** “क्या एक सांवली लड़की की डिग्रियां उसके रंग के आगे फीकी पड़ जाती हैं? और क्या लाखों का पैकेज लेने वाला प्राइवेट नौकरी का बेटा सरकारी चपरासी से भी कमतर है? पढ़िए समाज के उस दोहरे मापदंड की कहानी जिसने दो होनहार दिलों को एक ऐसे कटघरे में खड़ा कर दिया जहाँ फैसला गुणों का नहीं, बल्कि ‘चमड़ी’ और ‘कुर्सी’ का होना था।”
सरिता जी ने मुँह बनाया, “पढ़ाई-लिखाई तो ठीक है बहन जी, पर घर-गृहस्थी में डिग्रियां काम नहीं आतीं। हमारे वैभव को तो ऐसी पत्नी चाहिए जो घर को स्वर्ग बना सके। और सच कहूँ तो, वैभव इतना सुंदर है, गोरा-चिट्टा है… हमें उम्मीद थी कि लड़की भी थोड़ी…” उन्होंने बात अधूरी छोड़ दी, लेकिन इशारा साफ़ था।
लखनऊ के गोमती नगर में गुप्ता जी का घर आज सुबह से ही युद्ध के मैदान जैसा बना हुआ था। वजह थी उनकी इकलौती बेटी, सुमेधा को देखने के लिए लड़के वाले आ रहे थे। पच्चीस साल की सुमेधा, जिसने हाल ही में अपनी पीएचडी पूरी की थी और एक प्रतिष्ठित कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर थी, अपने कमरे में चुपचाप बैठी थी। उसके सामने ड्रेसिंग टेबल पर फेयरनेस क्रीम, पाउडर और फाउंडेशन का एक ढेर लगा था, जिसे उसकी माँ, विमला जी ने जबरदस्ती लाकर रख दिया था।
“सुमी, बेटा अभी तक तैयार नहीं हुई? वो लोग बस पहुँचने ही वाले हैं। देख, वो वाला पिंक सूट पहनना, और थोड़ा मेकअप ठीक से करना। सांवलापन छिपना चाहिए, वरना फिर से वही होगा जो पिछली बार हुआ था,” विमला जी ने कमरे में घुसते ही साँस रोके बिना हिदायतें दे दीं।
सुमेधा ने एक गहरी साँस ली। उसने अपनी थीसिस की फाइल को दराज में रखा और उस पाउडर के डिब्बे को उठाया। उसे लगा जैसे वह पाउडर अपने चेहरे पर नहीं, बल्कि अपने आत्म-सम्मान पर पोतने जा रही है। यह सातवीं बार था जब उसे ‘दिखावे’ के लिए सजाया जा रहा था। हर बार कहानी वही होती—लड़के वाले आते, समोसे-बिस्कुट खाते, उसकी डिग्रियां देखते, लेकिन नजरें उसके चेहरे के रंग पर अटक जातीं। और फिर बाद में फोन आता— “लड़की तो बहुत पढ़ी-लिखी है, लेकिन हमारा बेटा गोरा है, जोड़ी जमेगी नहीं।”
दूसरी तरफ, शहर के दूसरे छोर से शर्मा जी अपनी ऑल्टो कार में बेटे, वैभव को लेकर निकल चुके थे। वैभव एक मल्टीनेशनल आईटी कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर डेवलपर था। उसका पैकेज सालाना पच्चीस लाख का था, और वह अपनी मेहनत के दम पर विदेश भी हो आया था। लेकिन उसके पिता, रामप्रसाद शर्मा के लिए यह सब ‘बेकार’ था।
