“वो खामोश मालकिन” – वर्षा मंडल

“सूट-बूट पहनकर बोर्ड मीटिंग में फैसले लेना ही सिर्फ़ आज़ादी नहीं होती, कभी-कभी घर की चारदीवारी में रहकर अपनी शर्तों पर दुनिया चलाना उससे भी बड़ी ताक़त होती है। पढ़िए एक ऐसी कहानी जो नारीवाद (Feminism) की आपकी परिभाषा बदल देगी।”

“तुम लोग समझती हो कि साड़ी पहनने वाली, धीमी आवाज़ में बात करने वाली और रसोड़े में रहने वाली औरतें कमज़ोर होती हैं?” सुलोचना जी ने हल्का सा हंसा। “असली ताक़त वो होती है जो दिखाई न दे। इस घर की नींव मैं हूँ। और नींव कभी दिखाई नहीं देती, पर जिस दिन नींव हिल जाए, पूरी इमारत गिर जाती है।

बैंगलोर की उस हाई-राइज सोसायटी की 18वीं मंज़िल पर, रविवार की सुबह भी किसी युद्ध के मैदान से कम नहीं थी। 29 साल की आयशा अपने लैपटॉप पर उंगलियां नचा रही थी, कान में एयरपॉड लगे थे और वह ज़ोर-ज़ोर से किसी क्लाइंट को समझा रही थी।

“नो… नो मिस्टर मेहता! वी नीड एग्रेसिव मार्केटिंग। अगर हमें कंपीटीटर्स को हराना है तो हमें उनसे भी ज्यादा रथलेस (ruthless) होना पड़ेगा।”

लिविंग रूम के दूसरे कोने में, 58 साल की सुलोचना देवी शांति से बैठी स्वेटर बुन रही थीं। उनके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था। उन्होंने धीरे से टीवी का रिमोट उठाया और वॉल्यूम कम कर दिया ताकि आयशा को डिस्टर्ब न हो।

आयशा ने कॉल काटी और माथे पर हाथ रखकर सोफे पर गिर गई। “उफ़! ये आदमी समझता ही नहीं है। मर्दों को लगता है कि औरतों को बिज़नेस की समझ नहीं होती।”

सुलोचना देवी उठीं और किचन से एक कप अदरक वाली चाय और प्लेट में दो बिस्किट लेकर आईं। उन्होंने मेज़ पर चाय रखी और बोलीं, “थक गई होगी बेटा, चाय पी ले।”

आयशा ने चिढ़कर कहा, “मम्मी जी, प्लीज! अभी मेरा मूड नहीं है। और आप भी क्या दिन भर किचन-किचन खेलती रहती हैं? पापा जी ने पानी मांगा तो दौड़ कर दे दिया, भाई ने खाना मांगा तो परोस दिया। कभी तो अपने लिए जिया कीजिये। मुझे तो देखकर ही घुटन होती है।”

सुलोचना देवी मुस्कुराईं। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। वे वापस अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गईं और ऊन का गोला सुलझाने लगीं।

आयशा को अपनी सास की यही चुप्पी सबसे ज्यादा खलती थी। आयशा एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट थी। वह ‘मॉडर्न वुमन’ का प्रतीक थी। उसके लिए आज़ादी का मतलब था—मर्दों से कंधा मिलाकर चलना, उनसे ज्यादा कमाना और किसी के आगे न झुकना। और उसकी सास? सुलोचना देवी उसके लिए ‘बेचारी’ थीं। एक ऐसी औरत जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी पति और बच्चों की सेवा में निकाल दी। एम.ए. पास होने के बावजूद उन्होंने कभी नौकरी नहीं की।

शाम को घर पर आयशा के कुछ दोस्त आने वाले थे। यह “विमेन एम्पावरमेंट” (महिला सशक्तिकरण) ग्रुप की मंथली मीटिंग थी।

