:** जिस मोहल्ले की वाह-वाही लूटने के लिए आप अपने घर की इज्जत नीलाम कर रहे हैं, याद रखियेगा, बुढ़ापे में प्यास लगने पर पानी का गिलास वो मोहल्ला नहीं, वही ‘बुरी’ बहू लेकर आएगी। क्या दूसरों की सहानुभूति पाने की लत एक सास को इतना अंधा कर सकती है कि उसे अपनी बहू का त्याग दिखाई ही न दे?
“देख विमला! बहू बुरी हो या अच्छी, घर की इज्जत को यूं सरेआम जो करोगी तो नुकसान तुम्हारा ही होगा। क्योंकि जब सेवा की जरूरत पड़ेगी ना, तो कोई मोहल्ला नहीं आएगा। वो तो बस मैयत में आकर थोड़ा रो-गाकर चले जाएंगे। भले ही उनके खुद के घर में हजार क्लेश हों, पर तुम्हारे घर के बारे में जानकर उसमें आग में घी डालने का काम जरूर करेंगे। और यह मौका हम ही तो देते हैं उन्हें।”
शाम के पांच बजते ही ‘ग्रीन वैली सोसाइटी’ के पार्क वाली बेंच पर एक अलग ही संसद सजती थी। इस संसद की अध्यक्ष थीं 65 वर्षीय विमला देवी। उनके हाथ में मखाने का डिब्बा होता और जुबान पर अपने घर की शिकायतें।
“अरे सरला, क्या बताऊँ! आज तो हद ही हो गई। मेरी बहू, रश्मि, ने आज फिर लौकी बना दी। उसे पता है मुझे लौकी से नफरत है, फिर भी! जानबूझकर करती है यह सब। चाहती है कि बुढ़िया जल्दी ऊपर चली जाए तो राज करे,” विमला देवी ने मखाना चबाते हुए, चेहरे पर एक पीड़ित भाव लाकर कहा।
बगल में बैठी मिसेज चड्ढा ने तुरंत आग में घी डाला, “हाय राम! विमला जी, आप बहुत सहनशील हैं। हमारी वाली होती तो मैं तो उसी दिन मायके का रास्ता दिखा देती। ये आज कल की लड़कियां, न सेवा भाव है, न बड़ों का लिहाज। बस ऑफिस-ऑफिस खेलती रहती हैं।”
विमला जी को जैसे संजीवनी मिल गई। “सही कह रही हो बहन। सुबह आठ बजे उठती है, फिर लैपटॉप लेकर बैठ जाती है। मैं तो तरस गई हूँ कि कोई बहू मेरे पैर दबाए, दो घड़ी बैठकर बातें करे। पर नहीं, मैडम के पास फुर्सत कहाँ? और मेरा बेटा तो… बस जोरू का गुलाम है।”
पार्क में बैठी बाकी महिलाएं सहानुभूति से सिर हिला रही थीं, लेकिन उनकी आँखों में एक चमक थी—मजे लेने वाली चमक। विमला देवी को लगता था कि वो अपना दुख बांट रही हैं, लेकिन असल में वो उस पार्क के लिए शाम का मनोरंजन बन चुकी थीं।
उसी वक्त, रश्मि अपने फ्लैट की बालकनी से कपड़े उतार रही थी। पार्क से आती सासू माँ की ऊँची आवाज़ उसे साफ सुनाई दे रही थी। उसकी आँखें भर आईं। वह एक आईटी कंपनी में मैनेजर थी। सुबह 6 बजे उठकर खाना बनाती, विमला जी की शुगर की दवाइयां अलग करती, घर साफ करती और फिर 9 घंटे की शिफ्ट करती। लेकिन विमला जी को रश्मि की मेहनत नहीं, बस अपनी ‘लौकी’ वाली शिकायत याद थी।
रश्मि ने आंसू पोंछे और अंदर चली गई। उसे आदत हो गई थी।
एक दिन, विमला देवी बाथरूम में नहाने गई थीं। अचानक पैर फिसला और एक ज़ोरदार चीख के साथ वो गिर पड़ीं। कूल्हे की हड्डी में फ्रैक्चर हुआ था। डॉक्टर ने साफ कह दिया— “दो महीने तक पूर्ण विश्राम (Bed rest)। हिलना भी नहीं है।”
विमला जी के लिए यह किसी सजा से कम नहीं था। वो, जो पूरे मोहल्ले में घूम-घूम कर बातें करती थीं, अब एक कमरे में कैद हो गई थीं।
पहले दो दिन तो बेटे ने छुट्टी ली, लेकिन तीसरे दिन उसे जाना पड़ा। अब घर में सिर्फ रश्मि थी और बिस्तर पर लाचार विमला देवी।
खबर आग की तरह मोहल्ले में फैली। “विमला जी गिर गईं!”
