रिमोट कंट्रोल वाली गृहस्थी – डॉ पारुल अग्रवाल

*शादी के बाद बेटी ‘परायी’ नहीं होती, लेकिन अगर वह अपने ससुराल को ‘अपना’ नहीं मानती, तो वह पूरी जिंदगी एक ऐसे सराय में गुजार देती है जहाँ उसका बिस्तर तो होता है, पर सुकून नहीं।*

 “मीरा, क्या हम कभी एक बार भी बिना तुम्हारे ‘मायके’ के रेफरेंस के बात नहीं कर सकते? यह हमारा घर है, यहाँ के फैसले, यहाँ की समस्याएं हमारी होनी चाहिए। हर बात में—’पापा होते तो ये करते’, ‘मम्मी होतीं तो वो करतीं’—यह कब बंद होगा?”

मीरा तमक उठी। “क्यों? तुम्हें मेरे मम्मी-पापा से इतनी चिढ़ क्यों है? उन्होंने मुझे राजकुमारी की तरह पाला है। यहाँ आकर तो मैं एडजस्ट ही कर रही हूँ ना? तुम्हारी माँ सुबह छह बजे उठने की उम्मीद करती हैं, मेरे घर में तो मैं नौ बजे तक सोती थी।”

शाम की चाय का वक्त था। मेज पर गरमा-गरम पकौड़े और अदरक वाली चाय रखी थी, लेकिन कमरे का माहौल किसी बर्फीले रेगिस्तान जैसा ठंडा था। सोफे पर ३० वर्षीय मीरा बैठी थी, जिसके कान से मोबाइल फोन ऐसे चिपका था जैसे वह शरीर का ही कोई अंग हो। सामने उसका पति, आकाश, चुपचाप चाय पी रहा था, लेकिन उसकी नज़रें मीरा पर ही टिकी थीं।

“हाँ मम्मी… अरे क्या बताऊँ, आज फिर वही तोरई की सब्जी बनी है। मैंने कहा भी था कि मुझे पनीर पसंद है, पर यहाँ सुनता कौन है? … हाँ, पापा ने जो एसी (AC) लगवाया था हमारे कमरे में, उसकी कूलिंग कम लग रही है। आकाश कह रहे थे कि सर्विसिंग करवानी पड़ेगी। अरे, पापा होते तो अब तक नया एसी लगवा देते… यहाँ तो बस पैसे बचाने की होड़ लगी रहती है।”

मीरा की आवाज़ में शिकायत का वही पुराना राग था। आकाश ने चाय का कप जोर से टेबल पर रखा। खनखनाहट की आवाज़ से मीरा ने एक पल के लिए आकाश की तरफ देखा, फिर फोन पर बोली, “मम्मी, मैं थोड़ी देर में करती हूँ।”

फोन रखते ही आकाश ने गहरी सांस ली। “मीरा, क्या हम कभी एक बार भी बिना तुम्हारे ‘मायके’ के रेफरेंस के बात नहीं कर सकते? यह हमारा घर है, यहाँ के फैसले, यहाँ की समस्याएं हमारी होनी चाहिए। हर बात में—’पापा होते तो ये करते’, ‘मम्मी होतीं तो वो करतीं’—यह कब बंद होगा?”

मीरा तमक उठी। “क्यों? तुम्हें मेरे मम्मी-पापा से इतनी चिढ़ क्यों है? उन्होंने मुझे राजकुमारी की तरह पाला है। यहाँ आकर तो मैं एडजस्ट ही कर रही हूँ ना? तुम्हारी माँ सुबह छह बजे उठने की उम्मीद करती हैं, मेरे घर में तो मैं नौ बजे तक सोती थी।”

आकाश ने अपना सिर पकड़ लिया। उनकी शादी को तीन साल हो चुके थे, लेकिन मीरा आज भी मानसिक रूप से अपने मायके में ही रह रही थी। उसका शरीर आकाश के घर में था, लेकिन उसकी आत्मा, उसके फैसले, और उसकी खुशियाँ—सबका रिमोट कंट्रोल उसकी माँ, सरला जी के हाथ में था।

