**कांच के टुकड़ों के लिए हीरा खो दिया** – लतिका अग्रवाल 

“जिस पत्नी को ‘अनपढ़’ और ‘गंवार’ समझकर उसने छोड़ दिया, यह सोचकर कि वह उसके ‘स्टेटस’ के लायक नहीं है, आज वही पत्नी जब सामने आई, तो उसकी कामयाबी ने पति के अहंकार को चकनाचूर कर दिया। क्या ‘स्टेटस’ ही सब कुछ होता है?”

“पापा, आप नहीं समझेंगे। मुझे अपनी लाइफ में एक पार्टनर चाहिए, नौकरानी नहीं। नताशा मेरी तरह सोचती है, हम दोनों मिलकर करियर में बहुत आगे जाएंगे,” आकाश ने अपनी दलील दी।

सुधा, जो अब तक चुप थी, पहली बार बोली। उसकी आवाज में एक अजीब सी शांति थी।

“आकाश जी, अगर आपको लगता है कि अंग्रेजी बोलना और कांटा-चम्मच से खाना ही जीवन की सबसे बड़ी योग्यता है, तो आप सही हैं, मैं आपके लायक नहीं हूं। लेकिन याद रखिएगा, घर दीवारों से नहीं, भावनाओं से बनता है। आज आप जिस चमक-दमक के पीछे भाग रहे हैं, कल वही आपकी आंखों को चुभेगी।”

आकाश मल्होत्रा अपनी कंपनी का एक उभरता हुआ सितारा था। एमबीए की डिग्री, फर्राटेदार अंग्रेजी और शानदार व्यक्तित्व। लेकिन घर की दहलीज पार करते ही उसका यह व्यक्तित्व चिड़चिड़ेपन में बदल जाता था। वजह थी उसकी पत्नी—सुधा।

सुधा एक छोटे शहर की, बेहद साधारण और संस्कारी लड़की थी। आकाश के माता-पिता ने अपनी पसंद से यह रिश्ता तय किया था। सुधा देखने में सुंदर थी, लेकिन उसमें वो ‘मॉडर्न’ बात नहीं थी जो आकाश अपनी जीवनसंगिनी में चाहता था। सुधा को कॉन्टिनेंटल खाना बनाना नहीं आता था, उसे पार्टी में हाई हील्स पहनकर चलना नहीं आता था, और अंग्रेजी बोलने में तो उसकी जुबान अक्सर लड़खड़ा जाती थी।

आकाश के लिए सुधा सिर्फ एक ‘जिम्मेदारी’ थी जिसे वह ढो रहा था।

“सुधा, मेरा नीला वाला शर्ट कहां है? तुम्हें कितनी बार कहा है कि मेरे कपड़ों को कलर-कोऑर्डिनेट करके रखा करो!” आकाश सुबह-सुबह चिल्लाया।

रसोई से हाथ पोंछती हुई सुधा दौड़ी आई। “वो… वो मैंने प्रेस करके अलग रख दिया था, ताकि गंदा न हो।”

“उफ्फ! तुम और तुम्हारा यह देहाती दिमाग। कब सीखोगी तुम मेरे स्टैंडर्ड के हिसाब से रहना?” आकाश ने झल्लाहट में अलमारी का दरवाजा जोर से बंद किया।

सुधा की आंखों में नमी आ गई, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वह जानती थी कि आकाश को उसका हर काम, हर बात खटकती है। फिर भी, वह पूरे समर्पण से घर को संभाले हुए थी। आकाश के बूढ़े माता-पिता, बाबूजी और अम्मा जी, सुधा को अपनी बेटी से बढ़कर मानते थे। सुधा सुबह पांच बजे उठती, बाबूजी की शुगर-फ्री चाय से लेकर रात को अम्मा जी के पैरों की मालिश तक, सब कुछ हंसते-हंसते करती। घर का कोना-कोना उसकी मेहनत से चमकता था, बस आकाश का दिल ही उसके लिए काला पड़ चुका था।