अगले दिन सुबह-सुबह मिसेज चड्ढा और पार्क वाली मंडली विमला जी का ‘हाल-चाल’ लेने आ धमकी।
विमला जी दर्द से कराह रही थीं, लेकिन सहेलियों को देखकर उनके चेहरे पर थोड़ी रौनक आ गई। उन्हें लगा कि अब उन्हें सहानुभूति मिलेगी।
मिसेज चड्ढा सोफे पर जम गईं। “हाय विमला! यह क्या हो गया? अब तो बड़ा मुश्किल होगा। बहू तो ऑफिस वाली है, तुम्हारी सेवा कौन करेगा? मैंने तो सुना है फ्रैक्चर में बहुत सेवा चाहिए होती है। गंदगी साफ करनी पड़ती है… छी… आज कल की लड़कियां यह सब नहीं करतीं।”
दूसरी महिला बोली, “सही कह रही हो। मेरी ननद की बहू ने तो साफ मना कर दिया था, बेचारी ननद को आश्रम जाना पड़ा।”
विमला जी का दिल बैठ गया। उन्होंने रश्मि की तरफ देखा जो ट्रे में चाय और नाश्ता लेकर आ रही थी।
रश्मि ने सबको चाय दी। मिसेज चड्ढा ने चाय का घूँट भरा और मुंह बनाया, “चीनी थोड़ी कम है रश्मि बेटा। खैर, कोई बात नहीं, तुम तो काम में व्यस्त रहती होगी।”
रश्मि चुप रही। उसने विमला जी का तकिया ठीक किया, उन्हें पानी पिलाया और फिर वापस रसोई में चली गई सबके लिए और पकोड़े बनाने।
घंटे भर तक वो महिलाएं बैठी रहीं। उन्होंने विमला जी का हाल कम पूछा और रश्मि की बुराई ज्यादा की।
“देखो, घर में कितनी धूल है।”
“रश्मि ने तुम्हें नाइटी पहना रखी है? साड़ी क्यों नहीं पहनाई?”
“अरे, अभी तक डॉक्टर को नहीं दिखाया दोबारा?”
