**”नजर का इलाज डॉक्टर कर सकता है, लेकिन नजरिए का इलाज तो वक्त की ठोकर ही करती है। जब हम किसी को नफरत के चश्मे से देखते हैं, तो उसकी हर अच्छाई भी हमें साजिश नजर आती है।”**
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आर्यन की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उसका गला रुंध गया। उसे अपनी हर कही बात, हर ताना, हर अपमान याद आने लगा। उसे महसूस हुआ कि वंदना के प्रति उसकी नफरत वंदना की कमी के कारण नहीं थी, बल्कि उसके अपने दूषित नजरिए के कारण थी। उसने पहले ही तय कर लिया था कि ‘सौतेली माँ बुरी होती है’, इसलिए उसे वंदना का प्यार कभी दिखाई ही नहीं दिया।
शाम का वक्त था और शर्मा सदन के किचन में बर्तनों की खनक के साथ-साथ एक अजीब सा तनाव भी गूंज रहा था। वंदना ने बड़े प्यार से गाजर का हलवा बनाया था। आज उसके सौतेले बेटे, आर्यन, का इक्कीसवां जन्मदिन था। वंदना जानती थी कि आर्यन को गाजर का हलवा बहुत पसंद है—बिल्कुल वैसा ही जैसा उसकी सगी माँ, सुमित्रा, बनाया करती थीं। वंदना ने पिछले पाँच सालों में इस घर को, इस परिवार को अपना सब कुछ दिया था, लेकिन आर्यन के दिल में अपने लिए जगह नहीं बना पाई थी।
घड़ी में आठ बजते ही आर्यन अपने दोस्तों के साथ पार्टी करके घर लौटा। घर में गुब्बारों की सजावट और मेज पर रखा केक देखकर वह ठिठक गया। उसके पीछे उसके पिता, महेश जी, मुस्कराते हुए खड़े थे।
“जन्मदिन मुबारक हो मेरे शेर!” महेश जी ने आर्यन को गले लगाया।
वंदना भी आगे बढ़ी, उसके हाथ में आरती की थाली थी। उसने जैसे ही आर्यन के माथे पर तिलक लगाने के लिए हाथ उठाया, आर्यन ने झटके से अपना चेहरा पीछे कर लिया। थाली वंदना के हाथ से छूटते-छूटते बची। पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।
“यह सब नाटक बंद करो, वंदना आंटी,” आर्यन ने कड़वाहट से कहा। “मैंने हजार बार कहा है कि मेरी माँ बनने की कोशिश मत किया करो। मेरी माँ मर चुकी हैं, और उनकी जगह कोई नहीं ले सकता। खासकर तुम तो बिल्कुल नहीं।”
महेश जी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “आर्यन! यह कैसी बदतमीजी है? वंदना ने तुम्हारे लिए सुबह से…”
“रहने दीजिए पापा!” आर्यन चिल्लाया। “आपको लगता है यह मुझसे प्यार करती है? यह सिर्फ आपकी जायदाद और इस घर पर कब्जा करने के लिए यह सब ढोंग कर रही है। बुआ जी सही कहती थीं, सौतेली माँ कभी सगी नहीं हो सकती। यह मीठा बनकर मुझे घर से बाहर निकालने की साजिश रच रही है।”
वंदना की आँखों में आंसू तैर आए, लेकिन उसने उन्हें बहने नहीं दिया। उसने महेश जी का हाथ पकड़कर उन्हें शांत किया और आर्यन की ओर देखकर धीमी आवाज में बोली, “बेटा, मैं तुम्हारी माँ की जगह कभी नहीं लेना चाहती थी। मैं तो बस तुम्हारी दोस्त बनना चाहती थी। हलवा मेज पर रखा है, मन हो तो खा लेना।”
