*दुनिया के लिए जिसकी जुबान पर शहद घुला रहता है, घर की चारदीवारी में वही जुबान अपनी जन्मदात्री के लिए खंजर कैसे बन जाती है? क्या एक रिश्ता दूसरे रिश्ते की हत्या करके ही पनप सकता है?*
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“समीर, मैं एक औरत हूँ। और मैं अपना भविष्य देख रही हूँ। आज तुम्हारे पास जवानी है, पैसा है, और मैं सुंदर हूँ, इसलिए तुम मेरे पैर धोकर पी रहे हो। कल जब मैं बूढ़ी हो जाऊंगी, मेरे हाथ कांपेंगे, या मुझसे कोई गलती होगी, तो तुम मेरे साथ भी वही करोगे जो आज तुमने अपनी माँ के साथ किया। क्योंकि यह तुम्हारा ‘स्वभाव’ है, जो प्यार के मुखौटे के पीछे छिपा है।”
शहर के पॉश इलाके में बने ‘विला नंबर 42’ के बाहर खड़ी चमचमाती कार में बैठा समीर अपने फोन पर बड़े प्यार से बातें कर रहा था।
“हाँ जान, बस पहुँच गया हूँ। अरे नहीं बाबा, मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ? तुमने खाना खाया? ठीक है, अपना ख्याल रखना, लव यू।”
फोन रखते ही समीर के चेहरे की मुस्कान ऐसे गायब हुई जैसे कभी थी ही नहीं। उसने कार का शीशा ऊपर चढ़ाया, चेहरे पर तनाव की लकीरें उभारीं और घर के अंदर दाखिल हुआ।
घर के अंदर, हॉल में सोफे पर बैठीं 65 वर्षीय सुमित्रा देवी टीवी देख रही थीं, या यूं कहें कि टीवी देखने का नाटक कर रही थीं। उनकी नज़रें बार-बार दरवाजे की तरफ उठ जाती थीं। जैसे ही समीर अंदर आया, सुमित्रा जी के चेहरे पर एक डरी हुई चमक आ गई।
“आ गया बेटा? बड़ी देर कर दी आज? भूख लगी होगी, मैं खाना लगा देती हूँ,” सुमित्रा जी ने अपनी लाठी के सहारे उठने की कोशिश की।
समीर ने जूते उतारते हुए झल्लाहट में कहा, “माँ, आप बैठो ना। कितनी बार कहा है कि मेरे आते ही नौकरानी की तरह खड़ा मत हो जाया करो। नौकर है ना घर में, वो लगा देगा।”
“अरे नहीं बेटा, नौकर के हाथ में वो बात कहाँ। मैंने आज तेरे पसंद की कढ़ी बनाई है,” सुमित्रा जी ने ममता से कहा।
“फिर कढ़ी? आपको पता है ना मुझे एसिडिटी हो जाती है? बस अपनी मर्जी चलानी है। मुझे नहीं खाना, मैं बाहर से खाकर आया हूँ,” समीर ने चिल्लाते हुए अपना बैग सोफे पर पटका और अपने कमरे की ओर बढ़ गया।
सुमित्रा जी वहीं खड़ी रह गईं। उनकी बूढ़ी आँखों में तैरता हुआ उत्साह एक पल में आंसुओं में बदल गया। उन्होंने तो बस लाड़ में कढ़ी बनाई थी। वे धीरे से वापस सोफे पर बैठ गईं।
यह इस घर की रोज़ की कहानी थी। समीर, जो एक एमएनसी में जॉब करता था था, बाहर की दुनिया के लिए एक आदर्श पुरुष था। अपनी गर्लफ्रेंड ‘निशा’ के लिए वह दुनिया का सबसे केयरिंग बॉयफ्रेंड था। निशा अगर छींक भी दे, तो समीर पूरा आसमान सिर पर उठा लेता था। “बेबी, आर यू ओके? दवाई ली? डॉक्टर के पास चलें?” लेकिन घर में, अपनी माँ की खांसी भी उसे शोर लगती थी।
