“जिस पत्नी को पति ने महफिल में ‘गंवार’ कहकर चुप करा दिया, उसी बेटे ने माइक थामकर पिता की सारी डिग्रियों को कागज का टुकड़ा साबित कर दिया। आखिर उस बेटे ने भरी सभा में ऐसा क्या कह दिया कि पिता की नजरें झुक गईं?”
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“सोचना बंद करो तुम!” शेखर जी ने चिढ़कर उनकी बात काट दी। “तुम्हारी इसी सोच ने मुझे कभी चैन से जीने नहीं दिया। तुम बस अपनी रसोई और पूजा-पाठ तक सीमित रहा करो। बाहर की दुनिया तुम्हारे बस की नहीं है। अभी मिस्टर मेहता आएंगे, उनसे इंग्लिश में बात करनी होगी, तुम बस मुस्कुरा देना और वहां से खिसक लेना। मुंह मत खोलना वरना मेरी नाक कटवा दोगी, हमेशा की तरह।”
शहर के सबसे आलीशान बैंक्वेट हॉल में आज रौनक देखते ही बनती थी। झाड़-फानूसों की रोशनी से ज्यादा चमक मेहमानों के कपड़ों और गहनों में थी। मौका था शहर के नामी बिजनेसमैन मिस्टर शेखर खन्ना के बेटे, आरव खन्ना की कंपनी की सफलता की पार्टी का। आरव ने अपनी मेहनत से एक नया स्टार्टअप खड़ा किया था जो बहुत कम समय में ऊंचाइयों को छू रहा था।
हॉल के एक कोने में, शेखर जी अपनी पत्नी सुजाता को दबी आवाज़ में हड़का रहे थे।
“तुम्हें हजार बार समझाया है सुजाता, जब मेरे बिजनेस एसोसिएट्स आया करें तो तुम बीच में मत बोला करो। और यह क्या पहन रखा है? मैंने तुम्हें वो डिज़ाइनर साड़ी लाकर दी थी न? उसे छोड़कर तुम फिर यह अपनी बनारसी साड़ी पहनकर आ गई। तुम्हें समझ क्यों नहीं आता कि अब हम मिडिल क्लास नहीं रहे? मेरा एक स्टेटस है, लोग क्या सोचेंगे कि शेखर खन्ना की बीवी को कपड़े पहनने का भी सलीका नहीं है?”
सुजाता जी ने अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में भींचते हुए धीरे से कहा, “सुनिए, वो साड़ी मुझे बहुत चुभती है और यह वाली आरव ने अपनी पहली कमाई से मेरे लिए खरीदी थी। आज उसका दिन है, तो मैंने सोचा…”
“सोचना बंद करो तुम!” शेखर जी ने चिढ़कर उनकी बात काट दी। “तुम्हारी इसी सोच ने मुझे कभी चैन से जीने नहीं दिया। तुम बस अपनी रसोई और पूजा-पाठ तक सीमित रहा करो। बाहर की दुनिया तुम्हारे बस की नहीं है। अभी मिस्टर मेहता आएंगे, उनसे इंग्लिश में बात करनी होगी, तुम बस मुस्कुरा देना और वहां से खिसक लेना। मुंह मत खोलना वरना मेरी नाक कटवा दोगी, हमेशा की तरह।”
सुजाता जी की आँखों में नमी तैर गई, लेकिन उन्होंने पलकें झपकाकर उसे छिपा लिया। यह कोई नई बात नहीं थी। पिछले पच्चीस सालों से वह यह सुनती आ रही थीं। जब शेखर जी के पास कुछ नहीं था, तब सुजाता ने अपने गहने बेचकर उन्हें दुकान खुलवाकर दी थी। तब शेखर जी कहते थे, “सुजाता, तुम मेरी लक्ष्मी हो।” लेकिन जैसे-जैसे दुकान शोरूम में बदली और शोरूम कंपनी में, सुजाता ‘लक्ष्मी’ से ‘अनपढ़’ और ‘गंवार’ होती चली गईं।
शेखर जी के लिए ‘क्लास’ का मतलब था फर्राटेदार अंग्रेजी और मॉडर्न लाइफस्टाइल। सुजाता हिंदी भाषी थीं, साधारण रहने वाली घरेलू महिला। आरव दूर खड़ा यह सब देख रहा था। उसके हाथ में जूस का गिलास था, लेकिन उसका खून खौल रहा था। वह बचपन से देखता आया था कि कैसे उसके पापा, मम्मी के आत्मसम्मान को अपने जूतों तले रौंदते थे।
बचपन में जब आरव स्कूल से आता और कहता, “माँ, आज पापा ने तुम्हें फिर डांटा?”