शाम 7 बजे, ड्राइंग रूम सजा हुआ था। आयशा की चार सहेलियाँ—मीरा, तान्या, सिमरन और जोया—हाथों में वाइन के गिलास लिए बैठी थीं। चर्चा का विषय था—’कैसे पितृसत्ता (Patriarchy) ने औरतों के पंख काटे हैं।’

तभी सुलोचना देवी ट्रे में नाश्ता लेकर आईं। उन्होंने सबको समोसे और हरी चटनी परोसी।

तान्या ने सुलोचना को दया भरी नज़रों से देखा और बोली, “आंटी, आप बैठिये न हमारे साथ। ये सब काम मेड कर लेगी।”

सुलोचना जी ने साड़ी का पल्लू ठीक किया और विनम्रता से बोलीं, “नहीं बेटा, मुझे आदत है अपने हाथ का खिलाने की। तुम लोग बातें करो।”

जैसे ही सुलोचना किचन में गईं, सिमरन ने धीरे से कहा, “यार आयशा, तेरी सास को देखकर मुझे बड़ा बुरा लगता है। इतनी पढ़ी-लिखी हैं, फिर भी देखो, नौकरानी की तरह काम करती हैं। इनकी जनरेशन की औरतों ने तो अपनी सेल्फ-रिस्पेक्ट ही गिरवी रख दी थी।”

आयशा ने आह भरी, “वही तो। मैं इन्हें कितना समझाती हूँ कि अपनी पहचान बनाओ, पर इनके लिए ‘पति परमेश्वर’ ही सब कुछ हैं। ये ‘आज़ाद’ होना ही नहीं चाहतीं।”

तभी ड्राइंग रूम में आयशा के ससुर, विमल जी, और पति, रोहन, दाखिल हुए। वे दोनों बहुत परेशान लग रहे थे। विमल जी के हाथ में कुछ फाइलें थीं।

“पापा, क्या हुआ? आप दोनों इतने टेंशन में क्यों हैं?” आयशा ने पूछा।

विमल जी सोफे पर बैठ गए, पसीना पोंछते हुए बोले, “बेटा, बहुत बड़ी गड़बड़ हो गई है। हमारी फैक्ट्री की जो पुश्तैनी ज़मीन थी, उस पर किसी ने अवैध कब्ज़ा कर लिया है और लीगल नोटिस भेजा है। अगर हमने वो केस नहीं जीता, तो हम दिवालिया हो जाएंगे। वकील कह रहा है कि पेपरवर्क में कोई बहुत पुरानी कमी है जो हमें नहीं मिल रही।”

घर का माहौल एकदम से बदल गया। आयशा की सहेलियाँ खामोश हो गईं। आयशा ने फाइल देखी, “पापा, मैं कॉर्पोरेट लॉयर नहीं हूँ, पर मैं अपने लीगल हेड से बात करती हूँ।”

“कुछ नहीं होगा आयशा,” रोहन ने हताशा में कहा। “वो ज़मीन 1985 में खरीदी गई थी। उस वक़्त की रजिस्ट्री और पावर ऑफ अटॉर्नी की ओरिजिनल कॉपी मिल ही नहीं रही। हमने पूरा घर छान मारा।”

तभी सुलोचना देवी किचन से बाहर आईं। उनके हाथ में चाय की केतली नहीं, बल्कि एक पुरानी, धूल जमी हुई लोहे की चाबी थी।

वह सीधे विमल जी के पास गईं। “तुमने ‘नीली अलमारी’ देखी?” सुलोचना जी ने शांत स्वर में पूछा।

विमल जी ने झुंझलाकर कहा, “सुलोचना, अभी दिमाग ख़राब मत करो। वहाँ सिर्फ़ तुम्हारे पुराने कपड़े और रजाई-गद्दे पड़े हैं।”

सुलोचना देवी ने कुछ नहीं कहा। वह बेडरूम की तरफ बढ़ीं। आयशा और बाकी सब भी उनके पीछे गए। सुलोचना जी ने एक पुराने बक्से को खोला। उसके सबसे नीचे, पुराने अखबारों में लिपटी एक फाइल थी।

उन्होंने फाइल निकाली और विमल जी के हाथ में थमा दी। “ये लो। 1985 की रजिस्ट्री, स्टैम्प ड्यूटी की रसीद, और उस वक्त के तहसीलदार का साइन किया हुआ एफिडेविट। मैंने उसी साल इसकी तीन फोटोकॉपी करवाकर नोटरी भी करवा ली थी।”

विमल जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। “तु… तुम्हें ये सब कैसे पता? और तुमने ये सब संभाल कर कब रखा?”