विमला जी को पहली बार बेचैनी होने लगी। उनका शरीर दर्द से टूट रहा था, उन्हें वॉशरूम जाना था, लेकिन ये महिलाएं उठने का नाम नहीं ले रही थीं। वो बस बातें बनाए जा रही थीं। विमला जी का मन कर रहा था कि कोई उन्हें पानी दे दे, उनकी पीठ के नीचे तकिया लगा दे, लेकिन उनकी ‘प्यारी सहेलियां’ बस गप्पें मार रही थीं।
तभी रश्मि अंदर आई। उसने देखा विमला जी के चेहरे पर पसीने की बूंदें हैं और वो असहज हो रही हैं।
“आंटी जी,” रश्मि ने दृढ़ता से कहा, “माफ़ कीजियेगा, लेकिन माँ जी को अब आराम की जरूरत है। उनकी दवा का समय हो गया है और उन्हें ड्रेसिंग भी करवानी है। आप लोग अगर बुरा न मानें तो…”
मिसेज चड्ढा तनक गईं। “अरे, हम तो बस हाल पूछने आए थे। लो भाई, हम तो चले। विमला, अपना ध्यान रखना, वरना भरोसे के लायक तो कोई दिखता नहीं यहाँ।”
वे सब बड़बड़ाते हुए चली गईं। जाते-जाते उन्होंने कमरे में चाय के जूठे कप और बिस्किट का चूरा फैला दिया था।
उनके जाते ही रश्मि ने दरवाजा बंद किया और तुरंत विमला जी के पास आई।
“माँ जी, दर्द ज्यादा हो रहा है? आपको वॉशरूम जाना है?” रश्मि ने प्यार से पूछा।
विमला जी ने बस सिर हिलाया। रश्मि ने बिना किसी हिचकिचाहट के, अपनी सासू माँ को गोद में उठाया (जैसा कि डॉक्टर ने तकनीक बताई थी) और उन्हें वॉशरूम ले गई। साफ-सफाई की, कपड़े बदले, गीले तौलिए से उनका शरीर पोंछा और फिर दर्द निवारक तेल से उनके पैरों की मालिश करने लगी।
विमला जी चुपचाप यह सब देखती रहीं। वो महिलाएं जो अभी बड़ी-बड़ी बातें कर रही थीं, उनमें से किसी ने एक गिलास पानी भी उठाकर नहीं दिया था। और जिस बहू को वो रोज पार्क में बदनाम करती थीं, वो बिना नाक-भौं सिकोड़े उनकी गंदगी साफ कर रही थी।
शाम को विमला जी की बड़ी बहन, यानी रश्मि की बुआ सास, ‘सुमित्रा जी’ उनसे मिलने आईं। सुमित्रा जी शहर से दूर रहती थीं और बहुत ही सुलझी हुई महिला थीं।
कमरे में सन्नाटा था। रश्मि लैपटॉप पर काम कर रही थी और बीच-बीच में विमला जी का हाल पूछ रही थी। सुमित्रा जी ने रश्मि को इशारा किया कि वो थोड़ा आराम कर ले। रश्मि के जाने के बाद सुमित्रा जी विमला जी के पास बैठीं।
“कैसी है अब?” सुमित्रा जी ने पूछा।
“दर्द है दीदी… बहुत लाचारी लग रही है,” विमला जी की आँखों से आंसू बह निकले।
सुमित्रा जी ने विमला के आंसू पोंछे और फिर गंभीर स्वर में बोलीं, “विमला, मैं जब आ रही थी तो नीचे गेट पर मुझे मिसेज चड्ढा मिल गईं। वो रश्मि के बारे में बहुत कुछ ऊटपटांग बोल रही थीं। कह रही थीं कि ‘विमला तो नरक में पड़ी है, बहू ध्यान नहीं देती’।”
विमला जी ने नज़रें झुका लीं।
सुमित्रा जी ने अपनी आवाज़ थोड़ी सख्त की। “सच-सच बता विमला, क्या ये बातें तूने ही उनके दिमाग में नहीं डालीं? क्या तू ही पार्क में बैठकर अपने घर की बुराई नहीं करती थी?”