आकाश की माँ, सुमित्रा जी, एक बेहद सुलझी हुई महिला थीं। उन्होंने कई बार मीरा को समझाने की कोशिश की थी कि “बेटा, मायका अपनी जगह है और ससुराल अपनी जगह। अब तुम्हें अपनी गृहस्थी खुद संवारनी है।” लेकिन मीरा को लगता था कि उसकी सास उसे उसके माता-पिता से दूर करना चाहती हैं।

अगले महीने आकाश की पदोन्नति (प्रमोशन) हुई। वह बहुत खुश था। वह घर आया और मीरा को सरप्राइज देने के लिए बोला, “मीरा, चलो तैयार हो जाओ। इस वीकेंड हम नैनीताल घूमने चलेंगे। सिर्फ तुम और मैं। मैंने सब प्लान कर लिया है।”

मीरा के चेहरे पर चमक आ गई। “अरे वाह! मैं अभी मम्मी को बताती हूँ।”

उसने तुरंत फोन मिलाया। “मम्मी, आकाश नैनीताल ले जा रहे हैं!”

उधर से सरला जी की आवाज़ आई, “अरे बेटा, नैनीताल में तो अभी बहुत लैंडस्लाइड (भूस्खलन) हो रहे हैं। न्यूज़ नहीं देखी क्या? और वैसे भी, तेरी बुआ की लड़की आ रही है इस वीकेंड। तू एक काम कर, आकाश को बोल मायके ले आए। सब मिलकर यहीं पार्टी कर लेंगे। फालतू में पहाड़ों पर पैसे बर्बाद करने का क्या फायदा?”

मीरा का चेहरा उतर गया। उसने फोन रखा और आकाश से बोली, “आकाश, नैनीताल रहने देते हैं। मम्मी कह रही हैं वहां खतरा है। और बुआ की लड़की भी आ रही है। हम मम्मी के घर चलते हैं ना?”

आकाश का सब्र अब जवाब दे रहा था। “मीरा, यह ट्रिप हमारे लिए था। हमें एक-दूसरे के साथ वक्त बिताए महीनों हो गए हैं। तुम्हारी बुआ की लड़की से तुम वीडियो कॉल पर बात कर सकती हो। और लैंडस्लाइड की खबर पुरानी है, मैंने सब चेक किया है।”

“नहीं आकाश, मम्मी ने मना किया है तो कुछ सोच कर ही किया होगा। बड़ों की बात माननी चाहिए। तुम बस अपनी ज़िद करते हो।” मीरा ने फैसला सुना दिया।

आकाश उस दिन चुप रह गया, लेकिन उसके अंदर कुछ टूट गया था। वे नैनीताल नहीं गए। वे मीरा के मायके गए। वहां मीरा खुश थी, अपनी माँ के साथ हंस-हंस कर बातें कर रही थी, और आकाश एक कोने में बैठा अजनबियों की तरह मुस्कुराने का नाटक कर रहा था। वहां भी मीरा हर बात पर आकाश को नीचा दिखाती—”देखो आकाश, पापा ने नया सोफा लिया है, हमारे घर वाला तो कितना पुराना हो गया है।”

बात तब बिगड़ी जब आकाश के पिता को हार्ट अटैक आया।

रात के दो बजे थे। आकाश घबराया हुआ था। उसे पैसों की और मानसिक सहारे की ज़रूरत थी। सुमित्रा जी अस्पताल में रो रही थीं। आकाश ने मीरा को फोन किया, जो उस वक्त संयोग से अपने मायके में ही थी (किसी पूजा के लिए गई हुई थी)।

“मीरा, पापा को अटैक आया है। तुम जल्दी आ जाओ,” आकाश की आवाज़ कांप रही थी।

उधर से मीरा की नींद भरी आवाज़ आई, “हे भगवान! अभी? आकाश, इतनी रात को पापा (मीरा के पिता) गाड़ी नहीं निकालेंगे। ड्राइवर भी नहीं है। मैं सुबह आऊंगी। तुम अभी मैनेज कर लो। और हां, मम्मी कह रही थीं कि सरकारी अस्पताल मत ले जाना, इज्जत का सवाल है।”

