“अक्सर हम जिसे अपना खून कहते हैं, वही हमारी रूह को छलनी कर देता है, और जिसे पराया समझते हैं, वो हमारे स्वाभिमान की ढाल बन जाता है। क्या एक बेटे के लिए ‘सच’ बड़ा है या ‘परिवार की झूठी इज़्ज़त’?”
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“तमीज़ तो मैं तब भूल गया था भैया, जब मैंने अपनी आँखों से आपको भाभी पर हाथ उठाते देखा था। तमीज़ तो उस दिन ही मर गई थी जब इस घर की चारदीवारी के भीतर एक औरत के स्वाभिमान को रोज कुचला जा रहा था और हम सब ‘घर की बात घर में रहे’ का मंत्र जपते हुए तमाशा देख रहे थे,” समीर ने एक-एक शब्द चबाते हुए कहा।
हवेली के मुख्य द्वार पर एक अजीब-सा हड़कंप मचा हुआ था। शाम का धुंधलका गहराने लगा था, लेकिन ‘रघुकुल विला’ के आंगन में तने तनाव ने माहौल को और भी स्याह कर दिया था। सूटकेस सीढ़ियों के नीचे लुढ़का पड़ा था और उसके पास बिखरे हुए कपड़े गवाही दे रहे थे कि किसी को बेहद बेआबरू करके घर से निकाला जा रहा है।
“खबरदार! जो अब एक कदम भी आगे बढ़ाया। अगर इस घर की इज़्ज़त का तनिक भी ख्याल है, तो चुपचाप गाड़ी में बैठ जाओ और हमेशा के लिए यहाँ से दफा हो जाओ।”
पिताजी की दहाड़ से पूरा घर थर्रा गया था। उनके चेहरे की नसें तनी हुई थीं और उंगली उस महिला की तरफ उठी थी जो ज़मीन पर बैठी सिसक रही थी। वह कोई और नहीं, घर की बड़ी बहू ‘सुधा’ थी।
तभी, भीड़ को चीरते हुए एक युवक सामने आ खड़ा हुआ। उसकी आँखों में आंसू नहीं, अंगारे थे।
“गाड़ी में भाभी नहीं बैठेंगी पिताजी, बल्कि पुलिस की जीप में वो इंसान बैठेगा जिसने इस घर को अपराध का अड्डा बना रखा है,” समीर की आवाज़ में एक ऐसी दृढ़ता थी जिसे आज तक किसी ने नहीं सुना था।
समीर की इस हिमाकत पर पिताजी सन्न रह गए। माँ, जो अब तक सुधा को कोस रही थीं, उनका मुंह खुला का खुला रह गया। बड़े भाई, ‘विक्रम’, जो सोफे पर टांग पर टांग चढ़ाए बैठे थे, झटके से खड़े हो गए।
“तेरा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है समीर? बड़ों के बीच में बोलने की तमीज़ भूल गया है क्या?” विक्रम ने गुर्राते हुए कहा।
“तमीज़ तो मैं तब भूल गया था भैया, जब मैंने अपनी आँखों से आपको भाभी पर हाथ उठाते देखा था। तमीज़ तो उस दिन ही मर गई थी जब इस घर की चारदीवारी के भीतर एक औरत के स्वाभिमान को रोज कुचला जा रहा था और हम सब ‘घर की बात घर में रहे’ का मंत्र जपते हुए तमाशा देख रहे थे,” समीर ने एक-एक शब्द चबाते हुए कहा।
सुधा ने घबराई हुई नज़रों से समीर को देखा। “देवर जी, आप बीच में मत पड़िए। ये लोग बहुत ताकतवर हैं, आपकी ज़िंदगी खराब कर देंगे। मुझे जाने दीजिए,” सुधा ने हाथ जोड़ते हुए गिड़गिड़ाया।
समीर ने झुककर सुधा का हाथ पकड़ा और उन्हें ज़मीन से उठाया। “नहीं भाभी, आज अगर आप चुपचाप चली गईं, तो कल किसी और सुधा के साथ यही होगा। यह लड़ाई अब सिर्फ आपकी नहीं, इस घर की उस सड़ चुकी मानसिकता के खिलाफ है जिसे पिताजी ‘परंपरा’ कहते हैं।”
माँ ने अपना आपा खो दिया। वे दौड़कर समीर के पास आईं और उसका कॉलर पकड़ लिया, “तू उस कलमुंही का पक्ष ले रहा है? उस बाँझ औरत का? जिसने पांच साल में इस घर को वारिस नहीं दिया? अरे, विक्रम की दूसरी शादी की बात चल रही है, विधायक जी की बेटी से। करोड़ों का दहेज आ रहा है, हमारा बिज़नेस डूबने से बच जाएगा। तू चाहता है हम सड़क पर आ जाएं?”