आकाश की दुनिया घर से बाहर थी। ऑफिस में उसकी एक कलीग थी—नताशा। नताशा बिल्कुल वैसी थी जैसा आकाश चाहता था—स्मार्ट, बोल्ड, और महत्वकांक्षी। नताशा के साथ कॉफी पीते वक्त आकाश को लगता कि वह किसी ‘बराबरी’ वाले के साथ बैठा है। धीरे-धीरे, आकाश और नताशा की नजदीकियां बढ़ने लगीं। आकाश घर देर से आने लगा और सुधा की उपेक्षा और बढ़ गई।

एक दिन, आकाश की कंपनी की एक बड़ी पार्टी थी। आकाश न चाहते हुए भी माता-पिता के दबाव में सुधा को साथ ले गया। सुधा ने अपनी सबसे अच्छी बनारसी साड़ी पहनी थी, लेकिन वहां मौजूद गाउन और शॉर्ट ड्रेसेस वाली महिलाओं के बीच वह खुद को असहज महसूस कर रही थी।

पार्टी में एक जगह, आकाश अपने बॉस से बात कर रहा था। सुधा कुछ स्नैक्स लेकर वहां पहुंची। घबराहट में उसके हाथ से चटनी की एक बूंद बॉस के कोट पर गिर गई।

“ओह नो! व्हाट हैव यू डन?” बॉस थोड़ा पीछे हटा।

सुधा घबरा गई, “माफ करना साहब, वो गलती से…” उसने अपने साड़ी के पल्लू से उसे साफ करने की कोशिश की।

आकाश का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसने सुधा का हाथ झटक दिया। “रहने दो! और तमाशा मत बनाओ। जाकर गाड़ी में बैठो। तुम इसी लायक हो।”

सुधा भरी महफिल में अपमानित होकर, आंसू छुपाते हुए बाहर निकल गई। उस रात घर लौटते ही आकाश ने फैसला सुना दिया।

“मैं अब और नहीं झेल सकता, सुधा। हमारे बीच कोई मेल नहीं है। तुम एक कूपमंडूक हो और मैं आसमान में उड़ना चाहता हूं। मुझे तलाक चाहिए।”

घर में कोहराम मच गया। अम्मा जी ने बहुत समझाया, बाबूजी ने आकाश को डांटा, लेकिन आकाश पर नताशा के प्यार और अपनी झूठी शान का नशा सवार था।

“पापा, आप नहीं समझेंगे। मुझे अपनी लाइफ में एक पार्टनर चाहिए, नौकरानी नहीं। नताशा मेरी तरह सोचती है, हम दोनों मिलकर करियर में बहुत आगे जाएंगे,” आकाश ने अपनी दलील दी।

सुधा, जो अब तक चुप थी, पहली बार बोली। उसकी आवाज में एक अजीब सी शांति थी।

“आकाश जी, अगर आपको लगता है कि अंग्रेजी बोलना और कांटा-चम्मच से खाना ही जीवन की सबसे बड़ी योग्यता है, तो आप सही हैं, मैं आपके लायक नहीं हूं। लेकिन याद रखिएगा, घर दीवारों से नहीं, भावनाओं से बनता है। आज आप जिस चमक-दमक के पीछे भाग रहे हैं, कल वही आपकी आंखों को चुभेगी।”

तलाक की प्रक्रिया पूरी हुई। सुधा ने गुजारा भत्ता (Alimony) लेने से साफ इनकार कर दिया। “मुझे भीख नहीं चाहिए, मैं अपना रास्ता खुद बना लूंगी,” कहकर वह अपने मायके चली गई।

आकाश ने चैन की सांस ली। छह महीने बाद उसने नताशा से शादी कर लिया।

शुरुआत के दिन तो सपनों जैसे बीते। हनीमून, पार्टियां, डिनर डेट्स। लेकिन जैसे ही गृहस्थी की असलियत सामने आई, आकाश का सपना टूटने लगा।

नताशा को सुबह नौ बजे से पहले उठने की आदत नहीं थी। बाबूजी को सुबह की चाय अब खुद बनानी पड़ती थी। अम्मा जी की दवाइयां अक्सर छूट जाती थीं क्योंकि नताशा को याद दिलाना “बोरिंग” लगता था।