तो सुजाता मुस्कुराकर कहती, “अरे नहीं बेटा, वो तो मुझे समझा रहे थे। उन्हें दुनियादारी की समझ ज्यादा है न। मैं तो ठहरी कम पढ़ी-लिखी, मुझसे गलतियां हो जाती हैं।”
आरव जानता था कि माँ कम पढ़ी-लिखी जरूर हैं, लेकिन ‘अनपढ़’ नहीं। उसे याद था कि जब पापा बिजनेस के तनाव में रातों को सो नहीं पाते थे, तो माँ ही उन्हें हिम्मत देती थीं। जब पापा का एक्सीडेंट हुआ था और वो छह महीने बिस्तर पर थे, तब इसी ‘गंवार’ औरत ने घर और बाहर दोनों को संभाला था। लेकिन ठीक होते ही पापा का वही रवैया शुरू हो गया।
पार्टी शवाब पर थी। एंकर ने माइक संभाला और आरव को स्टेज पर बुलाया।
“देवियों और सज्जनों, अब मैं मंच पर बुलाना चाहूंगा आज की शाम के सितारे, मिस्टर आरव खन्ना को, जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से यह मुकाम हासिल किया है।”
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच आरव स्टेज पर चढ़ा। शेखर जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। वह सबसे हाथ मिला रहे थे, मानो यह सफलता आरव की नहीं, उनकी अपनी हो। सुजाता जी भीड़ में सबसे पीछे एक खंभे की ओट में खड़ी थीं, ताकि उनके ‘साधारण कपड़े’ शेखर जी की ‘इज्जत’ कम न कर दें।
आरव ने माइक थाम लिया। उसने भीड़ पर एक नजर डाली। उसे अपने पिता की चमकती हुई आंखें दिखीं और पीछे अंधेरे में खड़ी अपनी माँ का धुंधला चेहरा।
“थैंक यू एवरीवन,” आरव ने बोलना शुरू किया। “आज सब लोग मेरी सफलता की बात कर रहे हैं। सब पूछ रहे हैं कि मैंने यह सब कैसे किया। मेरे डैड, मिस्टर शेखर खन्ना, यहाँ बैठे हैं और सबको बता रहे हैं कि उन्होंने मुझे बिजनेस के गुर सिखाए।”
शेखर जी मुस्कुराए और हाथ हिलाया।
“लेकिन,” आरव की आवाज़ थोड़ी गंभीर हो गई। “आज मैं आपको एक ऐसे ‘इंवेस्टर’ (निवेशक) के बारे में बताना चाहता हूँ जिसका जिक्र बैलेंस शीट में नहीं होता। एक ऐसा पार्टनर जिसने इस कंपनी में पैसा नहीं, अपना पूरा वजूद इन्वेस्ट किया है।”
हॉल में सन्नाटा छा गया। शेखर जी को लगा आरव उनकी तारीफ करने वाला है।
आरव ने भीड़ में पीछे इशारा किया। “माँ… प्लीज स्टेज पर आइए।”
सुजाता जी सकपका गईं। उन्होंने न में सिर हिलाया। शेखर जी के चेहरे का रंग उड़ गया। उन्होंने आरव को आँखों से इशारा किया कि यह क्या कर रहे हो। लेकिन आरव ने दोबारा कहा, “माँ, अगर आज आप ऊपर नहीं आईं, तो मैं यह अवार्ड नहीं लूँगा।”
मजबूरन, भीड़ ने रास्ता बनाया और सुजाता जी को आगे आना पड़ा। वह हिचकिचाते हुए स्टेज पर चढ़ीं। आरव ने उनका हाथ पकड़कर उन्हें अपने बराबर में खड़ा किया।
