पहला प्यार – अर्चना खण्डेलवाल

आज शिरीष को बाजार में देखा तो देखती ही रह गई, तभी मेरी नजर दुकान पर लगे आइने पर गई, अगले ही पल मैंने अपनी आंखें स्वयं ही फेर ली, अब मैं विवाहित हूं, गले में मंगलसूत्र और माथे पर सजा सिंदूर मुझे ग्लानि महसूस करवा रहे थे, इस तरह विवाह के पश्चात पति को छोड़कर किसी ओर को देखना सही नहीं है।

मैं चुपचाप मॉं के साथ घर आ गई, अभी मेरे पति नीरज ऑफिस टूर पर गये है, इसलिए मॉं के घर रहने आ गई, मॉं का घर नजदीक में ही पड़ता है, जब भी नीरज कहीं बाहर जाते हैं, मैं यहां आ जाती हूं, जब भी बाजार जाती हूं, तो मन कहता है कि काश! एक झलक शिरीष की मिल जाएं, कैसे भी करके ये बुझी आंखें उसका चेहरा देखकर चमक जाएं, और आज ईश्वर ने मेरी मौन प्रार्थना सुन ली थी।

मैं रात भर शिरीष के बारे में सोचती रही, मैं इस बात से भी अनजान नहीं थी कि मुझे ये सब अब सोचना नहीं चाहिए, वैसे भी अब रिश्ते बदल गये है, रिश्तों के मायने बदल गये है, शिरीष और मेरे मध्य आजीवन की दूरियां आ गई है, अब हम समंदर के वो दो किनारे है जो कभी भी मिल नहीं सकते हैं।

फिर भी मन में अपने पहले प्यार के प्रति एक आकर्षण था, मैं उसे भुला नहीं पा रही थी।

शिरीष मेरे बड़े भैया के मित्र थे, उनका हमारे घर में बेरोकटोक आना-जाना था, उस समय मेरी उम्र भी ऐसी थी कि इस समय आकर्षण होना आम बात थी।

भैया मुझसे दो साल बड़े थे, वो कॉलेज में थे और मैं विद्यालय में, जब भी घर में कोई त्योहार होता या कुछ अवसर आता तो शिरीष उसमें जरूर आते थे।

उनकी सादगी, सौम्यता और बड़ी-बड़ी आंखें मेरे मन में उतर चुकी थी, मैं मन ही मन उन्हें चाहने लगी थी, मैं कॉलेज के प्रथम वर्ष में आई थी, और भैया का अंतिम वर्ष चल रहा था।

कॉलेज में आते-जाते समय भी मैं उन्हें नजरें चुराकर देख ही लेती थी, उनकी एक झलक दिखते ही, मन मयूर नाच उठता था, उस दिन मेरे होंठों पर मुस्कान से जाती थी, मैं पूरे घर में हर्षायी और इतराई सी घूमती थी, जीवन जैसे इंद्रधनुषी रंगों सा रंगीन हो जाता था, उस दिन घर के बाकी काम हो जाते थे, पर मुझसे पढ़ाई नहीं हो पाती थी।

शिरीष का मुझ पर ऐसा जादू चलता था कि मैं बाकी सब भुल जाती थी, शिरीष बिल्कुल मेरे सपनों के राजकुमार जैसे थे, लंबा कद, सांवला रंग, बात करने का सलीका, वो संस्कार और शिष्टाचार, कभी उन्होंने मुझे आंखें उठाकर नहीं देखा था, पता नहीं उन्हें मुझमें कुछ नजर आता था या नहीं, ये तो मैं नहीं जानती थी, पर हां वो एक सीमित मर्यादा में रहते थे, और सबसे नम्रतापूर्वक बात करते थे। मेरी उपस्थिति से उन्हें कुछ फर्क पड़ता था या नहीं, ये मैं आज तक नहीं जान पाई।