आकाश सन्न रह गया। उसका पति, उसका जीवनसाथी मुसीबत में था, और उसे अपने पिता की नींद और ‘गाड़ी’ की चिंता थी? उसने फोन काट दिया। उस रात आकाश ने अकेले सब संभाला। पिता की एंजियोप्लास्टी हुई। दो दिन तक आकाश अस्पताल में रहा, मीरा अगले दिन दोपहर में आई, वो भी अपनी माँ के साथ। आते ही सरला जी ने कहा, “अरे समधी जी, खान-पान का ध्यान रखा करो। हमारे घर में तो हम सब योग करते हैं, इसलिए आज तक किसी को कुछ नहीं हुआ।”

अस्पताल के उस बिस्तर के पास खड़े होकर आकाश ने फैसला कर लिया।

पिताजी के ठीक होकर घर आने के बाद, आकाश ने मीरा को ड्राइंग रूम में बुलाया।

“मीरा, बैठो।” आकाश की आवाज़ में आज एक अजीब सी शांति थी।

“क्या हुआ? इतनी सीरियसली क्यों बोल रहे हो?” मीरा ने पूछा।

“मीरा, मुझे लगता है कि तुम यहाँ खुश नहीं हो। तुम्हें हर चीज़ में कमी नज़र आती है। हमारा घर छोटा है, मेरा एसी पुराना है, मेरी सोच पिछड़ी है। तुम्हें सिर्फ़ अपने मम्मी-पापा का घर, उनकी राय और उनका रहन-सहन भाता है।”

“तो? इसमें गलत क्या है? वो मेरे माँ-बाप हैं,” मीरा ने तर्क दिया।

“गलत यह नहीं कि वो तुम्हारे माँ-बाप हैं। गलत यह है कि तुम पत्नी बनकर कभी इस घर में आई ही नहीं। तुम आज भी वही जिद्दी बेटी हो। मैं अब थक चुका हूँ मीरा। मैं एक ऐसी पत्नी के साथ ज़िंदगी नहीं बिता सकता जिसका शरीर मेरे बिस्तर पर हो और दिमाग उसकी माँ के घर। मैं चाहता हूँ कि तुम अपने मायके चली जाओ।”

“क्या? तुम मुझे घर से निकाल रहे हो?” मीरा चिल्लाई। “मैं अभी पापा को फोन करती हूँ!”

“हाँ, करो। उन्हें बुलाओ और ले जाओ। क्योंकि अब मैं तुम्हारे और तुम्हारे ‘मायके’ के बीच के कंपटीशन में और नहीं दौड़ सकता। मुझे एक जीवनसाथी चाहिए था, एक रूममेट नहीं जो हर वक्त अपने पिछले हॉस्टल की तारीफ करता रहे।”

मीरा ने गुस्से में अपना सामान पैक किया। उसे पूरा यकीन था कि आकाश दो दिन में नाकों चने चबाएगा और माफ़ी मांगने आएगा। उसके पापा, रमेश जी, अपनी बड़ी गाड़ी लेकर आए और आकाश को खूब खरी-खोटी सुनाई। “मेरी बेटी को रानी बनाकर रखा था, तुमने उसकी कद्र नहीं की। देखना, पछताओगे तुम।”

मीरा मायके आ गई।

शुरुआत के दस दिन बहुत अच्छे बीते। माँ ने पसंद का खाना बनाया, पापा ने शॉपिंग करवाई। मीरा को लगा कि वह आज़ाद हो गई है। वह अपनी सहेलियों को बताती, “मैंने उस कंजूस और बोरिंग आदमी को छोड़ दिया।”

लेकिन पंद्रह दिन बाद, कहानी बदलने लगी।

मीरा के भैया और भाभी भी उसी घर में रहते थे। भाभी, जिनका नाम ‘सुप्रिया’ था, बहुत समझदार थीं, लेकिन उन्हें मीरा का हर वक्त का हस्तक्षेप अब खटकने लगा था।

एक दिन नाश्ते की मेज पर मीरा ने कहा, “भाभी, आप आलू के परांठे में घी कम डालती हैं। मम्मी तो कितना अच्छा बनाती थीं। और यह पर्दे बदलो, इनका रंग फीका हो गया है।”