माइक पर आरव की आवाज़ गूंजी, “ये मेरी माँ हैं, मिसेज सुजाता खन्ना। मेरे डैड अक्सर कहते हैं कि मेरी माँ थोड़ी पुराने ख्यालात की हैं, उन्हें दुनियादारी की समझ नहीं है, वो थोड़ी ‘सिंपल’ हैं। दरअसल, डैड जिसे ‘सिंपल’ कहते हैं, मैं उसे ‘सैक्रिफाइस’ (त्याग) कहता हूँ।”
आरव ने अपनी माँ के कंधे पर हाथ रखा।
“जब मैं छोटा था, डैड अपने बिजनेस को बढ़ाने में बिजी थे। घर में राशन है या नहीं, मेरी फीस गई या नहीं, यह उन्हें पता भी नहीं होता था। वो सारा मैनेजमेंट इस महिला का था जिसे डैड कहते हैं कि उन्हें ‘हिसाब-किताब’ नहीं आता। डैड, आपको याद है जब आपका पहला बड़ा टेंडर पास हुआ था? आप कहते हैं वो आपकी किस्मत थी। लेकिन हकीकत यह है कि उस टेंडर के लिए सिक्योरिटी मनी जमा करने के लिए माँ ने अपने कंगन बेचे थे, यह कहकर कि ‘शेखर जी को पता नहीं चलना चाहिए वरना उनका स्वाभिमान चोटिल हो जाएगा’।”
शेखर जी का चेहरा सफेद पड़ गया। हॉल में पिन ड्रॉप साइलेंस था।
आरव ने अपनी बात जारी रखी। “लोग कहते हैं कि एक सफल पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है। लेकिन मेरे घर में कहानी उल्टी थी। मेरे घर में एक सफल पुरुष एक महिला के ऊपर खड़ा था, उसे दबाकर, उसे छोटा महसूस कराकर। मुझे आज भी याद है, डैड, जब आपने माँ को मेरे दोस्तों के सामने डांटा था कि उन्हें पिज़्ज़ा ऑर्डर करना नहीं आता। उस दिन मैं बहुत छोटा था, कुछ बोल नहीं पाया। लेकिन आज मैं बड़ा हो गया हूँ।”
आरव की आँखों में आंसू थे, लेकिन आवाज़ चट्टान जैसी मजबूत थी।
“मेरी माँ को फर्राटेदार इंग्लिश नहीं आती, सही बात है। लेकिन मुझे ‘इंसानियत’ की भाषा इन्हीं ने सिखाई है। डैड, आपने मुझे बिजनेस करना सिखाया, प्रॉफिट और लॉस सिखाया। लेकिन माँ ने मुझे सिखाया कि जब कोई गिर जाए तो उसे उठाया कैसे जाता है। आज मेरी कंपनी में 500 लोग काम करते हैं, और मैं उन सबके साथ सम्मान से पेश आता हूँ, यह संस्कार मुझे किसी एमबीए की डिग्री ने नहीं, मेरी इस ‘अनपढ़’ माँ ने दिए हैं।”
आरव ने मुड़कर सुजाता जी के पैर छुए। सुजाता जी फूट-फूट कर रो रही थीं।
आरव फिर माइक के पास आया और पिता की ओर देखकर बोला, “डैड, यह ट्रॉफी, यह सफलता, यह सब अधूरा है अगर इस घर की नींव को सम्मान न मिले। आप कहते हैं माँ गंवार हैं? अगर परिवार को जोड़कर रखना, पति के अपमान को घूंट की तरह पी जाना और बेटे को संस्कार देना गंवार होना है, तो मुझे गर्व है कि मैं एक गंवार का बेटा हूँ। और आज मैं जो कुछ भी हूँ, अपनी माँ की वजह से हूँ। आपकी डिग्रियां और बैंक बैलेंस ने मुझे सुविधाएं दीं, लेकिन मेरी माँ के आंचल ने मुझे ‘चरित्र’ दिया।”
पूरे हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। लोग खड़े होकर सुजाता जी के लिए तालियां बजा रहे थे। मिस्टर मेहता, जिन्हें इंप्रेस करने के लिए शेखर जी परेशान थे, स्टेज के पास आए।
“मिस्टर शेखर,” मेहता ने कहा, “आपका बेटा हीरा है। और इस हीरे को तराशा आपकी पत्नी ने है। इंग्लिश तो कोई भी दो महीने में सीख सकता है, लेकिन जो ‘ग्रेस’ और संस्कार आपकी पत्नी ने दिए हैं, वो पीढ़ियों में आते हैं। यू आर ए लकी मैन।”
शेखर जी अपनी जगह पर बुत बने खड़े थे। उनका अहंकार आज उनके बेटे के सच के सामने चकनाचूर हो गया था। वे धीरे-धीरे स्टेज की तरफ बढ़े।
सुजाता जी अभी भी सिर झुकाए खड़ी थीं, मानो उन्हें लग रहा हो कि अब घर जाकर बहुत डांट पड़ेगी। लेकिन शेखर जी ने आकर सुजाता का हाथ पकड़ लिया।
“सुजाता,” शेखर जी का गला रुंधा हुआ था। “मैं… मैं शायद बाहर की चमक-दमक में इतना अंधा हो गया था कि घर के उजाले को ही नहीं देख पाया। आरव ठीक कह रहा है। तुम अनपढ़ नहीं हो, अनपढ़ मैं हूँ। जो यह नहीं पढ़ पाया कि तुम्हारी खामोशी में कितना दर्द और त्याग छिपा था।”
सुजाता जी ने हैरान होकर पति को देखा। पच्चीस साल में पहली बार शेखर जी की आँखों में उनके लिए सम्मान था।
आरव ने मुस्कुराते हुए साइड से माइक पर कहा, “तो आज की पार्टी मेरी माँ के नाम!”
उस रात घर लौटने पर माहौल बदला हुआ था। शेखर जी ने सुजाता जी को पानी का गिलास थमाया और कहा, “आज की चाय मैं बनाऊँगा।”
सुजाता जी ने आरव को गले लगा लिया। “पगले, इतना सब बोलने की क्या ज़रूरत थी? वो तेरे पिता हैं।”
आरव ने माँ के माथे को चूमा और कहा, “माँ, पिता का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन वो सम्मान माँ के आत्मसम्मान की लाश पर नहीं टिक सकता। अब मैं बड़ा हो गया हूँ। अब इस घर में तुम्हारी आवाज़ दबेगी नहीं, बल्कि गूंजेगी। यह उस बेटे का वादा है जिसे तुमने बोलना सिखाया है।”
उस रात सुजाता जी को नींद बहुत अच्छी आई। इसलिए नहीं कि उनके बेटे ने उन्हें दुनिया के सामने महान बताया था, बल्कि इसलिए क्योंकि आज उन्हें अपना खोया हुआ वजूद वापस मिल गया था। उन्होंने समझ लिया था कि सम्मान मांगा नहीं जाता, लेकिन अगर न मिले, तो कभी-कभी उसे छीनने के लिए अपनों को आईना दिखाना जरूरी होता है।
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अक्सर हमारे घरों में, जो महिला सबसे ज्यादा त्याग करती है, उसे ही सबसे कम सम्मान मिलता है। हम भाषा, पहनावे या आधुनिकता के नाम पर अपनी माँ या पत्नी को कमतर आंकने लगते हैं। लेकिन याद रखिये, घर ईंट-पत्थर से नहीं, एक औरत की भावनाओं से बनता है।
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मूल लेखिका : विभा गुप्ता