समीर ने माँ के हाथों को अपनी शर्ट से धीरे से हटाया। उसकी नज़रों में माँ के लिए अब वो सम्मान नहीं बचा था जो कल तक था।
“तो यह है असली सच? वारिस तो बस एक बहाना है माँ। असली लालच तो दहेज का है। आप लोग सुधा भाभी को ‘बाँझ’ कहकर घर से निकाल रहे हैं ताकि भैया की दूसरी शादी कर सकें? लेकिन अगर दुनिया को पता चल गया कि कमी भाभी में नहीं, आपके लाडले बेटे विक्रम में है, तो क्या होगा?”
समीर के इस वाक्य ने जैसे वहां बम फोड़ दिया हो। विक्रम का चेहरा पीला पड़ गया। पिताजी लड़खड़ाकर सोफे का सहारा लेने लगे।
“तू… तू क्या बकवास कर रहा है?” पिताजी ने हकलाते हुए पूछा।
समीर ने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ कागज़ निकाला और उसे हवा में लहराया। “यह डॉ. मेहता की रिपोर्ट है पिताजी। वही डॉ. मेहता जो आपके दोस्त हैं और जिन्होंने आपसे यह रिपोर्ट छिपाकर रखी थी। विक्रम भैया को ‘एज़ूस्पर्मिया’ है। वो कभी पिता नहीं बन सकते। और यह बात भैया शादी से पहले से जानते थे। फिर भी… फिर भी पिछले पांच सालों से आप सब मिलकर भाभी को ताने देते रहे? उन्हें नीम-हकीमों के चक्कर लगवाते रहे, गर्म सलाखों से दगवाया, व्रत रखवाए… सिर्फ इसलिए ताकि आपकी झूठी शान बची रहे और भैया की कमी पर पर्दा पड़ा रहे?”
पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। सुधा ने कांपते हाथों से वह रिपोर्ट ली। उसे अंग्रेजी पढ़नी नहीं आती थी, लेकिन समीर की बातों और पति के झुके हुए सिर ने उसे सब समझा दिया था। पांच साल… पांच साल तक उसने खुद को कोसा था, खुद को अधूरा माना था, हर रात रोते हुए काटी थी। और असलियत यह थी?
“झूठ! यह सब झूठ है!” विक्रम ने झपटकर रिपोर्ट छीनने की कोशिश की, लेकिन समीर ने उसे धक्का दे दिया। विक्रम, जो हमेशा समीर को दबाकर रखता था, आज समीर की आंखों में अपनी सच्चाई देखकर सहम गया।
“समीर, तू अपने सगे भाई की पीठ में छुरा घोंप रहा है?” पिताजी ने दबी आवाज़ में कहा। “तुझे पता है अगर यह बात बाहर निकली तो हमारी क्या इज़्ज़त रह जाएगी? विधायक जी रिश्ता तोड़ देंगे। हमारा कर्ज़ कैसे उतरेगा?”
“इज़्ज़त?” समीर कड़वाहट से हंसा। “पिताजी, जिस इज़्ज़त की नींव एक बेगुनाह औरत के आंसुओं और धोखे पर टिकी हो, उसका गिर जाना ही बेहतर है। आप लोगों ने एक औरत को सिर्फ इसलिए ‘डिस्कार्ड’ कर दिया जैसे वो कोई खराब मशीन हो, क्योंकि आपको पैसों की ज़रूरत थी? यह व्यापार है पिताजी, परिवार नहीं।”
माँ अब रोने का नाटक करने लगीं। “हाय! मैंने कैसा कपूत पैदा किया। आज यह एक बाहरवाली के लिए अपने माँ-बाप को ज़लील कर रहा है। अरे, हमने तुझे पाल-पोस कर बड़ा किया, इसी दिन के लिए?”
समीर की आंखें भर आईं, लेकिन उसका संकल्प नहीं डिगा। “माँ, आपने मुझे पाला, लेकिन संस्कार शायद मुझे मेरी किताबों और मेरे विवेक ने दिए। अगर आज मैं चुप रहा, तो मुझे खुद से घिन आएगी। आप कहती हैं भाभी ‘बाहरवाली’ हैं? जिस दिन वो ब्याह कर आई थीं, आपने ही कहा था कि यह घर की लक्ष्मी है। पांच साल तक उन्होंने आपकी सेवा की, आपके ताने सहे, भैया की मार सही, और उफ्फ तक नहीं की। आज जब उनका काम निकल गया तो वो ‘बाहरवाली’ हो गईं?”