सुप्रिया ने कप मेज पर रखा और बोली, “दीदी, यह मेरा घर है। यहाँ पर्दे मेरे हिसाब से लगेंगे। आप मेहमान हैं, कुछ दिन के लिए आई हैं, तो आराम कीजिये। घर की व्यवस्था मुझे संभालने दीजिये।”

मीरा को धक्का लगा। यह उसका घर था! उसने माँ की तरफ देखा, पर माँ चुप रहीं। माँ को भी अब बहु के सामने बेटी का पक्ष लेने में झिझक हो रही थी, क्योंकि बेटा नाराज़ हो सकता था।

धीरे-धीरे मीरा को अहसास होने लगा कि उसके ‘मायके’ में उसकी जगह अब वो नहीं रही जो शादी से पहले थी। अब वह ‘बेटी’ नहीं, ‘बुआ’ और ‘नन्द’ थी। एक दिन उसने सुना कि उसके पापा और भैया प्रॉपर्टी के बारे में बात कर रहे थे।

मीरा वहां पहुंची तो पापा ने कहा, “बेटा, तुम अंदर जाओ। यह घर के बड़ों की बात है।”

“पापा? मैं घर की बड़ी नहीं हूँ?” मीरा ने पूछा।

“बेटा, तुम अब पराये घर की हो। तुम्हारी ससुराल ही अब तुम्हारा घर है। यहाँ तो तुम मिलने आती हो,” पापा ने अनजाने में ही सही, पर सच बोल दिया।

उस रात मीरा को नींद नहीं आई। उसे आकाश की बातें याद आने लगीं। “तुम पत्नी बनकर कभी आई ही नहीं…”

उसे याद आया कि जब भी वह बीमार पड़ती थी, आकाश रात भर जागता था। लेकिन यहाँ मायके में, जब उसे हल्का बुखार आया, तो माँ ने कहा, “बेटा, डॉक्टर को दिखा ले, मुझे भी घुटनों में दर्द है, मैं ज्यादा दौड़-भाग नहीं कर सकती।” भाभी ने खाना तो दिया, पर कमरे में रखकर चली गईं।

उसे समझ आ गया कि जिस ‘स्वर्ग’ के गुणगान वह आकाश के सामने गाती थी, वह स्वर्ग असल में एक ‘भ्रम’ था। मायका तब तक ही अपना लगता है जब तक आप वहां ‘मेहमान’ बनकर जाओ। हमेशा के लिए रहने जाओ, तो वही माँ-बाप, वही भाई-भाभी को आप बोझ लगने लगते हैं।

उसे अपनी गलती का अहसास तब सबसे ज्यादा हुआ जब करवा चौथ आया। सुप्रिया भाभी सज-धज कर पूजा की तैयारी कर रही थीं। घर में उत्सव का माहौल था। मीरा अपने कमरे में अकेली बैठी थी। उसका फोन बजा। आकाश का नंबर नहीं था। वह उम्मीद कर रही थी कि आकाश बुलाने आएगा।

तभी उसे सुप्रिया भाभी की आवाज़ सुनाई दी। वो अपनी माँ (मीरा की सास जैसी कोई रिश्तेदार) से फोन पर बात कर रही थीं।

“हाँ माँ जी, मैं जानती हूँ। मायके की इज़्ज़त तभी है जब बेटी अपनी ससुराल संवार ले। जो औरत अपने पति के घर को अपना नहीं बना पाती, वो धोबी के कुत्ते जैसी हो जाती है, न घर की न घाट की। मेरी ननद (मीरा) को देख लो, अपनी बनी-बनाई गृहस्थी में आग लगाकर यहाँ बैठी हैं और अब यहाँ भी सबको खटक रही हैं।”

मीरा के कानों में पिघला सीसा पड़ गया हो जैसे। वह फूट-फूट कर रोई। उसने अपना घर, अपना स्वाभिमान, अपना पति—सब खो दिया था, सिर्फ़ अपनी झूठी ज़िद और माँ के रिमोट कंट्रोल के चक्कर में।

अगली सुबह, मीरा ने अपना सूटकेस पैक किया। उसकी माँ ने पूछा, “कहाँ जा रही है?”

