था। उनके बाल तेल से चुपड़े हुए थे और कसकर बांधे गए थे।
अवनि की नज़र जैसे ही उन पर पड़ी, उसका दिल जोर से धड़का। “माँ!” उसके मुँह से अनायास ही निकला। वह मेहमानों के बीच से रास्ता बनाते हुए तेजी से दरवाजे की ओर लपकी।
जी हाँ, वह अवनि की माँ, सावित्री देवी थीं। वह गाँव में रहती थीं। अवनि ने उन्हें कई बार फ्लाइट की टिकट भेजने की कोशिश की थी, लेकिन सावित्री देवी को हवाई जहाज से डर लगता था और उन्हें अपनी पुरानी बस और ट्रेन का सफर ही भाता था। उन्हें पता था कि आज उनकी समधन (सुलोचना देवी) का जन्मदिन है, तो वह बिना बताए सरप्राइज देने आ गई थीं।
मिसेज कपूर और उनकी सहेलियों ने अवनि को उस ‘साधारण’ सी महिला के पैर छूते देखा, तो उनकी भृकुटियां तन गईं।
मिसेज कपूर ने अपनी सहेली से फुसफुसाते हुए कहा (लेकिन इतनी जोर से कि आसपास खड़े लोग सुन सकें), “ओह माय गॉड! ये अवनि की माँ हैं? मुझे लगा शायद कोई पुरानी आया या रसोइयन है जो बधाई देने आ गई है। सिंघानिया परिवार का स्टैण्डर्ड और ये… कितना बड़ा मिसमैच है।”
पास खड़ी दूसरी महिला ने तंज कसा, “यही होता है जब आप खानदान देखे बिना सिर्फ शक्ल देखकर बहु ले आते हैं। अब देखो, पार्टी का सारा क्लास खराब हो गया। ऐसे कपड़ों में कौन आता है इतनी ग्रैंड पार्टी में? और वो हाथ में क्या है? कोई पुराना थैला?”
अवनि ने ये बातें सुन ली थीं। उसका चेहरा शर्म से नहीं, बल्कि गुस्से और दुख से लाल हो गया। वह कुछ कहने ही वाली थी कि सावित्री देवी ने उसका हाथ दबा दिया। सावित्री देवी को अपनी वेशभूषा पर कोई शर्म नहीं थी, लेकिन वह अपनी बेटी की ससुराल में कोई तमाशा नहीं चाहती थीं।
“अवनि, लगता है मैं गलत समय आ गई बिटिया। मुझे पता नहीं था इतना बड़ा फंक्शन है। मैं बस समधन जी को बधाई देकर निकल जाऊंगी,” सावित्री देवी ने धीरे से कहा।
तभी भीड़ को चीरते हुए सुलोचना देवी वहां आ पहुंचीं। उन्होंने भारी बनारसी साड़ी और कुंदन के गहने पहने थे। उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि लोग अपने आप रास्ता छोड़ देते थे।
मिसेज कपूर ने सुलोचना देवी को आते देख सोचा कि अब तो सुलोचना अपनी समधन की क्लास लगाएगी या शर्मिंदा होगी। मिसेज कपूर ने आग में घी डालने के लिए कहा, “सुलोचना जी, देखिए कौन आया है। शायद अवनि की माँ हैं। बेचारी, शायद उन्हें पता नहीं था कि यहाँ ड्रेस कोड होता है। आप कहें तो मैं ड्राइवर से बोलकर इन्हें गेस्ट हाउस में भिजवा दूँ? यहाँ सब वीआईपी लोग हैं, थोड़ा ऑकवर्ड लग रहा है।”
हॉल में सन्नाटा छा गया। अवनि की आँखों में आंसू तैरने लगे। वह अपनी सास की ओर देखने लगी।
सुलोचना देवी ने एक पल के लिए मिसेज कपूर को अपनी तीखी नज़रों से देखा, फिर सावित्री देवी की ओर मुड़ीं। उनके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान आई जिसने वहां मौजूद हर शख्स को हैरान कर दिया। सुलोचना देवी ने आगे बढ़कर सावित्री देवी को गले लगा लिया। सिर्फ औपचारिक गले नहीं, बल्कि बड़े प्यार और सम्मान से।
“अरे समधन जी! आप आ गईं? मैं कब से अवनि से पूछ रही थी कि मेरी सबसे खास मेहमान क्यों नहीं पहुंची अब तक,” सुलोचना देवी की आवाज़ में खनक थी।
उन्होंने सावित्री देवी का हाथ थामा और उन्हें पार्टी के बिल्कुल बीचों-बीच ले आईं, ठीक वहां जहाँ बड़ा सा झूमर लगा था।
सुलोचना देवी ने माइक हाथ में लिया। संगीत बंद हो गया।
“हेलो एवरीवन,” सुलोचना देवी ने बोलना शुरू किया। “आप सब मेरी पार्टी की शान-ओ-शौकत की तारीफ कर रहे थे। मेरे घर की सजावट, मेरी बहू का सलीका और इस परिवार के संस्कारों की बातें कर रहे थे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये सब कहाँ से आया?”
