माँ के बाद… बाबूजी का ‘मायका’ – रमा शुक्ला

 “माँ के जाने के बाद बेटी को लगा कि अब मायके के दरवाजे उसके लिए बंद हो चुके हैं, वहां अब सिर्फ भाई-भाभी का राज होगा। लेकिन जब उसने ‘पराई’ होकर उस घर की देहरी लांघी, तो एक बूढ़े पिता ने अपनी कांपती हथेलियों में कुछ ऐसा थाम रखा था, जिसने ‘मायके’ की परिभाषा ही बदल दी। क्या एक पिता… ‘माँ’ बन सकता है?”

उन्होंने सुधा के आंसू पोंछे। “सुधा, तेरी माँ चली गई, पर तेरा बाप तो ज़िंदा है। मुझे पता है कि मायका ‘माँ’ से होता है। लेकिन बेटा, जब तक मैं हूँ, मैं इस घर को सिर्फ़ ‘भाई का घर’ नहीं बनने दूंगा। मैं कोशिश करूँगा… थोड़ी टूटी-फूटी ही सही… कि तुझे कभी यह न लगे कि तेरा कोई इंतज़ार करने वाला नहीं है।”

ट्रेन की रफ़्तार धीमी हो रही थी, और उसके साथ-साथ सुधा की धड़कनें तेज होती जा रही थीं। खिड़की से बाहर पीछे छूटते पेड़-पौधों को देखते हुए उसकी आँखों में एक अजीब सी उदासी थी। यह वही रास्ता था, वही स्टेशन था, जहाँ आने के लिए वह शादी के बाद साल भर तड़पती थी। पर आज… आज उसके कदम भारी थे।

सुधा का यह पहला फेरा था—माँ के गुजर जाने के बाद।

तीन महीने पहले जब माँ को हार्ट अटैक आया था, तब वह आखिरी बार आई थी। तब घर में रोना-धोना था, रिश्तेदारों का जमावड़ा था। लेकिन आज, जब सब शांत हो चुका था, उसे अकेले जाना था। पति, रमन ने बहुत समझाया था—”सुधा, हो आओ। पिता जी अकेले हैं, भाई-भाभी भी हैं। कब तक मन में गांठ बांधे रहोगी?”

सुधा ने मन ही मन सोचा, “रमन नहीं समझेंगे। मायका ‘माँ’ से होता है। माँ थी तो वह घर बुलाता था, अधिकार जताता था। अब माँ नहीं है, तो वह घर ‘भाई का घर’ बन गया है। वहां अब मेहमान की तरह जाना होगा, सोफे के कोने पर सिकुड़ कर बैठना होगा, और पानी के लिए भी शायद पूछना पड़ेगा।”

स्टेशन पर उतरी तो कोई लेने नहीं आया था। पहले माँ हफ़्तों पहले से भाई को हिदायत देती थी—”सुधा आ रही है, गाड़ी समय पर स्टेशन ले जाना।” आज उसने ऑटो किया।

घर के लोहे के गेट पर जंग लग गया था। तुलसी का पौधा, जिसे माँ अपने बच्चों की तरह सींचती थी, अब सूख कर कांटा हो चुका था। सुधा ने घंटी बजाई।

काफी देर बाद दरवाजा खुला। भाभी, गरिमा, सामने खड़ी थीं।

“अरे दीदी, आप? इतनी धूप में? बताया भी नहीं कि आ रही हैं?” गरिमा ने औपचारिकता निभाते हुए कहा और रास्ते से हट गई।

सुधा ने मुस्कराने की कोशिश की। “बस ऐसे ही प्रोग्राम बन गया गरिमा। बाबूजी कहाँ हैं?”

