प्यार के रंग पीढ़ियों के संग – संगीता त्रिपाठी

  “नानी क्या आपका भी कभी किसी से क्रश था “वन्या उत्सुकता से नानी को देख रही थी,

    “ये क्रश क्या होता है लाड़ो..”आँखों में हैरानी लिये नानी ने नातिनी के प्रश्न पर पूछा.

      “अरे नानी क्रश मतलब प्यार… क्या आपने किसी से प्यार किया था “

        “हाँ… तुम्हारे नाना से..”

         “नाना से तो आपकी शादी हुई थी, मैं प्यार के लिये पूछ रही हूँ “

          “हाँ तो जिससे शादी हुई उसी से प्यार होगा न “

           “रबिश… ये क्या बात हुई, शादी पहले और प्यार बाद में “

           “मान लीजिए आपको किसी और से प्यार हो गया हो “

           “कैसे मान लूँ वन्या… हमारे जमाने में इसी तरह प्यार होता था “

           वन्या मानने को तैयार नहीं थी, सालों पहले बिटिया यानि वन्या की माँ वर्तिका ने भी यही पूछा था, तब भी शोभा जी यानि वर्तिका की माँ ने यही जवाब दिया था वर्तिका ने मान लिया लेकिन ये आज की पीढ़ी…., इनके अपने तर्क और सोच है।

      वन्या की शादी होने वाली थी, उसी के पसंद के लड़के के साथ…, माँ-बेटी शॉपिंग चली गई, शोभा जी बालकनी में बैठी अतीत में गोते लगाने लगी,

     क्रश….., हाँ प्यार तो हुआ था, जब वे किशोरवस्था में थी,महेश का चेहरा याद आते ही शोभा जी के लकीरों से भरे चेहरे पर लालिमा छा गई,

               आठवी में थी वो, जब उससे नजरें चार हुई थी, उसी की कक्षा में था वो, हमेशा हुल्लड़ मचाता उसका मुखर स्वभाव और शोभा का शांत स्वभाव… दो विपरीत लोग कब एक दूसरे की जान बन गये पता ही नहीं चला…., मौन नैन संवाद करते थे एक दिन मौका पा उसने एक पुर्जा पकड़ा ही दिया…, घबराते हुये शोभा ने पुर्जा थाम तो लिया पर पढ़ने की हिम्मत न कर पाई, घर पहुंचते ही दादी बोली, “तेरा रिश्ता पक्का हो गया, दो महीने बाद शादी है,अब स्कूल जाने की जरूरत नहीं है “

          “पर दादी मेरी परीक्षा है अगले माह “

           “अब परीक्षा वैगरा तू ससुराल जा कर ही देना “

          हाथ की मुट्ठी में रखा पुर्जा पसीज गया, स्याही फ़ैल गई, छत पर जा बिना पढ़े ही पुर्जे के टुकड़े टुकड़े कर जला दी, जल गये प्यार के वे नव कोपल…. जो अंकुरण के दौरान ही दम तोड़ गये, दो बूंद आँखों से लुढ़क मिट्टी में मिल गये,उन आँसुओं में उभरा अक्स भी मिट्टी में मिल गया, माँ ने देखा, समझा लड़की पराये घर जाने के गम में रो रही।

         “बिटिया ये तो जमाने का दस्तूर है कि लड़की को पराये घर जाना ही है “

     होंठ भींचे शोभा के शब्द भी मौन हो गये, 

     स्कूल का वो आखिरी दिन था जब पुर्जा मिला था, ठीक दो महीने बाद शोभा पराये घर जाने के लिये पालकी में बैठ रही थी, घूँघट की ओट से उनकी नजर उन एक जोड़ी भीगी आँखो पर पड़ी जो पालकी को पकड़े खड़ी थी,

                “ओ महेशा….. जरा संभाल कर जइयो, बिटिया को कष्ट न हो “एक कड़क आवाज के साथ पालकी चल पड़ी,

        अंदर नवविवाहिता की आँखों से गंगा- जमुना बह रही थी,

        “ला पालकी अब मुझे दे दे “

        गांव के छोर पर हाथ बदल गये…, और बदल गई एक दुनियाँ.,

        ससुराल धनी था, साथ ही धनी परिवार के लड़के में सारे ऐब थे,मदिरा पीने से ले कर, हर वो बुरी आदत जो धनवान होने की निशानी थी, पति शंकर में थी।

        “खाते-पीते घर के मर्द ऐसे ही होते “सास बेटे के पक्ष में तलवार निकाल कर खड़ी रहती,

        सामंजस्य बैठाते… उनकी जिंदगी कट रही थी, वे ढल गई थी पति और ससुराल के अनुरूप,लेकिन तय कर लिया था वर्तिका के लिये संस्कार से धनी घर ही देखेंगी…।

       आज अस्सी साल की शोभा जी को वो “पहला प्यार” याद आ गया, जो जीने का हौंसला था, दिल की तिजोरी में बंद वे महके लम्हें और एहसास… उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी हौंसला देते थे,

      “नानी कुछ तो बात है जो ये गोरे गाल लाल हो गये,”वन्या ने छेड़ा,

       “चल हट पगली, हमारे जमाने में प्यार_- व्यार नहीं होता था… न ये वालेटीना होता था जो आजकल बुखार की तरह फैला हुआ है “लाल गालों पर पुरानी स्मृतियों की चमक थी।

      “नानी वालेटिना नहीं वैलेंटाइन होता है, प्यार के इजहार का वीक…, जब एक लड़का या लड़की एक दूसरे को प्रपोज़ करते है, इस जमाने में पहले प्यार होता है फिर शादी..”

     “हाँ वहीं…”

      “एक बात बताओ… सच्ची बोलना, सचमुच में तुम्हारे जमाने में प्यार नहीं होता था “

        “होता था लाड़ो, तब लड़कियों को प्यार करने या सपने देखने का हक़ नहीं था, और सपने देखने की उम्र तक आने से पहले वे ससुराल की देहरी लाँघ जाती थी,प्यार सिर्फ पति से किया जाता था, भले ही पति में कितनी भी कमियाँ हो लेकिन वो परमेश्वर होता है, ये शिक्षा बचपन से लड़कियों को दी जाती थी “

   “वैसे प्यार एक अहसास होता है जो दिल में महकता है, तू भाग्यशाली है जो तेरा प्यार तेरे साथ होने वाला है “वर्तिका की गहरी आवाज सुन शोभा जी ने उसे देखा, एक ख़ामोशी दोनों की आँखों में उतर आई, चाहते हुये भी शोभा जी वर्तिका का साथ नहीं दे पाई,

वे तीन पीढ़ियां है, ये नई पीढ़ी अपनी आजादी, अपने प्यार, अपनी इच्छा के लिये कुछ भी करने को तैयार रहती है। सही कहा गया, कुछ पाने के लिये खुद प्रयास करना होता है, रोशनी के लिये खुद मशाल जलानी पड़ती है,।

  प्यार के रूप भी अनेक है उनके समय में प्यार सिर्फ पति से किया जाता था, बेटी के समय प्यार मुखर हुआ लेकिन समाज क्या कहेगा के डर से… खामोश हो गया, लेकिन आज नातिनी ने प्यार को पाने के लिये हर तरह की हिम्मत से लड़ाई लड़ी और मुकाम की ओर पहुँची…।

               —-संगीता त्रिपाठी 

   #पहला प्यार 

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