वंदना अपने कमरे में चली गई। उस रात आर्यन ने हलवे को हाथ तक नहीं लगाया और अपने कमरे का दरवाजा जोर से बंद कर लिया। आर्यन के दिमाग में बचपन से ही रिश्तेदारों ने यह बात भर दी थी कि सौतेली माँ डायन होती है। वंदना चाहे उसके लिए रात भर जागकर प्रोजेक्ट बनाए, उसकी बीमारी में सेवा करे, या अपनी बचत से उसे बाइक दिलाए—आर्यन को हर काम में वंदना का कोई न कोई “स्वार्थ” ही दिखता था। उसने अपने मन में वंदना की एक ऐसी छवि बना ली थी, जिसे कोई अच्छाई नहीं मिटा सकती थी।
वक्त बीतता गया। आर्यन ने एमबीए की पढ़ाई पूरी की और उसे शहर की एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। उसे अब लगने लगा था कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो गया है और अब उसे इस “घुटते हुए” घर में रहने की जरूरत नहीं है।
एक दिन नाश्ते की मेज पर आर्यन ने ऐलान किया, “पापा, मुझे कंपनी की तरफ से दूसरे शहर में फ्लैट मिल रहा है। मैं अगले हफ्ते शिफ्ट हो रहा हूँ। मैं अब और इस औरत के साथ एक छत के नीचे नहीं रह सकता।”
महेश जी को धक्का लगा, लेकिन वंदना चुप रही। उसने चुपचाप आर्यन का सामान पैक करना शुरू कर दिया। जाते वक्त वंदना ने आर्यन को एक छोटा सा डिब्बा दिया। “इसमें घर की बनी कुछ दवाइयां और बेसन के लड्डू हैं। नए शहर में काम आएंगे।”
आर्यन ने वह डिब्बा लिया और कार में फेंक दिया। “मुझे तुम्हारी किसी चीज की जरूरत नहीं है,” कहकर वह चला गया।
नये शहर में आर्यन की जिंदगी आजाद थी। न कोई टोकने वाला, न कोई “झूठी ममता” दिखाने वाला। वह अपनी सफलता और आजादी के नशे में चूर था। वंदना और पापा का फोन आता, तो वह अक्सर काट देता या बहुत रूखेपन से बात करता।
छह महीने बाद, देश में एक भयानक महामारी फैली। लॉकडाउन लग गया। आर्यन जिस शहर में था, वहाँ हालात बहुत खराब हो गए। वह अकेला अपने फ्लैट में बंद था। शुरुआत में सब ठीक लगा, लेकिन फिर एक रात उसे तेज बुखार चढ़ गया। शरीर टूटने लगा और सांस लेने में तकलीफ होने लगी। उसने अपने दोस्तों को फोन किया, लेकिन संक्रमण के डर से कोई मदद को नहीं आया।
आर्यन बिस्तर पर पड़ा तड़प रहा था। उसके पास न खाने को कुछ था, न दवाई लाने की ताकत। बुखार ने उसके दिमाग को सुन्न कर दिया था। उसे अपनी माँ की याद आ रही थी। बेहोशी की हालत में उसने अपने पापा को फोन लगाया।
“पापा… मुझे बचा लो…” बस इतना कहकर फोन उसके हाथ से छूट गया।
महेश जी और वंदना उस वक्त तीन सौ किलोमीटर दूर थे। लॉकडाउन की वजह से गाड़ियाँ बंद थीं। पास की जरूरत के लिए भी पुलिस की अनुमति लेनी पड़ रही थी। महेश जी घबरा गए। उनकी उम्र और बीपी की बीमारी उन्हें लाचार बना रही थी।
“मैं जाऊंगी,” वंदना ने दृढ़ता से कहा।
“तुम? पागल हो गई हो? बाहर बीमारी फैली है, पुलिस जगह-जगह रोक रही है। और तुम्हें गाड़ी चलाना भी तो ठीक से नहीं आता,” महेश जी ने कहा।
“मेरा बेटा वहाँ अकेला है। मैं उसे मरने के लिए नहीं छोड़ सकती,” वंदना ने कहा। उसने घर की पुरानी कार निकाली। पुलिस से मिन्नतें करके पास बनवाया। महेश जी की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए उन्हें पड़ोसी के भरोसे छोड़कर वंदना अकेले निकल पड़ी।