अगले दिन रविवार था। समीर बहुत खुश था क्योंकि आज निशा पहली बार उसके घर आने वाली थी। समीर ने निशा से शादी की बात पक्की करने का मन बना लिया था। उसने घर को सजाने के लिए इवेंट प्लानर बुलाए थे, महंगे फूल मंगवाए थे।
सुबह से ही समीर माँ को हिदायतें दे रहा था।
“माँ, सुनिए। निशा आ रही है। वो मॉडर्न ख्यालात की है। प्लीज, आप अपनी पुरानी साड़ी में बाहर मत आना। मैंने आपके लिए जो नया सूट मंगवाया है, वही पहनना। और हाँ, ज्यादा सवाल-जवाब मत करना उससे। बस नमस्ते करना और अंदर चले जाना।”
सुमित्रा जी ने सिर हिलाया। बेटे की खुशी के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थीं। उन्होंने अपने कांपते हाथों से वो नया सूट पहना, बालों में कंघी की और भगवान के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, “हे प्रभु, मेरे बेटे की जोड़ी सलामत रखना। वो लड़की इसे बहुत प्यार करे।”
दोपहर के 1 बजे निशा आई। निशा बेहद खूबसूरत और समझदार लड़की थी। समीर ने दरवाज़ा खोला और उसे बाहों में भर लिया।
“वेलकम होम, डार्लिंग! तुम बहुत प्यारी लग रही हो,” समीर ने इतने प्यार से कहा कि सुमित्रा जी, जो पर्दे के पीछे खड़ी थीं, उनकी आँखें भर आईं। काश, कभी समीर उनसे भी ऐसे ही बात करता।
निशा अंदर आई। समीर ने उसे सोफे पर बैठाया।
“समीर, तुम्हारी मॉम कहाँ हैं? मुझे उनसे मिलना है,” निशा ने इधर-उधर देखते हुए कहा।
“हाँ-हाँ, वो आ रही हैं। अरे माँ! बाहर आइये,” समीर ने आवाज़ दी।
सुमित्रा जी धीरे-धीरे बाहर आईं। उनके चेहरे पर घबराहट थी। निशा ने तुरंत उठकर उनके पैर छुए। “नमस्ते आंटी जी। समीर आपकी बहुत तारीफ करता है।”
सुमित्रा जी ने कांपते हाथों से निशा के सिर पर हाथ रखा। “जीती रहो बेटा। भगवान तुम्हारी जोड़ी बनाए रखे।”
समीर ने माँ को इशारा किया कि वे अब जा सकती हैं, लेकिन निशा ने सुमित्रा जी का हाथ पकड़ लिया। “आंटी, आप खड़ी क्यों हैं? बैठिए ना हमारे पास।”
सुमित्रा जी झिझकते हुए सोफे के किनारे पर बैठ गईं।
बातचीत शुरू हुई। समीर निशा के लिए जूस और स्नैक्स लेकर आया।
“बेबी, ये देखो, ये काजू की बर्फी खास तुम्हारे लिए। और ये जूस, फ्रेश है,” समीर निशा की ख़ातिरदारी में लगा था।
तभी सुमित्रा जी को खांसी आई। उन्होंने पानी पीने के लिए टेबल पर रखा जग उठाने की कोशिश की। उनके हाथ बुढ़ापे के कारण कांपते थे। जग उठाते समय उनकी पकड़ ढीली पड़ गई और जग हाथ से छूटकर टेबल पर गिर गया। कांच का जग टूट गया और पूरा पानी टेबल पर, और कुछ पानी निशा की ड्रेस पर गिर गया।
समीर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वह भूल गया कि निशा वहां बैठी है।
“माँ!” वह चीखा। “आपसे एक काम ढंग से नहीं होता? कहा था ना कि आप अंदर रहिए। क्यों आईं यहाँ बैठने? अब देखो, निशा की ड्रेस खराब कर दी। शर्म नहीं आती आपको? हमेशा मेरा मूड खराब कर देती हैं। बुढ़ापे में अक्ल सठिया गई है क्या?”
