वेलेंटाइन डे – बीना शुक्ला अवस्थी

आज ” वेलेन्टाइन डे” है। हमेशा की तरह इस बार भी प्राची का मन 14 फरवरी आते आते अवश होने लगा है। वह लाख प्रयत्न करे परन्तु शाम होते होते कोई अनजान डोर उसे अपनी ओर खींचने लगती है। वर्ष भर किये सारे वादे, सारे प्रयत्न रेत के महल की तरह धराशाई होने लगते हैं।

प्राची को कभी यह रहस्य समझ में नहीं आया कि क्या यही प्यार है…….? यदि यही प्यार है तो दाम्पत्य इतना मधुर, सरस एवं परितृप्त कैसे रहा? पति के साथ तन एवं मन का इतना समर्पण सहज कैसे है?

…………और अगर वह प्यार नहीं है तो क्यों उसका मन सब कुछ होते हुये भी इस दिन की आतुरता से प्रतीक्षा करता रहता है? ………क्यों आज के दिन सारे उलाहने सुनकर भी उसका मन सारे बंधन तोड़ने को लिये  व्याकुल हो उठता है? ………..

क्यों युवा बेटे-बेटी का परिहास -“मम्मी वेलेन्टाइन डे के लिये नई साड़ी तो आप ले ही आईं होंगी” उसे चुभता नहीं है बल्कि एक रोमांच सा भर देता है? ……….क्यों सुबह सुबह पति का “वेलेन्टाइन मुबारक कहना” उसके अन्दर चोरी करते पकड़े जाने का भाव भर देता है?

क्या इसे ही पहला प्यार कहते हैं? परन्तु क्या यह सचमुच प्यार ही है?  क्या ऐसे भी कभी प्यार किया जाता है……… वर्षों पहले 14 फरवरी की शाम- उन दिनों 14 फरवरी “वेलेन्टाइन डे ” नहीं हुआ करती थी।

मन्दिर की सीढ़ियों पर अपने झुके सिर के नीचे किसी के कोमल पैरों का आभास पाकर प्राची की बन्द आखें खुल गईं‌ और वह हड़बड़ाकर खड़ी हो गई। सीढ़ियॉ उतरता उन चरणों का स्वामी भी इस अप्रत्याशितता से बौखला सा गया था। कुछ क्षण तक प्राची नजरें झुकाये खड़ी ही रह गई। उसकी ऑखें उन  चरण युगलों पर जैसे कील सी जड़ गई थी।

जब होश आया तो ” सॉरी ” कहकर लजाती शर्माती मन्दिर के अन्दर की ओर भाग गई थी और उसका ” वह” वैसा ही ठगा सा खड़ा रह गया था। लाज और शर्म से प्राची का पूरा शरीर पसीने से नहा गया था। काफी देर बाद बुआ के साथ बाहर आई

तो उसका ” वह” वैसे ही खड़ा था। छुट्टियो में बुआ के घर आई थी प्राची ।……… बस, और कुछ नही ………… क्या प्यार ऐसे भी होता है?

प्राची आज तक नहीं जान पाई कि पहला प्यार किसे कहते हैं? प्यार की पहली फुहार से अनजान ही है वह। विवाह होते ही दाम्पत्य और पति ही जीवन में पहला प्यार बनकर आ गये।

इसके बावजूद तब से आज तक प्राची उस चेहरे को तो भूल गई,परन्तु वे गोरे गोरे चरण युगल नाग के हत्यारे की तरह उसके नेत्रों‌ के स्थान पर हृदय पर अंकित हैं। उसी दिन पापा के साथ वापस लौट आने के कारण दुबारा अपने ” उसको” देख भी न सकी।

विवाह के पश्चात प्रीति भरी सुहागिन रातों में समा तो गई लेकिन उस ” एक क्षण ” ने कभी भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। काश…………

वर्षों बाद पति के स्थानान्तरण के कारण जब से इस शहर को स्थाई निवास बनाया है तब से उस ” एक क्षण” की स्मृति को हृदय में संजोये प्रति वर्ष उसी स्थान पर जाकर अपने ” उसको” गुलाब की कली अर्पित करके वैसे ही सिर झुकाती है, फिर बैठ जाती है

उन्हीं सीढ़ियों पर – एक निष्फल प्रतीक्षा के लिये। उस समय उसका अपने पर वश नहीं रह जाता – वह यंत्र बन जाती है- स्वचालित यंत्र। वह न किसी की मॉ रह जाती है और न किसी की पत्नी, वह तो सिर्फ प्राची रह जाती है, जिस पर काल , समय या परिस्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

परन्तु इस बार…….. जैसे ही उसने आंखें बन्द करके सीढ़ियों पर अपना माथा रक्खा, यह क्या ……हड़बड़ाकर ऑखें खोल दी।…… उसके माथे के नीचे वही चरण युगल … इन्हें तो मरते समय तक नहीं भूल सकती …….. वही गोरे गोरे पैर, बायें पैर में छै उंगलियॉ और दाहिने पैर पर काला तिल। प्राची हतप्रभ, अवाक खड़ी रह गई, बड़ी मुश्किल से मुंह से निकला-” सॉरी’ …….

” वर्षों पहले किसी ने यही गलती करके मुझे कंगाल बना दिया था, उस एक” क्षण “ने जीवन भर मुझे जीने नहीं दिया। उस ” एक क्षण” को सीने से लगाये कहीं भी होता हूं

प्रतिवर्ष यहॉ आता हूॅ शायद हमेशा आता रहूॅगा।” एक दर्दीली मुस्कान से उसका चेहरा सराबोर हो गया -” पागल हूॅ मैं जो आज भी उस बेरहम को ढ़ूॅढ़ रहा हूॅ जिसने एक क्षण में मेरा सब कुछ चुरा लिया। काश ! एक बार वह मिल जाये”


प्राची देखती रह गई अपने “उसको”। पत्नीत्व की मर्यादा में सिले उसके होंठ अपने “उसको” पाकर भी कह न पाये – ” वह “एक क्षण ” मेरे लिये भी तो जीवन के सारे सुखों से अधिक मूल्यवान है, उसे सीने से लगाये मैं भी तो भटकती रही हूॅ।”


” अब यहॉ कभी नहीं आउंगी, वरना बहुत कुछ जलकर भस्म हो जायेगा।” हृदय से परामर्श लिये बिना मस्तिष्क ने अपना निर्णय सुना दिया और साथ ही उसके हृदय ने स्पष्ट कर दिया कि वह एक क्षण ही उसका पहला प्यार है।

बीना शुक्ला अवस्थी, कानपुर

#पहला प्यार

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