उन्होंने अवनि की माँ की ओर इशारा किया।
“ये मेरी समधन, सावित्री जी हैं। अवनि आज जो कुछ भी है—इतनी समझदार, इतनी सहनशील, और घर को जोड़कर रखने वाली—ये सब इन्हीं की परवरिश का नतीजा है। आप लोगों को इनकी सूती साड़ी दिख रही है, लेकिन मुझे उस साड़ी के पल्लू में वो संस्कार दिख रहे हैं, जिसने मेरे घर को स्वर्ग बना दिया है।”
मिसेज कपूर और उनकी गैंग के चेहरे पीले पड़ने लगे।
सुलोचना देवी ने सावित्री देवी के हाथ में लटके उस पुराने थैले की ओर इशारा किया। “और मिसेज कपूर, आप पूछ रही थीं न कि इस थैले में क्या है? मुझे यकीन है कि इसमें वो चीज़ होगी जो आपके लाखों के तोहफों से ज्यादा कीमती है।”
सुलोचना देवी ने सबके सामने वो थैला खोला। उसके अंदर स्टील के डिब्बे में घर का बना गाजर का हलवा और हाथ से बुना हुआ एक ऊनी शॉल था।
सुलोचना देवी ने डिब्बा खोला। गाजर के हलवे की सोंधी खुशबू, जो शुद्ध घी और इलायची से बनी थी, हवा में तैर गई।
“शुद्ध देसी घी का हलवा,” सुलोचना देवी ने भावुक होकर कहा। “बाज़ार की मिठाइयों में वो मिठास कहाँ जो एक माँ के हाथ की मेहनत में होती है। और यह शॉल… सर्दियां आ रही हैं, मेरी समधन जी ने खुद मेरे लिए बुना है। इसमें ‘वक्त’ लगा है, ‘पैसा’ नहीं। और याद रखिये, जो तोहफा अपना कीमती वक्त देकर बनाया जाए, उससे बड़ा कोई लग्जरी आइटम नहीं होता।”
सुलोचना देवी ने वहीं, अपनी हीरों के सेट के ऊपर वो साधारण सा ऊनी शॉल ओढ़ लिया।
“आज मेरा जन्मदिन है, और यह मेरा सबसे नायाब तोहफा है,” उन्होंने गर्व से कहा।
फिर सुलोचना देवी मिसेज कपूर की ओर मुड़ीं और सख्त लहजे में बोलीं, “मिसेज कपूर, ‘क्लास’ कपड़ों से नहीं, सोच से आती है। अगर हम रेशम पहनकर भी दूसरों की गरीबी का मज़ाक उड़ाएं, तो हम अंदर से बहुत गरीब हैं। और अगर कोई सूती पहनकर भी दूसरों को इज़्ज़त दे, तो वही असली रईस है। मेरी समधन जी ‘गंवार’ नहीं हैं, वो इस देश की उस मिट्टी से जुड़ी हैं जहाँ रिश्ते मोबाइल की स्क्रीन पर नहीं, दिल की धड़कनों में बसते हैं।”
पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। जो लोग अभी तक नाक-भौं सिकोड़ रहे थे, अब वे भी अपनी गलती का अहसास कर रहे थे। मिसेज कपूर का सिर शर्म से झुक गया था। वह नज़रें चुरा रही थीं।
अवनि दौड़कर अपनी सास और माँ के पास आई। उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन ये ख़ुशी के आंसू थे।
“थैंक यू मम्मी जी,” उसने धीरे से कहा।
सुलोचना देवी ने अवनि के आंसू पोंछे और हंसते हुए कहा, “पगली, थैंक यू मुझे नहीं, अपनी माँ को बोल। इन्होंने ही तो मुझे ऐसी हीरा बहू दी है। अब चल, केक बाद में कटेगा, पहले मैं सावित्री जी के हाथ का हलवा खाऊँगी।”
सावित्री देवी की आँखों में भी नमी थी। उन्हें लगा था कि बड़े घर में उनकी बेटी शायद दबकर रहती होगी, लेकिन आज अपनी बेटी को इतना सम्मान और प्यार मिलते देख उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उन्हें यकीन हो गया कि अमीरी दौलत की नहीं, दिल की होती है।
उस रात पार्टी में सबसे ज्यादा चमक उस झूमर की नहीं, बल्कि सावित्री देवी की आँखों और सुलोचना देवी के बड़प्पन की थी। उस साधारण सी सूती साड़ी ने उस महफिल में मखमल और रेशम को भी फीका कर दिया था।
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**कहानी का शीर्षक:**
**संस्कारों का मोल और ममता की छाँव**
**हूक लाइन:**
*लिबास की चमक आँखों को धोखा दे सकती है, लेकिन संस्कारों की खुशबू रूह में उतर जाती है। देखिये कैसे एक सास ने दुनिया के ताने को अपनी समधन के सम्मान में बदल दिया!*
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**लेखक का संदेश:**
अक्सर हम बाहरी दिखावे में इतना खो जाते हैं कि सामने वाले की सादगी में छिपे प्रेम और त्याग को देख नहीं पाते। रिश्ते हैसियत से नहीं, बल्कि एहसास से बनते हैं। एक माँ, चाहे वह अमीर हो या गरीब, उसका प्रेम हमेशा अनमोल होता है।
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मूल लेखिका : आरती झा