रितिका तुम तैयार हो जाओ…! आज कहीं बाहर चलते हैं। और हाँ….! रात का खाना भी बाहर खाकर आएंगे, ऑफिस से आते ही रमन बोला।
रितिका भी बाहर जाने के लिए कई दिनों से सोच रही थी, लेकिन अभी महीना खत्म होने में पाँच दिन बाकी थे। उसने रमन से इस संबंध में कुछ नहीं बोला। जैसे ही रमन ने बोला तो उसने तुरंत जाने के लिए हामी भर दी।
अन्दर जाकर अलमारी खोली, देखा…! पैसे ज्यादा नहीं थे। वह फिर भी रमन की खुशी के लिए बाहर जाने के लिए तैयार हो गई। रमन पूरा वेतन रितिका के हाथ में रख देता, रितिका अपने हिसाब से पूरा महीना चलाती।
रितिका रसोई से दो कप गरमा गरम चाय बना कर ले आई। चाय पीने के बाद रितिका तैयार होने चली गई। रमन भी हाथ मुंँह धो कर जाने के लिए तैयार हो गया।
दोनों बाहर जाने के लिए निकल गए। थोड़ी दूर जाकर
रितिका बोली- रमन…! बहुत दिन हो गये सामने वाले पार्क में नहीं गए हैं। चलो न….!! वहांँ चलते हैं। सचमुच, वहाँ बहुत ही सुकून मिलता है।
रमन मुस्कुराते हुए जाने के लिए राजी हो गया।
रितिका रमन की बाहों में बाहें डालकर पार्क में घूमती रही। घूमते-घूमते काफी देर हो गई।
रमन बोला चलो, किसी अच्छे रेस्टोरेंट में खाना खाते हैं। रितिका बोली आज तो मैंने तुम्हारे मनपसंद आलू दम बनाए हैं। रमन कुछ नहीं बोला, बस एकटक रितिका की तरफ देखते हुए कुछ सोचने लगा।
रितिका प्यार भरी नजरों से रमन को निहारते हुए बोली चलो न…! सामने वाले स्टॉल से पानी पूरी खाते हैं। उसकी पानी पूरी मुझे बहुत पसंद है, उसके आगे मंँहगे-मंँहगे रेस्टोरेंट भी फेल है। रमन उसकी मन की बात समझ गया कि रितिका रेस्टोरेंट क्यों नहीं जाना चाह रही है…? इसका एक मुख्य कारण था पैसे का न होना।
दोनों पानी पूरी खाकर हंँसते- मुस्कुराते वापस घर आ गए। घर आकर रमन रितिका से बोला-रितिका हम तुम्हारे मन की बात अच्छे से समझते हैं। तुमने जानबूझकर रेस्टोरेंट जाने के लिए मना कर दिया, क्योंकि रेस्टोरेंट जाने से हमारे तीन-चार दिन का खर्चा बच जाएगा।
रितिका तुम इतना बचत करना कैसे सीख गई। जितनी मेरी तनख्वाह है, उतना तो तुम विवाह से पहले अपने घर में चार दिन में खर्च कर देती थी।
रितिका मुस्कुराते हुए बोली, जब हमारे पास खूब पैसा हो जाएगा, तब मेरा हाथ फिर से खुल जाएगा। आप चिंता मत करो, हम पूरा-पूरा हिसाब-किताब रखे हैं…. और बोलते हुए जोर से खिलखिलाने लगी।
रमन सिर्फ मुस्कुरा कर रह गया। रितिका सचमुच तुम कितनी समझदार हो गई हो।
रमन के वेतन से गांँव में बूढ़े माता- पिता को पैसा भेजना एवं छोटा भाई सुशांत कॉलेज में पढ़ रहा है उसको पैसा भेजना पड़ता था। इसके बाद मुंबई जैसे महानगर में रहना आसान नहीं है। रितिका किसी प्रकार से गृहस्थी की गाड़ी चला रही थी।
रमन सोचते- सोचते अपनी जिंदगी के पिछले अध्याय के पन्ने पलटने लगा।
रमन और रितिका दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। रितिका काफी अमीर माता-पिता की लाडली बेटी थी। वह बहुत ही लाड़- दुलार से पली थी। पैसों को उसने कभी पैसा नहीं समझा। अपने दोस्तों के ऊपर पैसा पानी की तरह बहाती थी।
उसे अपने ही कॉलेज का एक लड़का रमन बहुत अच्छा लगता था, जो उसके मन मंदिर में बस गया। उसने रमन से अपने दिल की बात की। रमन ने कहा- कहांँ मैं और कहांँ आप…. दोनों के रहन-सहन से लेकर हर चीज में बहुत अंतर है। आप जितना एक दिन में खर्च करती हैं उतना खर्च मुझे पूरे साल के लिए नहीं मिलता है।
मैं एक निम्न मध्यम वर्गीय किसान का बेटा हूँ। परिवार का बड़ा बेटा होने के कारण मेरे घर वालों को मुझसे बहुत आशाएं हैं।
हमारे परिवारों में भी बहुत असमानता है, इसलिए आप हमें भूल जाइए यही बेहतर है।
रमन की बात सुनकर रितिका गंभीर होकर सोचने लगी। रमन बहुत ही स्वाभिमानी लड़का है। यही अच्छाई रितिका को रमन के समीप ले आई।