सुलोचना देवी ने कमरे में रखी कुर्सी खींची और उस पर बैठ गईं। इस बार उनका बैठने का अंदाज़ अलग था। वो एक गृहिणी नहीं, एक मालकिन लग रही थीं।

उन्होंने आयशा की तरफ देखा और फिर अपने पति की तरफ।

“विमल,” सुलोचना जी ने कहा, “तुम्हें क्या लगता है? पिछले 35 सालों से ये घर, ये फैक्ट्री, ये इन्वेस्टमेंट्स हवा में चल रहे थे? तुम तो फैक्ट्री में मशीनों की आवाज़ में खोए रहते थे। घर का बजट, बच्चों की फीस, तुम्हारी सेविंग्स को कहाँ इन्वेस्ट करना है ताकि टैक्स बचे… ये सब कौन करता था?”

आयशा सन्न रह गई।

सुलोचना जी ने आयशा की सहेलियों की तरफ देखा जो अभी भी खड़ी थीं।

“तुम लोग अभी बाहर बात कर रही थी न कि मैंने अपनी ‘सेल्फ-रिस्पेक्ट’ खो दी है?” सुलोचना जी की आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था, बस एक गहरी समझ थी।

“बेटा, आज़ादी का मतलब सिर्फ़ लैपटॉप लेकर ऑफिस जाना या मर्दों पर चिल्लाना नहीं होता। आज़ादी का मतलब है ‘चयन’ (Choice)। जब मैंने एम.ए. किया था, मुझे भी बैंक में नौकरी मिल रही थी। लेकिन मैंने ‘चुना’ कि मैं नौकरी नहीं करूँगी। क्यों? क्योंकि मुझे किसी बॉस की डांट सुनना पसंद नहीं था। मुझे पसंद था अपना साम्राज्य खुद चलाना।”

उन्होंने रोहन की तरफ इशारा किया। “ये जो तुम्हारा भाई आज इतनी बड़ी कंपनी चला रहा है, इसकी शुरूआती पूंजी (Seed Capital) कहाँ से आई थी पता है? मेरी पीपीएफ और गोल्ड सेविंग्स से, जिसे मैं पिछले 30 सालों से जोड़ रही थी, बिना किसी को बताए।”

कमरे में सन्नाटा था। सुलोचना जी ने आगे कहा, “आयशा, तुम कहती हो मैं पापा जी को पानी क्यों देती हूँ? बेटा, ये ‘गुलामी’ नहीं है, ये ‘साझेदारी’ है। जब मैं बीमार होती हूँ, तो ये मेरे पैर भी दबाते हैं, बस तुमने कभी देखा नहीं, क्योंकि वो इंस्टाग्राम पर स्टोरी डालने के लिए नहीं होता। हम एक-दूसरे से ‘होड़’ नहीं करते, हम एक-दूसरे को ‘पूरा’ करते हैं।”

आयशा को लगा जैसे किसी ने आईना उसके चेहरे के सामने रख दिया हो।

“तुम लोग समझती हो कि साड़ी पहनने वाली, धीमी आवाज़ में बात करने वाली और रसोड़े में रहने वाली औरतें कमज़ोर होती हैं?” सुलोचना जी ने हल्का सा हंसा। “असली ताक़त वो होती है जो दिखाई न दे। इस घर की नींव मैं हूँ। और नींव कभी दिखाई नहीं देती, पर जिस दिन नींव हिल जाए, पूरी इमारत गिर जाती है। जैसे आज ये फाइल न मिलती, तो तुम्हारा ये ‘एम्पायर’ ताश के पत्तों की तरह बिखर जाता।”