“अपने घर,” मीरा ने सपाट आवाज़ में कहा।

“लेकिन आकाश ने तो बुलाया नहीं?” माँ ने कहा।

“गलती मेरी थी माँ, तो पहल भी मुझे ही करनी पड़ेगी। और माँ, एक बात कहूँ? आप मुझे बहुत प्यार करती हो, मैं जानती हूँ। लेकिन आपने मुझे कभी ‘पत्नी’ बनने ही नहीं दिया। आप मेरा रिमोट अपने हाथ में रखती रहीं, और मैं खुशी-खुशी कठपुतली बनी रही। आपने मेरी गृहस्थी नहीं बचाई, बल्कि अनजाने में उसे तोड़ने की नींव रखी। अब मुझे जाने दीजिये, और प्लीज… अब जब तक मैं न मांगूँ, मुझे सलाह मत दीजियेगा।”

मीरा जब अपने ससुराल, यानी आकाश के घर पहुंची, तो दरवाज़ा सुमित्रा जी ने खोला। मीरा को देखते ही वे चौंक गईं। मीरा के चेहरे पर वो अकड़ नहीं थी, वो झुकी हुई थी।

वह दौड़कर सास के पैरों में गिर पड़ी। “मम्मी जी, मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं भटक गई थी। मुझे लगा था कि जहाँ जन्म हुआ वही मेरा घर है। पर आज समझ आया कि जहाँ मेरा सम्मान है, जहाँ मेरा सिंदूर है, वही मेरा असली घर है।”

आकाश पीछे खड़ा था। वह अभी भी नाराज़ था, लेकिन मीरा की आँखों में जो पछतावा था, वह सच्चा था।

मीरा आकाश के पास गई। “आकाश, मैं यह नहीं कहूँगी कि मैं बदल गई हूँ, क्योंकि बदलाव एक दिन में नहीं आता। पर मैं वादा करती हूँ कि अब इस घर के फैसलों में ‘तीसरे’ की आवाज़ नहीं होगी। अब एसी पुराना हो या नया, उसकी हवा हम दोनों खाएंगे। अब मैं ‘तुम्हारी मीरा’ बनना चाहती हूँ, ‘रमेश जी की बेटी’ नहीं।”

आकाश ने कुछ पल मीरा को देखा, फिर धीरे से उसका हाथ थाम लिया। “स्वागत है मीरा… तुम्हारे अपने घर में।”

उस दिन के बाद, मीरा ने अपना फोन अपनी माँ से बात करने के लिए तो उठाया, पर शिकायत करने के लिए नहीं। जब भी उसकी माँ पूछतीं, “वहां सब ठीक है?” तो मीरा बस इतना कहती, “हाँ मम्मी, सब बहुत अच्छा है। यह मेरा घर है, मैं संभाल लूंगी।”

मीरा ने समझ लिया था कि पेड़ को बढ़ने के लिए जड़ों से जुड़े रहना ज़रूरी है, लेकिन अगर वो पेड़ अपनी नई ज़मीन में जड़ें नहीं जमाएगा, तो पहली आंधी में उखड़ जाएगा।

**कहानी का सार:**

लड़कियों के लिए मायका एक ‘पावर बैंक’ की तरह होना चाहिए, जहाँ जाकर वे रिचार्ज हो सकें, न कि वो ‘जनरेटर’ जिस पर उनका पूरा जीवन चले। जो स्त्रियां अपने पति और ससुराल को अपना नहीं मानतीं और हर बात की तुलना मायके से करती हैं, वे अक्सर अपने हाथों से अपने सुख की चिता जला बैठती हैं। शादी के बाद प्राथमिकताओं का बदलना ही सुखी दांपत्य जीवन की कुंजी है।

**अंत में आपसे एक सवाल:**

क्या आकाश का मीरा को घर से जाने के लिए कहना सही था? क्या कभी-कभी कठोर फैसले ही रिश्तों को सही पटरी पर लाते हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।

**”अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें ताकि यह संदेश हर उस बेटी तक पहुंचे जो अपनी गृहस्थी में उलझी हुई है। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**

मूल लेखिका : डॉ पारुल अग्रवाल

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