कार में बैठते ही रामप्रसाद जी ने ताना मारा, “देखो वैभव, वहाँ जाकर ज्यादा अपनी कंपनी की बड़ाई मत करना। गुप्ता जी पुराने ख्यालात के हैं, पर समझदार हैं। उन्हें साफ़ बता देना कि तुम सरकारी नौकरी के लिए भी ट्राई कर रहे हो। वरना कोई अपनी बेटी नहीं देगा। प्राइवेट नौकरी का क्या भरोसा, आज है कल नहीं। अगर तुम मेरी बात मानकर रेलवे का फॉर्म भर देते, तो आज राजा की तरह सीना तानकर जाते।”
वैभव ने स्टेयरिंग व्हील को कसकर पकड़ा। “पापा, प्लीज। मैं अपने काम से खुश हूँ। और अगर उन्हें मेरी काबिलियत से ज्यादा ‘सरकारी ठप्पा’ प्यारा है, तो मुझे ऐसा रिश्ता चाहिए ही नहीं।”
“चुप रहो! तुम्हें दुनियादारी की समझ नहीं है। साख सरकारी नौकरी से बनती है, कम्प्यूटर पर खट-खट करने से नहीं,” रामप्रसाद जी ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा। उनकी पत्नी, सरिता जी, पिछली सीट पर बैठी थीं। उनका ध्यान सिर्फ एक बात पर था— “सुना है लड़की पढ़ाती है, पर रंग थोड़ा पक्का है। वैभव के लिए तो मुझे चाँद जैसी बहू चाहिए थी। चलो, देखते हैं, अगर दहेज… मेरा मतलब है, अगर व्यवहार अच्छा हुआ तो सोचेंगे।”
दोपहर के बारह बजे गुप्ता निवास की घंटी बजी। माहौल में एक तनावपूर्ण सन्नाटा छा गया। सुमेधा के पिता, बनवारी लाल जी ने स्वागत किया। ड्राइंग रूम में सोफे पर शर्मा परिवार विराजमान हुआ। नाश्ते की ट्रे सज चुकी थी।
औपचारिकताओं के बाद असली ‘इंटरव्यू’ शुरू हुआ।
बनवारी लाल जी ने गला खंखारा और वैभव की तरफ देखा। “तो बेटा वैभव, क्या करते हो?”
वैभव ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “अंकल, मैं एक आईटी कंपनी में लीड डेवलपर हूँ। हम लोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर काम करते हैं।”
बनवारी लाल जी के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई, जिसमें प्रशंसा कम और चिंता ज्यादा थी। “अच्छा… अच्छा। प्राइवेट है मतलब? तो बेटा, साथ में सरकारी की तैयारी भी कर रहे हो या बस यही…?”
वैभव ने जवाब देने के लिए मुँह खोला ही था कि रामप्रसाद जी बीच में कूद पड़े, “अरे गुप्ता जी, लड़का होनहार है। अभी तो कर रहा है ये सब, पर मैंने इसे कह रखा है कि पीसीएस का फॉर्म भरे। दिमाग बहुत तेज है इसका, एक बार सरकारी में हो गया तो फिर लाइफ सेट है। ये प्राइवेट तो बस टाइम पास है।”
वैभव ने अपने पिता को अविश्वास से देखा। उसका आठ साल का करियर, उसकी रात-दिन की मेहनत, उसके पिता के लिए सिर्फ ‘टाइम पास’ थी? उसने मुट्ठी भींच ली लेकिन संस्कारों के बोझ तले चुप रह गया।
इधर, सरिता जी की नजरें दरवाजे पर थीं। तभी विमला जी सुमेधा को लेकर आईं। सुमेधा ने गुलाबी सूट पहना था, चेहरे पर मेकअप की परत थी, लेकिन उसकी आँखों का आत्मविश्वास और चाल की गरिमा उस मेकअप से कहीं ज्यादा प्रभावशाली थी।
सुमेधा ने सबको नमस्ते किया और एक कोने वाली कुर्सी पर बैठ गई।
सरिता जी ने चश्मा ठीक किया और सुमेधा को ऊपर से नीचे तक स्कैन किया। जैसे कोई सब्जी खरीदने से पहले उसकी ताजगी परखता है।
“बेटी, नाम क्या बताया था? सुमेधा?” सरिता जी ने पूछा। “फोटो में तो तुम थोड़ी अलग लग रही थी। शायद लाइट का फर्क होगा।”
कमरे में एक अजीब सी खामोशी छा गई। यह सीधा हमला था सुमेधा के रंग पर। सुमेधा ने अपनी माँ की तरफ देखा, जो नजरें झुकाए खड़ी थीं।
“जी, वो फोटो स्टूडियो वाली थी,” विमला जी ने सफाई दी। “वैसे सुमेधा ने अभी पीएचडी पूरी की है, कॉलेज में पढ़ाती है। गोल्ड मेडलिस्ट है अपनी यूनिवर्सिटी की।”
सरिता जी ने मुँह बनाया, “पढ़ाई-लिखाई तो ठीक है बहन जी, पर घर-गृहस्थी में डिग्रियां काम नहीं आतीं। हमारे वैभव को तो ऐसी पत्नी चाहिए जो घर को स्वर्ग बना सके। और सच कहूँ तो, वैभव इतना सुंदर है, गोरा-चिट्टा है… हमें उम्मीद थी कि लड़की भी थोड़ी…” उन्होंने बात अधूरी छोड़ दी, लेकिन इशारा साफ़ था।
रामप्रसाद जी ने मौका देखकर चौका मारा, “हाँ, और देखिए गुप्ता जी, बात साफ़ होनी चाहिए। हमारा लड़का लाखों कमाता है, लेकिन हमें पैसे का लालच नहीं है। बस ये है कि समाज में हमारी एक इज्जत है। अगर हम थोड़ा… मतलब… उन्नीस-बीस रंग के साथ समझौता करेंगे, तो फिर लेन-देन में तो आपको हमारा मान रखना पड़ेगा ना। आखिर सरकारी नौकरी वाला रुतबा मिलने वाला है आपकी बेटी को भविष्य में।”
यह दोहरा वार था। एक तरफ वैभव की ‘काल्पनिक’ सरकारी नौकरी का घमंड, और दूसरी तरफ सुमेधा के रंग को लेकर सौदेबाजी।
सुमेधा अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। वह कुर्सी से खड़ी हो गई।
“माफ़ कीजियेगा आंटी जी,” सुमेधा की आवाज़ में एक कंपन था, डर का नहीं, क्रोध का। “आपने कहा कि फोटो में मैं अलग लग रही थी। वो झूठ था। सच ये है जो आपके सामने खड़ा है। मेरा रंग सांवला है, गेहूँआ है, या जो भी आप इसे कहें। लेकिन यह मेरी चमड़ी का रंग है, मेरी काबिलियत का नहीं।”
विमला जी घबरा गईं। “सुमी, बैठ जाओ! बड़ों के सामने ऐसे नहीं बोलते।”
“नहीं माँ!” सुमेधा ने हाथ उठाकर रोका। “आज बोलने दीजिये। आज तक मैं चुप रही। पाउडर की परतों के नीचे अपने वजूद को दबाती रही। लेकिन अब नहीं।” वह सरिता जी की ओर मुड़ी। “आंटी, आपने मेरी डिग्रियों को एक झटके में खारिज कर दिया? जिस पीएचडी को करने में मैंने पाँच साल अपने खून-पसीने से सींचा, वो आपके लिए बेकार है क्योंकि मैं ‘गोरी’ नहीं हूँ? क्या गोरा रंग रोटी बना सकता है? क्या गोरा रंग बच्चों को संस्कार दे सकता है? अगर आपका बेटा बीमार पड़ेगा, तो क्या उसे मेरी डिग्रियां बचाएंगी या मेरा रंग?”