विमला जी चुप रहीं।
सुमित्रा जी ने आगे कहा, “देख विमला! बहू बुरी हो या अच्छी, घर की इज्जत को यूं सरेआम जो करोगी तो नुकसान तुम्हारा ही होगा। क्योंकि जब सेवा की जरूरत पड़ेगी ना, तो कोई मोहल्ला नहीं आएगा। वो तो बस मैयत में आकर थोड़ा रो-गाकर चले जाएंगे। भले ही उनके खुद के घर में हजार क्लेश हों, पर तुम्हारे घर के बारे में जानकर उसमें आग में घी डालने का काम जरूर करेंगे। और यह मौका हम ही तो देते हैं उन्हें।”
विमला जी ने सिसकते हुए कहा, “पर दीदी, रश्मि मेरे हिसाब से नहीं चलती…”
“हिसाब?” सुमित्रा जी ने टोका। “तेरा हिसाब क्या है? कि वो नौकरी भी करे और तेरे पैर भी दबाए? आज देख, तू बिस्तर पर है। वो मिसेज चड्ढा आई थीं न? उन्होंने तेरी चादर बदली? तुझे पानी दिया? तेरे गंदे कपड़े धोए? नहीं न! यह सब रश्मि कर रही है। वो अपनी नौकरी और तेरा मल-मूत्र दोनों संभाल रही है। और तू? तूने चंद तालियों और सहानुभूति के लिए अपनी उसी बहू को पूरे समाज में ‘कुलक्षणी’ बना दिया?”
सुमित्रा जी की बातें विमला जी के दिल पर हथौड़े की तरह बज रही थीं।
“विमला, याद रख! बुढ़ापे की लाठी पड़ोसी नहीं, घर के बच्चे होते हैं। तूने रश्मि की बुराई करके अपनी ही इज्जत गिराई है। लोग रश्मि पर नहीं हंसते, वो तुझ पर हंसते हैं कि ‘कैसी सास है जो अपने घर की बात बाजार में करती है’। अगर तूने रश्मि को प्यार दिया होता, उसे बेटी माना होता, तो आज तुझे यह डर नहीं लगता कि वो तेरी सेवा करेगी या नहीं। वो तो उसके संस्कार हैं जो वो चुपचाप सब कर रही है, वरना तेरे ताने सुनने के बाद कोई और होती तो तुझे नर्स के भरोसे छोड़ देती।”
सुमित्रा जी की खरी-खरी बातों ने विमला जी की अंतरात्मा को झकझोर दिया। उन्हें याद आया कि कैसे रश्मि ने आज अपनी मीटिंग छोड़कर उनकी मालिश की थी। कैसे वो रात भर उनके सिरहाने बैठी रही थी। और बदले में विमला जी ने उसे क्या दिया? बदनामी।
सुमित्रा जी के जाने के बाद रात हो गई। रश्मि खाने की थाली लेकर आई।
“माँ जी, आज मैंने लौकी नहीं बनाई। मूंग की दाल और तोरी बनाई है, डॉक्टर ने हल्का खाना कहा है। आपको पसंद आएगी,” रश्मि ने डरते-डरते कहा।
विमला जी ने रश्मि का हाथ पकड़ लिया। रश्मि चौंक गई।
विमला जी की आँखों में पश्चाताप के आंसू थे। “रश्मि… मुझे माफ़ कर दे बेटा।”
“अरे माँ जी! यह क्या कह रही हैं आप? मुझसे कोई गलती हो गई क्या?” रश्मि घबरा गई।
“नहीं बहू, गलती मुझसे हुई है,” विमला जी ने रश्मि का हाथ अपने गाल से लगाया। “मैं बाहर वालों की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई थी। मुझे लगा था कि वो मेरी सहेलियाँ हैं, मेरा दुख समझती हैं। लेकिन आज जब मैं प्यासी थी, तो पानी का गिलास तूने दिया, उन्होंने नहीं। उन्होंने तो बस मेरा तमाशा बनाया। मैंने तेरे बारे में बहुत गलत बोला बेटा… मुझे माफ़ कर दे।”
रश्मि की आँखों से भी आंसू आ गए। “माँ जी, आप बड़ी हैं। आप डांट सकती हैं, शिकायत कर सकती हैं। बस… बस बाहर वालों के सामने मत कहा कीजिये। बहुत दुख होता है जब कोई और मेरे घर के बारे में मजाक उड़ाता है।”