रितिका, रमन को जितना भूलना चाहती वह उतना ही उसके करीब जा रही थी। उसने अपने जीवन में कई बसन्त देखे थे, लेकिन उसके जीवन में प्यार की पहली दस्तक रमन ने दी थी। बहुत सोच विचार करने के बाद आखिर वह अपने दिल के हाथों हार गई।
कुछ दिनों के बाद वह रमन से मिली और बोली- कि वह उसके बिना नहीं रह सकती, और उससे विवाह करना चाहती है।
रमन – तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या..? अभी तो मैं पढ़ रहा हूंँ। इसके बाद नौकरी लगने में कितना वक्त लगेगा, पता नहीं। ऐसा नहीं कि रमन को रितिका पसंद नहीं थी, उसे इस बात का डर रहा था, कि रितिका एक अमीर माता-पिता की संतान है। क्या वह उसके साथ निर्वाह कर पाएगी…?
रितिका रमन का जीवन भर इंतजार कर सकती थी। वह बोली तुम्हारी जब नौकरी लगेगी, तभी विवाह करेंगे।
रमन- क्या तुम्हारे माता-पिता इस रिश्ते के लिए मान जायेंगे…? रितिका बोली शायद उन्हें मनाने में थोड़ा समय लगेगा। मुझे पूर्ण विश्वास है, वह अपनी औलाद की खुशी की खातिर मान जाएंँगे।
ग्रेजुएशन करने के बाद रमन ने कई जगह नौकरी के लिए फॉर्म भरे। उसमें से कई बार इंटरव्यू तक होते-होते रह गया, लेकिन माता-पिता की दुआओं एवं रितिका के सच्चे प्यार का असर हुआ, उसे बैंक में नौकरी मिल गई। रमन से ज्यादा रितिका खुश थी, कि अब उसे अपनी मंजिल मिल जाएगी।
रितिका ने अपने घर में रमन के साथ अपने रिश्ते की बात की। उसकी बात सुनकर सभी लोग उससे नाखुश हुए। मम्मी बोली- तुम एक छोटी सी नौकरी में कैसे खुश रह पाओगी। इस घर में तुम एक राजकुमारी की भांँति पली हो…. एक साधारण सी नौकरी के सहारे तुम अपना जीवन कैसे व्यतीत कर पाओगी..?
रितिका ने दोनों हाथ जोड़कर अपने माता-पिता को मनाने की कोशिश की और कहा- कि मैं रमन के साथ ही खुश रह पाऊंँगी, नहीं तो तुम्हारी बेटी हमेशा-हमेशा के लिए मुरझा जाएगी। मैंने रमन को अपने मन मंदिर में बसा लिया है। उसकी जगह किसी और को नहीं दे सकती।
माता-पिता बेटी की बात से ज्यादा देर नाराज नहीं रह पाए और कहा ठीक है जब तुम खुश रहोगी, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है।
कुछ दिनों के बाद रमन और रितिका का विवाह हो गया। विवाह के बाद रितिका रमन के गांँव यानी कि अपने ससुराल गई। उसने शायद पहले कभी भी गांँव नहीं देखे थे। रमन के माता-पिता ने रितिका को इतना प्यार दिया कि वह भी उनके प्यार में रंग गई। उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि वह अमीर घर से आई है। रमन के प्यार में इस तरह से रंगी थी, कि वह जिस हाल में उसे रखेगा रहेगी।
कुछ दिनों के बाद वह रमन के साथ वापिस मुंबई आ गई। मुंबई में एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया। उसी के अंदर रसोई थी। उसने अपनी जिंदगी की फुलबगिया को उस छोटे से कमरे में सजा लिया। जिसकी खुशबू उसके घर के कोने-कोने में बिखरी हुई थी। वह रमन के साथ दुनिया की हर खुशी महसूस कर रही थी।
रितिका रसोई के काम निपटाकर जब वापस आई तो रमन को खोया हुआ प्रकार शरारत से बोली- जागो मोहन प्यारे….!! कहकर रमन से सटकर बैठ गई। रमन अचानक से हूंऊं…करते हुए वापस वर्तमान में लौट आया
एक दिन रमन रितिका से बोला- मैंने तुमसे विवाह करके तुम्हें वो सब कुछ नहीं दे पाया, जिसकी तुम असल में हकदार थी। तुम्हें देख कर मुझे यह बात हमेशा सालते रहती है।
नहीं रमन…! तुम ऐसा सोच कर अपने आप को दु:खी मत करो। मैंने तो तुम्हें अपनी स्वेच्छा से चुना है। मुझे अपने चुनाव पर कभी बिल्कुल भी दुःख नहीं हुआ है। मैं हर हाल में तुम्हारे साथ बहुत खुश हूंँ।
रितिका एक अच्छी पत्नी, बहू,और भाभी की जिम्मेदारी बखूबी निभा रही थी।
अक्सर उसकी मांँ फोन करके पूछती- कैसी हो बेटी?