समीर ने सुधा के कंधे पर हाथ रखा। “भाभी, चलिए। अब यह घर आपके रहने लायक नहीं है। लेकिन आप यहाँ से बेआबरू होकर नहीं, सिर उठाकर जाएंगी।”
“तू इसे कहाँ ले जाएगा? इसकी मदद करके तू भी सड़क पर आ जाएगा,” विक्रम ने दांत पीसते हुए कहा। “जायदाद से बेदखल कर दूंगा तुझे।”
“रख लीजिए अपनी जायदाद भैया,” समीर ने पलटकर जवाब दिया। “मुझे ऐसी दौलत नहीं चाहिए जिसमें किसी की बद्दुआओं की महक हो। मैं कमा लूंगा, छोटा-मोटा काम कर लूंगा, लेकिन कम से कम रात को सुकून से सो सकूंगा।”
समीर ने सूटकेस उठाया। सुधा अभी भी बुत बनी खड़ी थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस देवर को वह हमेशा एक बच्चे की तरह मानती थी, आज वही उसकी ढाल बनकर खड़ा था।
“चलो भाभी,” समीर ने कहा।
जैसे ही वे दरवाजे की ओर बढ़े, पिताजी ने आखिरी दांव खेला। “अगर यह औरत इस घर से बाहर गई और इसने मुंह खोला, तो हम पुलिस में रिपोर्ट करेंगे कि यह घर से जेवर चुराकर भागी है। और तू… तू इसमें शामिल है। सोच ले समीर, तेरा करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगा।”
समीर रुका। वह मुड़ा और उसने अपना मोबाइल फोन जेब से निकाला।
“कीजिए रिपोर्ट पिताजी। लेकिन उससे पहले यह वीडियो देख लीजिए,” समीर ने फोन की स्क्रीन उनकी तरफ की।
स्क्रीन पर अभी-अभी हुई सारी बातचीत रिकॉर्ड थी। समीर ने पूरी घटना को लाइव रिकॉर्ड कर लिया था।
“आज की तकनीक बहुत आगे बढ़ चुकी है पिताजी। अगर आपने भाभी पर कोई भी झूठा इल्जाम लगाया, या उन्हें परेशान करने की कोशिश की, तो यह वीडियो और भैया की मेडिकल रिपोर्ट दोनों सोशल मीडिया और पुलिस कमिश्नर के पास होगी। यह धमकी नहीं, चेतावनी है।”
पिताजी धम्म से सोफे पर गिर पड़े। उनका आखिरी हथियार भी बेकार हो गया था। माँ अब सचमुच रो रही थीं, लेकिन अपने पापों के लिए नहीं, बल्कि अपनी हार के लिए।
समीर ने सुधा का हाथ पकड़कर देहरी पार कराई। बाहर ठंडी हवा चल रही थी। सुधा ने पहली बार उस घर की ओर मुड़कर देखा, जो पांच साल तक उसका पिंजरा था।
सड़क पर आकर सुधा फफक कर रो पड़ी। “समीर, तूने मेरे लिए अपने परिवार से दुश्मनी मोल ले ली। अब तू कहाँ जाएगा?”
समीर ने एक ऑटो रिक्शा रोका और सामान उसमें रखा। “भाभी, परिवार खून से नहीं, अहसास से बनता है। आज से आप मेरी ज़िम्मेदारी हैं। हम वकील के पास जाएंगे। आपको आपका हक़, आपका स्त्रीधन और गुज़ारा भत्ता, सब मिलेगा। और सबसे बड़ी बात, आपको वो सम्मान मिलेगा जिसकी आप हकदार हैं।”
सुधा ने कांपते हाथों से समीर के सिर पर हाथ रखा। उसे लगा जैसे उसे उसका खोया हुआ भाई मिल गया हो।
ऑटो चल पड़ा था। पीछे ‘रघुकुल विला’ अपनी झूठी शान और अंधेरे रहस्यों के साथ छोटा होता जा रहा था। समीर जानता था कि आगे का रास्ता कांटों भरा होगा। माँ-बाप उसे कोसेंगे, समाज सवाल उठाएगा, शायद उसे आर्थिक तंगी भी झेलनी पड़े। लेकिन उसके मन में एक अजीब-सा सुकून था।
उसने आज एक घर टूटने दिया, ताकि एक इंसान बच सके। उसने सीखा था कि कभी-कभी ‘धर्म’ को निभाने के लिए ‘रिश्तों’ की बलि देनी पड़ती है। और आज उसने वही किया था।
उस रात, शहर की चकाचौंध में दो रूहें अपने नए सफर पर निकल पड़ी थीं—एक, जिसे अपनी बेगुनाही का सबूत मिल गया था, और दूसरा, जिसने साबित कर दिया था कि मर्दानगी औरतों पर हाथ उठाने में नहीं, बल्कि उनके हक़ के लिए दुनिया से लड़ जाने में है।
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मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल