विधी का विधान कभी नहीं टलता – मंजू ओमर 

मांजी ओ मांजी लो खाना खा लो ।कमला के जोर से आवाज देने पर सुनैना जी की तन्द्रा टूटी ।अरे हां कमला क्या हुआ क्यों आवाज दे रही है । कहां खोई हुई है आप सुन ही नहीं रही है अब से आवाज दे रही हूं।

खाना लाई हूं आपके लिए ,अरे रख दे अभी बाद में खा लूंगी।अरे नहीं नहीं अभी गरम गरम है खा ले नहीं तो फिर रखा रह जाता है आप खाती नहीं है ।

कल का खाना देखो रखा रह गया था और आप भूखी ही सो गई थी। अच्छा ला दे तू बिना खिलाए मानेगी नहीं और सुनैना खाना खाने लगीं ।और सोचने लगी काश? कोई अपना भी इतने मनुहार से खिलाता । खाना क्या कोई खिलाएगा जब कोई ढंग से बात तक नहीं करता।

             ठंड बहुत थी तो सुनैना ने खाना खाकर कुर्सी धूप में डाली और बैठ गई धूप सेंकने।और धूप सेंकते हुए अपने अतीत में कहीं गहरे तक खो  गई। कितना खुशहाल परिवार था उसका और अब क्या हो गया। शादी होकर जब पति के साथ इस घर में आई थी

तो पति के अलावा उनकी बूढ़ी सास थी बस ।पति अविनाश के तीन और बड़े भाई थे एक भाई को छोड़कर दो भाई उसी शहर में अलग-अलग रहते थे। अविनाश घर में सबसे छोटे थे तो मां उनके साथ ही रहती थी ।

अविनाश और सास में आपस में बड़ा प्रेम था।सास कभी अविनाश को छोड़कर और लड़कों के पास नहीं जाती थी । जाती नहीं थी या अन्य बहुओं से कभी पटती ही नहीं थी।

             ‌शादी के तीन साल में सुनैना के दो बच्चे हो गए । सुनैना की सास बहुत तेज तर्रार थी ,शायद इसी कारण और बहुओं से कभी पटती ही नहीं थी ।और लड़के अपनी पत्नियों का पक्ष लेकर मां को ही डांट देते थे । अविनाश हमेशा मां का पक्ष लेते थे शायद इसी लिए सास अविनाश के ही साथ रहती थी।

सास सुनैना को बहुत परेशान करती थी और अविनाश कभी भी मां को कुछ कहते नहीं थे सुनैना को ही चुप करा देते थे।और साफ मुकर जाते थे कि मै मां के खिलाफ कुछ भी नहीं सुनूंगा। सुनैना की जब पहली डिलीवरी होने को थी तो वो हर वक्त सास सुनैना से कहती रहती थी मुझसे नहीं  होगा तुम्हारे जचके का काम या तो मायके चली जाओ या अपनी मां या बहन को बुला लो ।

अविनाश जी सुनैना को मायके भी नहीं भेजना चाहते थे और मां का विरोध भी नहीं करते थे। फिलहाल जब सुनैना की डिलीवरी हुई तो उसको अस्पताल में ढंग से खाना पीना नहीं मिलता था । अस्पताल से घर आने पर भी एक जापे में मां को जो खाना दिया जाता था वो कुछ नहीं देती थी । कहती मुझसे नहीं होगा। जबकि ऐसा नहीं था कर तो सबकुछ लेती थी।

       अविनाश से कहकर मेवा मसाला  तो सब मंगा लिया था सास ने और उसके लड्डू वगैरह भी बनवा लिए थे लेकिन सुनैना को नहीं मिलता था ।

वो सब या तो आने जाने वाले को खिला दिया जाता था या खुद खा लेती कुछ और अविनाश को खाने को दे देती और  वो ऐसे ही  खत्म हो जाता। अविनाश को ये पता ही नहीं होता था कि सुनैना को ये सब खाने को नहीं मिल रहा है। डिलिवरी के पंद्रह दिन बाद ही कहने लगी