पूरा कमरा सन्न रह गया। रामप्रसाद जी का चेहरा लाल हो गया। “गुप्ता जी, ये क्या बदतमीजी है? हमने तो बस…”
तभी एक और आवाज़ गूंजी। “यह बदतमीजी नहीं है पापा, यह सच है।”
यह वैभव था। वह भी खड़ा हो गया था। उसने अपनी टाई ढीली की और अपने पिता की आँखों में देखा।
“पापा, मैं पिछले आधे घंटे से सुन रहा हूँ। आप मेरी मेहनत, मेरे करियर को ‘टाइम पास’ बता रहे हैं? अंकल,” वह बनवारी लाल जी की ओर मुड़ा, “मैं कोई सरकारी नौकरी की तैयारी नहीं कर रहा हूँ। और न ही भविष्य में करूँगा। मैं अपनी जॉब से बहुत खुश हूँ। मैं जो सॉफ्टवेयर बनाता हूँ, उसका इस्तेमाल सरकारी दफ्तरों में भी होता है। मुझे अपनी स्किल पर भरोसा है, किसी पेंशन पर नहीं। अगर मेरी कंपनी कल बंद भी हो जाए, तो मुझमें इतनी काबिलियत है कि परसों दूसरी खड़ी कर दूँ। लेकिन आप लोगों के लिए ‘सुरक्षित भविष्य’ का मतलब सिर्फ सरकारी बाबू होना है, चाहे वो रिश्वत लेकर घर चलाए।”
वैभव ने एक गहरी साँस ली और सुमेधा की तरफ देखा। उसकी आँखों में सुमेधा के लिए सम्मान था।
“माँ,” वैभव ने अपनी माँ से कहा, “तुम्हें गोरी बहू चाहिए थी ना? ताकि तुम किटी पार्टी में दिखा सको? तुम्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो लड़की कैसी है, उसके विचार कैसे हैं, वो मेरा साथ देगी या नहीं। तुम्हें बस एक ‘शोपीस’ चाहिए। लेकिन मुझे एक साथी चाहिए। और सुमेधा जी ने अभी जो कहा… उस हिम्मत को देखने के बाद मुझे नहीं लगता कि इनसे बेहतर साथी कोई हो सकता है।”
रामप्रसाद जी चिल्लाए, “वैभव! होश में हो? तुम हमारे खिलाफ जा रहे हो?”
“मैं आपके खिलाफ नहीं, आपकी सोच के खिलाफ जा रहा हूँ पापा,” वैभव ने शांति से कहा। “हम किस सदी में जी रहे हैं? जहाँ एक लड़की की पहचान उसका रंग है और लड़के की पहचान उसकी सरकारी नौकरी? देखिए इस लड़की को… इसने अपनी पहचान खुद बनाई है, अपनी मेहनत से। और मैं… मैंने अपनी पहचान अपनी स्किल से बनाई है। हम दोनों ही आपकी ‘अच्छे बच्चे’ की परिभाषा में फिट नहीं बैठते। मैं सरकारी नहीं हूँ, और ये गोरी नहीं हैं। तो हिसाब बराबर हुआ ना?”
सुमेधा वैभव को देख रही थी। पहली बार किसी लड़के ने उसके रंग के पार उसकी रूह को देखा था। पहली बार किसी ने उसके पिता के सामने, जो हमेशा सरकारी दामाद के लिए मरते थे, प्राइवेट नौकरी का स्वाभिमान रखा था।
वैभव सुमेधा के पास गया। “सुमेधा जी, मुझे नहीं पता कि यह रिश्ता होगा या नहीं। यह हमारे माता-पिता तय करेंगे या शायद नहीं करेंगे। लेकिन मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि आप जैसी हैं, बेहतरीन हैं। अपना रंग किसी के लिए मत बदलिएगा। न पाउडर से, न विचारों से।”
सुमेधा की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन वे दुख के नहीं थे। “शुक्रिया वैभव जी। और आप भी… आप भी किसी के कहने पर फॉर्म मत भरियेगा। आपकी पहचान आपकी अपनी है।”
रामप्रसाद जी और सरिता जी गुस्से में खड़े हो गए। “गुप्ता जी, हमें ऐसी बददिमाग लड़की नहीं चाहिए जो बड़ों की बेइज्जती करे। और वैभव, अगर तुम्हें हमारे साथ चलना है तो चलो, वरना तुम जानो।”
वैभव ने एक पल सोचा, फिर अपनी जेब से कार की चाबी निकालकर टेबल पर रख दी।
“पापा, यह कार आपकी दी हुई है। मैं इसमें नहीं जाऊंगा। मैं अपनी कैब कर लूँगा। आज मुझे समझ आ गया कि मैं अब तक आपकी शर्तों पर जी रहा था। लेकिन जीवन मेरा है, तो शर्तें भी मेरी होनी चाहिए।”
रामप्रसाद जी और सरिता जी पैर पटकते हुए बाहर निकल गए। कमरे में सन्नाटा था, लेकिन यह सन्नाटा भारी नहीं, बल्कि सुकून देने वाला था।
बनवारी लाल जी, जो अब तक चुप थे, धीरे से सोफे पर बैठ गए। उन्होंने सुमेधा को देखा, फिर वैभव को। उन्होंने पानी का गिलास उठाया और पीया। उनका सरकारी दामाद का सपना टूट चुका था, लेकिन सामने एक ऐसा लड़का खड़ा था जिसने अभी-अभी एक औरत के सम्मान के लिए अपने ही माँ-बाप से बगावत कर दी थी। क्या एक सरकारी नौकरी वाला लड़का, जो दहेज और रंग के लिए मोल-भाव करता, इससे बेहतर होता?