वह खिलखिलाते हुए जबाब देती- माँ मैं बिल्कुल ठीक हूँ।
उसके इस जबाब से माँ का मन भर जाता। बुदबुदाते हुए कहती- मेरी बच्ची मुझे सब मालूम है। तुमने अपने जज्बात सब अपने अन्दर ही दफन कर लिये है। कम से कम अपनी मांँ से साझा कर लो। मैं तुम्हारी मांँ हूँ, मुझ से ज्यादा तुम्हें कौन जान सकता है।
माँ तुम बेकार ही परेशान हो रही हो, मैं सचमुच ठीक हूँ कहते हुए उसने ठंँडी सांँस ली। सचमुच रितिका ने अपने अंदर के सब जज्बात खत्म कर दिए थे।
जब लड़कियांँ अपने मनपसंद लड़के के साथ जीवन निर्वाह करने के लिए कदम उठाती हैं, तब वह अपने अंदर की उथल-पुथल किसी से न कह कर जीवन पर्यन्त अपने जज्बातों के साथ समझौता करती रहती हैं।
दूसरे दिन सुबह रितिका की मम्मी का फोन आया और सुबह-सुबह अपनी बेटी को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं देते हुए बोली- बताओ बेटी…!! तुम्हारे जन्मदिन में क्या तोहफा दूंँ…?
रितिका विवाह से पहले बहुत हक़ से बोलती थी, मुझे यह चीज चाहिए..!! इस बार वह बोली मम्मी मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस आप लोगों का आशीर्वाद बना रहे। यही कामना करती हूँ।
रितिका की मम्मी की आंँखों के किनारों से दो बूंँद लुढ़क कर गालों पर आ गए।
रितिका विवाह के बाद कितनी बदल गई है। उसने कभी भी अपनी पसंद, नापसंद मेरे पास नहीं रखी।
पहले तो जन्मदिन के लिए महीनों पहले अपनी पसंद की ड्रेस, दोस्तों के साथ पार्टी के लिए जगह सब निर्धारित करती थी लेकिन अब….
बेटी तुम अपने जन्मदिन में अपने घर नहीं बुलाओगी..? रितिका- हांँ हांँ क्यों नहीं मम्मी…! आपका जब दिल करे, तभी आ जाइए। यह तो तुम्हारी बेटी का ही घर है।
शाम होते ही रितिका के मम्मी-पापा आ गए। मम्मी-पापा के आते ही रितिका दौड़कर मम्मी के गले लग गई। मम्मी ने देखा घर एकदम साधारण कोई भी सजावट नहीं है।
आज रमन ने छुट्टी ले ली थी। शाम के समय वह कुछ जरूरी सामान लेने बाजार गया। कुछ देर के बाद वह सामान, मिठाइयांँ,केक और एक उपहार लेकर आ गया। घर में अपने सास- ससुर को देखकर प्रसन्नचित होकर उन्हें प्रणाम किया।
रमन ने टेबल पर केक सजाया और रितिका ने केक काटा। तत्पश्चात रमन उसे एक उपहार देते हुए बोला… यह मेरी तरफ से एक छोटी सी भेंट। उपहार देखते ही रितिका की आंँखें चमक उठी। वह तुरंत खोलकर देखने लगी। उसके अंदर शिफॉन की हल्के गुलाबी रंग की साड़ी थी।
रितिका बहुत खुश हुई और बोली…. तुम रुको..? मैं अभी यह साड़ी पहन कर आती हूंँ, और तुरंत वह साड़ी पहन कर आ गई।
रमन की खुशी का ठिकाना न रहा वह कोई मँहगे उपहार तो नहीं दे सकता था, लेकिन जो भी दिया उसमें रितिका खुश थी। यह देखकर उसे बहुत अच्छा लगा।
रितिका की मम्मी-पापा ने देखा रितिका अपनी दुनिया में खुश है यह सोचकर उन्हें संतुष्टि हुई।
सुनीता मुखर्जी “श्रुति”
स्वरचित,मौलिक, अप्रकाशित
हल्दिया पश्चिम बंगाल
#पहला प्यार