कि क्या दिनभर बैठी रहती हो घर के काम करो ।बस खाना नहीं बनाना है क्योंकि उसके लिए शुद्ध नहीं हो बाकी घर के काम जैसे झाड़ू लगाना, कपड़े धोना ,सामान हटाना बढ़ाना ये सब करो । खाना खुद सास भी बनाती थी । सुनैना सुबह से भूखी बैठी रहती शाम के चार चार बजे तक सुनैना को खाना ही नहीं मिलता था । सुनैना भूखी बैठी रहती।

          सास के ऐसे व्यवहार से सुनैना अंदर ही अंदर कुढ़ती रहती थी अविनाश पर भी गुस्सा आता था क्योंकि वो भी कुछ नहीं सुनते थे। सुनैना कभी कभी अविनाश से कह देती कि तुम्हारे और भी भाई तो है मांजी उनके पास क्यों नहीं रहती थोड़े दिन को । मुझे भी तो चैन मिले कुछ दिनों को।

उन लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं है क्या सब जिम्मेदारी तुम्हीं ने उठा रखी है।हर वक्त मेरे ही सिर पर सवार रहती है । लेकिन सुनैना के कहने का अविनाश पर मांजी पर कोई फर्क नहीं पड़ता था।वो सुनैना के पास में ही रहती थी।

     सुनैना का बच्चा अभी एक साल का हुआ भी था कि सुनैना फिर से प्रेग्नेंट हो गई।घर में इस साल भी वही स्थिति थी।सारा घर का काम ,एक बच्चे को भी संभालना, खुद को भी संभालना। फिलहाल किसी तरह समय बीता और सुनैना की दूसरी डिलीवरी भी हो गई। सुनैना को बहुत प्राब्लम हो रही थी

लेकिन सास घर में या बच्चे को संभालने में कोई मदद नहीं करती थी ।जब भी कभी अविनाश घर में होते तो सास दिखाने के लिए बच्चे को गोद में ले लेती । लेकिन जैसे ही वो घर से बाहर जाते वो बच्चे को वैसे ही रोता हुआ छोड़ देती ।इस बात पर अब सुनैना और सास में अक्सर कहा सुनी होने लगी ।

छोटी छोटी कहा सुनी अब बड़ी बनने लगी थी।जब भी कभी सुनैना बच्चों की वजह से खाना नहीं बना पाती थी तो सास अपना खाना बना कर खा लेती थी और सुनैना का नहीं बनाती थी ।अब सुनैना अविनाश से हर वक्त शिकायत करती लेकिन तब भी अविनाश मां को कुछ नहीं कहते।बस सुनैना कुढ़कर रह जाती कुछ कर नहीं पा रही थी।

             इसी बीच सास का वीपी हाई हुआ और ब्रेन हेमरेज हो गया। अस्पताल में भर्ती कराया गया।और कोई भी बहू कुछ करने को तैयार नहीं थी । सुनैना के बच्चे भी छोटे थे लेकिन उसे करना पड़ता था ।एक हफ्ते के बाद सास को अस्पताल से छुट्टी हो गई लेकिन वो बिस्तर की ही होकर रह गई।

न कुछ बोल पाती थी ,और न उठ बैठ पाती थी ।अब उनका रोजमर्रा का काम भी बिस्तर पर होने लगा । सुनैना चाहती थी कि और बहुएं भी सास की देखरेख करें पर कोई भी नहीं करता था । सुनैना के मन में सास को लेकर गुस्सा तो था अब सारा गुस्सा वो इस हालत में भी सास को परेशान करके दिखाती थी ।

जैसे ठीक से उनकी देखभाल न करना ,समय पर साफ सफाई न करना । लिक्विड देना होता था खाने को तो वो भी ठीक से नहीं देती ।एक दिन दाल का पानी बना देती कई कई दिन तक वहीं देती रहती ।अब सास कुछ विरोध तो कर नहीं सकती थी बस निरीह आंखों से सुनैना को देखती रहती थी।