रास्ता सुनसान और डरावना था। जगह-जगह बैरिकेडिंग थी। वंदना को कई बार पुलिस ने रोका, अपमानित किया, वापस जाने को कहा। लेकिन एक माँ की जिद के आगे किसी की नहीं चली। उसने पुलिस वालों के हाथ जोड़े, रोई, गिड़गिड़ाई—”साहब, मेरा बेटा मर जाएगा। मुझे जाने दीजिए।” उसकी आँखों की तड़प देखकर पुलिस वालों ने रास्ता दे दिया।
बारह घंटे का सफर तय करके जब वंदना आर्यन के फ्लैट पर पहुँची, तो आर्यन फर्श पर बेहोश पड़ा था। उसका शरीर आग की तरह तप रहा था। वंदना ने उसे उठाया, बिस्तर पर लिटाया। उसके सूखे होंठों पर पानी लगाया।
अगले पंद्रह दिन वंदना के लिए किसी युद्ध से कम नहीं थे। आर्यन को संक्रमण था। कोई डॉक्टर घर आने को तैयार नहीं था। वंदना ने फोन पर डॉक्टर से सलाह ली और खुद नर्स बन गई। वह आर्यन के शरीर पर ठंडी पट्टियाँ रखती, उसे जबरदस्ती काढ़ा और सूप पिलाती, उसकी गंदगी साफ करती। उसे न अपनी जान की परवाह थी, न नींद की।
आर्यन बीच-बीच में होश में आता, तो उसे धुंधला सा दिखाई देता कि कोई उसके सिर पर हाथ फेर रहा है। उसे लगता शायद उसकी सगी माँ स्वर्ग से आ गई हैं। वह बड़बड़ाता, “माँ… तुम आ गई? मुझे छोड़कर मत जाना।”
वंदना उसके आंसू पोंछती और कहती, “नहीं जाऊंगी बेटा, मैं यहीं हूँ।”
धीरे-धीरे आर्यन का बुखार उतरा। उसका शरीर कमजोर था, लेकिन जान बच गई थी। एक सुबह जब आर्यन की आँख खुली, तो उसने देखा कि वह अपने बिस्तर पर है और पास की कुर्सी पर वंदना बैठी ऊंघ रही है। वंदना का चेहरा पीला पड़ गया था, आँखों के नीचे गहरे गड्ढे थे, और बाल बिखरे हुए थे।
आर्यन को लगा कि वह सपना देख रहा है। उसने धीरे से पुकारा, “आंटी?”
वंदना हड़बड़ाकर उठी। “अरे, तुम उठ गए? पानी चाहिए? रुको मैं सूप गर्म करती हूँ।”
आर्यन ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी आँखों में अब भी वही सवाल था। “तुम… तुम यहाँ कैसे? पापा कहाँ हैं?”
वंदना ने मुस्कुराते हुए कहा, “पापा की तबीयत ठीक नहीं थी, और लॉकडाउन था। मैं आ गई। तुम चिंता मत करो, अब तुम ठीक हो।”
तभी दरवाजे की घंटी बजी। डॉक्टर आया था, जिसे वंदना ने बहुत मुश्किल से राजी किया था चेकअप के लिए। डॉक्टर ने आर्यन की जांच की और कहा, “नौजवान, तुम बहुत किस्मत वाले हो। जिस हालत में तुम थे, बचना मुश्किल था। यह तो तुम्हारी माँ की तपस्या है जो तुम जिंदा हो। मैंने देखा है कि कैसे यह औरत पिछले दो हफ्तों से एक पल के लिए भी नहीं सोई। खुद भूखी रही, लेकिन तुम्हें वक्त पर दवाई और खाना देती रही। ऐसी माँ भगवान सबको दे।”
डॉक्टर चला गया। आर्यन सन्न रह गया। उसे याद आया कि कैसे उसके अपने दोस्तों ने फोन नहीं उठाया था, कैसे रिश्तेदार सिर्फ हालचाल पूछकर फोन काट देते थे। और यह औरत… जिसे वह जिंदगी भर नफरत करता रहा, जिसे उसने ‘जायदाद की लालची’ और ‘डायन’ कहा, वह अपनी जान जोखिम में डालकर, पुलिस की लाठियां और वायरस का खतरा झेलकर उसके पास आई थी।
उसने देखा कि वंदना किचन में जा रही थी। आर्यन की नजर मेज पर रखे उस डिब्बे पर पड़ी जो वंदना ने उसे घर से निकलते वक्त दिया था—बेसन के लड्डू और दवाइयां। वह डिब्बा अब भी वहीं पड़ा था, अनछुआ।