“बाबूजी तो अपने कमरे में हैं। टीवी देख रहे होंगे या सो रहे होंगे। आप बैठिए, मैं पानी लाती हूँ।”

सुधा ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठ गई। वही सोफा, वही पर्दे, वही दीवारें। सब कुछ वही था, पर सब कुछ बदला हुआ था। पहले जैसे ही वह गेट से घुसती थी, रसोई से माँ की आवाज़ आती थी—”आ गई मेरी लाड़ो! कितनी धूप हो रही है, रुक मैं शर्बत लाती हूँ।” और फिर माँ का पल्लू उसके पसीने को पोंछता था।

आज एसी की ठंडी हवा थी, पर उस हवा में माँ की गर्मी नहीं थी। घर में एक अजीब सा सन्नाटा था। भाई, अमित, अभी ऑफिस में था।

गरिमा पानी लेकर आई। “दीदी, चाय बना दूँ? या कॉफ़ी लेंगे?”

“नहीं रहने दे, बस पानी ठीक है,” सुधा ने कहा। उसे याद आया कि कैसे माँ उसके मना करने पर भी जबरदस्ती अदरक वाली चाय और बेसन के पकोड़े बना लाती थी। आज गरिमा ने शिष्टाचार में पूछा, और सुधा ने शिष्टाचार में मना कर दिया। यही फर्क था ‘माँ के घर’ और ‘मायके’ में।

सुधा उठी और अपने पुराने कमरे की ओर गई। दरवाजा खोला तो देखा वहां अब कबाड़ भरा पड़ा था। पुराना कूलर, रद्दी अखबार, और टूटी कुर्सियां। उसकी किताबों वाली अलमारी गायब थी।

उसकी आँखों में आंसू आ गए। “माँ के जाते ही मेरा वजूद भी इस घर से मिटा दिया गया,” उसने सोचा। उसे लगा कि रमन गलत थे, उसे यहाँ नहीं आना चाहिए था। वह यहाँ अब एक बाहरी व्यक्ति है।

दोपहर के खाने पर भी वही औपचारिकता रही। खाने में लौकी की सब्जी और दाल थी। सुधा को लौकी बिल्कुल पसंद नहीं थी, यह बात माँ जानती थी, पर गरिमा को शायद याद नहीं था या उसे फर्क नहीं पड़ता था। सुधा ने चुपचाप दो निवाले खाए और प्लेट रख दी।

“दीदी, खाना अच्छा नहीं बना क्या?” गरिमा ने पूछा।

“नहीं-नहीं, भूख कम है। सफर की थकान है,” सुधा ने झूठ बोला।

शाम को अमित ऑफिस से आया। “अरे दीदी, कैसी हो?” उसने पूछा, थोड़ी देर बैठा, इधर-उधर की बातें कीं और फिर अपने कमरे में चला गया। “कल मीटिंग है, प्रेजेंटेशन तैयार करनी है,” यह कहकर।

रात हो गई। सुधा को नींद नहीं आ रही थी। उसे घुटन महसूस हो रही थी। उसने तय किया कि कल सुबह ही पहली ट्रेन से वापस चली जाएगी। यहाँ अब उसका कोई नहीं है। बाबूजी से भी उसने बस थोड़ी बहुत बात की थी। वे भी अब बहुत चुप रहने लगे थे। माँ के जाने के बाद जैसे वे भी घर के किसी कोने में फर्नीचर की तरह हो गए थे।

सुबह के पांच बजे थे। सुधा अपना बैग पैक कर रही थी। तभी उसे रसोई से कुछ खट-पट की आवाज़ सुनाई दी।

“इतनी सुबह कौन?” सुधा ने सोचा। “गरिमा तो आठ बजे से पहले उठती नहीं है।”

कौतूहलवश सुधा कमरे से बाहर निकली और दबे पाँव रसोई की तरफ गई। वहां का नज़ारा देख उसके कदम ठिठक गए।

सत्तर साल के उसके बाबूजी, जिनका हाथ हमेशा कांपता था, गैस के सामने खड़े थे। उन्होंने एक हाथ से पतीला पकड़ रखा था और दूसरे हाथ से दूध चला रहे थे। स्लैब पर आटा फैला हुआ था और कुछ जले हुए परांठे प्लेट में रखे थे।

सुधा की आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। बाबूजी ने ज़िंदगी में कभी पानी का गिलास खुद लेकर नहीं पिया था। आज वे रसोई में क्या कर रहे थे?

