पहला प्यार – डाॅ उर्मिला सिन्हा 

शाम हो चली थी।सामने लंबे वृक्षों की घनी छाया सीधे पहाड़ी से नीचे उतर रही थी। घने लंबे पेड़ों झाड़ियों से आच्छादित वह स्थान मंडप सा प्रतीत होता था। ऊंची पहाड़ी से निकलती जल की धारा उछाल मार रही थी।  गरिमा  को यह डूबते सूर्य की पीली रौशनी, पेड़-पौधों का झुरमुट उसपर चहचहाते चिड़ियों का झुंड बहुत आकर्षित करता था।

  जब भी अपने कामकाज से छुट्टी मिलती वह संध्या समय अपने बालकनी में खड़ी होकर यह प्राकृतिक दृश्य निहारने का लोभ संवरण नहीं कर पाती थी।

    ” कहां हो गरिमा,देखो कौन आया है” देवेश उसका पति अति उत्साहित आवाज लगा रहा था।

” जी आई, कौन आया है” उसने देवेश से पूछा।

” मेरे बचपन का दोस्त रोहन… पहाड़ों पर सपरिवार छुट्टियां बिताने आया है”।

   रोहन सुनते ही गरिमा को झटका सा लगा लेकिन उसने अपने-आप को संभाल लिया। स्त्रियां ऐसे भी अपना मनोभाव छुपाने में माहिर होती हैं।उसका पति वन-विभाग में अधिकारी है।दो बेटे हैं और दोनों हाॅस्टल में रहते हैं। कभी सास-ससुर देवेश के भाई-बहन सपरिवार आते तब यह सरकारी बंगला गुलजार हो जाता।

  गरिमा का भाई विदेश में सेटल था और माता-पिता

उसके साथ ही रहते थे। कभी-कभार आते तो भेंट होती। फोन का सहारा था।देवेश सरल हृदय का व्यक्ति अपने बीबी बच्चों पर जान छिड़कता था।उसकी पहचान एक ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ अफसर की थी।

   वही गरिमा आज ‘रोहन’ नाम सुनते ही विचलित हो गई यह सोचने वाली बात थी।

   ” गरिमा यह मेरा लंगोटिया यार रोहन,इसकी पत्नी प्रिया और बेटी पीहू ” देवेश का उत्साह देखते बन रहा था।

” और रोहन यह मेरी धर्मपत्नी गरिमा”।

जहां गरिमा रोहन को देखते ही चिहुंक उठी वहीं रोहन गरिमा को देखते ही चीख पड़ा,” अरे यह तो गरिमा है मेरी मौसी की बेटी की सहेली, कैसी हो गरिमा… तुम्हें देवेश की पत्नी के रुप में देख आश्चर्य और खुशी दोनों हो रहा है” रोहन अपनी पत्नी से गरिमा उसके परिवार की बातें बताये जा रहा था ।

गरिमा सुन कहां रही थी होंठों पर नकली मुस्कान और मन-मस्तिष्क में किशोरावास्था की यादें।

सहेली के घर अक्सर आते-जाते गरिमा की मुलाकात रोहन से हो जाती… हाय-हेलो से ज्यादा कुछ नहीं। गरिमा का किशोर मन भीतर ही भीतर रोहन की ओर आकर्षित होने लगा। इस सब से अनजान रोहन ऊंची पढ़ाई के लिये बाहर चला गया और एक कार्यक्रम में देवेश की मां को गरिमा भा गई और चट मंगनी पट व्याह।

गरिमा देवेश की जोड़ी जैसे सिया राम , राधे कृष्णा की।

गरिमा अपनी घर-गृहस्थी में रम गई थी लेकिन अपने पहले प्यार रोहन को नहीं भूली थी।

वही रोहन उसके सामने अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खड़ा है।सिर के बाल उड़ चुके हैं बदन भी भारी हो चला है लेकिन ठहाका वैसे ही जोरदार।

दो-तीन दिनों तक वे साथ रहे लेकिन रोहन की आंखों बातों या व्यवहार में गरिमा के लिए कोई प्यार वार की झलक नहीं दिखी।

रहा सहा कसर तब पूरा हुआ जब विदा लेते समय रोहन ने देवेश से कहा,” रक्षाबंधन में गरिमा को लेकर मेरे घर जरुर आना। वर्षों से किसी बहन ने राखी नहीं बांधी है सौभाग्य से गरिमा बहन तुम्हारी अर्द्धांगिनी के रुप में मिली है।”

” क्यों नहीं जरुर” देवेश ने हाथ मिलाया। साथ ही गरिमा के सिर से पहले प्यार की गलतफहमी का भूत भी उतर गया उसने चैन की सांस ली।

मित्रों ऐसा भी होता है …हम ताउम्र किसी न किसी गलतफहमी में जीते हैं… परदा उठते ही सुकून भी मिलता है।

मौलिक रचना -डाॅ उर्मिला सिन्हा 

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