मेरी सहेलियों ने मेरे मन की बात जान ली थी, एक दिन हम चारों सहेलियां बैठी थी, सबने अपने मन की बात, पहले प्यार की बात की तो मैंने भी बता दिया, बस तभी से हम एक-दूसरे के प्यार का नाम लेकर एक-दूसरे को छेड़ने लगे थे, इस तरह मेरा नाम शिरीष के साथ में जुड़ने लगा, शिरीष की नेहा ये सुनते ही मेरे मन में अनगिनत प्यार की कलियां खिल जाती थी, आपसी चुहलबाजियों से मुझ पर प्रेमरस बरसने लगा, उसी में मैं डूबकर रहने लगी।

अगले वर्ष शिरीष का कॉलेज पूरा हो गया, मेरा कॉलेज अभी चल रहा था, कुछ समय बाद शिरीष की दूसरे शहर में  नौकरी लग गई थी, भैया भी नौकरी के सिलसिले में बाहर चले गए, मेरी भी पढ़ाई पूरी हो गई, अब घर में मेरे विवाह की बात चलने लगी, विवाह की जल्दी नहीं थी, पर ये जरूरी था।

दादी मॉं मेरे विवाह का पल देखना चाहती थी, उन्हें लगता था कि वो इस दुनिया से जब भी जाएं तो मेरे विवाह होने के पश्चात ही जाएं।

इधर दादी मॉं बीमार हो गई, वो चाहती थी मेरा विवाह और वर दोनों देख जाएं। घर में विवाह की बातें होने लगी, पिता जी नित नये रिश्ते बताते थे, अंत में नीरज को मेरे लिए चुन लिया गया।

मैंने भी चुपचाप हां कर दी, क्योंकि मेरे पास कोई विकल्प नहीं था, मैं जिससे प्यार करती थी, वो भी मुझसे प्यार करते हैं या नहीं ये मुझे पता ही नहीं था, एक अनिश्चितता की स्थिति थी। कोई उम्मीद, आस नहीं थी, कोई शिकायत, कोई अपेक्षा नहीं थी। मन ही मन का ये पहला प्यार मन में ही रह गया था, जिसे हर क्षण मन से चाहा,  उसे ही कभी बता ना पाई।

बालिग उम्र का आकर्षण था, या पूर्व जन्मों का कोई अधुरा रिश्ता, जो इस जन्म में भी कोई मूर्त स्वरूप नहीं ले पाया था।

अपनी उलझन किसको बताती, मन में अनेकानेक आशंकाएं थी, प्यार शिरीष से ओर विवाह नीरज से, कहीं मैं छल तो नहीं कर रही हूं। इस अनजाने पाप की आशंका मुझे कचोट रही थी।

विवाह तय हो गया, कुछ दिनों पहले बुआ पहली पावणी बनकर घर आई, बुआ मेरी सहेली से बढ़कर थी, वो मेरे मन की हर बात जानती थी, पर उन्हें अपनी उलझन बताना सही नहीं लगा।

मैं सबके बीच में बैठी थी, बुआ अपनी सहेली की बेटी का किस्सा बता रही थी, कैसे उसने पड़ौसी के लड़के से प्यार किया और विवाह से इनकार कर दिया, बात करने पर पता चला कि वो लड़का तो उससे प्यार करता ही नहीं था।

ये लड़कियां भी ना कोई भी हंस बोल लें तो उसे प्यार समझ लेती है, अरे!! विवाह के पहले तो लड़की की सौ जगह बात चलती हैं, मन में लड़कों की परछाई पड़ती है, लेकिन असली छवि तो विवाह बाद उसके पति की सदा के लिए अंकित हो जाती है, जो उसे शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक सुरक्षा देता है।

उस दिन मेरे मन में भ्रम के जो बादल थे, वो छंट गए, क्योंकि मैं स्वयं शिरीष की इस बात से अपरिचित थी कि वो भी मुझे इस नजर से देखते हैं क्या, जिस नजर से मैं उन्हें देखती हूं।

मैंने फैसला ले लिया था, मैं निश्चित थी, अडिग थी, अपने निर्णय पर, मन की डांवाडोल पतवार को किनारा मिल गया था। मैंने नीरज से विवाह कर लिया, और मैं सुखपूर्वक रहने लगी।

