सुमित्रा देवी की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। जिस बेटे को उन्होंने ‘नकारा’ और ‘पत्थर’ समझा था, असल में वही उनकी नींव का पत्थर था। और जिस दामाद को उन्होंने ‘हीरा’ समझा था, वह केवल कांच का टुकड़ा निकला जो वक्त आने पर चुभ गया।
कहानी का हुक: हम अक्सर मीठी जुबान वालों को अपना हमदर्द समझ बैठते हैं और कड़वी सच्चाई बोलने वालों को दुश्मन… लेकिन क्या मीठी बातों के पीछे छिपे खंजर को वक्त रहते पहचाना जा सकता है?
रघुनाथपुर की हवेली में आज सुबह से ही चहल-पहल थी। सुमित्रा देवी के पति के देहांत के बाद यह पहली बार था जब घर में किसी बड़े पूजा-पाठ का आयोजन हो रहा था। सुमित्रा देवी, जो अब घर की मालकिन थीं, अपने बड़े जमाई, रमन की तारीफ करते नहीं थक रही थीं।
रमन शहर से आया था, देखने में बेहद स्मार्ट, जुबान का मीठा और हर काम में आगे। वहीं दूसरी ओर सुमित्रा का अपना बेटा, कौशल, एक कोने में खड़ा चुपचाप व्यवस्था देख रहा था। कौशल स्वभाव से थोड़ा रूखा था, ज्यादा बोलता नहीं था और खेती-बाड़ी में रमे रहने के कारण अक्सर उसके कपड़े मिट्टी से सने रहते थे।
सुमित्रा देवी अक्सर पड़ोसियों से कहतीं, “मेरा बेटा तो बस नाम का है, असली सेवा तो मेरा दामाद रमन करता है। हर हफ्ते शहर से आता है, मेरे लिए दवाइयां लाता है, मेरे पैरों में तेल लगाता है। और एक ये कौशल है, जिसे खेत-खलिहान से फुर्सत ही नहीं मिलती। माँ जिन्दा है या मर गई, इसे कोई परवाह नहीं।”
कौशल यह सब सुनता, उसका दिल दुखता, लेकिन वह कभी पलटकर जवाब नहीं देता। उसे पता था कि माँ अभी पिता के जाने के गम में हैं और रमन की चिकनी-चुपड़ी बातें उन्हें मरहम जैसी लगती हैं।
कहानी में मोड़ तब आया जब रमन ने सुमित्रा देवी के दिमाग में एक बात डाल दी। एक रात खाना खाते समय रमन ने बड़े प्यार से कहा, “माँ जी, आप इस पुरानी हवेली और गाँव की जमीन के चक्कर में क्यों पड़ी हैं? कौशल तो सीधा-सादा है, उससे यह सब संभलेगा नहीं। शहर में एक बड़ी स्कीम आई है। अगर हम यह जमीन बेचकर वहां पैसा लगा दें, तो अगले ही साल पैसा दोगुना हो जाएगा। फिर मैं आपको अपने पास शहर ले चलूँगा, वहां आप रानी की तरह रहेंगी।”
सुमित्रा देवी को यह सपना बहुत सुहावना लगा। उन्हें लगा कि रमन ही उनका असली शुभचिंतक है। अगले ही दिन उन्होंने कौशल को बुलाया और कहा, “कौशल, मैंने फैसला किया है कि हम गाँव की पुश्तैनी जमीन बेच देंगे और पैसा रमन को देंगे ताकि वह शहर में निवेश कर सके।”
कौशल सन्न रह गया। उसने कहा, “माँ, यह जमीन पिताजी की निशानी है। यह हमारी जड़ें हैं। और रमन जीजाजी जिस स्कीम की बात कर रहे हैं, मैंने उसके बारे में पता किया है, वह बहुत जोखिम भरी है। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए।”
सुमित्रा देवी भड़क गईं। “तू तो बस जलता है रमन से! क्योंकि वह तरक्की कर रहा है और तू यहीं गोबर में पड़ा रहना चाहता है। तुझे मेरी खुशी बर्दाश्त नहीं होती। बस, मैंने जो कह दिया सो कह दिया। अगले हफ्ते रजिस्ट्री होगी।”
कौशल ने बहुत समझाया, “माँ, ‘विश्वास’ का पौधा लगाने से पहले जमीन जरूर परख लेना। रमन जीजाजी की बातों की चमक पर मत जाओ, उनकी नियत की मिट्टी उपजाऊ नहीं है।” लेकिन सुमित्रा ने उसकी एक न सुनी। उन्होंने कौशल को धक्के देकर कमरे से बाहर निकाल दिया और रमन को पावर ऑफ अटॉर्नी देने के कागज तैयार करवाने लगीं।