समीर चिल्लाता रहा। सुमित्रा जी सहम गईं। वे कांपते हुए अपनी साड़ी के पल्लू से टेबल पोंछने लगीं। “माफ़ कर दे बेटा… गलती से हो गया… हाथ कांप गया था…”
“रहने दो! हटिए यहाँ से! नौकर साफ़ कर देगा। आप अंदर जाइये,” समीर ने लगभग उन्हें धक्के मारने वाले अंदाज़ में कहा।
सुमित्रा जी अपमान के आंसुओं को पीते हुए, सिर झुकाकर अपने कमरे की तरफ चल दीं।
कमरे में सन्नाटा छा गया। समीर ने गहरी सांस ली, अपने चेहरे पर वापस वो ही नकली मुस्कान चिपकाई और निशा की तरफ मुड़ा।
“आई एम सो सॉरी बेबी। माँ को ना, समझ नहीं है। एज हो गई है, तो बस क्लमज़ी (फुहड़) हो गई हैं। तुम वाशरूम जाकर साफ़ कर लो, मैं तुम्हारे लिए दूसरी ड्रेस मंगा देता हूँ।”
समीर ने सोचा था निशा उसे सांत्वना देगी। लेकिन जब उसने निशा का चेहरा देखा, तो सन्न रह गया। निशा अपनी जगह से उठी भी नहीं थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी खामोशी और तिरस्कार था।
“समीर,” निशा ने बेहद शांत आवाज़ में कहा। “क्या मैं वाशरूम यूज़ कर सकती हूँ?”
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं। उधर है,” समीर ने इशारा किया।
निशा वाशरूम गई, लेकिन ड्रेस साफ़ करने नहीं। उसने वहां खड़े होकर आईने में खुद को देखा। उसे समीर का वो रूप याद आ रहा था जो अभी उसने देखा था। वो चिल्लाना, वो अपमानित करना, और फिर एक पल में पलटकर उससे प्यार से बात करना।
निशा बाहर आई। उसने अपना बैग उठाया।
“चलो समीर, मुझे घर छोड़ दो।”
समीर हैरान था। “अरे, अभी तो तुम आई थी। लंच तो कर लो। माँ ने… मतलब कुक ने बहुत कुछ बनाया है।”
“नहीं समीर, मेरी भूख मर गई है,” निशा ने कड़े शब्दों में कहा।
समीर को लगा शायद ड्रेस खराब होने से वह नाराज़ है। वह उसे मनाने की कोशिश करने लगा। “अरे बेबी, प्लीज गुस्सा मत हो ना। वो माँ की गलती थी, मैंने उन्हें डांट दिया ना। अब ऐसा नहीं होगा।”
निशा एक झटके से रुकी और समीर की आँखों में देखा।
“यही तो दिक्कत है समीर। तुमने उन्हें डांट दिया। किस बात के लिए? एक जग टूटने के लिए?”
“अरे वो बूढ़ी हैं, ध्यान नहीं रखतीं,” समीर ने सफाई दी।
निशा ने कड़वाहट से हँसते हुए कहा, “समीर, तुम्हें पता है, जब हम डेट पर गए थे और मैंने गलती से वेटर के ऊपर कॉफी गिरा दी थी, तब तुमने क्या कहा था? तुमने कहा था—’इट्स ओके बेबी, हो जाता है, तुम हर्ट तो नहीं हुई?’ और आज तुम्हारी अपनी माँ, जिनके हाथ कांपते हैं, उनसे पानी गिर गया तो तुम उन पर चीख पड़े? ‘शर्म नहीं आती’, ‘अक्ल सठिया गई है’—ये शब्द तुमने अपनी माँ के लिए इस्तेमाल किए?”