शिरीष शहर से बाहर थे, वो मेरी शादी में नहीं आ पाये थे, धीरे-धीरे मेरा भी मायके आना-जाना कम ही हो गया।

जब भी मायके आती तो मायके से जुड़ी हर चीज, हर जगह, हर शख्स कुछ ना कुछ याद दिलाता था। उनमें शिरीष भी एक था, मैं जब भी मायके जाती, उनका चेहरा देखने की तमन्ना लिये जाती और अगर वो दिख जाएं तो आराम मिल जाता था। शिरीष के माता-पिता तो इसी शहर में रहते थे, वो अक्सर अपने माता-पिता के पास आया करते थे।

मैं अपनी सोच में डूबीं थी तभी बड़े भैया ने आकर मुझे चौंका दिया।

भैया आप … अचानक शहर से यहां… मैं एक ही सांस में बोले जा रही थी।

हां, परसों शिरीष की शादी है, इसलिए दो दिन की छुट्टी लेकर आया हूं, मॉं ने तुझे बताया नहीं?

अच्छा…तो उन्होंने  मेरा सरप्राइज बताया नहीं।

शिरीष की शादी…? मगर किससे…..और अचानक?

मैं हैरान थी।

अरे!! इसमें हैरानी की क्या बात है ? सबकी शादी होती है, कल तेरी हुई थी, शिरीष की होने जा रही है और बाद में मेरी होगी, बड़े भैया ने कहा।

अच्छा हुआ तू भी यही है, हमें सपरिवार शादी में जाना है, हम सब शिरीष की शादी में गये और बधाईयां देकर आ गये।

भैया शहर निकल गये, नीरज भी टूर से आ गये तो मैं वापस अपने शहर में आ गई।

नीरज काफी अच्छे व्यवहार के थे, अपने कार्य के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित थे। हमारे दो प्यारे बच्चे हो गये और नये शहर में हमारा तबादला हो गया।

बच्चों का स्कूल में एडमिशन करवा दिया, दोनों बच्चे स्कूल जाने लग गये। एक दिन स्कूल में पैरेंट्स टीचर मीटिंग थी, वहां अचानक से शिरीष नजर आ गये, धड़कन एक पल के लिए ठहर गई, आज अचानक इतने सालों बाद कैसे ?

मैं आगे बढ़कर कुछ कहती इससे पहले नीरज बोल पड़े, ये मेरे नये बॉस है, अभी इसी शहर में आये है, मैंने ये स्कूल एडमिशन के लिए बताया है।

मैंने भी नीरज से शिरीष के बारे में सब बताया कि ये मेरे बड़े भैया के दोस्त हैं और हमारे घरवालों के बीच आना-जाना था, ये जानकर नीरज और भी खुश हुए।

अब हमारे घरों के बीच में आना- जाना शुरू हो गया, 

शिरीष जब भी मेरे सामने आते मेरे चेहरे पर मुस्कान रहती थी, लेकिन मैं थोड़ी असहज सी हो जाती थी।

अब मन में कोई कसक नहीं थी, हर थोड़े दिनों में मिलना हो जाता था, हमारे बच्चे और हम पत्नियां आपस में घुल-मिल गये थे।

समय के साथ में सामान्य हो गई थी, अब पहले वाली कोई बात नहीं थी, कुछ महीनों में शिरीष अपने परिवार सहित हमारी ही सोसाइटी में हमारे फ्लैट के पास रहने आ गये।

अब तो सुबह-शाम आते-जाते हम एक-दूसरे को देखते और मिलते थे, अभिवादन करते थे।

जिस शख्स का चेहरा देखने के लिए मैं तरसा करती थी, वो ही शख्स मेरा पड़ौसी बन गया था। दुनिया सचमुच गोल है, हम जाने-अनजाने में एक-दूसरे से मिल ही लेते हैं।

ये मेरे प्यार की इंतजार की पराकाष्ठा थी कि वो शख्स मेरे साथ नहीं था, पर मेरे पास था। हम जीवन साथी तो नहीं बन पायें पर पड़ौसी होने के नाते एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी बन गये थे।

धन्यवाद 

लेखिका 

अर्चना खण्डेलवाल 

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