“नताशा, नाश्ते में क्या है?” आकाश ने एक दिन पूछा।

“ओह आकाश, कम ऑन! मैं तुम्हारी मेड नहीं हूं। मैंने टोस्ट और कॉफी ऑर्डर कर दी है। मुझे प्रेजेंटेशन तैयार करनी है, डोंट डिस्टर्ब मी,” नताशा ने लैपटॉप पर टाइप करते हुए कहा।

घर का खाना अब इतिहास बन चुका था। रोज बाहर से खाना आता। घर में धूल जमने लगी थी क्योंकि नताशा को सफाई करना पसंद नहीं था और मेड के न आने पर वह घर गंदा ही छोड़ देती थी।

सबसे बुरा तब हुआ जब अम्मा जी बाथरूम में फिसल कर गिर गईं। उनकी कूल्हे की हड्डी टूट गई। उन्हें बेड रेस्ट बताया गया। आकाश को लगा कि अब नताशा घर की जिम्मेदारी संभालेगी।

लेकिन नताशा ने साफ कह दिया, “आकाश, देखो मेरे करियर का पीक टाइम चल रहा है। मैं घर पर बैठकर किसी की सेवा नहीं कर सकती। बेहतर होगा हम अम्मा जी के लिए कोई फुल टाइम नर्स रख लें या उन्हें ओल्ड एज होम शिफ्ट कर दें जहां उनकी बेहतर देखभाल हो सके।”

आकाश सन्न रह गया। “वो मेरी मां हैं, नताशा!”

“तो मैं क्या करूं? मैं अपनी लाइफ बर्बाद नहीं कर सकती,” नताशा ने चिल्लाकर कहा और अपना बैग उठाकर ऑफिस चली गई।

उस रात आकाश अपने माता-पिता के कमरे में गया। अम्मा जी दर्द से कराह रही थीं, और बाबूजी उनके पैरों में बाम लगा रहे थे। आकाश को देखते ही बाबूजी ने मुंह फेर लिया। घर का वह सुकून, वह तुलसी की चाय की खुशबू, वह धुले हुए कपड़ों की महक—सब सुधा के साथ ही चला गया था। आकाश के पास अब सिर्फ एक ‘स्मार्ट’ पत्नी थी, जिसके पास दिल नहीं था।

समय का पहिया घूमा। दो साल बीत गए। आकाश और नताशा के बीच अब सिर्फ झगड़े होते थे। आकाश को अपनी गलती का अहसास हो चुका था, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

एक दिन, आकाश को कंपनी के काम से दूसरे शहर जाना पड़ा। वहां एक बड़े फूड एक्सपो (Food Expo) का आयोजन था। आकाश अपनी टीम के साथ वहां पहुंचा। एक्सपो में एक स्टॉल पर बहुत भीड़ थी। वहां के खाने की खुशबू पूरे हॉल में फैली हुई थी। लोग तारीफ करते नहीं थक रहे थे।

आकाश भी उस स्टॉल की तरफ बढ़ा। बैनर पर लिखा था—**”सुधा’स सात्विक रसोई”**।

नाम पढ़ते ही आकाश ठिठक गया। उसने भीड़ के बीच से झांककर देखा। वहां काउंटर के पीछे, एक बेहद आत्मविश्वास से भरी महिला खड़ी थी। उसने खादी की साड़ी पहनी थी, बाल करीने से बंधे थे, और वह फर्राटेदार अंग्रेजी में विदेशी क्लाइंट्स को भारतीय मसालों का महत्व समझा रही थी।

वह सुधा थी।

लेकिन यह वो सहमी हुई सुधा नहीं थी। यह एक उद्यमी, एक सफल बिजनेसवुमन सुधा थी।

आकाश के पैर वहीं जम गए। जब भीड़ थोड़ी कम हुई, तो वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। सुधा की नजर उस पर पड़ी। एक पल के लिए वह रुकी, लेकिन उसकी आंखों में न तो पुरानी घबराहट थी, न ही कोई शिकायत।

“हैलो, आकाश जी। कैसी है आपकी नताशा और आपका ‘मॉडर्न’ जीवन?” सुधा ने सहजता से पूछा।

आकाश शर्मिंदा था। “सुधा… तुम? यह सब?”