आर्यन की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उसका गला रुंध गया। उसे अपनी हर कही बात, हर ताना, हर अपमान याद आने लगा। उसे महसूस हुआ कि वंदना के प्रति उसकी नफरत वंदना की कमी के कारण नहीं थी, बल्कि उसके अपने दूषित नजरिए के कारण थी। उसने पहले ही तय कर लिया था कि ‘सौतेली माँ बुरी होती है’, इसलिए उसे वंदना का प्यार कभी दिखाई ही नहीं दिया।
वंदना सूप लेकर आई। “लो बेटा, पी लो।”
आर्यन ने सूप का कटोरा मेज पर रखा और अचानक वंदना के पैरों में गिर पड़ा। वह फूट-फूटकर रोने लगा।
“मुझे माफ कर दो माँ… मुझे माफ कर दो,” आर्यन सिसक रहा था। “मैं अंधा था। मैंने हमेशा तुम्हें गलत समझा। तुमने मुझे बेटा माना, लेकिन मैं कभी तुम्हें माँ नहीं मान सका। मैं बहुत बुरा हूँ माँ।”
वंदना की आँखों से भी आंसू बह निकले। उसने झुककर आर्यन को उठाया और अपने सीने से लगा लिया। यह वो पल था जिसका इंतजार वह सालों से कर रही थी।
“पगले, माँ से भी कोई माफी मांगता है क्या?” वंदना ने उसका सिर सहलाते हुए कहा। “माँ के लिए बच्चा कभी बुरा नहीं होता, बस थोड़ा नासमझ होता है। और वैसे भी, मुझे ‘सौतेली’ होने का दुख नहीं था, दुख बस इस बात का था कि मेरा बेटा मुझे पहचान नहीं पा रहा था।”
आर्यन ने वंदना का चेहरा अपने हाथों में लिया और कहा, “गलती मेरी थी माँ। मैंने अपनी आँखों पर नफरत की पट्टी बांध रखी थी। आप सौतेली नहीं हो, आप तो मेरी सगी माँ से भी बढ़कर हो। क्योंकि सगी माँ ने तो मुझे जन्म देकर छोड़ दिया, लेकिन आपने मुझे मौत के मुंह से छीनकर नया जन्म दिया है।”
उस दिन उस छोटे से फ्लैट में सिर्फ आर्यन का बुखार नहीं उतरा था, बल्कि उसके दिमाग का वो बुखार भी उतर गया था जिसने उसे सालों से बीमार बना रखा था—शक और नफरत का बुखार।
जब लॉकडाउन खुला और वे दोनों घर वापस आए, तो महेश जी ने देखा कि गाड़ी से आर्यन उतरा, और उसने दौड़कर दूसरी तरफ का दरवाजा खोला और वंदना का हाथ पकड़कर उसे बड़े सम्मान से नीचे उतारा। घर में घुसते ही आर्यन ने सबसे पहले उस तस्वीर को दीवार से उतारा जो उसने अपने दिमाग में बना रखी थी, और वंदना को वही दर्जा दिया जिसकी वह हकदार थी।
रिश्तेदार अब भी कहते थे, “अरे, यह तो सौतेली है।” लेकिन अब आर्यन मुस्कुराकर जवाब देता, “हाँ, यह मेरी माँ है। और अगर सौतेली माँ ऐसी होती है, तो भगवान हर किसी को ऐसी ही माँ दे।”
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**जीवन का सत्य यही है कि हम अक्सर लोगों को वैसा नहीं देखते जैसे वे हैं, बल्कि वैसा देखते हैं जैसे हम हैं। आर्यन ने अपनी सोच बदली तो उसे एक माँ मिल गई। कहीं आप भी किसी अपने को गलतफहमी के चश्मे से तो नहीं देख रहे? याद रखिये, दीवारें घर में हों तो तोड़ी जा सकती हैं, लेकिन मन में बनी दीवारें इंसान को अकेला कर देती हैं।**
**क्या आर्यन की तरह हमें भी अपने पूर्वाग्रह (prejudice) छोड़ने चाहिए? क्या वंदना का त्याग सही था? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।**
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