मेरा पहला प्यार – संजय सिंह

शाम 4:00 का समय था। राज घर के बाहर जाती धूप में कुर्सी लगाकर चुपचाप बैठा था ।पास में उसका  कुत्ता भी धूप का आनंद ले रहा था ।घर पर कोई नहीं था ।राज को बड़े लाड प्यार से पढ़ा लिखा कर ,काबिल इंसान बनाने में जिस हस्ती का न हाथ था। वह उसकी मां थी। जिस समय राज ने होश संभाला।

उसने प्रथम बार मां को ही अपने सबसे करीब पाया ।कोई भी मुश्किल आती तो मां पहले से मौजूद होती और मुसीबत किस चिड़िया का नाम है ।उसे इसका इल्म तक नहीं था। समय बीत गया और राज अब उस पड़ाव था। जब वह आज अपने आप को ,उस स्वर्ग में बैठी मां से काफी दूर महसूस कर रहा था।

जब से मां उसकी जिंदगी से सदा के लिए चली गई थी। तब से हर दुख और सुख में, हर सुबह, हर दोपहर, हर शाम, हर रात वह अपनी मां को जरूर याद करता और सिर्फ उसके हिस्से में लंबी और गहरी सांस ही आती । वह यह सोचकर हौसला बांधता कि अब तो बस जीवन को काटना है।

बिन मां के हर खुशी उसे पल दो पल की ही लगती। बस यही महसूस होता कि अब मां आएगी  । मन में वह यह सोचता कि जहां भी मां होगी  क्या वह मुझे भी याद करती होगी? या मिलने का प्रयास करती होगी परंतु इसका कोई भी उत्तर उसको ना मिलता।

मन ही मन में राज सोचता कि इंसान का सबसे पहला और सच्चा प्यार उसकी मां ही होती है क्योंकि प्यार की सच्ची परिभाषा मां से ही बनती है और मां पर ही खत्म होती है ।कई बार राज के मन में आता कि एक समय पक्का आएगा। जिस समय वह अपनी मां से फिर से मिलेगा और उस दिन वह अपने गिले- शिकवे और खुशियां उससे   सांझा करेगा

और वाकई ही वह  दिन बहुत ही खुशी का होगा। फिर से वैसी ही खुशियां चारों तरफ होगी और जीवन जीने का मजा आ जाएगा क्योंकि जब वह अपनी मां जो उसका पहला प्यार है। उसको पाएगा तो जीवन फूलों की भांति खुशबूदार और खिला-खिला हो जाएगा। राज की जिंदगी में उसकी मां का विशेष महत्व रहा है ।

उसको उच्च शिक्षा ,संस्कार, सहनशक्ति, प्रेमभाव, मिलनसार और सदा खुश रहने का रहने के गुणों से सराबोर  करने वाली उसकी मां ही थी। आज राज यह सब सच कर कुछ पल के लिए अपने अतीत में चला गया है और बस जब उसे यह याद आता है कि अब उसकी मां दुनिया में नहीं है।

तो वह अपने आप को बहुत ही अकेला महसूस करता। काम तो वह हर कोई करता परंतु उसे काम को पूर्ण करने के पश्चात उसे मां की याद आती। मां अपने आप में पूर्णता का प्रतीक है। उस जैसा कोई नहीं है और ना ही हो सकता है ।राज को मन में हमेशा इस बात का गिला रहेगा कि यदि वह अपनी मां के जीते जी कामयाबी को प्राप्त करता तो उसका जीवन सफल हो जाता।  मां के चले जाने के बाद कामयाबी मिलना  अधूरी ही लगती है।

मां के जाने के बाद राज का जीवन खाली-खाली हो गया है ।अब जो भी छोटा-मोटा काम करना होता तो उसमें मां की सलाह नहीं मिलती। राज को स्वयं ही जैसे तैसे काम को निपटाना पड़ता। उसे ऐसे लगता जैसे की वह सिर्फ दिन काट रहा है ।कई बार मन में आता कि जल्दी-जल्दी यह दिन बीते और वह दिन भी आए।

जिस दिन वह अपनी मां के पास जाएगा और वह उसकी जिंदगी का सबसे सुहावना दिन होगा। यह सब सोचते हुए एकाएक राज का कुत्ता भौंकने लगा। राज मां की यादों से निकलकर एकाएक इस सांसारिक उठा- पठक में फिर से शामिल हो गया और उसका ध्यान सांसारिक कार्य में फिर से  लिप्त हो गया ।

बस जाते-जाते राज ने यही सोचा की कोई कुछ भी कहे परंतु इंसान का पहला प्रेम, पहला प्यार उसकी मां ही होती है। यह प्यार ऐसा प्यार है जो अटूट है। जो मरते क्षणों तक जीवंत रहता है और मरने के बाद भी उसी को पाने की तमन्ना करता है।

राज ने मन ही मन में कहा । उसके शरीर के तार- तार रोम -रोम मां के प्यार से सराबोर  है ।मां को कभी नहीं भूल सकता। बस यही कहता है कि हे ईश्वर! मेरा पहला प्यार मेरी मां मुझे कब मिलेगी? धन्यवाद। 

लेखक :संजय सिंह।

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