“बाबूजी?” सुधा की आवाज़ कांप गई।

बाबूजी हड़बड़ा गए। उनके हाथ से चमचा गिर गया। वे मुड़े, चेहरे पर एक अपराधबोध भरी मुस्कान थी, जैसे कोई बच्चा चोरी करते पकड़ा गया हो।

“अरे बेटा… तू जाग गई? मैं… मैं तो बस…” वे हकलाने लगे।

सुधा दौड़कर उनके पास गई। “यह क्या कर रहे हैं आप? हाथ जला लेंगे। और यह सब… दूध, आटा… गरिमा कहाँ है?”

बाबूजी ने सुधा के सिर पर हाथ रखा। उनकी आँखों में नमी थी।

“गरिमा सो रही है बेटा। उसे मत जगाना। वो… कल दोपहर मैंने देखा था तूने खाना ठीक से नहीं खाया। तुझे लौकी पसंद नहीं है न? तेरी माँ कहती थी कि मेरी सुधा को आलू-प्याज के परांठे और गाढ़ी खीर बहुत पसंद है।”

सुधा सन्न रह गई।

बाबूजी ने अपने कुर्ते से एक छोटी सी डायरी निकाली। “तेरी माँ के जाने के बाद मुझे कुछ बनाना नहीं आता था। पर मुझे पता था तू कभी न कभी तो आएगी। तो मैंने यूट्यूब से देख-देख कर इस डायरी में रेसिपी लिखी थी। कल रात भर जागकर वीडियो देखा कि नरम परांठे कैसे बनाते हैं। देख, थोड़े जल गए हैं, तेरी माँ जैसे तो नहीं बने होंगे… पर कोशिश की है।”

सुधा के सब्र का बांध टूट गया। वह वहीं रसोई के फर्श पर, बाबूजी के पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगी।

“बाबूजी… आपको यह सब करने की क्या ज़रुरत थी? मैं तो बस…”

बाबूजी ने झुककर उसे उठाया। वे खुद भी रो रहे थे।

“ज़रुरत थी बेटा,” बाबूजी ने भारी आवाज़ में कहा। “कल जब तू आई, तो मैंने तेरी आँखों में देखा। तू अपनी माँ को ढूंढ रही थी। तू उस ‘मायके’ को ढूंढ रही थी जहाँ तुझे हक़ से डांटा जाए, जहाँ तेरी पसंद का खाना बने, जहाँ तुझे ‘मेहमान’ नहीं ‘बेटी’ समझा जाए।”

उन्होंने सुधा के आंसू पोंछे। “सुधा, तेरी माँ चली गई, पर तेरा बाप तो ज़िंदा है। मुझे पता है कि मायका ‘माँ’ से होता है। लेकिन बेटा, जब तक मैं हूँ, मैं इस घर को सिर्फ़ ‘भाई का घर’ नहीं बनने दूंगा। मैं कोशिश करूँगा… थोड़ी टूटी-फूटी ही सही… कि तुझे कभी यह न लगे कि तेरा कोई इंतज़ार करने वाला नहीं है।”

बाबूजी ने पास रखे एक डिब्बे को खोला। उसमें बाज़ार की मिठाई नहीं, बल्कि घर के बनाए बेसन के लड्डू थे—बेडौल, थोड़े कच्चे, थोड़े पक्के।

“तेरी माँ हर बार तुझे विदाई में बेसन के लड्डू देती थी न? मैंने बनाए हैं। गरिमा हंस रही थी कि आप क्यों परेशान हो रहे हैं, बाज़ार से मंगवा देते हैं। पर बाज़ार की मिठाई में वो आशीर्वाद कहाँ जो माँ-बाप के हाथों में होता है?”