आयशा की सहेली सिमरन ने धीरे से अपना गिलास नीचे रखा। उसे अपनी बातें बहुत छोटी लग रही थीं।

आयशा धीरे से आगे बढ़ी और सुलोचना जी के पास घुटनों के बल बैठ गई। “मम्मी जी… मुझे माफ़ कर दीजिये। मैंने आपको कभी समझा ही नहीं। मुझे लगा…”

सुलोचना जी ने आयशा के सिर पर हाथ फेरा। “कोई बात नहीं बेटा। तुम्हारी पीढ़ी को लगता है कि ‘समानता’ (Equality) का मतलब है ‘मर्द बन जाना’। नहीं। औरत होना अपने आप में एक शक्ति है। हमें मर्दों जैसा बनने की ज़रूरत नहीं है। हम जीवन देती हैं, हम घर बनाती हैं, और ज़रूरत पड़ने पर हम उसे बचाती भी हैं। अपनी कोमलता को अपनी कमज़ोरी मत समझो। जिस दिन तुम समझ जाओगी कि तुम क्या हो, उस दिन तुम्हें किसी को चिल्लाकर साबित नहीं करना पड़ेगा कि तुम आज़ाद हो।”

विमल जी ने फाइल सीने से लगा ली और अपनी पत्नी को देखा। उनकी आँखों में कृतज्ञता थी। “सुलोचना, आज तुमने हमें बचा लिया। सच में, तुम इस घर की गृहमंत्री नहीं, बल्कि रक्षक हो।”

उस रात, डिनर टेबल का नज़ारा बदला हुआ था। आज आयशा ने लैपटॉप नहीं खोला था। उसने किचन में जाकर सुलोचना जी से पूछा, “मम्मी जी, वो अचार वाली रेसिपी क्या थी? मुझे भी सीखनी है।”

सुलोचना जी मुस्कुराईं। “क्यों? वीपी साहिबा को अचार बनाने की क्या ज़रूरत?”

“क्योंकि,” आयशा ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं भी चाहती हूँ कि मेरे घर की नींव मज़बूत रहे। और मुझे समझ आ गया है कि आज़ादी लैपटॉप में नहीं, बल्कि अपनी मर्जी से, खुशी-खुशी अपनी ज़िंदगी जीने में है—चाहे वो बोर्ड रूम हो या किचन।”

उस रात आयशा को नींद बहुत अच्छी आई। उसे समझ आ गया था कि **”उड़ने के लिए पंखों की ज़रूरत तो होती है, लेकिन वापस लौटने के लिए एक मज़बूत ज़मीन की भी ज़रूरत होती है।”** और वो ज़मीन उसकी सास, सुलोचना देवी थीं।

**कहानी का सार:**

हम अक्सर आधुनिकता की दौड़ में अपनी पुरानी पीढ़ी की औरतों के त्याग और उनकी समझदारी को ‘पिछड़ापन’ मान लेते हैं। हम भूल जाते हैं कि वो चुप ज़रूर रहती थीं, लेकिन कमज़ोर नहीं थीं। आज़ादी कपड़ों से या नौकरी से नहीं आती, आज़ादी आती है अपनी शर्तों पर जीने से और अपने परिवार को संबल देने से। एक गृहिणी (Homemaker) होना कोई मजबूरी नहीं, एक कला है, एक मैनेजमेंट है जिसे सलाम किया जाना चाहिए।

**सवाल:**

क्या आपके घर में भी कोई ऐसी ‘सुलोचना देवी’ हैं जो बिना किसी क्रेडिट के पूरे घर को संभाल रही हैं? क्या आपने कभी उन्हें ‘थैंक यू’ कहा है? आज ही कहिये।

**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ, तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और दिल को झकझोर देने वाली कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!**

लेखिका : वर्षा मंडल

error: Content is protected !!