         ऐसी ही अवस्था में सुनैना की सांस करीब छै महीने रही उसके बाद उनका देहांत हो गया।समय तेजी से बीत गया और अब सुनैना भी सास बन गई । उसने चाहा था कि वो अपनी बहू को खूब अच्छे से रखेगी। जैसा उसकी सास ने उसके साथ किया वैसा वो कुछ भी अपनी बहू के साथ नहीं करेगी।

लेकिन विधी का विधान तो कुछ और ही होता है।लाख चाहा सुनैना ने कि वैसा कुछ न हो लेकिन सुनैना की बहू प्रिया सुनैना को पसंद ही नहीं करती थी।वो न तो सुनैना के संग रहना चाहती थी और सुनैना को अपने साथ रखना चाहती थी। प्रिया को सुनैना की कोई भी बात अच्छी नहीं लगती थी।

कुछ कहना या बताना चाहती भी थी सुनैना तो प्रिया साफ मना कर देती थी कि आप मुझे न सिखाए । प्रिया बात बात पर सुनैना का अपमान करती ।

       अब तो अविनाश जी भी नहीं रह गए थे ।अब सुनैना की मजबूरी थी कि बहू बेटे के साथ रहने के लिए। लेकिन सुनैना ने इस बार निश्चित कर लिया था कि अब वो अकेले ही रहेगी बहू बेटों के साथ नहीं रहेगी ।आज के अपमान से सुनैना तिलमिला गई थी ।हुआ यूं कि आज बेटे का जन्मदिन था

और सुनैना ने थोड़ा हलुआ बना दिया था भगवान को भोग लगाने को ।बेटा अनुज जब आफिस जाने लगा मैं सुनैना ने हलुआ बेटे को दिया बेटा अनुज आज तुम्हारा जन्म दिन है आज हमने हलुआ बनाया है बेटा खा के जाओ । क्या है मां कौन खाता है अब हलवा हेल्थ का ध्यान रखना पड़ता है और

अनुज हलवा छोड़कर चला गया ।तभी प्रिया बिफर पड़ी मम्मी आपको तो बस बैठे बैठे उल्टा सीधा काम करने को पड़ी रहती है हलवा बना दिया इतना घी बर्बाद कर दिया ।अब कौन खाएगा ये, अब आगे से आप रसोई में नही जाएगी समझीं आप ।और नहीं तो आप अपने घर जाएं । यहां मैं आपको नहीं रख सकती ।

          सुनैना को बहुत चोट लगी अंदर तक और वो आज आ गई अपने घर ।और बैठकर सोचने लगी क्या यही विधी का विधान है क्या जो आपने अपनों के साथ किया है उसका फल भोगना ही पड़ेगा।

सुनैना सोचने लगी मैंने पहले तो सास के साथ कुछ ग़लत नहीं किए सास ने ही मेरे साथ गलत किया। अच्छा व्यवहार नहीं किया था। लेकिन शायद मेरी ग़लती तब रही जब सास बेबस और लाचार हो गई थी । मैंने उनके साथ ठीक नहीं किया।और उसका फल अब मेरी बहू मेरे साथ अच्छा व्यवहार न करके दे रही है।

         अविनाश भी सुनैना को अकेले छोड़कर जा चुके थे।अब सुनैना बिल्कुल अकेले थी।एक बेटी थी जो शादी करके अमेरिका में सैटिल थी तो उसके पास भी नहीं जा सकती थी। सुनैना मन ही मन कहने लगी अब शायद अकेले ही जीवन पार करना है।

         दोस्तों बड़ों के साथ गलत न करें ।चाहे उन्हें कोई भी रिश्ता हो।हां अगर वो छोटे  हैं जैसे कि बहू के साथ  कुछ सास ने गलत किया है तब भी यह भी आप गलत व्यवहार न करें । क्योंकि वही जब आपके साथ बीतती है तो बहुत बुरा लगता है। लेकिन ईश्वर सब देख रहा है।और सही गलत का न्याय तो वहीं करता है।अगर आपके साथ कुछ ग़लत हो रहा है तो हो सकता है आपने भी किसी के साथ कुछ ग़लत किया हो। क्योंकि फल तो भोगना ही पड़ता है और यही विधी का विधान है ।

मंजू ओमर 

झांसी उत्तर प्रदेश 

11 फरवरी 

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