सुधा ने उस अधजले परांठे का एक टुकड़ा तोड़ा और मुंह में डाला। उसमें नमक थोड़ा ज्यादा था, वह थोड़ा कच्चा भी था। लेकिन सुधा के लिए वह दुनिया का सबसे स्वादिष्ट भोजन था। उस निवाले में उसे अपनी माँ का स्वाद मिल गया था।

“आप… आप दुनिया के सबसे अच्छे शेफ हैं बाबूजी,” सुधा ने हंसते हुए और रोते हुए कहा।

बाबूजी भी मुस्कुरा दिए। “चल, अब मुंह हाथ धो ले। अमित और गरिमा उठेंगे तो उन्हें लगेगा मैंने रसोई गंदी कर दी। जल्दी-जल्दी साफ़ कर देते हैं। और सुन… आज नहीं जाएगी तू। मैंने शाम के लिए गाजर का हलवा बनाने की विधि भी लिख रखी है। वो खाकर जाना।”

सुधा ने अपना बैग वापस कमरे में रख दिया।

जब वह नाश्ते की मेज पर बैठी, तो अमित और गरिमा भी आ गए। गरिमा ने देखा कि सुधा बड़े चाव से वही टेढ़े-मेढ़े परांठे खा रही है और बाबूजी उसे बड़े प्यार से खिला रहे हैं।

“अरे दीदी, यह क्या? बाबूजी ने रसोई का क्या हाल किया है? मैं नाश्ता बना देती,” गरिमा ने चिढ़ते हुए कहा।

सुधा ने पहली बार गरिमा की आँखों में आँखें डालकर, पूरे आत्मविश्वास और हक़ के साथ कहा, “रहने दे गरिमा। आज नाश्ता मेरे ‘मायके’ से मिला है। मेरे बाबूजी ने बनाया है। इसका स्वाद तुम नहीं समझोगी।”

अमित ने अपने पिता की तरफ देखा, जो आज सालों बाद इतने खुश और व्यस्त लग रहे थे। उसे भी अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने धीरे से कहा, “बाबूजी, अगली बार मुझे भी सिखाइएगा। दीदी के लिए हम दोनों मिलकर बनाएंगे।”

सुधा ने उस दिन जाना कि मायका सिर्फ ‘माँ का घर’ नहीं होता। मायका वह एहसास है जहाँ कोई निस्वार्थ भाव से आपकी खुशी की परवाह करे। माँ के जाने से एक शून्य ज़रूर आया था, लेकिन बाबूजी ने अपने कांपते हाथों और जले हुए परांठों से उस शून्य को भर दिया था।

शाम को जब सुधा विदा हो रही थी, तो इस बार उसकी झोली खाली नहीं थी। उसके पास बेसन के लड्डू का डिब्बा था, और मन में एक सुकून था।

गेट पर बाबूजी खड़े थे। “जल्दी आना बेटा। अगली बार कढ़ी-चावल बनाना सीख रखूँगा।”

सुधा ने मुस्कुराकर हाथ हिलाया। ऑटो जब चला, तो उसने पीछे मुड़कर उस घर को देखा। तुलसी का पौधा अभी भी सूखा था, गेट पर अभी भी जंग लगा था। लेकिन अब वह घर उसे ‘खंडहर’ नहीं लग रहा था। वह उसे आवाज़ दे रहा था। उसमें वो कशिश, वो खिंचाव वापस आ गया था।

क्योंकि अब वह सिर्फ ईंट-पत्थर का मकान नहीं था। वह बाबूजी का बनाया हुआ नया ‘मायका’ था। एक ऐसा मायका जहाँ माँ की ममता अब पिता के रूप में जिंदा थी।

रास्ते भर सुधा उन बेडौल लड्डुओं को अपनी गोद में रखे रही, जैसे कोई अनमोल खजाना हो। उसे समझ आ गया था कि रिश्ते खून से नहीं, बल्कि ‘महसूस’ करने से बचते हैं। और आज एक पिता ने साबित कर दिया था कि बेटी के लिए वह माँ की परछाई भी बन सकते हैं।

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अक्सर हम सोचते हैं कि माँ के बिना घर बिखर जाता है, लेकिन कई बार पिता उस बिखरे हुए घर को अपने मौन प्रेम से समेट लेते हैं। पिता का प्यार अक्सर खामोश होता है, पर जब वो छलक कर बाहर आता है, तो उसकी गहराई को नापना नामुमकिन होता है।

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मूल लेखिका : रमा शुक्ला

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