रीवा स्टेशन पर उतरी तो धुंध अभी टूटी नहीं थी।
रात की ठंड जैसे लोहे की पटरियों में छिपकर उसके कपड़ों में उतर रही थी।
उसके एक हाथ में छोटा-सा सूटकेस था, दूसरे हाथ में पाँच बरस का आरव—
कभी कोट का सिरा पकड़ता, कभी उंगली कसकर थाम लेता,
जैसे दुनिया एक अजगर है जो किसी भी पल उसे निगल लेगी।
भीड़ की आवाज़ें टूटते कांच की तरह उसके कानों में गिर रही थीं।
और रीवा के भीतर एक ही आवाज़ गूँज रही थी—
“तुम्हारे फैसले की कीमत कौन देगा?”
वह ट्रेन में चढ़ी।
आरव खिड़की की ओर भागा, और सामने बैठे बुजुर्गा के पास जा बैठा।
स्त्री ने जगह सरका दी—सफेद बाल, चावल-सी मुलायम आवाज़।
“पहली बार जा रही हो, बेटी?”
आवाज़ में कोई कौतूहल नहीं था, केवल अनुभव की शिकनें थीं।
रीवा ने मुस्कराने की कोशिश की।
“हाँ… नया काम। नई ज़िंदगी।”
वृद्धा की आँखें उसके हाथों पर पड़ीं—अंगूठी का निशान था, लेकिन अंगूठी नहीं।
उन्होंने धीरे-से कहा,
“नए सफ़र में सबसे कठिन होता है वह दरवाज़ा बंद करना
जो दिल के भीतर खुला रहना चाहता है।”
रीवा ने उत्तर नहीं दिया।
वह खिड़की से बाहर देखने लगी—पटरी के किनारे भटकते झोपड़े,
धूल के बादल, और पीछे भागता शहर,
जैसे उसका अतीत उसे रोके रखने की कोशिश कर रहा हो।
कभी वह रीवा नहीं थी,
वह मायरा थी—अभय की पत्नी।
अभय बोल नहीं पाता था।
शब्द उसकी जीभ तक आते और वहीं दम तोड़ देते।
उसका आधा शरीर उस रात की निशानी था जब किस्मत ने उसे गिरा दिया था।
पर आँखों में अब भी संवाद बचा था।
और मायरा उन आँखों से बातें करती थी—
रोज़, रात-दिन, बिना थके।
घर में तीसरा आया—यशवंत।
बाहर से आया, पर धीरे-धीरे भीतर बस गया।
कागज़ों में सहारा देने को,
रसोई में नमक थामने को,
साँझ के अँधेरे में साथ बैठने को।
शुरू में वह राहत था—
फिर आदत—
और आदतें अक्सर धीरे-धीरे धागों में बदलकर
गले में फंदे-सी कस जाती हैं।
अभय सोता और यशवंत जागता।
मायरा झपकियों और जागने के बीच झूलती—
किसी ने भी इरादा नहीं किया था,
पर तीन और दो के बीच एक दीवार खुद खड़ी हो गई।
एक सुबह
थकान ने फैसला किया।
मायरा ने नहीं।
सूटकेस उठाया,
चाबी मेज पर रखी,
अभय के सिर पर हाथ रखा—या शायद रखा भी नहीं।
वह यशवंत के साथ निकल पड़ी।
सिर्फ घर नहीं छोड़ा था—
अपनी साँसों का आधा हिस्सा पीछे छोड़ आई थी।
वह मायरा से रीवा बन गई।
चार महीने बीत गए।
नाम बदल गया, शहर बदल गया, पर क्या खुद बदल गई?
दुकान में काम, कपड़े तहना,
घरेलू औरतों की आवाज़ें—
हँसी, सौदे, चुगलियाँ—
सबने उसे छूकर देखा, लेकिन उसके भीतर नहीं पहुँचे।
रात होते ही भीतर का कमरा खुल जाता—
वह कमरा जिसमें अभय की खामोशी अब भी बैठी थी
और नन्हा अभ्यास—
जिसकी हँसी उसके सीने में इस तरह चुभती
जैसे किसी ने जेब में एक नुकीला खिलौना छोड़ दिया हो
और वह हर कदम पर चुभता जाए।
यशवंत अब सहारा नहीं था—
वह एक दर्पण था
जिसमें रीवा अपनी गलती का चेहरा देखती थी।
वह पास था, पर किसी अजनबी की तरह पास।
उसका स्पर्श अब राहत नहीं, भार था।
अपराधबोध कभी चिल्लाता नहीं—
वह धुएँ की तरह फैलता है,
हर साँस को भारी कर देता है।
एक रात
रीवा उठ बैठी।
उसने सपना देखा—अभ्यास गिर रहा है,
उसके छोटे हाथ हवा में तड़प रहे हैं
और कोई पकड़ने वाला नहीं।
उसने पहली बार समझा—
वह क्या छोड़ आई थी।
सुबह
ना चेतावनी, ना बहस।
रीवा स्टेशन पर खड़ी थी,
हाथ में आरव, आँखों में स्पष्टीकरण नहीं,
सिर्फ लौटने का संकल्प।
वृद्धा ने पूछा—
“कहाँ उतरना है?”