सुधा मुस्कुराई। “क्या करूं? जब घर टूटा, तो समझ आया कि सिर्फ रोटियां बेलना काफी नहीं है। मैंने अपने हुनर को ही अपनी ताकत बना लिया। आज मेरी कंपनी का टर्नओवर करोड़ों में है। और हां, अंग्रेजी भी सीख ली, ताकि कोई मुझे ‘गंवार’ कहकर मेरी बेइज्जती न कर सके।”

आकाश की जुबान तालू से चिपक गई थी। “सुधा, मैं… मैंने बहुत बड़ी गलती की। नताशा के साथ मैं खुश नहीं हूं। घर बिखर गया है। अम्मा-बाबूजी बहुत दुखी हैं। क्या हम… क्या हम फिर से शुरुआत कर सकते हैं?”

सुधा ने एक गहरा सांस लिया और आकाश की आंखों में सीधे देखा।

“आकाश जी, जब मैं आपके घर में थी, तब मैं ‘कच्ची मिट्टी’ थी, जिसे आप जैसा चाहते ढाल सकते थे। लेकिन आपने मुझे तोड़कर भट्ठी में डाल दिया। अब मैं ‘पक्की ईंट’ बन चुकी हूं। मैं अब वापस उस ढांचे में नहीं फिट हो सकती। और रही बात गलती की, तो गलती आपकी नहीं थी, आपकी सोच की थी। आपको ‘पत्नी’ नहीं, एक ‘शो-पीस’ चाहिए था।”

सुधा ने अपने असिस्टेंट को इशारा किया और एक फाइल उठाई। “मेरी मां कहती थी कि जब दूध फट जाए, तो उससे पनीर बना लेना चाहिए, लेकिन फटे दूध को दोबारा उबाला नहीं जा सकता। मैं अपनी जिंदगी में बहुत खुश हूं, आकाश जी। मेरे पास वो सुकून है जो आपके पास करोड़ों की डील होकर भी नहीं है। क्योंकि मैंने रिश्तों को अहमियत दी थी, और आपने ‘दिखावे’ को।”

यह कहकर सुधा अपने काम में व्यस्त हो गई। आकाश वहां खड़ा का खड़ा रह गया। उसके कानों में सुधा के शब्द गूंज रहे थे। उसे आज समझ आया कि जीवनसाथी का चुनाव ‘सीवी’ (Resume) देखकर नहीं, बल्कि ‘सीरत’ (Character) देखकर करना चाहिए था।

आकाश जब वापस लौटा, तो उसका घर आलीशान था, लेकिन वीरान था। नताशा फोन पर किसी पार्टी का प्लान बना रही थी, और बगल के कमरे से अम्मा जी के खांसने की आवाज आ रही थी। आकाश सोफे पर बैठ गया और सिर पकड़ कर रोने लगा।

उसने कांच के रंगीन टुकड़ों को इकट्ठा करने के चक्कर में, अपने घर का असली हीरा हमेशा के लिए खो दिया था। अब उसके पास सिर्फ पछतावा था, जो उम्र भर उसका साथ निभाने वाला था।

**सीख:**

रिश्ते और इंसान की परख समय आने पर ही होती है। बाहरी चमक-दमक कुछ दिनों का आकर्षण है, लेकिन सादगी, समर्पण और संस्कार ही वह नींव है जिस पर सुखी जीवन की इमारत खड़ी होती है। अपने जीवनसाथी को उसकी कमियों के साथ अपनाएं, क्योंकि कोई भी ‘परफेक्ट’ नहीं होता।

**क्या इस कहानी ने आपके दिल को छुआ?**

अक्सर हम जो हमारे पास होता है, उसकी कद्र नहीं करते और जब वो खो जाता है, तब हमें उसकी असली कीमत समझ आती है। आकाश की कहानी शायद आज के समाज के कई घरों की हकीकत है।

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मूल लेखिका : लतिका अग्रवाल 

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