समीर हक्का-बक्का रह गया। “निशा, तुम समझ नहीं रही हो, घर की बात अलग होती है…”
“हाँ, बिल्कुल अलग होती है,” निशा ने उसकी बात काटी। “बाहर तुम ‘जेंटलमैन’ हो क्योंकि तुम्हें मुझे इंप्रेस करना है। और घर में तुम ‘राक्षस’ हो क्योंकि माँ तो अपनी है, वो कहाँ जाएगी? वो तो सह लेगी।”
निशा की आवाज़ ऊंची हो गई। “समीर, मैं एक औरत हूँ। और मैं अपना भविष्य देख रही हूँ। आज तुम्हारे पास जवानी है, पैसा है, और मैं सुंदर हूँ, इसलिए तुम मेरे पैर धोकर पी रहे हो। कल जब मैं बूढ़ी हो जाऊंगी, मेरे हाथ कांपेंगे, या मुझसे कोई गलती होगी, तो तुम मेरे साथ भी वही करोगे जो आज तुमने अपनी माँ के साथ किया। क्योंकि यह तुम्हारा ‘स्वभाव’ है, जो प्यार के मुखौटे के पीछे छिपा है।”
समीर पसीने-पसीने हो गया। “निशा, ऐसा नहीं है। मैं माँ से प्यार करता हूँ, बस फ्रस्ट्रेशन…”
“फ्रस्ट्रेशन?” निशा चिल्लाई। “ऑफिस का फ्रस्ट्रेशन माँ पर? और मुझसे प्यार भरी बातें? वाह! समीर, जो मर्द अपनी जननी का सम्मान नहीं कर सकता, वो अपनी पत्नी का सम्मान खाक करेगा? मुझे ऐसे दोहरे चरित्र वाले इंसान के साथ ज़िंदगी नहीं बितानी।”
निशा ने अपनी उंगली से वो अंगूठी उतारी जो समीर ने उसे पिछले हफ्ते दी थी और टेबल पर रख दी।
“यह लो अपनी अंगूठी। और हाँ, अंदर जाकर उस बूढ़ी माँ के पैर पकड़कर माफ़ी मांगना, जिन्होंने तुम्हारे जैसे पत्थर को जन्म दिया और पाल-पोसकर बड़ा किया। वो जग उनसे नहीं, तुम्हारे संस्कारों से टूटा है आज।”
निशा दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गई। समीर उसे रोकने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाया। कार स्टार्ट होने की आवाज़ आई और फिर सन्नाटा।
समीर वहीं खड़ा रहा, बुत बनकर। निशा के शब्द उसके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतर रहे थे। “दोहरा चरित्र… मुखौटा… भविष्य।”
उसकी नज़र टेबल पर गिरे पानी और टूटे हुए कांच पर पड़ी। उसे याद आया बचपन का वो दिन जब उसने क्रिकेट खेलते हुए घर का महंगा टीवी फोड़ दिया था। पिताजी मारने दौड़े थे, लेकिन माँ ने उसे अपने आँचल में छिपा लिया था और कहा था, “बच्चा है, गलती हो गई, मैं जोड़ दूंगी पैसे।”
और आज? आज उसी माँ से सौ रुपये का जग टूट गया तो उसने उन्हें जलील कर दिया?
समीर के पैरों में जान नहीं बची। वह गिरता-पड़ता माँ के कमरे की तरफ भागा।
कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर, सुमित्रा जी बिस्तर पर लेटी सिसक रही थीं। लेकिन उनके हाथ में क्या था? समीर ने गौर से देखा।
वे अपने कांपते हाथों से भगवान की मूर्ति के सामने दीया जला रही थीं और बुदबुदा रही थीं, “हे भगवान, मेरे बेटे की शादी मत तुड़वाना। उस लड़की को सद्बुद्धि देना कि वो मेरे बेटे की डांट का बुरा न माने। मेरा बेटा दिल का बुरा नहीं है, बस थोड़ा गुस्से वाला है।”
समीर दरवाजे पर ही ढह गया।
उसकी माँ, जिसे उसने अभी इतना जलील किया था, जिसका रिश्ता उसने तुड़वा दिया था (हालांकि उन्हें अभी पता नहीं था), वो अभी भी उसी के लिए दुआ मांग रही थीं?