विमला जी सुमेधा के पास आईं और उसके चेहरे से पसीने और पाउडर की परत को अपने पल्लू से पोंछने लगीं। “पागल लड़की,” विमला जी रो पड़ीं, “तू सही कहती थी। मेरा सांवला सोना ही खरा है। मुझे माफ़ कर दे।”
बनवारी लाल जी उठे और वैभव के पास गए। उन्होंने कार की चाबी उठाई और वैभव के हाथ में दी।
“बेटा, माँ-बाप हैं, गुस्सा होकर गए हैं, पर हैं तो तुम्हारे ही। उन्हें मनाने का काम बाद में करेंगे। लेकिन आज… आज तुमने मेरी आँखों से एक बहुत पुराना चश्मा उतार दिया। समाज क्या कहता है, भाड़ में जाए। मुझे मेरी बेटी के लिए एक ‘मददगार’ नहीं, एक ‘हमसफर’ चाहिए था। और तुमसे बेहतर हमसफर उसे नहीं मिल सकता, जो उसकी कमियों (जो समाज की नजर में हैं) को नहीं, उसकी खूबियों को देखे।”
सुमेधा ने पिता की तरफ देखा, उसकी आँखों में चमक थी।
वैभव ने मुस्कुराते हुए सुमेधा की ओर हाथ बढ़ाया, “तो प्रोफेसर साहिबा, क्या एक प्राइवेट नौकरी वाले के साथ कॉफी पीना पसंद करेंगी? बिल मैं भरूँगा, प्रॉमिस!”
सुमेधा हँस पड़ी, एक खुलकर आने वाली हँसी। “बिल आधा-आधा होगा, मिस्टर डेवलपर। बराबरी का जमाना है।”
उस दिन उस ड्राइंग रूम में कोई रिश्ता पक्का नहीं हुआ, कोई शगुन नहीं दिया गया। लेकिन दो पुरानी रूढ़ियाँ हमेशा के लिए टूट गईं। समाज का वह पुराना बैरोमीटर— ‘सरकारी लड़का और गोरी लड़की’— उस कमरे के बाहर कूड़ेदान में पड़ा था। अंदर सिर्फ दो इंसान थे, जो एक-दूसरे को रंग और रूतबे से नहीं, बल्कि सम्मान और स्वाभिमान से देख रहे थे।
सच ही तो है, जीवन का रंग गोरा या काला नहीं होता, जीवन का रंग वह होता है जो हम अपने कर्मों और संस्कारों से भरते हैं। और सुरक्षा किसी सरकारी फाइल में नहीं, बल्कि एक ऐसे साथी के साथ में होती है जो हर मुश्किल में आपके साथ खड़ा रहे, चाहे दुनिया कुछ भी कहे।
**समापन:**
दोस्तों, यह कहानी सिर्फ सुमेधा और वैभव की नहीं है, यह हर उस घर की कहानी है जहाँ आज भी बच्चों को एक सांचे में फिट करने की कोशिश की जाती है। हम कब समझेंगे कि काला-गोरा सिर्फ त्वचा का रंग है, मन का नहीं? और काबिलियत सरकारी मोहर की मोहताज नहीं होती। एक सफल रिश्ता वह नहीं जहाँ ‘परफेक्ट मैच’ हो, बल्कि वह है जहाँ दो ‘इम्परफेक्ट’ लोग एक-दूसरे को ‘परफेक्ट’ सम्मान दें। क्या आपको नहीं लगता कि अब हमें अपनी सोच का ‘मेकअप’ बदलने की जरूरत है?
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लेखिका : गरिमा चौधरी