रीवा ने धीमे से कहा—
“वहीं, जहाँ मेरी कमी किसी ने महसूस की थी।”
वृद्धा ने मुस्कुराकर कहा,
“घर वही होता है, जहाँ दर्द आकर भी बैठने से इंकार नहीं करता।”
सेमरपुर की पगडंडी पर
अभय दरवाज़े के पास खड़ा था—
हाथों में अभ्यास का बस्ता,
चेहरे पर नींद और इंतज़ार की रेखाएँ।
रीवा को देखते ही
अभ्यास उसकी ओर भागा।
लिपट कर बोला,
“मम्मा!”
रीवा अंदर तक हिल गई।
नाम की पहचान, खून की पहचान—
इनमें कोई तर्क नहीं लगता।
बच्चों में सच आँखों से उतरता है।
अभय ने कुछ नहीं कहा।
कुछ पूछने की ताकत उसमें थी नहीं, और शिकायत की आदत उसने कभी सीखी ही नहीं।
उसकी चुप्पी ने रीवा को बचपन की किताब की तरह खोल दिया—
जिसके पन्ने उसने खुद फाड़ दिए थे।
रात को रसोई जली।
रोटियाँ फुलीं।
दाल की खुशबू ने उन दीवारों में नरमी भर दी
जहाँ महीनों तक ठंड बैठी रही थी।
रीवा चूल्हे के सामने बैठी रही—
बिना एक कौर जाए।
अंदर कोई युद्ध चल रहा था।
अभय ने धीरे से कहा,
“तुम लौट आई, यही काफी है।”
लेकिन रीवा जानती थी—
यह सच नहीं है।
कुछ खाइयाँ कदमों से नहीं भरतीं।
अभ्यास उसकी गोद में सिर रख कर सो गया।
रीवा ने उसे थपकियाँ दीं
पर उसकी हथेली काँप रही थी—
जैसे दिल हाथों में उतर आया हो।
उसे लगा
शायद वापसी ही माफी है।
शायद घर लौटने से पाप छोटा हो जाता है।
शायद बच्चे की मुस्कान दोषों को धो देती है।
पर सच यह था—
रीवा किसी और से क्षमा चाह ही नहीं रही थी।
अभय तो क्षमा का शब्द भी बोल नहीं सकता था।
अभ्यास कभी शिकायत करेगा भी नहीं—
क्योंकि उसे त्याग का अर्थ नहीं मालूम।
दोष
केवल रीवा और रीवा के बीच फँसा था।
उस रात उसने महसूस किया—
वह घर लौटी है
पर खुद तक नहीं लौटी।
सोने से पहले उसने धीरे-से दीवार को छूकर फुसफुसाया—
“मैं तुम दोनों की हो सकती हूँ…
पर अपने लिए मैं कौन हूँ?”
उत्तर नहीं मिला।
उत्तर कई बरस दूर था।
सुबह
सूरज खिड़की पर चढ़ा
और तीन लोगों का घर रोशन हुआ।
पर रीवा की भीतर की रात नहीं टूटी।
वह काम करती, हँसती, बच्चे को नहलाती
पर एक चीज़ भीतर खड़ी रही—
एक खाली आईना
जिसमें वह अपना चेहरा देखने से डरती थी।
क्योंकि वहाँ सिर्फ एक सच लिखा था—
जो माँ अपने बच्चे को छोड़ दे
वह लौट तो सकती है,
पर खुद को कभी पूरी तरह माफ़ नहीं कर पाती।
रीवा ने जीना शुरू किया—
पर क्षमा नहीं।
वह रोज़ उठती, रोटी सेंकती, बच्चों की हँसी सुनती
पर अपने कानों में फुसफुसाती रहती—
“मैंने गलती की थी।”
और शायद
इसका अंत ही उसकी सज़ा और उसका धर्म दोनों था।
कि वह लौट आई
पर अपने ही दिल में
अभी भी रास्ता तलाश रही थी।
कभी एक स्त्री टूटती नहीं—
वह दो हिस्सों में बँटकर जीती है।
एक हिस्सा आगे बढ़ता है,
दूसरा पीछे बैठे रोता है।
रीवा ने आगे बढ़ने को चुना।
रोने वाले हिस्से को साथ लेकर।
क्योंकि हालाँकि सबने उसे स्वीकार कर लिया—
लेकिन वह अभी तक खुद को
क्षमा नहीं कर सकी थी।
और शायद
यही सबसे सच्चा अंत था। 🌿
दीपा माथुर