समीर घुटनों के बल रेंगता हुआ माँ के पास पहुँचा और अपना सिर उनकी गोद में रख दिया। उसका गला रंधा हुआ था, आवाज़ नहीं निकल रही थी। बस आँखों से पश्चाताप का सैलाब बह रहा था।
सुमित्रा जी चौंक गईं। उन्होंने देखा बेटा रो रहा है। वे अपना अपमान भूल गईं, अपनी कढ़ी का तिरस्कार भूल गईं।
“अरे क्या हुआ मेरे लाल? क्यों रो रहा है? निशा ने कुछ कहा क्या? मैं अभी उससे बात करती हूँ, मैं हाथ जोड़ लुंगी उसके आगे…” सुमित्रा जी घबरा गईं।
समीर ने माँ के दोनों हाथ पकड़ लिए और अपने आंसुओं से भिगो दिया।
“नहीं माँ… निशा ने नहीं, तुमने मुझे मारा है। तुम्हारे इस प्यार ने मुझे मार डाला माँ। मैं कितना घटिया हूँ। मैं दुनिया भर में प्यार बांटता रहा और घर में सिर्फ़ ज़हर घोला। मुझे माफ़ कर दो माँ… प्लीज मुझे माफ़ कर दो।”
समीर बच्चों की तरह बिलख रहा था। “मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ। मुझे मारो, मुझे गालियां दो, पर यूँ भगवान से मेरे लिए दुआ मत मांगो। मैं इस लायक नहीं हूँ।”
सुमित्रा जी की आँखों से भी आंसू बह निकले। उन्होंने समीर को गले लगा लिया और उसके बालों में उंगलियां फेरने लगीं।
“पगले, माँ कभी औलाद से नाराज़ होती है क्या? तू तो मेरा टुकड़ा है। गुस्सा आता है तुझे, मैं जानती हूँ। पर दिल तो मेरा ही है तेरे सीने में।”
समीर उस दिन बहुत देर तक माँ की गोद में सिर रखकर रोता रहा। उसका ‘ब्रेकअप’ हो चुका था, लेकिन उसका ‘वेकअप’ (जागना) भी हो चुका था। निशा चली गई थी, लेकिन जाते-जाते उसे इंसान बना गई थी।
शाम को समीर ने खुद रसोई में जाकर खिचड़ी बनाई। कढ़ी तो नहीं, पर खिचड़ी ही सही। उसने माँ को अपने हाथों से खाना खिलाया।
“माँ, कढ़ी बहुत अच्छी थी, मैंने झूठ बोला था। कल फिर बनाओगी?” समीर ने पूछा।
सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए उसके गाल पर हाथ रखा, “हाँ बेटा, कल फिर बनाऊंगी।”
समीर ने मन ही मन कसम खाई। अब वह अपनी गर्लफ्रेंड (भविष्य में जो भी होगी) से प्यार से बात करेगा या नहीं, यह बाद की बात है। लेकिन अपनी माँ से आवाज़ ऊंची करके बात करने से पहले वह अपनी जुबान काट लेना पसंद करेगा।
क्योंकि प्रेमिका छोड़कर जा सकती है, पत्नी मायके जा सकती है, दोस्त मुंह फेर सकते हैं… लेकिन एक माँ ही है जो अपमान के बाद भी दुआओं का आँचल फैलाए खड़ी रहती है।
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**कहानी का संदेश:**
हम अक्सर बाहर वालों को खुश करने के लिए अपनों को रुला देते हैं। याद रखिये, जिस दिन आप अपनी माँ की आँखों में देखकर वही प्यार और सम्मान दे पाएंगे जो आप अपनी प्रेमिका को देते हैं, उस दिन आप सच में ‘मर्द’ कहलाएंगे। नकली मर्दानगी चिल्लाने में नहीं, संभालने में है।
**अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या निशा ने समीर को छोड़कर सही किया? क्या समीर का पछतावा सच्चा था? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं।
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मूल लेखिका : विभा गुप्ता