“अब नहीं होगा रश्मि। अब कभी नहीं होगा,” विमला जी ने कसम खाई।
डेढ़ महीने बाद।
विमला जी अब वॉकर के सहारे चलने लगी थीं। शाम का वक्त था। मिसेज चड्ढा और बाकी महिलाएं सोसायटी के नीचे खड़ी थीं। विमला जी को नीचे उतरता देख सब उनकी तरफ लपकीं।
“अरे विमला! तुम तो बड़ी जल्दी ठीक हो गई!” मिसेज चड्ढा ने हैरानी से कहा। “जरूर बहुत महंगा नर्स रखा होगा बेटे ने। बहू के बस का तो था नहीं।”
विमला जी रुकीं। उन्होंने एक गहरी सांस ली। उनकी रीढ़ की हड्डी अब सीधी थी, और नज़रें भी।
“नहीं सरला बहन,” विमला जी ने बुलंद आवाज़ में कहा, ताकि वहां खड़े सभी लोग सुन सकें। “मैंने कोई नर्स नहीं रखी। मेरी सेवा मेरी बहू रश्मि ने की है। उसने अपनी नींद खराब करके, अपनी नौकरी के साथ-साथ मुझे संभाला है। अगर मैं आज अपने पैरों पर खड़ी हूँ, तो सिर्फ अपनी बहू की वजह से।”
मिसेज चड्ढा का मुंह खुला का खुला रह गया। “लेकिन… तुम तो कहती थीं कि वो…”
“मैं गलत कहती थी,” विमला जी ने उनकी बात काट दी। “मुझे परखने में गलती हुई थी। मेरी बहू लाखों में एक है। और हाँ, आज के बाद मेरे घर के बारे में कोई भी टिप्पणी करने से पहले सौ बार सोचियेगा। क्योंकि मेरी बहू की बुराई सुनने के लिए अब मेरे कान बंद हैं।”
विमला जी ने गर्व से रश्मि का हाथ पकड़ा, जो उन्हें नीचे टहलाने लाई थी, और आगे बढ़ गईं। रश्मि की आँखों में एक विजय मुस्कान थी—वह मुस्कान जो उसे किसी मेडल से ज्यादा कीमती लग रही थी। पीछे खड़ा ‘गॉसिप ग्रुप’ सन्न रह गया था, क्योंकि आज तमाशा खत्म हो चुका था और मरहम जीत चुका था।
उस दिन के बाद, विमला जी ने पार्क में बैठना नहीं छोड़ा, लेकिन अब वहाँ शिकायतों का दौर नहीं, बल्कि रश्मि की तारीफों के पुल बांधे जाते थे। और मजे की बात यह थी कि जब विमला जी ने तारीफ करना शुरू किया, तो धीरे-धीरे बाकी महिलाओं ने भी अपनी बहुओं की बुराई करना कम कर दिया। एक सास के बदलाव ने पूरे मोहल्ले की हवा बदल दी थी।
**समापन:**
दोस्तों, हमारे घर की बातें, हमारे घर के झगड़े, सिर्फ हमारे अपने होते हैं। जब हम बाहर वालों को इसमें शामिल करते हैं, तो वे सुलझाते नहीं, बस मजे लेते हैं। विमला जी को यह समझने में एक एक्सीडेंट का सहारा लेना पड़ा, लेकिन हमें और आपको इतनी देर नहीं करनी चाहिए। याद रखिये, जब वक्त बुरा आता है, तो ‘Kitty Party’ की सहेलियाँ नहीं, घर की ‘लक्ष्मी’ ही काम आती है। अपनी बहुओं को, अपने बेटों को, अपने परिवार को वो सम्मान दीजिये जिसके वे हकदार हैं। घर की इज्जत, घर के भीतर रहे, तो ही शोभा देती है।
**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपके साथ या आपके परिवार में कभी ऐसा हुआ है कि बाहरी लोगों ने घर के मामलों में आग लगाने की कोशिश की हो? और आपने उसे कैसे संभाला? अपने अनुभव कमेंट में जरूर लिखें।
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लेखिका : सीमा श्रीवास्तव