रजिस्ट्री के दो दिन पहले की बात है। सुमित्रा देवी को अचानक सीने में तेज दर्द उठा। आधी रात का वक्त था। रमन उस वक्त घर पर ही था, लेकिन जैसे ही सुमित्रा ने उसे आवाज दी, वह अपने कमरे से बाहर नहीं निकला। उसने अपनी पत्नी (सुमित्रा की बेटी) से धीरे से कहा, “अरे, बुढ़िया का रोज का नाटक है। अभी बाहर गया तो रात खराब हो जाएगी। सुबह देखेंगे।”
दूसरी तरफ, कौशल अपने खेत पर पानी लगा रहा था। जैसे ही उसे नौकर से खबर मिली, वह नंगे पांव भागता हुआ घर आया। माँ की हालत देखकर उसने उन्हें अपनी पीठ पर लादा और जीप निकालकर शहर के अस्पताल की ओर भागा। पूरे रास्ते वह माँ से बातें करता रहा ताकि वे होश न खो दें। अस्पताल पहुँचकर डॉक्टर ने कहा, “अगर दस मिनट की और देरी होती तो इन्हें बचाना मुश्किल था। इनका तुरंत ऑपरेशन करना होगा, पाँच लाख रुपये जमा कराओ।”
कौशल के पास उस वक्त इतने पैसे नहीं थे। उसने रमन को फोन लगाया।
“जीजाजी, माँ की हालत गंभीर है, आप जल्दी पैसे लेकर आ जाइए।”
उधर से रमन ने जवाब दिया, “कौशल, मैं तो अभी एक जरुरी मीटिंग के लिए निकल गया हूँ। और पैसे… पैसे तो अभी मेरे हाथ तंग हैं। तुम देख लो कुछ, आखिर माँ तो तुम्हारी भी है।” और फोन काट दिया।
उस रात कौशल ने अपनी वह जमीन गिरवी रख दी जो उसने अपनी मेहनत की कमाई से खरीदी थी। उसने एक बार भी नहीं सोचा कि भविष्य में क्या होगा। उसने माँ का इलाज करवाया। तीन दिन तक वह आईसीयू के बाहर भूखा-प्यासा बैठा रहा। रमन एक बार भी अस्पताल नहीं आया, यह कहकर कि उसे ‘इन्फेक्शन’ का डर है।
जब सुमित्रा देवी को होश आया, तो उन्होंने सबसे पहले रमन को पुकारा। नर्स ने बताया, “माजी, रमन नाम का कोई आदमी यहाँ नहीं आया। वो जो बाहर बेंच पर लड़का बैठा है, जिसका कुर्ता मैला है और दाढ़ी बढ़ी हुई है… वही पिछले तीन दिनों से आपके लिए यमराज से लड़ रहा था। उसने अपने खून की बोतलें आपको चढ़वाई हैं।”
सुमित्रा देवी की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। जिस बेटे को उन्होंने ‘नकारा’ और ‘पत्थर’ समझा था, असल में वही उनकी नींव का पत्थर था। और जिस दामाद को उन्होंने ‘हीरा’ समझा था, वह केवल कांच का टुकड़ा निकला जो वक्त आने पर चुभ गया।
घर लौटने पर सुमित्रा ने सबसे पहला काम किया—जमीन बेचने के कागजात फाड़ दिए। जब रमन घर आया और उसने बनावटी चिंता दिखाते हुए पूछा, “माँ जी, अब कैसी हैं आप? मैं तो बहुत परेशान था…”
सुमित्रा देवी ने हाथ के इशारे से उसे चुप कराया। उन्होंने रमन की आँखों में आँखें डालकर कहा, “रमन बेटा, मुझे माफ करना। मैंने गलत जगह उम्मीद लगा ली थी। कौशल ने मुझे एक बार कहा था कि ‘विश्वास’ का पौधा लगाने से पहले जमीन जरूर परख लेना क्योंकि हर मिट्टी उपजाऊ नहीं होती..! मैंने तुम्हारी मीठी बातों की सतह तो देखी, लेकिन उसके नीचे छिपी लालच की बंजर जमीन नहीं देख पाई। मेरा बेटा कौशल जरूर खुरदरा है, लेकिन उसकी मिट्टी उपजाऊ है, जिसमें वफादारी और सेवा के फल उगते हैं।”
रमन का चेहरा शर्म से झुक गया। उसे समझ आ गया कि उसकी दाल अब यहाँ नहीं गलने वाली। वह चुपचाप वहाँ से चला गया। उस दिन के बाद सुमित्रा ने कभी कौशल की तुलना किसी से नहीं की। उन्हें समझ आ गया था कि प्रेम का प्रदर्शन करने वाले और प्रेम को निभाने वाले में जमीन-आसमान का फर्क होता है।
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लेखिका : रीमा साहू